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नज़्म
गर्मी-ए-दिल थी वही उस की वही ज़ौक़-ए-तलब
ढलते सायों में वो था मर्द-ए-जवाँ की मानिंद
जयकृष्ण चौधरी हबीब
नज़्म
सय्यदा शान-ए-मेराज
नज़्म
दास्तान-ए-अहद-ए-पारीना है ज़ौक़-ए-रंग-ओ-बू
अब छलकता है ख़ुम-ओ-साग़र से इंसाँ का लहू