aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "sparsh"
तुम्हारी आँखें तुम वहीं तो बसते होएक जिस्म को दुनिया ने तुम्हारा नाम दियातुम्हें पाया तुम्हारी आँखों में है मैं नेउन दो पलकों ने छुआ है मुझेतुम्हारी उँगलियों के जादुई स्पर्श सीमेरे चेहरे की नर्म गुलाबी गलियों में खोईमेरी ज़ुल्फ़ों में उलझी हुई रेशम से तर-ब-तर ये आँखेंकभी होंठ बन कर तुम्हारी साँसों की आहट कोचुपके से मेरे कानों में रख जाती हैतुम्हारे ज़ेहन में पनप रहे हरनाज़ुक जज़्बात की ख़ुशबू है तुम्हारी आँखेंमेरे काँपते होंटों पे तुम्हारे होंटों केनिशान है तुम्हारी आँखेंवही तो है जो हथेलियाँ बन कर मज़बूती सेमेरा हाथ थामे हुए है अब तकतुम्हारे दिल सी धड़कती है तुम्हारी आँखेंमेरे अश्कों का हर एक क़तराउन की नमी में डूब कर एक हो जाता हैरात के सन्नाटे में मज़बूत बाहें बन करअपनी ठंडक में सुला देती हैतुम्हारे क़दम बन कर साथ चली है जैसे तुम चलतेउस ने लूटा नहीं लौटाया है मुझे अपने आप कोइन आँखों में एक घर बसाया है मैं नेतुम्हारे जिस्म में जुड़ी है मगरमेरी है तुम्हारी आँखें
दिशाएँ मुझ में सिमट आई हैंआसमान ज़ुल्म-ओ-जब्र के बावजूदअपने तमाम रंगों के साथमेरी आँखों में उतर रहा हैधरा की शिरा शिरा मेंउमड़आया है समय का रागहवाओं के पारस्पर्श से परेभीतर जो बोलता हैकुछ निराकारआखर की आग मेंनहाया हुआहाथों में पोर-पोर मेंकर्म सा समाया हुआपूर्वज के पौरूष साया काल पुष्पमौन अपने प्रवाह में है लय-मानगतियों से आबद्ध मेंशब्द अतीत गानपृथ्वी अपने इस छन में सुंदरतम हैक्यों कि उस ने शब्द को धारण किया हैइस लिए मुझ पर जो बीत रही हैशायद वो कविता हैऔर ये छनइतिहास पृथ्वी सृष्टि क्यापूरे ब्रह्मांड पर भारी है
पुरानी बहुत पुरानी काई लगी दीवारलखोरी ईंटों कीइतिहास ने अपने लम्बे लम्बे हाथों से जोड़ों को जिस के बाँधा हैऔर गुलाबी भूरे सब्ज़ मिले-जुले धब्बों से जिस पर लाख कहानीलिख डाली हैअलबेली किरनें रोज़ सुब्ह चुपके से उस पर चढ़ जाती हैंइधर उधर फिर झाँकती हैंऔर एक एक करके दबे पाँवकोनों में इस के लुक जाती हैंदौड़ दौड़ कर आँख-मिचौली खेलती हैंलज्जा से चूर लता निहुड़ाए सर मुस्काती हैहल्के से उस के दामन से दो-चार फूल टपक जाते हैंसहर उठता है सब्ज़ाआसमान ने आज उसे फिररंग लताफ़त ख़ुशबू का ये कोमल तोहफ़ाभेंट किया हैमन उस का ये दौलतपा कर भी भर आता हैये आनंद अनंत नहीं हैमगर यही स्पर्शहज़ारों तारों में जीवन दुनिया केरस भरता हैऔर फिर इस से ऐसे राग निकलते हैंजो कभी नहीं मरतेइस दीवार के साए मेंइस उपवन मेंसर्द खड़े हैं बिल्कुल सीधेसाकित चुपअशोक बड़ी गम्भीर सोच में गुमपुराने मंदिर जैसेकँवल की कलियाँहरी हरी सारी फैलाएतैर रही हैंऔर फ़व्वारा हल्के हल्के यूँ चलता हैजैसे सुब्ह को बालकसोई माँ के डर सेसिसक सिसक कर बिल्के
हुआ ख़ेमा-ज़न कारवान-ए-बहारइरम बन गया दामन-ए-कोह-सारगुल ओ नर्गिस ओ सोसन ओ नस्तरनशहीद-ए-अज़ल लाला-ख़ूनीं कफ़नजहाँ छुप गया पर्दा-ए-रंग मेंलहू की है गर्दिश रग-ए-संग मेंफ़ज़ा नीली नीली हवा में सुरूरठहरते नहीं आशियाँ में तुयूरवो जू-ए-कोहिस्ताँ उचकती हुईअटकती लचकती सरकती हुईउछलती फिसलती सँभलती हुईबड़े पेच खा कर निकलती हुईरुके जब तो सिल चीर देती है येपहाड़ों के दिल चीर देती है येज़रा देख ऐ साक़ी-ए-लाला-फ़ामसुनाती है ये ज़िंदगी का पयामपिला दे मुझे वो मय-ए-पर्दा-सोज़कि आती नहीं फ़स्ल-ए-गुल रोज़ रोज़वो मय जिस से रौशन ज़मीर-ए-हयातवो मय जिस से है मस्ती-ए-काएनातवो मय जिस में है सोज़-ओ-साज़-ए-अज़लवो मय जिस से खुलता है राज़-ए-अज़लउठा साक़िया पर्दा इस राज़ सेलड़ा दे ममूले को शहबाज़ सेज़माने के अंदाज़ बदले गएनया राग है साज़ बदले गएहुआ इस तरह फ़ाश राज़-ए-फ़रंगकि हैरत में है शीशा-बाज़-ए-फ़रंगपुरानी सियासत-गरी ख़्वार हैज़मीं मीर ओ सुल्ताँ से बे-ज़ार हैगया दौर-ए-सरमाया-दारी गयातमाशा दिखा कर मदारी गयागिराँ ख़्वाब चीनी सँभलने लगेहिमाला के चश्मे उबलने लगेदिल-ए-तूर-ए-सीना-ओ-फ़ारान दो-नीमतजल्ली का फिर मुंतज़िर है कलीममुसलमाँ है तौहीद में गरम-जोशमगर दिल अभी तक है ज़ुन्नार-पोशतमद्दुन तसव्वुफ़ शरीअत-ए-कलामबुतान-ए-अजम के पुजारी तमामहक़ीक़त ख़ुराफ़ात में खो गईये उम्मत रिवायात में खो गईलुभाता है दिल को कलाम-ए-ख़तीबमगर लज़्ज़त-ए-शौक़ से बे-नसीबबयाँ इस का मंतिक़ से सुलझा हुआलुग़त के बखेड़ों में उलझा हुआवो सूफ़ी कि था ख़िदमत-ए-हक़ में मर्दमोहब्बत में यकता हमीयत में फ़र्दअजम के ख़यालात में खो गयाये सालिक मक़ामात में खो गयाबुझी इश्क़ की आग अंधेर हैमुसलमाँ नहीं राख का ढेर हैशराब-ए-कुहन फिर पिला साक़ियावही जाम गर्दिश में ला साक़ियामुझे इश्क़ के पर लगा कर उड़ामिरी ख़ाक जुगनू बना कर उड़ाख़िरद को ग़ुलामी से आज़ाद करजवानों को पीरों का उस्ताद करहरी शाख़-ए-मिल्लत तिरे नम से हैनफ़स इस बदन में तिरे दम से हैतड़पने फड़कने की तौफ़ीक़ देदिल-ए-मुर्तज़ा सोज़-ए-सिद्दीक़ देजिगर से वही तीर फिर पार करतमन्ना को सीनों में बेदार करतिरे आसमानों के तारों की ख़ैरज़मीनों के शब ज़िंदा-दारों की ख़ैरजवानों को सोज़-ए-जिगर बख़्श देमिरा इश्क़ मेरी नज़र बख़्श देमिरी नाव गिर्दाब से पार करये साबित है तो इस को सय्यार करबता मुझ को असरार-ए-मर्ग-ओ-हयातकि तेरी निगाहों में है काएनातमिरे दीदा-ए-तर की बे-ख़्वाबियाँमिरे दिल की पोशीदा बेताबियाँमिरे नाला-ए-नीम-शब का नियाज़मिरी ख़ल्वत ओ अंजुमन का गुदाज़उमंगें मिरी आरज़ूएँ मिरीउम्मीदें मिरी जुस्तुजुएँ मिरीमिरी फ़ितरत आईना-ए-रोज़गारग़ज़ालान-ए-अफ़्कार का मुर्ग़-ज़ारमिरा दिल मिरी रज़्म-गाह-ए-हयातगुमानों के लश्कर यक़ीं का सबातयही कुछ है साक़ी मता-ए-फ़क़ीरइसी से फ़क़ीरी में हूँ मैं अमीरमिरे क़ाफ़िले में लुटा दे इसेलुटा दे ठिकाने लगा दे इसेदमा-दम रवाँ है यम-ए-ज़िंदगीहर इक शय से पैदा रम-ए-ज़िंदगीइसी से हुई है बदन की नुमूदकि शो'ले में पोशीदा है मौज-ए-दूदगिराँ गरचे है सोहबत-ए-आब-ओ-गिलख़ुश आई इसे मेहनत-ए-आब-ओ-गिलये साबित भी है और सय्यार भीअनासिर के फंदों से बे-ज़ार भीये वहदत है कसरत में हर दम असीरमगर हर कहीं बे-चुगों बे-नज़ीरये आलम ये बुत-ख़ाना-ए-शश-जिहातइसी ने तराशा है ये सोमनातपसंद इस को तकरार की ख़ू नहींकि तू मैं नहीं और मैं तू नहींमन ओ तू से है अंजुमन-आफ़रींमगर ऐन-ए-महफ़िल में ख़ल्वत-नशींचमक उस की बिजली में तारे में हैये चाँदी में सोने में पारे में हैउसी के बयाबाँ उसी के बबूलउसी के हैं काँटे उसी के हैं फूलकहीं उस की ताक़त से कोहसार चूरकहीं उस के फंदे में जिब्रील ओ हूरकहीं जज़ा है शाहीन सीमाब रंगलहू से चकोरों के आलूदा चंगकबूतर कहीं आशियाने से दूरफड़कता हुआ जाल में ना-सुबूरफ़रेब-ए-नज़र है सुकून ओ सबाततड़पता है हर ज़र्रा-ए-काएनातठहरता नहीं कारवान-ए-वजूदकि हर लहज़ है ताज़ा शान-ए-वजूदसमझता है तू राज़ है ज़िंदगीफ़क़त ज़ौक़-ए-परवाज़ है ज़िंदगीबहुत उस ने देखे हैं पस्त ओ बुलंदसफ़र उस को मंज़िल से बढ़ कर पसंदसफ़र ज़िंदगी के लिए बर्ग ओ साज़सफ़र है हक़ीक़त हज़र है मजाज़उलझ कर सुलझने में लज़्ज़त उसेतड़पने फड़कने में राहत उसेहुआ जब उसे सामना मौत काकठिन था बड़ा थामना मौत काउतर कर जहान-ए-मकाफ़ात मेंरही ज़िंदगी मौत की घात मेंमज़ाक़-ए-दुई से बनी ज़ौज ज़ौजउठी दश्त ओ कोहसार से फ़ौज फ़ौजगुल इस शाख़ से टूटते भी रहेइसी शाख़ से फूटते भी रहेसमझते हैं नादाँ उसे बे-सबातउभरता है मिट मिट के नक़्श-ए-हयातबड़ी तेज़ जौलाँ बड़ी ज़ूद-रसअज़ल से अबद तक रम-ए-यक-नफ़सज़माना कि ज़ंजीर-ए-अय्याम हैदमों के उलट-फेर का नाम हैये मौज-ए-नफ़स क्या है तलवार हैख़ुदी क्या है तलवार की धार हैख़ुदी क्या है राज़-दरून-हयातख़ुदी क्या है बेदारी-ए-काएनातख़ुदी जल्वा बदमस्त ओ ख़ल्वत-पसंदसमुंदर है इक बूँद पानी में बंदअँधेरे उजाले में है ताबनाकमन ओ तू में पैदा मन ओ तू से पाकअज़ल उस के पीछे अबद सामनेन हद उस के पीछे न हद सामनेज़माने के दरिया में बहती हुईसितम उस की मौजों के सहती हुईतजस्सुस की राहें बदलती हुईदमा-दम निगाहें बदलती हुईसुबुक उस के हाथों में संग-ए-गिराँपहाड़ उस की ज़र्बों से रेग-ए-रवाँसफ़र उस का अंजाम ओ आग़ाज़ हैयही उस की तक़्वीम का राज़ हैकिरन चाँद में है शरर संग मेंये बे-रंग है डूब कर रंग मेंइसे वास्ता क्या कम-ओ-बेश सेनशेब ओ फ़राज़ ओ पस-ओ-पेश सेअज़ल से है ये कशमकश में असीरहुई ख़ाक-ए-आदम में सूरत-पज़ीरख़ुदी का नशेमन तिरे दिल में हैफ़लक जिस तरह आँख के तिल में हैख़ुदी के निगहबाँ को है ज़हर-नाबवो नाँ जिस से जाती रहे उस की आबवही नाँ है उस के लिए अर्जुमंदरहे जिस से दुनिया में गर्दन बुलंदख़ुदी फ़ाल-ए-महमूद से दरगुज़रख़ुदी पर निगह रख अयाज़ी न करवही सज्दा है लाइक़-ए-एहतिमामकि हो जिस से हर सज्दा तुझ पर हरामये आलम ये हंगामा-ए-रंग-ओ-सौतये आलम कि है ज़ेर-ए-फ़रमान-ए-मौतये आलम ये बुत-ख़ाना-ए-चश्म-ओ-गोशजहाँ ज़िंदगी है फ़क़त ख़ुर्द ओ नोशख़ुदी की ये है मंज़िल-ए-अव्वलींमुसाफ़िर ये तेरा नशेमन नहींतिरी आग इस ख़ाक-दाँ से नहींजहाँ तुझ से है तू जहाँ से नहींबढ़े जा ये कोह-ए-गिराँ तोड़ करतिलिस्म-ए-ज़मान-ओ-मकाँ तोड़ करख़ुदी शेर-ए-मौला जहाँ उस का सैदज़मीं उस की सैद आसमाँ उस का सैदजहाँ और भी हैं अभी बे-नुमूदकि ख़ाली नहीं है ज़मीर-ए-वजूदहर इक मुंतज़िर तेरी यलग़ार कातिरी शौख़ी-ए-फ़िक्र-ओ-किरदार काये है मक़्सद गर्दिश-ए-रोज़गारकि तेरी ख़ुदी तुझ पे हो आश्कारतू है फ़ातह-ए-आलम-ए-ख़ूब-ओ-ज़िश्ततुझे क्या बताऊँ तिरी सरनविश्तहक़ीक़त पे है जामा-ए-हर्फ़-ए-तंगहक़ीक़त है आईना-ए-गुफ़्तार-ए-ज़ंगफ़रोज़ाँ है सीने में शम-ए-नफ़समगर ताब-ए-गुफ़्तार रखती है बसअगर यक-सर-ए-मू-ए-बरतर परमफ़रोग़-ए-तजल्ली ब-सोज़द परम
नेट ईजाद हुआ हिज्र के मारों के लिएसर्च इंजन है बड़ी चीज़ कुँवारों के लिए
ऐ ताज-महल नक़्श-ब-दीवार हो ग़म सेऐ क़िला-ए-शाही ये अलम पूछ न हम सेऐ ख़ाक-ए-अवध फ़ाएदा क्या शरह-ए-सितम सेतहरीक ये मिस्र-ओ-'अरब-ओ-रूम से निकलेउर्दू का जनाज़ा है ज़रा धूम से निकले
रुख़्सत हुआ वो बाप से ले कर ख़ुदा का नामराह-ए-वफ़ा की मंज़िल-ए-अव्वल हुई तमाममंज़ूर था जो माँ की ज़ियारत का इंतिज़ामदामन से अश्क पोंछ के दिल से किया कलामइज़हार-ए-बे-कसी से सितम होगा और भीदेखा हमें उदास तो ग़म होगा और भीदिल को सँभालता हुआ आख़िर वो नौनिहालख़ामोश माँ के पास गया सूरत-ए-ख़यालदेखा तो एक दर में है बैठी वो ख़स्ता-हालसकता सा हो गया है ये है शिद्दत-ए-मलालतन में लहू का नाम नहीं ज़र्द रंग हैगोया बशर नहीं कोई तस्वीर-ए-संग हैक्या जाने किस ख़याल में गुम थी वो बे-गुनाहनूर-ए-नज़र ये दीदा-ए-हसरत से की निगाहजुम्बिश हुई लबों को भरी एक सर्द आहली गोशा-हा-ए-चश्म से अश्कों ने रुख़ की राहचेहरे का रंग हालत-ए-दिल खोलने लगाहर मू-ए-तन ज़बाँ की तरह बोलने लगाआख़िर असीर-ए-यास का क़ुफ़्ल-ए-दहन खुलाअफ़्साना-ए-शदाइद-ए-रंज-ओ-मेहन खुलाइक दफ़्तर-ए-मज़ालिम-ए-चर्ख़-ए-कुहन खुलावा था दहान-ए-ज़ख़्म कि बाब-ए-सुख़न खुलादर्द-ए-दिल-ए-ग़रीब जो सर्फ़-ए-बयाँ हुआख़ून-ए-जिगर का रंग सुख़न से 'अयाँ हुआरो कर कहा ख़मोश खड़े क्यूँ हो मेरी जाँमैं जानती हूँ जिस लिए आए हो तुम यहाँसब की ख़ुशी यही है तो सहरा को हो रवाँलेकिन मैं अपने मुँह से न हरगिज़ कहूँगी हाँकिस तरह बन में आँखों के तारे को भेज दूँजोगी बना के राज-दुलारे को भेज दूँदुनिया का हो गया है ये कैसा लहू सपीदअंधा किए हुए है ज़र-ओ-माल की उमीदअंजाम क्या हो कोई नहीं जानता ये भेदसोचे बशर तो जिस्म हो लर्ज़ां मिसाल-ए-बीदलिक्खी है क्या हयात-ए-अबद इन के वास्तेफैला रहे हैं जाल ये किस दिन के वास्तेलेती किसी फ़क़ीर के घर में अगर जनमहोते न मेरी जान को सामान ये बहमडसता न साँप बन के मुझे शौकत-ओ-हशमतुम मेरे लाल थे मुझे किस सल्तनत से कममैं ख़ुश हूँ फूँक दे कोई इस तख़्त-ओ-ताज कोतुम ही नहीं तो आग लगा दूँगी राज कोकिन किन रियाज़तों से गुज़ारे हैं माह-ओ-सालदेखी तुम्हारी शक्ल जब ऐ मेरे नौनिहालपूरा हुआ जो ब्याह का अरमान था कमालआफ़त ये आई मुझ पे हुए जब सफ़ेद बालछटती हूँ उन से जोग लिया जिन के वास्तेक्या सब किया था मैं ने इसी दिन के वास्तेऐसे भी ना-मुराद बहुत आएँगे नज़रघर जिन के बे-चराग़ रहे आह 'उम्र भररहता मिरा भी नख़्ल-ए-तमन्ना जो बे-समरये जा-ए-सब्र थी कि दु'आ में नहीं असरलेकिन यहाँ तो बन के मुक़द्दर बिगड़ गयाफल फूल ला के बाग़-ए-तमन्ना उजड़ गयासरज़द हुए थे मुझ से ख़ुदा जाने क्या गुनाहमंजधार में जो यूँ मिरी कश्ती हुई तबाहआती नज़र नहीं कोई अम्न-ओ-अमाँ की राहअब याँ से कूच हो तो 'अदम में मिले पनाहतक़्सीर मेरी ख़ालिक़-ए-आलम बहल करेआसान मुझ ग़रीब की मुश्किल अजल करेसुन कर ज़बाँ से माँ की ये फ़रियाद-ए-दर्द-ख़ेज़उस ख़स्ता-जाँ के दिल पे चली ग़म की तेग़-ए-तेज़'आलम ये था क़रीब कि आँखें हों अश्क-रेज़लेकिन हज़ार ज़ब्त से रोने से की गुरेज़सोचा यही कि जान से बेकस गुज़र न जाएनाशाद हम को देख के माँ और मर न जाएफिर अर्ज़ की ये मादर-ए-नाशाद के हुज़ूरमायूस क्यूँ हैं आप अलम का है क्यूँ वफ़ूरसदमा ये शाक़ 'आलम-ए-पीरी में है ज़रूरलेकिन न दिल से कीजिए सब्र-ओ-क़रार दूरशायद ख़िज़ाँ से शक्ल 'अयाँ हो बहार कीकुछ मस्लहत इसी में हो परवरदिगार कीये जा'ल ये फ़रेब ये साज़िश ये शोर-ओ-शरहोना जो है सब उस के बहाने हैं सर-ब-सरअस्बाब-ए-ज़ाहिरी में न इन पर करो नज़रक्या जाने क्या है पर्दा-ए-क़ुदरत में जल्वा-गरख़ास उस की मस्लहत कोई पहचानता नहींमंज़ूर क्या उसे है कोई जानता नहींराहत हो या कि रंज ख़ुशी हो कि इंतिशारवाजिब हर एक रंग में है शुक्र-ए-किर्दगारतुम ही नहीं हो कुश्ता-ए-नैरंग-ए-रोज़गारमातम-कदे में दहर के लाखों हैं सोगवारसख़्ती सही नहीं कि उठाई कड़ी नहींदुनिया में क्या किसी पे मुसीबत पड़ी नहीं
मुझे ज़िंदगी से अज़ीज़-तरफ़क़त एक तेरी ही ज़ात थीतिरी हर निगाह मिरे लिएसबब-ए-सुकून-ए-हयात थीमिरी दास्तान-ए-वफ़ा कभीतिरी शरह-ए-हुस्न-ए-सिफ़ात थीमगर अब तो रंग ही और हैन वो तर्ज़ है न वो तौर हैये सितम भी क़ाबिल-ए-ग़ौर हैतुझे अपने हुस्न का वास्तामुझे भूल जा मुझे भूल जाक़सम इज़्तिराब-ए-हयात कीमुझे ख़ामुशी में क़रार हैमिरे सहन-ए-गुलशन-ए-इश्क़ मेंन ख़िज़ाँ है अब न बहार हैयही दिल था रौनक़-ए-अंजुमनयही दिल चराग़-ए-मज़ार हैमुझे अब सुकून-ए-दिगर न देमुझे अब नवेद-ए-सहर न देमुझे अब फ़रेब-ए-नज़र न देन हो वहम-ए-इश्क़ में मुब्तलामुझे भूल जा मुझे भूल जा
मेरे हुनर में सर्फ़ हुई है तिरी नज़रख़ेमा है मेरे नाम का बाला-ए-बहर-ओ-बरशोहरत की बज़्म तुझ से मुनव्वर नहीं मगरफ़र्क़-ए-गदा पे ताज है सुल्ताँ बरहना-सरपरवाने को वो कौन है जो मानता नहींऔर शम्अ' किस तरफ़ है कोई जानता नहीं
इक चमेली के मंडवे-तलेमय-कदे से ज़रा दूर उस मोड़ परदो बदनप्यार की आग में जल गएप्यार हर्फ़-ए-वफ़ा प्यार उन का ख़ुदाप्यार उन की चितादो बदनओस में भीगते चाँदनी में नहाते हुएजैसे दो ताज़ा-रौ ताज़ा-दम फूल पिछले-पहरठंडी ठंडी सुबुक-रौ चमन की हवासर्फ़-ए-मातम हुईकाली काली लटों से लपट गर्म रुख़्सार परएक पल के लिए रुक गईहम ने देखा उन्हेंदिन में और रात मेंनूर-ओ-ज़ुल्मात मेंमस्जिदों के मनारों ने देखा उन्हेंमंदिरों के किवाड़ों ने देखा उन्हेंमय-कदों की दराड़ों ने देखा उन्हेंअज़-अज़ल ता-अबदये बता चारा-गरतेरी ज़म्बील मेंनुस्ख़ा-ए-कीमीया-ए-मुहब्बत भी हैकुछ इलाज ओ मुदावा-ए-उल्फ़त भी हैइक चमेली के मंडवे-तलेमय-कदे से ज़रा दूर उस मोड़ परदो बदन
ऐ दिल-ए-बे-ख़बरजो हवा जा चुकी अब नहीं आएगीजो शजर टूट जाता है फलता नहींवापसी मौसमों का मुक़द्दर तो हैजो समाँ बीत जाए पलटता नहींजाने वाले नहीं लौटते उम्र भरअब किसे ढूँढता है सर-ए-रहगुज़रऐ दिल-ए-कम-नज़र ऐ मिरे बे-ख़बर ऐ मिरे हम-सफ़रवो तो ख़ुशबू था अगले नगर जा चुकाचाँदनी था हुआ सर्फ़-ए-रंग-ए-क़मरख़्वाब था आँख खुलते ही ओझल हुआपेड़ था रुत बदलते हुआ बे-समरऐ दिल-ए-बे-असर ऐ मिरे चारा-गरये है किस को ख़बर!कब हवा-ए-सफ़र का इशारा मिले!कब खुलें साहिलों पर सफ़ीनों के परकौन जाने कहाँ मंज़िल-ए-मौज है!किस जज़ीरे पे है शाह-ज़ादी का घर ऐ मिरे चारा-गरऐ दिल-ए-बे-ख़बर कम-नज़र मो'तबरतू कि मुद्दत से है ज़ेर-ए-बार-ए-सफ़रबे-क़रार-ए-सफ़ररेल की बे-हुनर पटरियों की तरहआस के बे-समर मौसमों की तरहबे-जहत मंज़िलों की मसाफ़त में हैरस्ता भूले हुए रहरवों की तरहचोब-ए-नार-ए-सफ़रए'तिबार-ए-नज़र किस गुमाँ पर करेंऐ दिल-ए-बे-बसरये तो साहिल पे भी देखती है भँवररेत में किश्त करती है आब-ए-बक़ाखोलती है हवाओं में बाब-ए-असरतुझ को रखती है ये जे़ब-ए-दार-ए-सफ़र बे-क़रार-ए-सफ़रऐ दिल-ए-बे-हुनरगर्म साँसों की वो ख़ुशबुएँ भूल जावो चहकती हुई धड़कनें भूल जाभूल जा नर्म होंटों की शादाबियाँहर्फ़-ए-इक़रार की लज़्ज़तें भूल जाभूल जा वो हवा भूल जा वो नगरकौन जाने कहाँ रौशनी खो गईलुट गया है कहाँ कारवान-ए-सहरअब कहाँ गेसुओं के वो साए कहाँउस की आहट से चमके हुए बाम-ओ-दर ऐ दिल-ए-बे-बसररंग-ए-आसूदगी के तमाशे कहाँझुटपुटा है यहाँ रहगुज़र रहगुज़रवो तो ख़ुशबू था अगले नगर जा चुकाअब किसे ढूँढता है अरे बे-ख़बरजाने वाले नहीं लौटते उम्र भरऐ दिल-ए-कम-नज़र ऐ मिरे चारा-गर ऐ मिरे हम-सफ़र
वो कब के आए भी और गए भी नज़र में अब तक समा रहे हैंये चल रहे हैं, वो फिर रहे हैं, ये आ रहे हैं वो जा रहे हैंवही क़यामत है कद्द-ए-बाला वही है सूरत, वही सरापालबों को जुम्बिश, निगह को लर्ज़िश, खड़े हैं और मुस्कुरा रहे हैंवही लताफ़त, वही नज़ाकत, वही तबस्सुम, वही तरन्नुममैं नक़्श-ए-हिरमाँ बना हुआ था वो नक़्श-ए-हैरत बना रहे हैंख़िराम रंगीं, निज़ाम रंगीं, कलाम रंगीं, पयाम रंगींक़दम क़दम पर, रविश रविश पर नए नए गुल खिला रहे हैंशबाब रंगीं, जमाल रंगीं, वो सर से पा तक तमाम रंगींतमाम रंगीं बने हुए हैं, तमाम रंगीं बना रहे हैंतमाम रानाइयों के मज़हर, तमाम रंगीनियों के मंज़रसँभल सँभल कर सिमट सिमट कर सब एक मरकज़ पर आ रहे हैंबहार-ए-रंग-ओ-शबाब ही क्या सितारा ओ माहताब ही क्यातमाम हस्ती झुकी हुई है, जिधर वो नज़रें झुका रहे हैंतुयूर सरशार-ए-साग़र-ए-मुल हलाक-ए-तनवीर-ए-लाला-ओ-गुलसब अपनी अपनी धुनों में मिल कर अजब अजब गीत गा रहे हैंशराब आँखों से ढल रही है, नज़र से मस्ती उबल रही हैछलक रही है उछल रही है, पिए हुए हैं पिला रहे हैंख़ुद अपने नश्शे में झूमते हैं, वो अपना मुँह आप चूमते हैंख़राब-ए-मस्ती बने हुए हैं, हलाक-ए-मस्ती बना रहे हैंफ़ज़ा से नश्शा बरस रहा है, दिमाग़ फूलों में बस रहा हैवो कौन है जो तरस रहा है? सभी को मय-कश पिला रहे हैंज़मीन नश्शा, ज़मान नश्शा, जहान नश्शा, मकान नश्शामकान क्या? ला-मकान नश्शा, डुबो रहे हैं पिला रहे हैंवो रू-ए-रंगीं ओ माैजा-ए-यम, कि जैसे दामान-ए-गुल पे शबनमये गरमी-ए-हुस्न का है आलम, अरक़ अरक़ में नहा रहे हैंये मस्त बुलबुल बहक रहे हैं, क़रीब-ए-आरिज़ चहक रहे हैगुलों की छाती धड़क रही है, वो दस्त-ए-रंगीं बढ़ा रहे हैंये मौज-ओ-दरिया, ये रेग-ओ-सहरा ये ग़ुंचा-ओ-गुल, ये माह-ओ-अंजुमज़रा जो वो मुस्कुरा दिए हैं वो सब के सब मुस्कुरा रहे हैंफ़ज़ा ये नग़्मों से भर गई है कि मौज-ए-दरिया ठहर गई हैसुकूत-ए-नग़्मा बना हुआ है, वो जैसे कुछ गुनगुना रहे हैंअब आगे जो कुछ भी हो मुक़द्दर, रहेगा लेकिन ये नक़्श दिल परहम उन का दामन पकड़ रहे हैं, वो अपना दामन छुड़ा रहे हैंये अश्क जो बह रहे हैं पैहम, अगरचे सब हैं ये हासिल-ए-ग़ममगर ये मालूम हो रहा है, कि ये भी कुछ मुस्कुरा रहे हैंज़रा जो दम भर को आँख झपकी, ये देखता हूँ नई तजल्लीतिलिस्म सूरत मिटा रहे हैं, जमाल मअनी बना रहे हैंख़ुशी से लबरेज़ शश-जिहत है, ज़बान पर शोर-ए-तहनियत हैये वक़्त वो है 'जिगर' के दिल को वो अपने दिल से मिला रहे हैं
कहीं नहीं है कहीं भी नहीं लहू का सुराग़न दस्त-ओ-नाख़ुन-ए-क़ातिल न आस्तीं पे निशाँन सुर्ख़ी-ए-लब-ए-खंजर न रंग-ए-नोक-ए-सिनाँन ख़ाक पर कोई धब्बा न बाम पर कोई दाग़कहीं नहीं है कहीं भी नहीं लहू का सुराग़न सर्फ़-ए-ख़िदमत-ए-शाहाँ कि ख़ूँ-बहा देतेन दीं की नज़्र कि बैआना-ए-जज़ा देतेन रज़्म-गाह में बरसा कि मो'तबर होताकिसी अलम पे रक़म हो के मुश्तहर होतापुकारता रहा बे-आसरा यतीम लहूकिसी को बहर-ए-समाअत न वक़्त था न दिमाग़न मुद्दई न शहादत हिसाब पाक हुआये ख़ून-ए-ख़ाक-नशीनाँ था रिज़्क़-ए-ख़ाक हुआ
ख़ुदा अलीगढ़ के मदरसे को तमाम अमराज़ से शिफ़ा देभरे हुए हैं रईस-ज़ादे अमीर-ज़ादे शरीफ़-ज़ादेलतीफ़ ओ ख़ुश-वज़'अ चुस्त ओ चालाक ओ साफ़ ओ पाकीज़ा शाद-ओ-ख़ुर्रमतबीअतों में है इन की जौदत दिलों में इन के हैं नेक इरादेकमाल-ए-मेहनत से पढ़ रहे हैं कमाल-ए-ग़ैरत से पढ़ रहे हैंसवार मशरिक़ राह में हैं तो मग़रिबी राह में पियादेहर इक है इन में का बे-शक ऐसा कि आप उसे चाहते हैं जैसादिखावे महफ़िल में क़द्द-ए-र'अना जो आप आएँ तो सर झुका देफ़क़ीर माँगे तो साफ़ कह दें कि तू है मज़बूत जा कमा खाक़ुबूल फ़रमाएँ आप दावत तो अपना सरमाया कुल खिला देबुतों से इन को नहीं लगावट मिसों की लेते नहीं वो आहटतमाम क़ुव्वत है सर्फ़-ए-ख्वांदन नज़र के भोले हैं दिल के सादेनज़र भी आए जो ज़ुल्फ़-ए-पेचाँ तो समझें ये कोई पॉलीसी हैइलेक्ट्रिक लाइट उस को समझें जो बर्क़-वश कोई कूदेनिकलते हैं कर के ग़ोल-बंदी ब-नाम-ए-तहज़ीब ओ दर्द-मंदीये कह के लेते हैं सब से चंदे जो तुम हमें दो तुम्हें ख़ुदा देउन्हें इसी बात पर यक़ीं है कि बस यही अस्ल कार-ए-दीं हैइसी से होगा फ़रोग़-ए-क़ौमी इसी से चमकेंगे बाप दादेमकान-ए-कॉलेज के सब मकीं हैं अभी उन्हें तजरबे नहीं हैंख़बर नहीं है कि आगे चल कर है कैसी मंज़िल हैं कैसे जादेदिलों में इन के हैं नूर-ए-ईमाँ क़वी नहीं है मगर निगहबाँहवा-ए-मंतिक़ अदा-ए-तिफ़ली ये शम्अ ऐसा न हो बुझा देफ़रेब दे कर निकाले मतलब सिखाए तहक़ीर-ए-दीन-ओ-मज़हबमिटा दे आख़िर को दीन-ओ-मज़हब नुमूद-ए-ज़ाती को गो बढ़ा देयही बस 'अकबर' की इल्तिजा है जनाब बारी में ये दुआ हैउलूम ओ हिकमत का दर्स इन को प्रोफ़ेसर दें समझ ख़ुदा दे
पापा की इंटेलीजेंसी तुम पर भारी हैलेकिन तुम ने प्रेम की गंगा घर में उतारी हैबाँधना घर को एक धागे में कितना भारी हैइस में तुम्हारी सर्फ़ तुम्हारी ही होशियारी हैतुम को है मा'लूम पिरोना कैसा होता हैमाँ हो तुम और माँ का होना ऐसा होता है
जबीन-ए-वक़्त पर लिक्खी हुई सच्चाइयाँ रौशन रही हैंता-अबद रौशन रहेंगीख़ुदा शाहिद है और वो ज़ात शाहिद है कि जो वज्ह-ए-असास-ए-अन्फ़ुस-ओ-आफ़ाक़ हैऔर ख़ैर की तारीख़ का वो बाब-ए-अव्वल हैअबद तक जिस का फ़ैज़ान-ए-करम जारी रहेगायक़ीं के आगही के रौशनी के क़ाफ़िले हर दौर में आते रहे हैंता-अबद आते रहेंगेअबू-तालिब के बेटे हिफ़्ज़-ए-नामूस-ए-रिसालत की रिवायत के अमीं थेजान देना जानते थेवो मुस्लिम हों कि वो अब्बास हों औन ओ मोहम्मद हों अली-अकबर हों क़ासिम हों अली-असग़र होंहक़ पहचानते थेलश्कर-ए-बातिल को कब गर्दानते थेअबू-तालिब के बेटे सर-बुरीदा हो के भी ऐलान-ए-हक़ करते रहे हैंअबू-तालिब के बेटे पा-ब-जौलाँ हो के भी ऐलान-ए-हक़ करते रहे हैंअबू-तालिब के बेटे सर्फ़-ए-ज़िंदाँ हो के भी ऐलान-ए-हक़ करते रहे हैंमदीना हो नजफ़ हो कर्बला हो काज़िमैन ओ सामिरा हो मशहद ओ बग़दाद होआल-ए-अबू-तालिब के क़दमों के निशाँइंसानियत को उस की मंज़िल का पता देते रहे हैं ता-अबद देते रहेंगेअबू-तालिब के बेटों और ग़ुलामान-ए-अली-इब्न-ए-अबी-तालिब में इक निस्बत रही हैमोहब्बत की ये निस्बत उम्र भर क़ाएम रहेगीता-अबद क़ाएम रहेगी
न अब हम साथ सैर-ए-गुल करेंगेन अब मिल कर सर-ए-मक़्तल चलेंगेहदीस-ए-दिल-बराँ बाहम करेंगेन ख़ून-ए-दिल से शरह-ए-ग़म करेंगेन लैला-ए-सुख़न की दोस्त-दारीन गम-हा-ए-वतन पर अश्क-बारीसुनेंगे नग़्मा-ए-ज़ंजीर मिल करन शब भर मिल के छलकाएँगे साग़रब-नाम-ए-शाहिद-ए-नाज़ुक-ख़यालाँब-याद-ए-मस्ती-ए-चश्म-ए-ग़ज़ालाँब-नाम-ए-इम्बिसात-ए-बज़्म-ए-रिंदाँब-याद-ए-कुल्फ़त-ए-अय्याम-ए-ज़िंदाँसबा और उस का अंदाज़-ए-तकल्लुमसहर और उस का आग़ाज़-ए-तबस्सुमफ़ज़ा में एक हाला सा जहाँ हैयही तो मसनद-ए-पीर-ए-मुग़ाँ हैसहर-गह अब उसी के नाम साक़ीकरें इत्माम-ए-दौर जाम साक़ीबिसात-ए-बादा-ओ-मीना उठा लोबढ़ा दो शम-ए-महफ़िल बज़्म वालोपियो अब एक जाम-ए-अल-विदाईपियो और पी के साग़र तोड़ डालो
दिन ढला कूचा ओ बाज़ार में सफ़-बस्ता हुईंज़र्द-रू रौशनियाँउन में हर एक के कश्कोल से बरसें रिम-झिमइस भरे शहर की नासूदगियाँदूर पस-मंज़र-ए-अफ़्लाक में धुँदलाने लगेअज़्मत-ए-रफ़्ता के निशाँपेश-ए-मंज़र मेंकिसी साया-ए-दीवार से लिपटा हुआ साया कोईदूसरे साए की मौहूम सी उम्मीद लिएरोज़-मर्रा की तरहज़ेर-ए-लबशरह-ए-बेदर्दी-ए-अय्याम की तम्हीद लिएऔर कोई अजनबीइन रौशनियों सायों से कतराता हुआअपने बे-ख़्वाब शबिस्ताँ की तरफ़ जाता हुआ
दिल-ओ-दिमाग़ को रो लूँगा आह कर लूँगातुम्हारे इश्क़ में सब कुछ तबाह कर लूँगाअगर मुझे न मिलीं तुम तुम्हारे सर की क़सममैं अपनी सारी जवानी तबाह कर लूँगामुझे जो दैर-ओ-हरम में कहीं जगह न मिलीतिरे ख़याल ही को सज्दा-गाह कर लूँगाजो तुम से कर दिया महरूम आसमाँ ने मुझेमैं अपनी ज़िंदगी सर्फ़-ए-गुनाह कर लूँगारक़ीब से भी मिलूँगा तुम्हारे हुक्म पे मैंजो अब तलक न किया था अब आह कर लूँगातुम्हारी याद में मैं काट दूँगा हश्र से दिनतुम्हारे हिज्र में रातें सियाह कर लूँगासवाब के लिए हो जो गुनह वो ऐन सवाबख़ुदा के नाम पे भी इक गुनाह कर लूँगाहरीम-ए-हज़रत-ए-सलमा की सम्त जाता हूँहुआ न ज़ब्त तो चुपके से आह कर लूँगाये नौ-बहार ये अबरू, हवा ये रंग शराबचलो जो हो सो हो अब तो गुनाह कर लूँगाकिसी हसीने के मासूम इश्क़ में 'अख़्तर'जवानी क्या है मैं सब कुछ तबाह कर लूँगा
इधर बैठोपराई लड़कियों को इस तरह देखा नहीं करतेये लिपस्टिकये पाउडरऔर ये स्कार्फ़क्या होगामुझे खेतों में मज़दूरी से फ़ुर्सत ही नहीं मिलतीमिरे होंटों पे घंटों बूँद पानी की नहीं पड़तीमिरे चेहरे मिरे बाज़ू पे लू और धूप रहती हैगले में सिर्फ़ पीतल का ये चंदन हार काफ़ी हैहवा में दिलकशी हैऔर फ़ज़ा सोना लुटाती हैमुझे उन से अक़ीदत हैयही मेरी मताअ' मेरी नेमत है
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