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नज़्म
है मिरी जुरअत से मुश्त-ए-ख़ाक में ज़ौक़-ए-नुमू
मेरे फ़ित्ने जामा-ए-अक़्ल-ओ-ख़िरद का तार-ओ-पू
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
मौज-ए-मुज़्तर थी कहीं गहराइयों में मस्त-ए-ख़्वाब
रात के अफ़्सूँ से ताइर आशियानों में असीर
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
अता ऐसा बयाँ मुझ को हुआ रंगीं-बयानों में
कि बाम-ए-अर्श के ताइर हैं मेरे हम-ज़बानों में
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
लाला-ए-अफ़्सुर्दा को आतिश-क़बा करती है ये
बे-ज़बाँ ताइर को सरमस्त-ए-नवा करती है ये
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
ताइर-ए-ज़ेर-ए-दाम के नाले तो सन चुके हो तुम
ये भी सुनो कि नाला-ए-ताइर-ए-बाम और है