aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "sumuum"
जन्नत-ए-शौक़ थी बेगाना-ए-आफ़ात-ए-सुमूमदर्द जब दर्द न हो काविश-ए-दरमाँ मालूमख़ाक थे दीदा-ए-बेबाक में गर्दूं के नुजूमबज़्म-ए-परवीं थी निगाहों में कनीज़ों का हुजूम
और यूँ कहीं भी रंज-ओ-बला से मफ़र नहींक्या होगा दो घड़ी में किसी को ख़बर नहींअक्सर रियाज़ करते हैं फूलों पे बाग़बाँहै दिन की धूप रात की शबनम उन्हें गिराँलेकिन जो रंग बाग़ बदलता है ना-गहाँवो गुल हज़ार पर्दों में जाते हैं राएगाँरखते हैं जो 'अज़ीज़ उन्हें अपनी जाँ की तरहमिलते हैं दस्त-ए-यास वो बर्ग-ए-ख़िज़ाँ की तरहलेकिन जो फूल खिलते हैं सहरा में बे-शुमारमौक़ूफ़ कुछ रियाज़ पे उन की नहीं बहारदेखो ये क़ुदरत-ए-चमन-आरा-ए-रोज़गारवो अब्र-ओ-बाद ओ बर्फ़ में रहते हैं बरक़रारहोता है उन पे फ़ज़्ल जो रब्ब-ए-करीम कामौज-ए-सुमूम बनती है झोंका नसीम काअपनी निगाह है करम-ए-कारसाज़ परसहरा चमन बनेगा वो है मेहरबाँ अगरजंगल हो या पहाड़ सफ़र हो कि हो हज़ररहता नहीं वो हाल से बंदे के बे-ख़बरउस का करम शरीक अगर है तो ग़म नहींदामान-ए-दश्त दामन-ए-मादर से कम नहीं
चलने ही को है इक सुमूम अभीरक़्स-फ़रमा है रूह-ए-बर्बादीबरबरियत के कारवानों सेज़लज़ले में है सीना-ए-गीती
छा गई बरसात की पहली घटा अब क्या करूँख़ौफ़ था जिस का वो आ पहुँची बला अब क्या करूँहिज्र को बहला चली थी गर्म मौसम की सुमूमना-गहाँ चलने लगी ठंडी हवा अब क्या करूँआँख उठी ही थी कि अब्र-ए-लाला-गूँ की छाँव मेंदर्द से कहने लगा कुछ झुटपुटा अब क्या करूँअश्क अभी थमने न पाए थे कि बेदर्दी के साथबूंदियों से बोस्ताँ बजने लगा अब क्या करूँज़ख़्म अब भरने न पाए थे कि बादल चर्ख़ परआ गया अंगड़ाइयाँ लेता हुआ अब क्या करूँआ चुकी थी नींद सी ग़म को कि मौसम ना-गहाँबहर-ओ-बर में करवटें लेने लगा अब क्या करूँचर्ख़ की बे-रंगियों से सुस्त थी रफ़्तार-ए-ग़मयक-ब-यक हर ज़र्रा गुलशन बन गया अब क्या करूँक़ुफ़्ल-ए-बाब-ए-शौक़ थीं माहौल की ख़ामोशियाँदफ़अतन काफ़िर पपीहा बोल उठा अब क्या करूँहिज्र का सीने में कुछ कम हो चला था पेच-ओ-ताबबाल बिखराने लगी काली घटा अब क्या करूँआँख झपकाने लगी थी दिल में याद-ए-लहन-ए-यादमोर की आने लगी बन से सदा अब क्या करूँघट चला था ग़म की रंगीं बदलियों की आड़ सेउन का चेहरा सामने आने लगा अब क्या करूँआ रही हैं अब्र से उन की सदाएँ 'जोश' 'जोश'ऐ ख़ुदा अब क्या करूँ बार-ए-ख़ुदा अब क्या करूँ
मैं ने ख़्वाबों के समन-रंग शबिस्तानों मेंलोरियाँ दे के ग़म-ए-दिल को सुलाना चाहातल्ख़ी-ए-ज़ीस्त से बे-ज़ार-ओ-परेशाँ हो करतल्ख़ी-ए-ज़ीस्त का एहसास मिटाना चाहाऔर मैं डरते झिजकते किसी मुजरिम की तरहआ गया तेरी मोहब्बत के परिस्तानों मेंछोड़ कर अपने तआ'क़ुब में निगाहें अपनीखो गया काकुल-ओ-रुख़्सार के अफ़्सानों मेंमैं ने सोचा था तिरे जिस्म की रानाई सेसंग-दिल ज़ेहन की तक़दीर बदल जाएगीज़िंदगी वक़्त के सहरा की अलमनाक सुमूमतेरे अन्फ़ास की महकार में ढल जाएगीआह इक लम्हा भी लेकिन मिरे सीने की तड़पतेरे गाते हुए माहौल को अपना न सकीतेरी ज़ुल्फ़ों के घने और ख़ुनुक साए मेंमेरे जलते हुए इदराक को नींद आ न सकीतेरी हँसती हुई लबरेज़ छलकती आँखेंमेरी आँखों में कभी रंग-ए-तरब भर न सकींतेरे दामन की हवाएँ थीं जुनूँ-ख़ेज़ मगरमेरे एहसास की क़िंदील को गुल कर न सकींमैं ने सोचा था मगर कितना ग़लत सोचा थाज़िंदगी एक हक़ीक़त थी फ़साना तो न थीमेरी दुनिया मिरे ख़्वाबों की सुनहरी दुनियानौहा-ए-ग़म थी मसर्रत का तराना तो न थीअब ये समझा हूँ कि इस दर्द भरी दुनिया मेंमेरे आग़ाज़ का अंजाम यही होना थाख़्वाब फिर ख़्वाब थे ख़्वाबों का भरोसा क्या थाहासिल-ए-काहिश-ए-नाकाम यही होना थाज़ेहन पर लाख फ़ुसूँ-कार तख़य्युल हों मुहीतलाख पर्दों में निगाहों को छुपाया जाएतल्ख़ी-ए-ज़ीस्त का एहसास नहीं मिट सकतातल्ख़ी-ए-ज़ीस्त को जब तक न मिटाया जाए
मैं अपने आप गुम सुम्मुन उदास वामाँदाये सोचता हूँ कि क्या हक़ है मुझ को जीने कान माहताब मिरा है न आफ़्ताब मिरान दिन के रंग मिरे हैं न लुत्फ़-ए-ख़्वाब मिरा
चल ऐ नसीम-ए-सहरा रूह-ओ-रवान-ए-सहरामेरा पयाम ले जा सू-ए-बुतान-ए-सहरासहराई महवशों की ख़िदमत में जा के कहनाभूले नहीं तुम्हें हम ऐ दुख़्तरान-ए-सहरागर बस चले तो आएँ और दर्द-ए-दिल सुनाएँतुम को गले लगाएँ हम फिर मियान-ए-सहरातुम नज्द में परेशाँ शहरों में हम हैं हैराँअल्लाह की अमाँ हो तुम पर बुतान-ए-सहरातुम इस तरह ग़मों से बेहाल हो रही होहम इस तरफ़ हैं मुज़्तर दामन-कुशान-ए-सहराहम पास आएँ क्यूँ कर तुम को बुलाएँ क्यूँ करये दुख मिटाएँ क्यूँ कर वामाँदगान-ए-सहराबेताब हैं अलम से बे-ख़्वाब रंज-ओ-ग़म सेक्या पूछती हो हम से ऐ दिलबरान-ए-सहरातुम याद कर रही हो बेदाद कर रही होबरबाद कर रही हो ऐ गुल-रुख़ान-ए-सहराये क्या कहा कि तुम हो रंगीनियों के ख़ूगरग़मगीं हैं तुम से बढ़ कर ऐ ग़म-कुशान-ए-सहराये रात ये घटाएँ ये शोर ये हवाएँबिछड़े हुए मिलेंगे क्यूँकर मियान-ए-सहराशहरों की ज़िंदगी से हम तंग आ चुके हैंसहरा में फिर बुला लो ऐ सकिनान-ए-सहरायाद-ए-सुमूम हो या सरसर के तुंद तूफ़ाँडरते नहीं किसी से दिल-दादगान-ए-सहराआबादियों में हासिल आज़ादियाँ नहीं हैंआ जाओ तुम ही उड़ कर ओ ताइरान-ए-सहरासहरा की वुसअतों में हम को न भूल जानाओ दुख़्तरान-ए-सहरा ओ आहुवान-ए-सहराऐ अब्र चुप न रहना मेरा फ़साना कहनामिल जाए गर कहीं वो सर्व-ए-रवान-ए-सहरादश्ती की धुन में साक़ी इक नग़्मा-ए-इराक़ीहाँ फिर सुना ब-याद-ए-गुल-चेहरगान-ए-सहराआँखों में बस रहा है नक़्श-ए-बुतान-ए-सहराओ दास्ताँ-सरा छेड़ इक दास्तान-ए-सहरामस्ताना जा रहा है फिर कारवान-ए-सहराहाँ झूम कर हुदी-ख़्वाँ इक दास्तान-ए-सहरादेहात की फ़ज़ाएँ आँखों में फिर रही हैंदिल में समा रही है याद-ए-बुतान-ए-सहरानज़रों पे छा रहा है वो चाँदनी का मंज़रसहरा में खेलती थीं जब हूरयान-ए-सहरावो चाँदनी का मौसम वो बे-ख़ुदी का आलमवो नूर का समुंदर रेग-ए-रवान-ए-सहराजल्वे मह-ए-जवाँ के वो रंग-ए-कारवाँ केवो नग़्मे सारबाँ के रक़्साँ मियान-ए-सहराक्यूँकर न याद आएँ वो सीम-गूँ फ़ज़ाएँवो आसमान-ए-सहरा माह-ए-रवान-ए-सहरावो कमसिनों के गाने वो खेल वो तरानेबे-फ़िक्री के फ़साने विर्द-ए-ज़बान-ए-सहराखेतों में घूमते थे हर गुल को चूमते थेमस्ती में झूमते थे जब मय-कशान-ए-सहरावो गाँव वो फ़ज़ाएँ वो फ़स्ल वो हवाएँवो खेत वो घटाएँ वो आसमान-ए-सहराफिर याद आ रही हैं फिर दिल दुखा रही हैंमजनूँ बना रही हैं लैला-वशान-ए-सहरारातों को छुप के आना और शाने को हिलानाहै याद वो जगाना हम को मियान-ए-सहरावो उन की शोख़ आँखें वो उन की सादा नज़रेंबे-ख़ुद बना रही हैं दोशीज़गान-ए-सहरावो इश्क़-पेशा हूँ मैं जिस के जवान नग़्मेगाता है चाँदनी में हर नौजवान-ए-सहराइक बदवियत का आशिक़ सहराइयत से बे-ख़ुद'अख़्तर' भी अपनी धुन में है इक जवान-ए-सहरा
बन गई बाद-ए-सुमूम आह असर से तेरेइस चमन में जो कभी बाद-ए-सबा भी आई
हमारे शेरों में मक़्तल के इस्तिआरे हैंहमारे ग़ज़लों ने देखा है कूचा-ए-क़ातिलसलीब-ओ-दार पे नज़्में हमारी लटकी हैंहमारी फ़िक्र है ज़ख़्मी लहू-लुहान है फ़िक्रहर एक लफ़्ज़ परेशाँ हर एक मिस्रा उदासहम अपने शेरों के मफ़्हूम पर पशेमाँ हैंख़ुदा करे कि जो आएँ हमारे ब'अद वो लोगहमारे फ़न की अलामात को समझ न सकेंचराग़-ए-दैर-ओ-हरम से किसी का घर न जलेन कोई फिर से हिकायात-ए-रफ़्तगाँ लिक्खेन कोई फिर से अलामात-ए-ख़ूँ-चकाँ लिक्खेफ़सील-दार सरों के चराग़ रक़्स-ए-जुनूँसराब-ए-तिश्ना-लबी ख़ार आबला-पाईदरीदा-पैरहनी चाक-दामनी वहशतसुमूम, आतिश-ए-गुल, बर्क़, आशियाँ, सय्यादरिवायतें ये मिरे अहद की अलामत हैंअलामतें ये मिरे शेर का मुक़द्दर हैंख़ुदा करे कि जो आएँ हमारे ब'अद वो लोगहमारे फ़न की अलामात को समझ न सकेंचराग़-ए-दैर-ओ-हरम से किसी का घर न जलेन कोई फिर से हिकायात-ए-रफ़्तगाँ लिक्खेन कोई फिर से अलामात-ए-ख़ूँ-चकाँ लिक्खे
बसों का शोर धुआँ गर्द धूप की शिद्दतबुलंद ओ बाला इमारात सर-निगूँ इंसाँतलाश-ए-रिज़्क़ में निकला हुआ ये जम्म-ए-ग़फ़ीरलपकती भागती मख़्लूक़ का ये सैल-ए-रवाँहर इक के सीने में यादों की मुनहदिम क़ब्रेंहर एक अपनी ही आवाज़-ए-पा से रू-गर्दांये वो हुजूम है जिस में कोई फ़लक पे नहींऔर इस हुजूम-ए-सर-ए-राह से गुज़रते हुएन जाने कैसे तुम्हारी वफ़ा करम का ख़यालमिरे जबीं को किसी दस्त-ए-आश्ना की तरहजो छू गया है तो अश्कों के सोते फूट पड़ेसुमूम ओ रेग के सहरा में इक नफ़स के लिएचली है बाद-ए-तमन्ना तो उम्र भर की थकनसर-ए-मिज़ा सिमट आई है एक आँसू मेंये वो गुहर है जो टूटे तो ख़ाक-ए-पा में मिलेये वो गुहर है जो चमके तो शब-चराग़ बने
उफ़ुक़ से ता-बा-उफ़ुक़ ज़र्द ना-मुराद बगूलेउफ़ुक़ से ता-बा-उफ़ुक़ इक मुहीब सोग है तारीउफ़ुक़ से ता-बा-उफ़ुक़ संग-दिल कठोर चटानेंहर एक सहर है सय्याद हर तिलिस्म शिकारीहर एक जादा में बोसीदा उस्तख़्वानों के टुकड़ेकहीं है सोख़्ता महमिल कहीं शिकस्ता अमारीन जहल से कोई ढारस न आगही से तसल्लीन वक़्त-ए-नाला-ओ-ज़ारी न होश-ए-ज़ख़्म-शुमारीन कोई नंद उन्हें अपनी झोंपड़ी में पनाह देजो श्याम लाडले कल थे वो आज सब पे हैं भारीन उन की आग से गुलशन कोई ज़ुहूर में आएन उन के पाँव रगड़ने से रूद-ए-आब हो जारीन उन को तीरा कुएँ से निकालें क़ाफ़िले वालेन नील-ए-वक़्त की मौजों को उन की जान हो प्यारीन उन के दामन-ए-इस्मत को थाम लेने से छाएँघटाएँ तिश्ना-दहन बाँझ वादियों पे हमारीन उन की चश्म-ए-करम सरसर-ओ-सुमूम में घोलेसफ़ा-ए-बाद-ए-सहर दम-ए-सुरूर बाद-ए-बहारी
सुमूम तेज़ है मौज-ए-सबा को आम करोख़िज़ाँ के रुख़ को पलटने का एहतिमाम करोबिखर रहे हो मज़ामीन-ए-शायरी की तरहकिसी मक़ाम पे जम जाओ कोई काम करोसबक़ मिला है ये तारीख़ के नविश्तों सेकि तेग़-ए-हैदर-ए-कर्रार बे-नियाम करोजबीं पे ख़ाक है किस आस्तान-ए-दौलत कीकभी तो अपनी आना का भी एहतिराम करोये मशवरे हैं कई दिन से क़स्र-ए-शाही मेंकिसी तरीक़ से दानिशवरों को राम करोक़लम की शोख़-निगारी को रोकने के लिएज़बाँ-दराज़ अदीबों को ज़ेर-ए-दाम करोझुका के सर किसी फ़रमाँ-रवा की चौखट परज़बान-ए-तोहमत-ओ-इल्ज़ाम बे-लगाम करो'ज़फ़र' अली की ज़बाँ में है मशवरा मेरामिरी तरफ़ से इसे दोस्तों में आम करोइस इब्तिला से ख़ुदा की हज़ार-बार पनाहकि झुक के तुम किसी ना-अहल को सलाम करो
अल्लाह रे ये आलम-ए-नैरंगी-ए-ख़यालमौज-ए-नसीम है कभी बाद-ए-सुमूम है
ये तंगन-ए-क़फ़स ये सियासत-ए-सय्यादये आब-ओ-गिल के तलातुम यह वुसअ'त-ए-बर्बादये तीरगी ये दिल-ए-मेहर-ओ-माह की धड़कनये आँसूओं के सितारे ये इस्मतों के कफ़नये भीगती हुई पलकें ये टूटते हुए दिलये रेग-ज़ार-ए-हक़ीक़त ये पर्दा-ए-महमिलये चीख़ती हुई रूहें ये हसरतों के सनमये बज़्म-ए-कुफ़्र-ओ-यक़ीं ये जहान-ए-दैर-ओ-हरमये शोर-ए-हश्र ये पैकार-ए-सुब्हा-ओ-ज़ुन्नारये जाँ-गुदाज़ फ़ज़ाएँ ये रूह-सोज़ बहारये आंधियों की क़तारें ये कारवान-ए-हयातन पूछ कितने शगूफ़े हैं मरकज़-ए-आफ़ातसवाद-ए-ज़ीस्त में तूफ़ान आए हैं क्या क्याचराग़-ए-सिद्क़-ओ-सफ़ा झिलमिलाए हैं क्या क्याअयाग़ छूट पड़े मय-कशों के हाथों सेअयाँ दिलों की सियाही है कितने हाथों सेनिगल चुकी शब-ए-ग़म किन सहर-शिकारों कोकि ज़लज़लों ने जगाया है फ़ित्ना-ज़ारों कोहयात मर्ग-ए-मोहब्बत पे नौहा-ख़्वाँ है अभीवही फ़साना-ए-इफ़्लास जाँ-सिताँ है अभीउदास-उदास सी रातें थके-थके से नुजूमये अब्र-ओ-बाद की यूरिश ये बिजलियों का हुजूमये तीरा बज़्म-ए-जहाँ ये शिकस्त-ए-क़ल्ब-ओ-नज़रमहल बनाए हैं क़ारूनियों ने लाशों परदिलों पे यास के होते रहे सितम क्या क्याकराहते रहे ज़ुल्फ़ों के पेच-ओ-ख़म क्या क्यादयार-ए-शौक़ में गूँजे हैं मरसिए कितनेबुझा गई है नसीम-ए-सहर दिए कितनेवही सदाक़त-ओ-एहसास के जनाज़े हैंइज़ार-ए-गंग-ओ-जमन पर लहू के ग़ाज़े हैंवही ख़ुदा हैं वही बुत वही रसूल अभीसमनिस्ताँ में हैं बाक़ी ख़िज़ाँ के फूल अभीचमन हज़ार सुमूम-ए-ख़िज़ाँ से खेले हैंमगर हनूज़ वही बेबसी के मेले हैं
जल चुकी शाख़-ए-नशेमन थम चुकी बाद-ए-सुमूमअब हवा-ए-नौ-बहाराँ कौसर-अफ़्शाँ है तो क्याकर चुकी ख़ून-ए-तमन्ना तीरगी-ए-शाम-ए-ग़मआसमाँ पर अब नया सूरज दरख़्शाँ है तो क्याजाम अफ़्सुर्दा सुराही सर-निगूँ मीना ख़मोशमय-कदे में अब हुजूम-ए-मय-गुसाराँ है तो क्यादूर हो सकता नहीं ऐ दोस्त क़रनों का सुकूतज़िंदगी अब अपने बरबत पर ग़ज़ल-ख़्वाँ है तो क्यागर्दिश-ए-दौराँ पे कोई फ़त्ह पा सकता नहींतेरे लब पर शिकवा-ए-आलाम-ए-दौराँ है तो क्यामुन्कशिफ़ होने को है राज़-ए-सबात-ए-जावेदाँआज अगर शीराज़ा-ए-हस्ती परेशाँ है तो क्याकल ये दुनिया वादी-ए-रक़्स-ओ-नवा कहलाएगीआज अगर जौलाँ-गह-ए-सैलाब-ओ-तूफ़ाँ है तो क्यासड़ चुके इस के अनासिर हट चुका सोज़-ए-हयातअब तुझे फ़िक्र-ए-इलाज-ए-दर्द-ए-इंसाँ है तो क्याज़िंदगी की तल्ख़ियों ने छीन ली ताब-ए-नज़रतूर की चोटी पर 'अफ़सर' अब चराग़ाँ है तो क्या
हर इक लम्हा कोई न कोई बगूला उठाऔर मिरे नक़्श-ए-पा को मिटाने की धुन में चलालेकिन आवाज़-ए-पा की गरजती घटाओं सेटकरा के दश्त-ए-ख़मोशी मेंगुम हो गयाहर इक गाम सम्तों नेसंगीं शिकंजों में कसने कीहसरत को रुस्वा कियामिरी फ़िक्र की लौसुमूम ओ सबा कीफ़ुसूँ-कारियों से गुरेज़ाँमुसलसल फ़रोज़ाँ रहीये वो आँच है जिस की हिद्दत सेहर क़ुव्वत-ए-संग-साज़ी पिघलती रही
शाख़ों पे सुर्ख़-ओ-ज़र्द शगूफ़े हैं महव-ए-ख़्वाबख़्वाब-ए-गिराँ से जागने वाला है आफ़्ताबगेसू खुले हुए हैं उरूस-ए-बहार केशाने हिला रही है सबा लाला-ज़ार केवीरान हो चली है सितारों की अंजुमनदामान-ए-कोहसार में जैसे हैं ख़ेमा-ज़नवो लोग पैकर-ए-ग़म-ओ-हिर्मां कहें जिन्हेंबेताबियों के रूप में इंसाँ कहें जिन्हेंहर साँस एक महशर-ए-पिन्हाँ लिए हुएबेदारियाँ भी ख़्वाब-ए-परेशाँ लिए हुएअम्बार-ए-आरज़ू से तनफ़्फ़ुस रुका हुआइफ़रात-ए-ग़म से रूह का परचम झुका हुआनौरस कँवल सुमूम-ए-अजल की पनाह मेंबे-जान हसरतों के तलातुम निगाह मेंसीनों में दिल कशाकश-ए-हस्ती से दाग़ दाग़इंसानियत की क़ब्र के बुझते हुए चराग़होंटों पे आह-ए-सर्द जबीं पर ग़ुबार-ए-राहहैं इस ज़मीं पे ख़ाक-बसर कितने मेहर-ओ-माह
एक दिन थी दोपहर की सख़्त गर्मी आश्कारधूप की शिद्दत थी मिस्ल-ए-नार-ए-दोज़ख़ क़हर-बारदामनों में आग ले कर थी दवाँ बाद-ए-सुमूमथरथराहट थी फ़ज़ा में मिस्ल-ए-मौज-ए-शो'ला-बारआसमाँ से शो'ले गिरते थे झुलसती थी ज़मींगर्मी-ए-रोज़-ए-क़यामत का नमूना आश्कारगर्म झोंके चल रहे थे थीं हवा की यूरिशेंतुंद शो'ले सुर्ख़ ज़र्रे उड़ रहे थे बार-बारहर किसी की था ज़बाँ पर अल-हफ़ीज़-ओ-अल-ग़ियासचिलचिलाती धूप से था ज़र्रा ज़र्रा बे-क़राररास्ते सूने पड़े थे राह पर कोई न थाचल रही थी हर तरफ़ लू और बशर कोई न था
गहरी नींद से सोने वालोवक़्त को अपने खोने वालोरात कटी कुछ तुम को ख़बर हैचौंको चौंको वक़्त-ए-सहर हैचाँद की रंगत हो गई मैलीदेखो चमक सूरज की फैलीचलते हैं झोंके सर्द हवा केझूम रहे हैं फूल इतरा केकोयलें कूकें कू कू कू कूयाहू बोले याहू याहूनींद से चौंकें पँख पखेरूबोल रहे हैं शाख़ों पे हर सूभूले हुए हैं इस दम सब धुनलाल पुकारे सुम्मुन बुकमुनखिल गईं कलियाँ बाग़ की सारीचार तरफ़ हैं नहरें जारीगो कि अभी तक कुछ है अंधेराचिड़ियाँ लेने आईं बसेरागाएँ दूब को चरने आईंभैंसों ने अपनी शक्लें दिखाईंरुक गया इस दम बहता दरियादूर तलक शफ़्फ़ाफ़ है सहराउट्ठो उट्ठो अहमद उट्ठोमुँह को धो कर कपड़े पहन लोसैर करो मैदाँ की निकल करफूल को देखो बाग़ में चल करवक़्त को खोना ज़ुल्म है प्यारेसुन ये नसीहत दोस्त हमारे
सुना ये है तुम्हें क़ुरआन भी अच्छी तरह पढ़ना न आता थामगर मैं ने तो ये देखागली के कितने ही आवारा कुत्ते दुम दबा कर बैठ जाते थेतुम्हारी एक सुम्मुन और बुकमुन की तिलावत से
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