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नज़्म
मियान-ए-शाख़-साराँ सोहबत-ए-मुर्ग़-ए-चमन कब तक
तिरे बाज़ू में है परवाज़-ए-शाहीन-ए-क़हस्तानी
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
ज़िंदगी की ओज-गाहों से उतर आते हैं हम
सोहबत-ए-मादर में तिफ़्ल-ए-सादा रह जाते हैं हम
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
इस की सोहबत से फ़रोज़ाँ आज शम-ए-ए'तिबार
इस की उल्फ़त से दरख़्शाँ आज हुस्न-ए-इख़्तियार
अता आबिदी
नज़्म
था दिमाग़-ओ-दिल में सहबा-ए-क़नाअत का सुरूर
थी जवाब-ए-सतवत-ए-शाही तिरी तब-ए-ग़यूर
मिर्ज़ा मोहम्मद हादी अज़ीज़ लखनवी
नज़्म
अच्छे और बुरे की सोहबत अपना रंग दिखाती है
खोटे और खरे की तुम को हो पहचान ज़रूरी है