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नज़्म
ये ख़त लिखना तो दक़यानूस की पीढ़ी का क़िस्सा है
ये सिंफ़-ए-नस्र हम ना-बालिग़ों के फ़न का हिस्सा है
जौन एलिया
नज़्म
आसमाँ जान-ए-तरब को वक़्फ़-ए-रंजूरी करे
सिंफ़-ए-नाज़ुक भूक से तंग आ के मज़दूरी करे
जोश मलीहाबादी
नज़्म
जानती है अपनी रुस्वाई को तो वज्ह-ए-नुमूद
सिंफ़-ए-नाज़ुक की खुली तौहीन है तेरा वजूद
माहिर-उल क़ादरी
नज़्म
ख़ाका-ए-दस्तूर-ए-क़ौमी या'नी वो शे'री रिपोर्ट
'अम्न'-साहब ने रक़म की थी ब-सिंफ़-ए-मसनवी
रज़ा नक़वी वाही
नज़्म
मर्सिया-ए-गोई बनी मुक़्तदिर इक सिंफ़-ए-सुख़न
या'नी इस फ़न को मिला आप से रुत्बा क्या क्या
नाज़िश प्रतापगढ़ी
नज़्म
है ग़लत-गो फिर भी हर इक सिंफ़ में साइब है वो
लिख रहा है ख़ुद ही अपनी अज़्मतों की दास्ताँ
नुसरत मेहदी
नज़्म
क़तार-दर-क़तार सिंफ़-हा-ए-ख़ल्क़ देखती हुई
क़ज़ा भी ठहर कर नज़र बचा के देखने लगी
अब्दुल्लाह साक़िब
नज़्म
जंग-ए-आज़ादी की मश'अल बन गई हज़रत महल
और ऊँचा कर दिया है सिंफ़-ए-नाज़ुक का मक़ाम