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नज़्म
दर्द की सीप में एक भी बूँद मोती नहीं बन सकी
दिल के कश्कोल में एक सिक्का मसर्रत का खनका नहीं
रफ़ीआ शबनम आबिदी
नज़्म
'उफ़ुक़ की गोद में लिपटी हुई ये धुँद की चादर
ये बिखरे सीप ये पाँव तले कुचली हुई रेतें