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नज़्म
ज़मीर-ए-लाला में रौशन चराग़-ए-आरज़ू कर दे
चमन के ज़र्रे ज़र्रे को शहीद-ए-जुस्तुजू कर दे
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
ये तिरी आँखों की बे-ज़ारी ये लहजे की थकन
कितने अंदेशों की हामिल हैं ये दिल की धड़कनें
अहमद फ़राज़
नज़्म
रिश्वतों की ज़िंदगी है चोर-बाज़ारी के साथ
चल रही है बे-ज़री अहकाम-ए-ज़रदारी के साथ
जोश मलीहाबादी
नज़्म
चली आती है अब तो हर कहीं बाज़ार की राखी
सुनहरी सब्ज़ रेशम ज़र्द और गुलनार की राखी
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
अजब सा कर्ब बेचैनी मुसलसल बे-क़रारी हो
निगाहें मुंतज़िर फ़ुर्क़त कसक और आह-ओ-ज़ारी हो
अलीना इतरत
नज़्म
मयस्सर हैं ज़री के शामियाने ख़ुश-नसीबी को
ओढ़ा दी साया-ए-दीवार ने चादर ग़रीबी को
हफ़ीज़ जालंधरी
नज़्म
वो नुक़्ता जिस पे मैं हूँ मरक़द-ए-शाम-ए-ग़रीबाँ है
मगर इस सम्त कोई आह-ओ-ज़ारी को नहीं आता
शहज़ाद अहमद
नज़्म
दोनों हाथों से कमा कर उज़्र-ए-नादारी करूँ
जब हुकूमत टेक्स माँगे आह और ज़ारी करूँ