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नज़्म
अंजुम ख़लीक़
नज़्म
रस्ता ये जाना-पहचाना है कभी कभी ये अपना होता था
बरसों बरस तक इन पथ पर प्यार हमारा संजोता था
शहाब जाफ़री
नज़्म
मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग
मैं ने समझा था कि तू है तो दरख़्शाँ है हयात
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
हम ने इस इश्क़ में क्या खोया है क्या सीखा है
जुज़ तिरे और को समझाऊँ तो समझा न सकूँ
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
तअस्सुब छोड़ नादाँ दहर के आईना-ख़ाने में
ये तस्वीरें हैं तेरी जिन को समझा है बुरा तू ने