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नज़्म
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
तमाशा है अहा हा-हा ग़नीमत है ये आलम भी
उठाना हाथ प्यारे वाह-वा टुक देख लें हम भी
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
ये रूप दिखा कर होली के जब मैन रसीले टुक मटके
मँगवाए थाल गुलालों के भर डाले रंगों से मटके
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
इस क़ौम की फ़लाह है जाम-ओ-सुबू के बेच
तुम इंतिख़ाब जा के लड़ो हाव-हू के बीच
सय्यद मोहम्मद जाफ़री
नज़्म
किसी कंजूस के कमरे में जा कर बैठ जाते हैं
और उस के नाम पर टुक शाप से चीज़ें मंगाते हैं
सय्यद मोहम्मद जाफ़री
नज़्म
एक इक तुक-बंद उस्तादों के मुँह आने लगा
लिख के सुब्ह-ओ-शाम नज़्में बे-तुकी से बे-तुकी
रज़ा नक़वी वाही
नज़्म
बस दूर ही से टुक-टुक हम को वो तक रहा है
चाँदी की तश्तरी सा चम-चम चमक रहा है
अमान-उल-हक़ बालापुरी
नज़्म
मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग
मैं ने समझा था कि तू है तो दरख़्शाँ है हयात