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नज़्म
किस की आँखों में समाया है शिआर-ए-अग़्यार
हो गई किस की निगह तर्ज़-ए-सलफ़ से बे-ज़ार
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
मिरे दीरोज़ में ज़हर-ए-हलाहल तेग़-ए-क़ातिल है
मिरे घर का वही सरनाम-तर है जो भी बिस्मिल है
जौन एलिया
नज़्म
ज़मीर-ए-लाला में रौशन चराग़-ए-आरज़ू कर दे
चमन के ज़र्रे ज़र्रे को शहीद-ए-जुस्तुजू कर दे
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
ज़र्रे ज़र्रे में तिरे ख़्वाबीदा हैं शम्स ओ क़मर
यूँ तो पोशीदा हैं तेरी ख़ाक में लाखों गुहर
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
ब-रब्ब-ए-काबा उस की याद में उम्रें गँवा दूँगा
मैं उस वादी के ज़र्रे ज़र्रे पर सज्दे बिछा दूँगा
अख़्तर शीरानी
नज़्म
हमारे वास्ते तू एक लाफ़ानी मसर्रत है
हमें स्कूल तेरे ज़र्रे ज़र्रे से मोहब्बत है
अब्दुल अहद साज़
नज़्म
समेट लूँ उन्हें तो फिर वो काएनात को जगाएँ
अभी तो रूह बन के ज़र्रे ज़र्रे में समाऊँगा