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नज़्म
गए वो दिन कि जब कुछ लोग ही इस को समझते थे
ज़बानों में उभर आई है तश्त-अज़-बाम है उर्दू
माजिद-अल-बाक़री
नज़्म
तीन दिन किस तरह फ़ाक़े से रहे शाह-ए-ज़फ़र
तीसरे दिन तश्त पर लाए गए बेटों के सर
प्रेम लाल शिफ़ा देहलवी
नज़्म
तश्त-ए-सीमाब झलकाती झुकती हुई लड़कियो
नित-नए मौसमों की तरह मुझ पे बीती हुई लड़कियो
मोहम्मद अनवर ख़ालिद
नज़्म
बर्फ़-बारी में पुराने बाँस का
तश्त में सिन्दूर छिदे सिक्के सजा कर बीच रस्ते पर रखूँ
मोहम्मद अनवर ख़ालिद
नज़्म
वज़ीर आग़ा
नज़्म
तख़्त-ए-फ़ग़्फ़ूर भी उन का था सरीर-ए-कए भी
यूँ ही बातें हैं कि तुम में वो हमियत है भी
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
तख़्त-ए-सुल्ताँ क्या मैं सारा क़स्र-ए-सुल्ताँ फूँक दूँ
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ