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नज़्म
गए ज़माने भी जैसे आँखों के सामने आ खड़े हुए हैं
वही गुलाबी सी धूप दीवार-ओ-दर को रंगीं बना रही है
मख़मूर सईदी
नज़्म
इरफ़ान शहूद
नज़्म
यूँ न था मैं ने फ़क़त चाहा था यूँ हो जाए
और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा