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नज़्म
कुछ ऐसे हैं कि तीस इक साल होने आए हैं अब जिन की रहलत को
इधर कुछ सानेहे ताज़ा भी हैं हफ़्तों महीनों के
अब्दुल अहद साज़
नज़्म
कहा किस ने कि इस्तिब्दाद इक ज़िमनी हक़ीक़त है
कहा किस ने तशद्दुद बरबरियत कम बक़ा कुछ सानेहे से हैं
सत्यपाल आनंद
नज़्म
आह लेकिन कौन जाने कौन समझे जी का हाल
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
है आख़िर ज़िंदगी ख़ून अज़-बुन-ए-नाख़ुन बर-आवर-तर
क़यामत सानेहा मतलब क़यामत फ़ाजिआ परवर