aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "tasliim-e-paspaa.ii"
अदम तस्लीम-ए-पस्पाई में चिल्लाते हुए रहना...
नाकामी-ए-आरज़ू को दिल नेतस्लीम ओ रज़ा के नाम बख़्शे
फ़ितरत के तक़ाज़ों पे न कर राह-ए-‘अमल बंदमक़्सूद है कुछ और ही तस्लीम-ओ-रज़ा का
अल्लह रे शान-ए-हुस्न कि तस्लीम-ए-शौक़ परनज़रें उठाए सर को झुकाती चली गईं
है कभी जाँ और कभी तस्लीम-ए-जाँ है ज़िंदगीतू इसे पैमाना-ए-इमरोज़-ओ-फ़र्दा से न नाप
जहाँ साए सिमट कर एक हूँतस्लीम-ए-जाँ तक की हुमक जागे
दिल गिर पड़े एहसास की आग़ोश मेंऔर बोल उठे तस्लीम ऐ पीर-ए-मुग़ाँ जाते हैं हम
इश्क़ की ख़ैर वो पहली सी अदा भी न सहीजादा-पैमाई-ए-तस्लीम-ओ-रज़ा भी न सही
और तक़्वीम-ए-मोहब्बत न बिखर जाए कहीं
अपनी तख़्लीक़ में वो रंग भी शामिल कर देजो तिरे ज़ौक़-ए-हुनर की भी गवाही ठहरें
आब-ओ-गिल गूँध के कूज़े जो बनाए गए हैंउन की तख़्लीक़ का हासिल ही बिखरना ठहरा
ऐ बहादुर-लाल ऐ भारत सुपूततू था अम्न-ओ-आश्ती का पासदार
तकरीम-ए-आदमख़ुदा ला-मकाँ था
उन्हीं की चश्म-ए-करम के तुफ़ैल में बे-शकजदीद दौर की रौशन-ख़यालियाँ 'पापा'
सच है तेरी बस्ती मेंनंग-ए-पारसाई हूँ
तालीम-ओ-तर्बियत सेइक इंक़लाब लाएँ
है हिमाला सा पर्बत मिरे देश मेंक़ौल-ए-इक़बाल में संतरी पासबाँ
जो सोया हैशायद तन्वीम के ज़ेर-ए-असर
तंज़ीम-ए-काएनात-ए-जुनूँ की हँसी उड़ाउजड़े हुए चमन की बहारों पे रक़्स कर
मर्ग़ूब थी तंज़ीम-ए-जमाअत उस कोछीना हुआ स्वराज लिया बापू ने
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