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नज़्म
कुछ इस तरह से बढ़ा दिल में ज़ौक़-ए-आज़ादी
कि रफ़्ता रफ़्ता तमन्ना जवान होती गई
सय्यदा शान-ए-मेराज
नज़्म
ख़ून-ए-दिल से आप ने सींचा हमारा ये चमन
जिस में खुलते आज भी हैं ग़ुंचा-हा-ए-इल्म-ओ-फ़न
सय्यदा फ़रहत
नज़्म
मुतमइन है तू परेशाँ मिस्ल-ए-बू रहता हूँ मैं
ज़ख़्मी-ए-शमशीर-ए-ज़ौक़-ए-जुस्तुजू रहता हूँ मैं
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
हश्र के दिन तक फला-फूला रहे तेरा चमन
तेरे पैमानों में लर्ज़ां है शराब-ए-इल्म-ओ-फ़न
जोश मलीहाबादी
नज़्म
ज़िंदगी महबूब ऐसी दीदा-ए-क़ुदरत में है
ज़ौक़-ए-हिफ़्ज़-ए-ज़िंदगी हर चीज़ की फ़ितरत में है
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
यूँ तो हम हर शम-ए-इल्म-ओ-फ़न के परवाने रहे
ये हक़ीक़त है कि हम तेरे भी दीवाने रहे
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
क़दम बोसों के भयानक ग़ोल को जो दीमक-ओ-जरासीम की सूरत
निज़ाम-ए-फिक्र-ओ-फ़न बरबाद करता है
अबु बक्र अब्बाद
नज़्म
रंज-ओ-राहत की कशाकश से वरा है ज़िंदगी
इज्तिहाद-ए-इल्म-ओ-फ़न से मा-सिवा है ज़िंदगी