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नज़्म
उठाए कुछ वरक़ लाले ने कुछ नर्गिस ने कुछ गुल ने
चमन में हर तरफ़ बिखरी हुई है दास्ताँ मेरी
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
टूटेंगे कभी तो बुत आख़िर दौलत की इजारा-दारी के
जब एक अनोखी दुनिया की बुनियाद उठाए जाएगी
साहिर लुधियानवी
नज़्म
निगाह-ए-शौक़ के साँचों में रोज़ ढलता हुआ
सुना है रावियों से दीदनी थी उस की उठान
फ़िराक़ गोरखपुरी
नज़्म
नूर ही नूर है किस सम्त उठाऊँ आँखें
हुस्न ही हुस्न है ता-हद्द-ए-नज़र आज की रात