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नज़्म
ख़ुदा-ए-लम-यज़ल का दस्त-ए-क़ुदरत तू ज़बाँ तू है
यक़ीं पैदा कर ऐ ग़ाफ़िल कि मग़लूब-ए-गुमाँ तू है
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
आँख है और बारिश-ए-सैलाब-ए-ख़ूँ तेरे बग़ैर
आ कि रुस्वा है मिरा हाल-ए-ज़बूँ तेरे बग़ैर
जौहर निज़ामी
नज़्म
गर्दिश-ए-दौराँ ने जब उस को आह शिकस्ता-हाल किया
देख कर उस के हाल-ए-ज़बूँ को तू ने कुछ न मलाल किया
अली मंज़ूर हैदराबादी
नज़्म
ज़बूँ-हाली की ज़द में है बयाँ मेरा ज़बाँ मेरी
नहीं मिन्नत-कश-ए-ताब-ए-शुनीदन दास्तान मेरी
असद जाफ़री
नज़्म
मुंतशिर हो के ज़माने में हुआ ख़ार-अो-ज़बूँ
हो मुनज़्ज़म तो क़वी तुझ सा ज़माने में नहीं
दाऊद ग़ाज़ी
नज़्म
अभी तक आदमी सैद-ए-ज़बूँ है
अंधेरा ही अज़ल है और अंधेरा ही अबद की जोत है शायद
ज़किया सुल्ताना नय्यर
नज़्म
ख़ुद-शनासी से है उम्मीद कि बन जाएगा काम
वर्ना इस हाल-ए-ज़बूँ का है तबाही अंजाम