अंतर होत उदासी

बानो कुदसिया

अंतर होत उदासी

बानो कुदसिया

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    स्टोरीलाइन

    "अंतर होत उदासी एक ऐसी ग़रीब लड़की की कहानी है जो जवान होते ही संदेह के घेरे में आ जाती है, कभी उसकी माँ संदेह करती है, कभी सास और कभी उसका बेटा। वो सारी ज़िंदगी सफ़ाईयाँ देते-देते निढाल हो जाती है। उस लड़की पर पहले उसकी माँ बदचलनी का इल्ज़ाम लगाती है, फिर जब उसकी शादी एक मानसिक रूप से बीमार परन्तु अमीर व्यक्ति से कर दी जाती है और वारिस की चाहत में उसका सुसर उससे सम्बंध बना लेता है तो सास उसे घर से बाहर निकाल देती है। उसकी कोख में पलने वाला बच्चा जब बड़ा होता है तो वो भी अपनी माँ को शक की सूली पर लटकाता है तो माँ निढाल हो जाती है और कहती है कि मेरा कभी किसी से नाता नहीं रहा बेटा, मैं इस क़ाबिल नहीं थी कि कोई मुझसे रिश्ता जोड़ता।"

    फिर तीसरी बार ऐसे हुआ। इससे पहले भी दोबार और ऐसे हुआ था... बिल्कुल ऐसे। जब मेरा बायां पांव बाँस की सीढ़ी के आख़िरी डंडे पर था और मेरा दायाँ पैर सेहन की कच्ची मिट्टी से छः इंच ऊंचा था तो पीछे से माँ ने मेरे बाल ऐसे पकड़े जैसे नए नए चूज़े पर चील झपटती है। मेरा तवाज़ुन बुरी तरह बिगड़ा और मैं कपड़े की गड्डी की मानिंद अड़ंग बड़ंग कच्ची मिट्टी पर जा गिरी।

    माँ को मुझे पटख़नी देने या धप्पा मारने की नौबत ही आई क्योंकि जब इंसान किसी से बिछड़ कर रहा हो तो उसमें इतनी जान ही कहाँ होती है। मुझे तो एक गर्म सांस उस वक़्त चारों शाने गिरा सकता था। माँ ने तो फिर हबका मार कर मेरे बाल झिंझोड़े थे।

    “बोल बोल, इस भरी दोपहर में तू कहाँ से रही है? गशती अलफ़ती कहाँ थी तू इस वक़्त... बोल। गर्मी ऐसी कि छांव तले धरती फट जाये और तो सक्खर कोठे पर क्या कर रही थी नाख़समी?”

    मैं चुप रही।

    “बोल कौन है ऊपर? ऊपर कोई कमरा टट्टी? फिर ऊपर क्या लेने गई थी तू? किस यार हिमायती से मिलने गई थी, उसका मैं लहू पी जाऊँगी बोल उसका नाम...”

    मैं और भी गूँगी हो गई।

    मेरा अब्बा भी बड़ा चुप आदमी था लेकिन उसकी चुप, उसका गूंगापन, उसके मरन बरत सब माँ को सताने के लिए होते थे। उसे माँ को तड़पाने में बड़ा मज़ा मिलता था। वो अपनी बड़ी बड़ी मूंछों तले मुस्कुराता रहता पर माँ की किसी बात का जवाब देता। वो इस कचहरी में अपनी सफ़ाई के लिए कभी एक लफ़्ज़ भी मुँह से निकालता। उसी चुप में अब्बा की सारी इज़्ज़त और ज़िंदगीभर की जीत पिनहां थी। जब माँ बोल बोल कर हलकान हो जाती, ताने, बद दुआएं, कोसने, आहें, सिसकियाँ सब बारी बारी अपना दौर ख़त्म कर चुकतीं तो माँ हलकान हो कर दीवारे साथ खड़ी चारपाई आँगन में बिछाती और उस पर औंधी लेट जाती।

    ऐसे में बासी रोटी की तरह उसके चेहरे पर अनगिनत दाग़ धब्बे नज़र आने लगते। मुझे माँ पर बड़ा तरस आता लेकिन अब्बा मुख़्तलिफ़ था। औरत मर्द के इस खेल में जब वो जीत चुकता तो फिर चार ख़ाने का खेस कंधे पर डाल कर यूं निकल जाता जैसे पहलवान अखाड़े से कुश्ती जीत कर जाते हैं।

    माँ मेरे और अब्बा के दरमियान बेतौर टकराने वाली गेंद थी। मुझ दीवार से टकराती तो टप्पा खा कर अब्बा की तरफ़ जाती। वहां पत्थर से सर फोड़ कर फिर बढ़क कर मेरी जानिब आती। माँ की सारी उम्र इसी बेमसरफ़ पेशक़दमी और पसपाई में गुज़र गई और सारी उम्र उसे इल्म हो सका कि ये खेल सिर्फ़ उसको थकाने के लिए खेला जाता था।

    बड़ी रात गए अब्बा लौटता तो माँ वैसी नींद सोई होती जो ज़च्चा को बच्चे की पैदाइश के बाद नसीब होती है। मैं कुंडी खोलती, अब्बा मुहब्बत से मेरे सर पर हाथ फेरता और चुपचाप अंदर चला जाता। अब्बा की हर बात बिन कहे मुझे समझ आती थी और माँ की बातें ऐसे थीं जैसे गूँधे आटे की भरी कनाली पर ऊपर ही ऊपर मक्खियां भिनभिना रही हों, मेरे पल्ले कभी कुछ पड़ा।

    अब्बा बड़ा चुप आदमी था लेकिन अब्बा की चुप में एक चाल थी। मैं अब्बा की तरह चुप नहीं थी। मेरी चुप हवेली के सदर दरवाज़े के क़दमों में गिरे हुए इस कुफ़्ल की मानिंद है जिसे पिछली रात चोर, दरवाज़े के कंडे से उतार कर फेंक गए हों। ऐसा ताला बहुत कुछ कहता है लेकिन कोई तफ़सील बयान करने से क़ासिर रहता है। वो सारी वारदात से आगाह होता है लेकिन अपनी सफ़ाई में कुछ नहीं कह सकता। हिफ़ाज़त कर सकने का ग़म, अपनी हेचमदानी का एहसास, अपने मालिकों के साथ गहरी दग़ाबाज़ी का हैरत-अंगेज़ इन्किशाफ़ उसे गुम-सुम कर देता है।

    मेरी और अब्बा की चुप में बड़ा फ़र्क़ था। अब्बा उन ऊंचे पहाड़ों की तरह चुप था जिनके क़दमों में लहरें शोर मचा मचा कर सो जाती हैं। मेरी चुप उस लावे की मानिंद थी जो ज़मीन के अंदर उबलता सड़ता, बहता कहीं का कहीं उतर जाता है

    “यूं चुप क्यों खड़ी है अपने कुपित बाप की तरह... बोल, किस यार की बग़ल गर्म कर के आई है नामुराद।” उसी मुसीबत के हाथों अब्बा ने कुछ साल पहले बड़ी लंबी ख़ामोशी इख़्तियार करली थी। हर सफ़ाईयां पेश करने के झंझट से फ़ारिग़ हो कर लंबी तान कर सो गया था। मैं माँ को क्या बताती? कहाँ से शुरू करती और कहाँ जा कर ख़त्म करती।

    “कुत्ती, हमारा कोठा सारे महल्ले से नीचा है। किस-किस ने तुझे आते-जाते देखा होगा। बोल? कितने अर्से से ये सिलसिला जारी है? कौन सा महीना लगा है? बता जल्दी। कोई डाक्टर दाई तो कर मरूँ इज़्ज़त गँवाने से पहले।”

    एकदम आँसू मेरी आँखों से बहने लगे। अभी थोड़ी देर पहले उसने भी मेरी चोटी पकड़ कर यही कहा था। मैं अम्मां को क्या बताती कि अभी अभी मैं उसके मुँह से भी यही सुनकर आई थी, “बोल बताती क्यों नहीं। रोए क्यों जाती है। किसी डाक्टरनी की ज़रूरत है तो ख़र्च मैं करूँगा। बोल रोती क्यों जाती है। कुछ बताती क्यों नहीं?” मैं उसे कुछ बता सकी और अम्मां को... बचपन से मुझे यूं लगता है कि अगर मैंने किसी से कुछ कहा तो वो समझेगा नहीं, उल्टा समझ कर मेरा दुश्मन हो जाएगा।

    मैं कच्ची मिट्टी से उठी और अंदर ग़ुस्लख़ाने में चली गई। माँ कुछ देर दरवाज़ा धड़धड़ाती रही। फिर ताने, कोसने, बद दुआएं जारी हुईं। उनका स्टाक ख़त्म हो गया तो वो देर तक दरवाज़े के साथ लग कर रोती रही। फिर उसने अपनी पुरानी तकनीक इस्तेमाल की।

    आँगन में चारपाई पर लेट गई और मेरे पैदा होने से लेकर आज तक के तमाम वाक़ियात ऊंचे ऊंचे दोहराने लगी। मेरा हमल उस पर कैसा भारी था? मुझे जनने में उसने कैसी दर्द-ए-ज़ह बर्दाश्त की थी? फिर कैसे छल्ले में मुझे ख़सरा निकल आया और वो पूरे उन्नीस दिन पलंग पर बैठी रही। गोद में लेकर... मुझे पालने पोसने में उसे जो जो मुसीबत, मरहले क़ुर्बानियां दरपेश रहीं उनका आँखों देखा हाल बयान करते करते शाम ढल गई।

    जब मैं बाहर निकली तो माँ की सारी गैस निकल चुकी थी। वो एक छोटे मासूम बच्चे की तरह अलानी चारपाई पर घोक सो रही थी और उसकी बाएं गाल पर बान की रस्सियों का जाल बना हुआ था। शाम को नीम के दरख़्त पर अनगिनत चिड़ियां चहचहा रही थीं लेकिन माँ को उनके शोर का इल्म था। ऐसे में अगर मैं किसी के साथ भाग जाती तो भी माँ को इल्म होता। लेकिन मैं भागती किस के साथ? जिन औरतों को मर्द भगा ले जाते हैं ख़ुदा जाने वो कैसी होती हैं? हम जैसी लड़कियों से तो कोई भगा ले जाने का वादा भी नहीं करता।

    मैं चुप-चाप चारपाई के पाए से सर जोड़ कर बैठ गई। माँ के सिवाए इस दुनिया में मेरा था भी कौन? अब्बा का भी सिवाए माँ के दुनिया में और कोई नहीं था। वो लाख बार घर से गया और फिर इसलिए लौट आया कि इस खोटे सिक्के को सँभाल कर रखने वाली एक ही तिजोरी थी।

    मेरा अब्बा इतना निखटटू् था इतना निखटटू् था कि मुँह पर झूलने वाली मक्खियां भी बिलआख़िर उसे छोड़ जातीं। वो खाता बहुत कम था क्योंकि उसे नवाले तोड़ने से वहशत होती थी। आधे पिंडे से ज़्यादा को कभी वो एक वक़्त में साबुन नहीं लगा सका, इसी लिए वो नहाने से भी कतराता था।

    सर्दीयों में बग़ैर लिहाफ़ के पड़ा रहता। गर्मियों में पसीने में नहाया नज़र आता लेकिन पंखा कभी झलता। अब्बा उस खत्ती से मुशाबेह था जो बच्चे गिल्ली-डंडा खेलते वक़्त खो देते हैं। कभी कभी बरसाती पानी उसमें आपी आप भर जाता है वर्ना उम्र उसकी मुँह खोले ही गुज़र जाती है।

    माँ ने सारी उम्र अब्बा का साथ दिया। बोल कर, ताने देकर, हलकान हो कर, सिसकियाँ भर कर दिया, पर दिया। हम दोनों पक्की दीवारों से सर फोड़ फोड़ कर माँ बूढ़ी हो गई। उस बूढ़ी नीम जान घायल को मैं क्या बताती? कहाँ से बात शुरू करती और कहाँ जा कर ख़त्म करती? हमारे घर में हर उस चीज़ का फ़ुक़दान था जिससे ज़िंदगी परवान चढ़ती है, सरशार होती है। दौलत, शराफ़त, मुहब्बत, इन चीज़ों का हमेशा घाटा टोटा रहा। हमें तो हर चीज़ ऐसे मिली कि साँसें क़ायम रहीं लेकिन ज़िंदगी के आसार खुल कर पैदा हो सके।

    जब मैं तीन साल की हुई तब से माँ एक क़रीबी फ़ैक्ट्री में काम करने जाने लगी। अब्बा और मैं घर पर रहते थे। हम दोनों अपनी अपनी चुप के क़िले में बंद सारा दिन पास रहते हुए भी बहुत दूर दूर रहते। जब अब्बा घर पर होता तो यूं लगता था कि जैसे कहीं बाहर गया हुआ है और जब वो बाहर होता तो यूं लगता कि इधर उधर ही कहीं होगा।

    कुछ अर्सा मैं स्कूल जाती रही। फिर ये सिलसिला ख़र्च की ज़्यादती के बाइस बंद हो गया। ये भी अच्छा हुआ क्योंकि स्कूल मुझे दिल से बुरा लगता था। वहां सब लड़कियां बड़ी ख़ुश ख़ुश आती थीं। उनके पास बताने के लिए इतनी सारी बातें होती थीं कि वो उस्तानी के पढ़ाते वक़्त भी रुक्क़ों पर पैग़ामात लिख लिख कर एक दूसरे को पहुंचाती रहती थीं।

    मुझे मेरी क्लास की लड़कियां “बिल बतौरी नासां चौड़ी” छेड़ती थीं लेकिन मैं उनको कभी पलट कर कुछ कहती। उनकी छेड़-छाड़ इस तान-ओ-तशनीअ के मुक़ाबले में फूल की छड़ी थी जिससे मेरा दिल मेरी तवाज़ो किया करता था। स्कूल से हट कर मेरी ज़िंदगी फिर कुवें की माल बन गई। हर वक़्त वही सुबह-ओ-शाम, वही चुल्लू-भर पानी, वही चा-ब-चा भर ज़िंदगी, कभी तुग़्यानी नहीं, कभी सेरी नहीं।

    फिर अब्बा मर गया।

    उस रात उसने चार ख़ाने वाला कम्बल ओढ़ा, अपनी ख़ामोशी की मसहरी तानी और फिर हमेशा के लिए चुप हो गया। माँ दंग सी रह गई। उसने ऊंचे ऊंचे बैन डाले, दीवारों से टकराई। बस देखते ही देखते वो बंजर ज़मीन की तरह चटख़ गई। हमारे कोई रिश्तेदार आए, क़ुरआन ख़त्म हुए, गुठलियां पढ़ी गईं। बस महल्ले वालों ने चंदा कर के माँ के सर से बोझ उठा दिया और सोएम के बाद माँ फिर फ़ैक्ट्री जाने लगी।

    अब अब्बा हर वक़्त घर में रहने लगा।

    उसी अब्बा से ख़ौफ़-ज़दा हो कर मैं कोठे पर चढ़ जाती। हमारे घर की छत पर ऊंची ऊंची मुंडेरें नहीं थीं। बस उभरवां किनारे थे जिनकी सूखी मिट्टी में तिलके चमकते रहते हैं। उसी किनारे पर बैठे-बैठे मुझे नुक्कड़ से माँ आती दिखाई देती तो मैं नीचे चली आती। महल्ले में बहुत लड़कियां थीं लेकिन मेरी चुप का ताला खोल खोल कर वो सब बेज़ार हो चुकी थीं। अब मैं थी और कोठे की मुंडेर, आसमान पर उड़ने वाली चीलें, महल्ले के कबूतर और शाम को लौटने वाली कव्वों की क़तारें।

    एक रोज़ चौथे कोठे से मुझे सीटी की आवाज़ सुनाई दी। तब मुझे मालूम नहीं था कि सीटी बजाने वाला क़दीर खोखे वाला है। तब मुझे ये भी मालूम नहीं था कि क़दीर के पाँच बच्चे हैं और उसकी बीवी महल्ले की सबसे ख़ूबसूरत औरत है। मुझे तो सिर्फ़ ये दिखाई दे रहा था कि क़दीर का पक्का घर सारे महल्ले में ख़ूबसूरत और ऊंचा है। उस की खिड़कियों में पर्दे थे और उसकी दीवारों पर जालियाँ बनी हुई थीं। सब से ऊपर एक हवादार कमरा था जिसकी खिड़कियों पर नीम फ़ीरोज़ी, नीम हरा, ताज़ा-ताज़ा रंग किया हुआ था।

    यही कमरा मेरा पहला घर बना। उसी कमरे में पहली बार क़दीर ने मुझे अपने खोखे से लाकर ठंडा कोकाकोला पिलाया। प्लास्टिक के क्लिप, नक़ली हार, कांच की चूड़ियां और नाक में डालने वाला बड़ा चमकदार लेकिन झूटा कूका दिया। क़दीर की हर बात अपने खोखे की तरह थी। वो थोड़ी क़ीमत पर ज़्यादा माल ख़रीदने का आदी था। उसके हाँ उधार क़तई बंद था और वो किसी गाहक को भी नाराज़गी का मौक़ा नहीं देता था।

    पता नहीं मैं अब्बा के डर से वहां जाती थी? पता नहीं जवानी में तन्हाई का साँप क्यों ऐसे बिलों में ले घुसता है? ख़ुदा जाने मेरी तुग़्यानी, जी भर कर कुछ खाने, कुछ हंस लेने, कुछ वक़्त झोली भर कर गुज़ारने की ख़्वाहिश मुझे वहां खींच कर ले जाती थी।

    ग़ालिबन कभी कभी कोई वजह नहीं भी होती। बस यूंही इंसान ज़िंदगी के पहिए में रेशम के थान की तरह उलझता चला जाता है। क़दीर को अपने ख़ानदान से बड़ी मुहब्बत थी। वो मासियों, फूफियों, हम ज़ुल्फ़ों की बातें करता थकता था। उसे अपनी बीवी से भी बड़ी मुहब्बत थी क्योंकि उसकी बीवी उसके ख़ानदान का एक अहम हिस्सा थी।

    वो विसाल के लम्हों में भी उसी का नाम ले-ले कर मुझसे लिपटता रहता। उसकी मुहब्बत फोके अंदाज़ की थी कि जिससे मेरे लहू का ताइर कभी भी ज़ख़्मी हो कर गिरता बल्कि ऊपर ही ऊपर... और ऊपर उड़ता चला जाता, बिलकुल तन्हा।

    अपने बच्चों की बातें करके क़दीर को बड़ी ख़ुशी मिलती थी। अपनी ख़ानदानी रवायात का, अपनी महल्ले की साख और बिरादरी की इज़्ज़त का उसे बड़ा पास था। क़दीर भी दरअसल तुग़्यानी से ना-आश्ना था। उसकी सारी ज़िंदगी भी मुआशरे के पैमानों में नाप तौल कर गुज़री थी। वो इतनी छोटी उम्र से खोखा चला रहा था कि अब उसकी अपनी ज़िंदगी ख़ाली खोखे के इलावा और कुछ थी।

    इन सब क़ुयूद के बावुजूद वो बड़े एहतिमाम से मुझे मिलता था। वो बड़े हिसाब से अपने खोखे से ऐसी चीज़ें मेरे लिए लाता जो उसके बाल-बच्चों की हक़तलफ़ी करें। वो अपनी ज़िंदगी की लज़्ज़तें यूं इकट्ठी करता जैसे कोई बड़ी-बी हिसाब का पान लगा रही हो। बराबर का चूना, बराबर का कत्था, चुटकी भर ज़र्दा। उसकी जज़बाती ज़िंदगी भी एक ख़ास पैमाने पर चलती थी। यहां कोई उधार था फुज़ूलखर्ची... वो जो कुछ मुझे देता फ़ौरन उसकी क़ीमत वसूल कर लेता, लेकिन मेरी बोल बुलावे वाली माँ ये सब कुछ कैसे समझ सकती थी।

    जब बड़ी शाम गए उसकी आँख खुली तो चंद लम्हे वो मुझे देखती रह गई। मैं समझी शदीद ग़म ने उसके ज़ेहन को माऊफ़ कर दिया है लेकिन फिर वो मेरे कंधे पर हाथ मार कर बोली, “बोल बद-बख़्त, कौन सा महीना लगा है तुझे, बोल मर।” मैं उसे कैसे समझाती कि ऐसे लिखे दारों के साथ महीने नहीं चढ़ा करते। ऐसे लोगों के साथ कभी नफ़ा होता है नुक़्सान। सिर्फ़ ज़िंदगी का बही खाता हिंदसों से भर जाता है जिन्हें कोई पढ़ नहीं सकता।

    “बोल फिर मिलेगी तू उससे... बोल?”

    पूरे हाथ का चांटा आया और बिजली की तरह मेरे जिस्म से गुज़र गया। मैं माँ को क्या बताती कि मुझे क़दीर से मिलने का कुछ ऐसा शौक़ भी नहीं था। ये बात अगर मैं क़दीर या माँ को समझाने की कोशिश करती तो ग़ालिबन वो दोनों मुझे जान से मार देते।

    “बोल गशती... बोल हरामख़ोर... मिलेगी उससे?”

    मैंने माँ के पांव पकड़ लिये। अपने दुख की वजह से नहीं। मेरे अपने कोई दुख नहीं थे लेकिन मैं उसे इस क़दर हलकान होते देख नहीं सकती थी। अगर वो मुझे मारती रहती तो शायद मुझ पर कोई असर होता। लेकिन अब वो अपने मुँह पर चाँटे मार रही थी। अपने बाल खसोट रही थी। उसे यूं अपने से बदला लेते हुए देखकर मुझे बड़ी तकलीफ़ होती थी।

    मैंने बड़ी क़समें खाईं कि फिर क़दीर से मिलूंगी। क़ुरआन उठाया। उसके बाद मैं कभी क़दीर के कोठे पर नहीं गई लेकिन माँ चूँकि सारा दिन फ़ैक्ट्री में काम करती। इसलिए उसे कभी यक़ीन आसका कि मेरे अह्द सच्चे थे। वो मुझसे बड़ी मुहतात हो गई थी। जब मैं सो जाती तो वो चोरी चोरी आकर मेरी क़मीज़ मेरे पेट से उठाती और बड़े पोले पोले हाथों से मेरे पेट की टोह लेती। उसे पूरा शक था कि ये अंदर ही अंदर बढ़ रहा है। कभी कभी रात के पिछले-पहर वो मेरे सिरहाने बैठ कर हौले हौले रोने लगती जैसे बिल्लियां मस्ती में आकर बोलती हैं।

    क़दीर ने मेरे खाते को फिर कभी खोला। मैं कभी उसके कोठे पर गई। डूबी रक़म पर वो ज़्यादा वक़्त ज़ाए करने का आदी था। इतने सारे मेल-जोल के बावजूद कोई नफ़ा हुआ नुक़्सान... ज़िंदगी चुल्लू भर पानी खींचती रही, कोई तुग़्यानी आई सेरी का एहसास बढ़ा। बस सिर्फ़ सांस की डोरी टूटी।

    फिर एक दिन फ़ैक्ट्री से माँ बड़ी ख़ुश लौटी। उसके हाथ में मिठाई का बड़ा सा डिब्बा था, “ले खा हाजिरा... खा... तेरे तो नसीब खुल गए। चंद्रिये मिठाई खा। तेरी बात पक्की करके आई हूँ बादामी बाग़ में।”

    बात पक्की कराने का शौक़ मेरे दिल में क़दीर ने डाला। वो इतनी प्रीत से अपनी बीवी की बातें किया करता था कि मेरा दिल भी करता कोई मेरे मुताल्लिक़ ऐसी ही बातें किया करे। मेरा ख़्याल था कि एक रोज़ मुझे देखने वालियाँ आयेंगी। फिर एक सेहरे वाला चेहरे पर रूमाल रखे आएगा। मैं उसके चमकदार बूटों को देखती घर से रुख़सत हो जाऊँगी। मुझे जंगल के उस पार जाने का बड़ा शौक़ था।

    “आ... मुँह लपेट कर पड़ी रहा कर। तेरा इंतिज़ाम तो अल्लाह ने ख़ुद किया। मैनेजर साहिब की बीवी ख़ुद मेरे पास आई। सुन रही है हाजिरा? नाज़ाँ बेटी... सुन रही है?”

    “सुन रही हूं माँ!”

    “फिर ख़ुश क्यों नहीं होती...?”

    “ख़ुश हो रही हूँ... माँ।”

    माँ राज़दारी से मेरे पास आकर बैठ गई और बैठी हुई आवाज़ में बोली, “मैनेजर की बीवी बोली मेरी बहन का बेटा है। पढ़ा लिखा तो नहीं है, पर जायदाद का अकेला वारिस है। हम तो जायदाद का नफिसा भी मुँह से नहीं ले सकते, तू जायदाद वाली हो जाएगी। मैं ख़ुद बादामी बाग़ गई थी, मैनेजर साहिब की कार में। घर देखकर आरही हूँ। पीली हवेली है दोमंज़िला, पंखे, रेडियो, टेलीविज़न, क़ालीन, सब कुछ है घर में... ले लड्डू खा। ऊपर वाली मंज़िल में लड़का रहता है, बड़ा घर है। सारी उम्र रेशम पहनेगी। इस कच्चे कोठे के अज़ाबों से बची रहेगी, ख़ुश होजा... जिसका कोई सुधारने वाला हो रब उसके काम करता है... रज खाना रज सोना...”

    बड़ी देर बाद मैंने पूछा, “और वो... वो कैसा है?”

    “जैसा घर होता है, वैसे लोग होते हैं उसमें रहने वाले। ऐसे घरों में कोई हमा-शुमा थोड़ी रहते हैं।”

    “कैसी शक्ल है उसकी?”

    “माँ ख़ूबसूरत है तो बेटा भी ख़ूबसूरत होगा। गोरी चिट्टी, ये बड़ा सा कूका नाक में, पूरा बाज़ू चूड़ियों से भरा हुआ। कोई प्यारी बातें करती है हाजिरा, कोई प्यारी, बातें करती है, बैठिए बहन जी... खाइए बहन जी... ये गद्दी कमर के पीछे रख लें। ठंडा पिएंगी कि गर्म। मेरा तो वहां से आने को जी नहीं करता था, सच हाजिरा...”

    मैं चुप रही।

    “बादामी बाग़ वाली कह रही थी, हाजिरा बहन जी, हमें सिर्फ़ लड़की चाहिए जो हमारे गुड्डू को ख़ुश रखे, उससे हमदर्दी करे, उसका दिल लगाए। हमें किसी चीज़ की तमअ नहीं। हमें कुछ नहीं चाहिए। अल्लाह का दिया बहुत कुछ है। अगर हमें लालच होता तो हम अमीरों की लड़की कभी की ले आते। हमें तो ये पता है कि ग़रीबों में ग़ैरत होती है। मुहब्बत होती है, शराफ़त होती है...”

    मैं अंदर ही अंदर हंस दी। बादामी बाग़ वाली नहीं जानती थी कि इन ही तीनों के फ़ुक़दान से ग़रीबी पैदा होती है... दौलत का फ़ुक़दान तो फ़क़त ग़रीबी को सदाबहार बनाता है। असली बहार तो उन तीनों ही के होने से हुआ करती है।

    “ले सोनिए खा... असली मोतीचूर के लड्डू हैं, ले खा...”

    अम्मां उस रोज़ बड़ी ख़ुश थी। वो हांडी भूनते हुए कुछ गुनगुनाती रही। फिर महल्ले वालों को ये ख़बर सुनाने चली गई। वापस आई तो उसका चेहरा दग दग कर रहा था। मैंने अम्मां को इस क़दर ख़ुश कभी नहीं देखा। निकाह से एक रात पहले तक उसी तरह हँसती गुनगुनाती रही।

    शादी से एक दिन पहले जब शाम को बादामी बाग़ से लौटी तो उसका चेहरा बुझा हुआ था और वो चुप-चुप थी। मुश्किल से उसने वो सूटकेस लाकर आँगन में रखा जिसमें कपड़े और ज़ेवर थे। उसके बाद वो बग़ैर मुझे आवाज़ दिए अंदर ग़ुस्ल-ख़ाने में चली गई। उसने सूटकेस खोल कर मुझे कपड़ा ज़ेवर दिखाये मुँह से कुछ बोली। उस रात के बाद मेरी माँ ने फिर मुझसे कोई बात की। आधी रात को मैं उसकी सिसकियों की आवाज़ सुन कर जाग गई। वो सूटकेस खोले कपड़ों को घूर रही थी।

    “क्या हुआ माँ...?”

    “कुछ नहीं, तू सो जा...”

    “फिर तू रो क्यों रही है?”

    “कुछ नहीं।”

    माँ मुझसे लिपट गई। उसके ताने, कोसने, बद दुआएं ज़िंदा थीं। आज मुझे इस बग़लगीरी से यूं लगा गोया उसकी जान जिस्म छोड़ रही है। मेरा ख़्याल था कि वो मुझसे बिछड़ने का ग़म कर रही है लेकिन मेरा दिल हर क़िस्म के जज़बात से ख़ाली था। यहां किसी से मिलने की ख़ुशी थी किसी से बिछड़ने का रंज।

    मेरी ज़िंदगी के माह-ओ-साल तो यूं गुज़रे थे जैसे किसी गोदाम में नए साल का कलेंडर लटके लटके पुराने सालों से जा मिले। माँ सुबह तक मुझसे लिपटी रही और रोती रही और जब मेरी शादी का दिन तुलूअ हुआ और उसकी पहली सफ़ेदी उभरने लगी तो माँ बोली, “देख हाजिरा, नसीब से झगड़ना। औरत की सारी ज़िंदगी नसीब से चलती है। मुझे देख तेरह बरस की ब्याही आई थी। एक दिन शौहर की कमाई का खोटा पैसा तक नहीं मिला।

    एक दिन इस घर के मालिक ने मुझे सीपी भर प्यार भी नहीं दिया। पर रानिए मैंने नसीब से झगड़ा नहीं किया। जो मेरे करम अच्छे होते तो सब कुछ मिल जाता। हाथ-पांव मारे बग़ैर मिल जाता। सुनती है कि नहीं? किसी को अल्लाह दौलत देता है तो औलाद नहीं होती। औलाद देता है तो सेहत नहीं मिलती। इतने तारे अल्लाह ने नहीं बनाए जितने ग़म बनाए हैं। सब अपने अपने तारे का ग़म सहने आए हैं इस जहां में।”

    पहली बार मुझे शक गुज़रा जैसे माँ मुझसे कुछ छुपा रही है, मुझसे झूट बोल रही है। क्योंकि इन दोनों की उसे आदत नहीं थी।

    “क्या बात है माँ?”

    “कोई बात नहीं, हर माँ बेटी को कुछ कुछ साथ देती है। मैं तुझे जहेज़ तो दे नहीं सकती, दिलासा भी देकर रुख़सत करूँ।” मुझे रोना गया और मैं माँ से लिपट गई।

    ’’जब मैं यहां से फ़ैक्ट्री जाती हूँ तो रास्ते में कई मैनहोल खुले मिलते हैं। अँधेरी रातों में उनमें राहगीर गिर भी पड़ते हैं। हाजिरा यूं समझ ले सोनिए हमारे रब ने हर चौड़ाई के हर गहराई के मैनहोल बिछा रखे हैं अपनी दुनिया में। आख़िर आदमी कब तक बचेगा। बंदा बशर है, लंबी स्याह ज़िंदगी है किसी किसी खड में तो गिर कर ही रहेगा।”

    “तू मुझे साफ़ साफ़ बताती क्यों नहीं, क्या बात है ? हुआ क्या है?”

    “कोई बात नहीं, कुछ नहीं हुआ। नया घर होगा नए लोग होंगे। वहां तेरी माँ नहीं होगी लेकिन ग़रीबी भी नहीं होगी। हर जगह का अपना सुख है, अपना दुख है। जो लड़की मैके के सुख याद करती है वो कभी ससुराल घर जा कर ख़ुश नहीं होती।” '

    “तुझे किसी ने कुछ कहा है माँ? बता, तू बताती क्यों नहीं?”

    मेरी माँ चुप रही। उसकी चुप मेरी और अब्बा की चुप से भी अटल थी क्योंकि शादी की दूसरी रात मेरी माँ चुपचाप इस दुनिया से रुख़सत हो गई। मेरे ससुराल वालों ने ख़ामोशी से उसको सपुर्द-ए-ख़ाक कर दिया और मुझको बताया। वो मुझे दो सदमे एक ही वक़्त में देना चाहते थे।

    जिस तरह सश माहे बच्चे को मस्नूई हरारत में रखकर इस दुनिया में रहने के क़ाबिल बनाते हैं, उसी तरह मेरे ससुराल वालों ने मुझे आसाइश, आराम और बड़ी चापलूसी की रूई में बचा बचा कर कई दिन रखा ताकि गुड्डू से बहुत पहले मैं इस घर की दौलत भरी ज़िंदगी की आदी हो जाऊं।

    जितने दिन घर में मेहमान रहे यही सुनने में आया कि गुड्डू बीमार है और निचली मंज़िल में अपनी माँ के कमरे में है। कई बार जी में आई कि एक नज़र गुड्डू को देख आऊँ, उसकी बीमारपुर्सी करूँ। पर दूसरी मंज़िल से नीचे जाने की हिम्मत पैदा हुई।

    मेरी सास मेरी माँ का उलट थी। गोरी गोरी गोल गोल... चुप-चुप सी, बड़ी साबिर, बड़ी बर्दाश्त वाली। कभी कभी मुझे लगता... वो इस दुनिया की मख़लूक़ नहीं है। उसकी आँखों में इतना ग़म होता कि मुझे उससे डर आने लगता।

    माँ की मौत के बाद सबसे पहले मेरी सास ने मेरा दिल जीत लिया। वो चुप-चुप बैठी होती तो मुझे बड़ा दुख होता जैसे माँ को देखकर होता था। जिस रात पहली बार मैं गुड्डू से मिली, देर तक सास मेरे पास बैठी रही। उसका हाथ मेरे घुटने पर था और वो बार-बार उसे थपक रही थी। वो जिस बात का सिरा पकडती, बीच में अधूरा छोड़कर चुपचाप मेरा मुँह तकने लगती।

    “गुड्डू साहिब का अब क्या हाल है जी?”

    “ठीक है अब तो, आज आएगा तेरे पास...” अनदेखे दूल्हे की आरज़ू रोशन सूरज की तरह मेरे दिल में तुलूअ हो गई।

    “कभी कभी जो तसव्वुर औरत दूल्हे का बनाती है, हाजिरा दूल्हा उससे मुख़्तलिफ़ होता है। पर सारी चीज़ औरत का जज़बा है... घर औरत बनाती है, बच्चे औरत जनती है। मर्द तो ऐसे ही घर के बाहर नाम की तख़्ती है।”

    मेरा दिल पहली बार डरा, लेकिन फिर सोचा गुड्डू शायद बदसूरत हो, इसीलिए ये तमहीद बांध रही है। इतने दिन इसीलिए उसे मेरे पास आने भी नहीं दिया। लेकिन मेरी सास को शायद इल्म था कि इतने दिन ससुराल में रह कर मैं परेशान हो गई थी।

    अब मुझे अच्छे बुरे आदमी की पहचान रही थी। मुझे अपना शौहर दरकार था। बड़ी देर तक सास यूंही बेमसरफ़ चुपचाप मेरे पास बैठी रही। फिर जब वो आधी दहलीज़ के अंदर और आधी बाहर थी तब वो बोली, “सुन हाजिरा, हम लोग तेरी बड़ी क़दर करेंगे, सिर्फ़ तो गुड्डू की क़दर करना। वो हमारा इकलौता बेटा है। पाँच बहनों का अकेला भाई। देख बेटी, जो कुछ वो तुझे दे सके तो हमसे माँगना। मेरे पास गुड्डू से और कोई क़ीमती चीज़ नहीं है।”

    मैं अपनी सास को समझने की कोशिश कर रही थी। पर वो... अपने दिल की भट्टी को आँसूओं और बातों से ठंडा कर रही थी, “मेरे रिश्तेदारों में लड़कियों का काल नहीं है लेकिन मैं ग़रीब घर की लड़की इसलिए लाई हूँ कि ग़रीबों में हमदर्दी होती है। वो मुहब्बत करना जानते हैं। अब गुड्डू जैसा भी है, तेरा है हाजिरा... जैसा भी है... सिर्फ़ तेरा है।” मेरी सास जल्दी से रुख़सत हो गई।

    उसकी बात ठीक थी कि गुड्डू सिर्फ़ मेरा था लेकिन अफ़सोस मैं उसकी इतनी भी हो सकी जितनी मैं क़दीर की थी। रात के पिछले पहर गुड्डू कमरे में दाख़िल हुआ। पहले बाहर कुछ खुसर फुसर होती रही। फिर गुड्डू अंदर आया। वो अंदर आते ही मुझे ऐसे चिमटा जैसे रीछ दरख़्त से झप्पी डालता है। उसके पीछे मेरी सास और बड़ी दो ननदें खड़ी थीं।

    “अम्मां, मेरी दुल्हन... मेरी बीवी... मेरी अम्मां जी, पारी पारी दुल्हन जी...”

    मेरी सास और ननदों ने जल्दी से उसे मुझसे जुदा कर दिया।

    “क्या कर रहा है गुड्डू?”

    “देखो दुल्हन, ये मुझे तुम्हारे पास नहीं आने देती थीं। कहती थीं दुल्हन भाग जाएगी। तू भागेगी? बता मैं कोई बुरा हूँ... मैं अपना क़ायदा लाकर तुम्हें सुनाऊँ? कहाँ है मेरा क़ायदा... लाओ... लाते क्यों नहीं? मैं दुल्हन को क़ायदा सुनाऊँ।”

    मेरी सास ने उसे चुप कराने की कोशिश की तो वो रोने लगा, “सब मुझसे बुरा सुलूक करते हैं, फिर कहते हैं, हम तुम्हारा भला कर रहे हैं। मैं क्यों चुप रहूं बड़ी आपा। तुम चुप हो जाओ, तुम दफ़ा होजाओ। मेरी दुल्हन है, मैं इससे बोलूँगा... बोलूँगा... बोलूँगा।”

    ढीली मसहरी कभी कभी बाँसों के साथ लगानी बड़ी मुश्किल होती है। एक सिरे पर डंडों का क्रास ठीक करो तो दूसरे सिरे के डंडे सरक कर पायों के नीचे से निकल जाते हैं। बिल्कुल ऐसे ही मेरी सास ननदें तत्तो थम्बो करके गुड्डू को इंसान के रूप में पेश कर रही थीं। कुछ देर बाद वो ढीली मसहरी मुझ पर तान कर जल्दी से नीचे चली गईं। उनका ख़्याल था ख़तरे से ओझल होते ही ख़तरा टल जाएगा।

    ये आग़ाज़ था। मैनहोल में गिरने का आग़ाज़। एक नीम दीवाने शौहर के साथ अज़दवाजी ज़िंदगी का आग़ाज़। मैंने इतनी उम्र बग़ैर अच्छा खाए पिए गुज़ारी थी कि अगर गुड्डू आम सा दीवाना होता तो शायद मैं बड़ी रज़ा-ओ-रग़बत से आसाइश और दौलत की ज़िंदगी में डूब जाती लेकिन गुड्डू दीवाना होने के साथ साथ आशिक़ मिज़ाज भी था। उसे बग़लगीर होने, चूमने, मसास करने का बड़ा शौक़ था। उसका जी चाहता कि मैं सारा सारा दिन उसके साथ पलंग पर पड़ी रहूं। वो नाशते की मेज़ से मेरा हाथ पकड़ कर घसीटने लगता।

    “गुड्डू, नाशता करने दो हाजिरा को...”

    “एक बात है अम्मी... मेरी पाली अम्मी, प्राईवेट बात। कमरे में करने वाली।”

    “टोस्ट तो ख़त्म कर लेने दे बेचारी को।” मेरी बड़ी ननद कहती।

    फिर वो सब के सामने मेरे कान में मुँह ठूंस कर एक-आध ऐसी बात कहता जो सबको सुनाई देती और जिसका ताल्लुक़ जिस्म के ऐसे हिस्सों से होता जिनका ज़िक्र आम तौर पर लोग नहीं किया करते।

    “उठ ना ज़रूरी काम है...”

    “तू चल, अभी आजाएगी अभी...”

    वो मुझे दुपट्टे से घसीटना शुरू कर देता, “जल्दी चल... चल नाँ...”

    कमरे में पहुंच कर मेरा फनकारना बोलना, उसे परे परे करना सब बेकार था। वो बंदरों की तरह उचक उचक कर मुझे चूमने लगता। मैं ज़ेवर-कपड़ा उतारने में हुज्जत करती तो बच्चों की तरह फूट फूटकर रोने लग जाता, ऐसे ही लम्हों में गुड्डू मुझ पर हावी हो जाता क्योंकि इस सुनहरी बालों वाले दीवाने को रोता देखकर जाने क्यों मेरे रहम के अंदर कहीं दुख की टीसें उठने लगतीं और मेरा जी उसे गोद में उठाने को चाहता।

    अजीब से दिन थे अजीब सी रातें। तेज़ बुख़ार में आने वाले ख़्वाबों की तरह उनका हजम, उनकी जसामत कुछ भी दुरुस्त था। जाने दिन को सूरज निकलता भी था कि नहीं। ख़ुदा जाने रातों को अंधेरा होता भी था कि नहीं। मेरी सास मेरी आवभगत में लगी रहती। नए नए ज़ेवर, ख़ूबसूरत कपड़े आते रहते। मेरी ननदें मुझसे शर्मिंदा शर्मिंदा परे रहती थीं। मेरा सुसर अलबत्ता कभी कभी मुझे पास बिठाकर ज़िंदगी की ऊंच-नीच समझाया करता।

    गुड्डू पर कभी कभी सियानेपन के दौरे पड़ते तो मुझे बड़ी उम्मीद बंध जाती। शायद कोई मोजिज़ा कोई करामत हो जाएगी। ऐसे दिनों में कोई गुड्डू को पहचान ही नहीं सकता था। वो सिर पर टोपी पहन कर बाज़ू पर जाएनमाज़ लटकाए मेरे पास आता और बड़ी मीठी मुस्कुराहट के साथ कहता, “देख हाजिरा, मैं मस्जिद में इशा की नमाज़ पढ़ने जा रहा हूँ, तू खाना खा कर सो जाना। बैठी इंतज़ार करती रहना।”

    पाँच बहनों के इकलौते भाई की ऐसी नॉर्मल बात सुनकर मेरी सास का लब-ओ-लहजा नॉर्मल हो जाता।

    “सो जायेगी, सो जायेगी। तुम फ़िक्र करो। तुम आराम से नमाज़ पढ़ने जाओ।”

    वापसी पर वो सबको सलाम कर के अपने कमरे में आता। बड़ी देर तक वो एक मुअम्मर आदमी की तरह दाँत साफ़ करता रहता। फिर सोफ़े में बैठ कर बेड लैम्प की रोशनी में वो किताबें देखता रहता जिनका पढ़ना उसके लिए मुश्किल था। बड़ी रात गए वो पलंग पर आता और मेरी तरफ़ पीठ करके सो जाता।

    फ़र्ज़ाना होते ही उसे मुझसे कोई ग़रज़ रहती। ऐसे ही दिनों में वो बड़े तवातुर के साथ मेरे सुसर के हमराह फ़ैक्ट्री जाने लगता। वापसी पर वो ख़ामोशी से खाना खाता, फ़ैक्ट्री के मसाइल पर गुफ़्तगु करता और फिर मुझसे मिले बग़ैर सिनेमा देखने चला जाता। उन दिनों मेरी सास ज़मीन से दो दो फुट ऊंचा चलने लगतीं।

    “हमने सब कुछ गुड्डू के नाम मुंतक़िल करवा दिया है हाजिरा, कोठी, मुरब्बे, फ़ैक्ट्री सब कुछ। ये सब तो अपने अपने घर चली जाएँगी। सब कुछ तेरा है... तेरा और गुड्डू का।”

    ये दिन बड़े पुरसुकून होते। अगर मैं ग़लती से उसे किसी के सामने हाथ भी लगा लेती तो वो बिदक जाता और आवाज़ गिरा कर कहता, “क्या करती है हाजिरा, किसी का लिहाज़ भी नहीं तुम्हें, मेरी जवान बहनें देखती हैं।”

    लेकिन ये दिन ज़्यादा नहीं होते थे। अज़ली दर्द की तरह किसी सुबह उठते ही गुड्डू अपने चोले को उतार कर असली रूप में जाता। जब गुड्डू होश में होता, उन दिनों ससुराल में ऊपर नीचे क़हक़हे होते। मेरी ननदों के रिश्तों की बातें होतीं। सारा घर मैटिनी शो देखने जाता।

    रिश्तेदारों की दावतें होतीं। मेरी सास फ़राख़ दिली से मुझे सबसे मिलाती और ऊंची आवाज़ में कहती, “मेरी हाजिरा का जादू देखा बहन जी? जो काम डाक्टर कर सके मेरी बहू ने कर दिखाया। दस साल से सरत मारी गई है गुड्डू की... अब देख लो चंगा भला, होशमंद हो गया है। हाजिरा ने उसे ज़िंदगी दी है... हाजिरा ने उसे इंसान बना दिया है।”

    मुझे अपनी सास की फ़राख़ दिली से बड़ी शर्म आती। वो माँ थी, इसलिए उसका जज़बा सच्चा था और मैं औरत थी और चूँकि मेरी ज़रूरतें अधूरी थीं, इसलिए मैं अभी अधूरी थी। मैं जो कुछ भी ज़ाहिर करती अंदर महसूस करने से आरी थी। अगर मेरी सास का बस चलता तो वो ख़ुद गुड्डू की बीवी बन जाती और सारी उम्र उसे अपने परों तले यूं छुपाए रखती जैसे बत्तख़ सूँ सूँ करती अपने अंडों को समेटती है।

    कभी कभी गुड्डू पलंग पर पेशाब कर देता तो चोरी चोरी ख़ुद ही चादरें गद्दे धुलवा देती। मुझ पर गुड्डू की देख-भाल का कोई बोझ था। मैं अपनी सास को देखकर सोचती रहती, एक इंसान की इतनी सारी कमज़ोरियों पर कोई इस नफ़ासत से पर्दा डाल सकता है? इतनी बड़ी कोताही के बावुजूद उसे इस क़दर जी जान से क़बूल कर सकता है? कभी कभी मुझे लगता है जैसे अल्लाह मियां भी अपनी मख़लूक़ को इसीलिए मौत के पर्दे में छुपा लेता है ताकि इबलीस उसकी मख़लूक़ की कोताहियों का मज़ाक़ उड़ाए।

    अपनी सास के सामने मुझे अपना वुजूद एक चोर का सा लगता। इस घर की सारी आसाइशें, सारे आराम, चाव-चोंचले बेकार गए। मैं गुड्डू के लिए अपने दिल में जगह बना सकी। मैं कोशिश करती थी, मार्का करती थी लेकिन जहां पक्की सिलाई की ज़रूरत हो वहां टाँके या पिन से काम नहीं चलता। जहां तन-मन धन से तपस्या की ज़रूरत हो वहां वक़तन फ़वक़तन की चूमा चाटी से गुज़र-औक़ात नहीं हो सकती।

    ख़ुदा जाने ये गुड्डू के बाइस हुआ? ख़ुदा जाने माँ की मौत के बाद मेरा दिल ख़ाली पिंजरे की तरह हो गया था या अल्लाह की मर्ज़ी थी। ज़िंदगी कभी सीधा रास्ता नहीं पकड़ती। उसे तंग पगडंडी, बंजर रास्ते, पथरीले खुंगराले मुक़ामात से गुज़रने का बहुत शौक़ है। मर्ग़-ज़ारों में चलने वाले जान-बूझ कर कांटों से उलझते हैं। अमीरों की ज़िंदगी में हमेशा डाक्टर, दुख और बड़े बड़े नासूर रहते हैं।

    ये दूसरी बार थी जब मेरा बायां पांव आख़िरी सीढ़ी पर और मेरा दायाँ पांव संगमरमर के ख़ूबसूरत फ़र्श से छः इंच ऊंचा था, मेरी सास ने पीछे से मेरे बाल पकड़ लिये। जो इंसान गुनाह के एहसास से मेरी तरह बोझल हो वो तो अपने पांव पर मुश्किल से खड़ा हो सकता है, उसे गिराने के लिए मारपीट, धौल धप्पे की ज़रूरत नहीं होती।

    “बोल, ये आधी रात को तो किधर से रही है? बोल, हरामज़ादी?”

    मेरा सर पक्के फ़र्श से गोल्फ़ की गेंद की तरह टकराया।

    “ऊपर कमरा पाख़ाना... सिर्फ़ बरसाती में इतनी रात गए तू क्या करने गई थी? ना-मुराद बोल!”

    मेरा दिल-ओ-दिमाग़, रूह, ख़सलत, सब पत्थर के हो चुके थे।

    “बोल कौन था वो? कौन है हमारी इज़्ज़त के साथ खेलने वाला...?”

    मेरी सास तीसरी मंज़िल को जाने वाली सीढ़ियों पर बैठी ज़ार-ओ-ज़ार रो रही थी और ऊपर बरसाती में कम्बल ओढ़े दिसंबर की सर्दियों में मेरा सुसर ठिठुर रहा था। मैं अपनी सास को क्या बताती कि मैं उसकी इज़्ज़त के साथ खेलने वाली नहीं हूँ। मैं तो उसकी इज़्ज़त बनाने वाली हूँ। लेकिन कुछ बातें जब होंटों पर आती हैं तो अजीब क़िस्म का झूट लगती हैं।

    “कौन था ऊपर? कौन है हमारे घर में सेंध लगाने वाला? मुर्दार, हरामख़ोर, एहसान फ़रामोश, कुछ तो बोल?”

    मैं ठंडे फ़र्श पर चित्त लेटी थी और सोच रही थी कि अपनी सास को क्या बताऊं? कहाँ से शुरू करूँ और कहाँ जा कर ख़त्म करूँ? क्या वो इतनी सारी उलझाओ की बातें समझ भी सकेगी।

    “सुन हाजिरा, या तो उसका नाम बता दे सीधे सुभाओ या फिर मैं तुझे खड़े खड़े तलाक़ दिला दूँगी।”

    मुझे अपनी सास से प्यार हो गया था। मैं उसे सीधे सुभाव कैसे किसी का नाम बता सकती थी?

    “हाजिरा, मैंने तेरी कैसी कुछ ख़िदमत नहीं की और इसका तूने ये बदला दिया कलमुंही? बोल, बता उसका नाम। देख मैंने आज तक किसी पर हाथ नहीं उठाया लेकिन... लेकिन बोल हाजिरा, बता तो कौन था ऊपर...?”

    मैं अपनी सास को क्या बताती कि मैंने भी उसकी ख़िदमतों के बदले में इतनी बड़ी गुनाह की गाँठ सर पर उठाई थी। ये गाँठ बाज़ार की उन गाँठों से मुशाबेह थी जिनसे पुराने बदबूदार इस्तेमाल शुदा साहिबों के कपड़े निकला करते हैं।

    शुरू सर्दियां थीं जब एक रोज़ मेरा सुसर मेरे पास आया। उस रोज़ घर के तमाम लोग गुड्डू को लेकर एक मज़ार पर देग चिढ़ाने गए हुए थे। मुझे बुख़ार था इसलिए मैं उनके साथ जा सकी थी। मेरे दरवाज़े पर हल्की सी दस्तक हुई जैसे कोई चिड़िया आकर बार-बार रास्ता तलाश करने में टकरा रही हो। बड़ी देर बाद एक मरी सी आवाज़ आई, ''हाजिरा!”

    मैंने दरवाज़ा खोला तो मेरा सुसर खड़ा था।

    “कैसी तबीयत है अब...?”

    “ठीक है जी।”

    जब मैं लौटने लगी तो उसने मेरी कलाई को पकड़ कर बड़ी गर्माहट से कहा, “डाक्टर साहिब आए थे?”

    “आए थे जी!”

    बड़ी देर तक वो मेरे पलंग के पास सोफ़े में बैठ कर दवाईयों के पमफ़लेट पढ़ता रहा। शायद वो अपने नफ्स-ए-मज़मून को तैयार कर रहा था। जब मैंने थक कर उसकी तरफ़ पुश्त कर ली तो वो खंकार कर बोला, “तुमसे एक बात करनी है हाजिरा, पता नहीं तुम मेरी बात को किस रोशनी में समझो?”

    “जी फ़रमाईए।”

    “गुड्डू मेरा इकलौता बेटा है और मेरी सारी जायदाद उसके नाम है।”

    “अल्लाह ने चाहा तो गुड्डू साहिब ठीक हो जाएंगे जी... अम्मी जी, शाह क़लंदर के देग चढ़ाने गई हैं।”

    “ठीक उसने क्या होना है अमरीका तो फिर आया... एक सूरत है।”

    वो कौन सी सूरत थी? उसके इंतज़ार में मैं कितनी देर उनकी तरफ़ देखती रही। फिर एकदम मेरे सुसर की आँखों से आँसू बहने लगे... क़तरा-क़तरा।

    “गुड्डू के अगर बचा हो जाये तो मेरी इज़्ज़त बच सकती है... इस घर का बूटा ज़रूर लगना चाहिए।” मुझे ये मालूम था कि इस घर का बूटा क्यों लगना चाहिए और बूटा लगने से किसी को क्या फ़ायदा होता है लेकिन मुझे अपने बूढ़े सुसर पर तरस रहा था।

    “मुझे बचा लो। मेरे घर की ख़ुशी को बचा लो... इस घर की इज़्ज़त, ख़ुशी, नाम, सब कुछ तुम्हारे हाथ में है हाजिरा!”

    मेरी सास तीसरी मंज़िल को जाने वाली सीढ़ियों पर बैठी एहसानात की वो फ़ेहरिस्त गिनवा रही थी जो इस थोड़े अर्से में उसने मुझ पर किए थे। बाड़से की शॉपिंग, होटलों के डिनर, फिल्मों के नॉम बार-बार उसके होंटों पर रहे थे। दूर कहीं एक मुर्ग-ए-सुबह ख़ैर बारीक सी आवाज़ में बाँग दे रहा था। मुझे अपनी सास का वुजूद टप्पा खाई गेंद की तरह नज़र रहा था। वो भी अपने दीवाने बेटे के इश्क़ में टकरा टकरा कर ज़ख़्मी हो चुकी थी। उस वक़्त पता नहीं क्यों मुझे अपनी माँ बहुत याद रही थी।

    “बोल हाजिरा, बता दे ख़ुदा के लिए... कौन था वो... एक-बार उसका नाम बता दे, मैं उस का लहू चूस लूँगी। मेरे गुड्डू की ख़ुशियों पर डाका डालने वाला मुझसे बच कर नहीं जा सकता।”

    मैं अपनी सास को क्या बताती कि मुझे भी ग़र्ज़-ए-गाव सर ज़ेर कर सकता था। मुझ पर डाका डालने वाले ने अब्रेशमी कमंद को इस्तेमाल किया था। मैं अपनी सास को समझा नहीं सकती थी कि जो रिश्ता इज़्ज़त बचाने से शुरू हुआ था वो हमल ठहर जाने के बहुत बाद तक क्यों जारी रहा?

    कई बातें तारीख़ के वाक़ियात की तरह होती हैं। उनकी कई तावीलें, कई थ्योरियाँ तो हो सकती हैं लेकिन सच्चाई और असलियत तक पहुंचना क़रीब क़रीब नामुमकिन होता है।

    “बता हाजिरा, मैं आख़िरी बार पूछ रही हूँ, आख़िरी बार। बता हमारी ख़ुशियों से खेलने वाला कौन है?”

    मेरी सास बेचारी मामता की मारी हुई कैसे समझ पाती कि जब से दुनिया बनी है, एक ही खेल इंसान का सच्चा और असली खेल रहा है। अगर लोगों ने इस खेल के साथ इज़्ज़त को नत्थी किया होता तो बनी नौअ इंसान हंसते-खेलते बहुत दूर निकल जाते। अब तो बंधे टिके उसूलों से कोई रत्ती भर भटका और इज़्ज़त के लाले पड़ गए।

    ख़ुदा जाने पहले-पहल किस काफ़िर ने इश्क़ किया और अफ़्ज़ाइश-ए-नस्ल के खेल के साथ इज़्ज़त का तसव्वुर तावीज़ के तौर पर बांध दिया। पता नहीं किस सदी में किस नई सोच वाले ने मज़हब-ए-इश्क़ और जिस्मानी ताल्लुक़ात की ज़रूरत को यकजा कर के हदीस-ए-इश्क़ तैयार की। अब तो इज़्ज़त आज़ाए जिन्स और मुहब्बत अजीब क़िस्म के तिकोन बन गए हैं जिनका हर ज़ाविया सलीब की तरह ज़ाविया क़ायमा और हर ज़िला क़ियामत से भी लंबा था।

    “हाजिरा मैं आख़िरी बार पूछ रही हूँ, तेरे पेट मैं किस का हमल है?”

    मेरे जी में आई चीख़ कर कहूं आज तक किसी को मेरे हमल की ख़ुशी नहीं हुई। जो भी जानना चाहता है यही चाहता है कि हमल किस का है? क्या हमल बज़ात-ए-ख़ुद कोई हैसियत नहीं रखता? क्या उसी हमल की ख़ुशी की जा सकती है जो जायज़ बंधे-टके उसूलों के तहत होता है? अगर फ़ित्रत का भी मंशा यही होता तो औरत को अपनी नाजायज़ औलाद से कभी प्यार होता।

    “बोल हाजिरा कौन है वो...? अगर तू बता देगी तो क़सम ख़ुदा की मैं हराम की औलाद को भी अपनी कहूँगी। पर अगर तूने बताया तो... तो... तो तुझे तलाक़ दिलवा दूँगी।”

    मैं अपनी सास को बताना चाहती थी लेकिन मुझे उस औरत से प्यार था। उसके दुख से गहरी हमदर्दी थी। मैं एक ही जुमले में उसका दोहरा नुक़्सान नहीं कर सकती थी।

    मैं अपने घर चली आई... चुपचाप यहां हर वक़्त मेरा अब्बा रहता था। चुपचाप, अनदेखा, बोलने, झिड़कने और एहसान जताने वाली माँ जाने कहाँ चली गई थी?

    और आज अचानक बाईस बरस गुज़र जाने के बाद, ये तीसरी बार थी जिस वक़्त मेरा दायाँ पैर सीढ़ी की आख़िरी टेक पर था और मेरा बायां पांव ज़मीन से सवा छः इंच ऊंचा था। किसी ने पीछे से मेरा चोंडा पकड़ लिया। मेरा जिस्म तो पहले ही ज़ीना उतरने से हांप रहा था, उसे ज़मीन पर गिरते देर लगी। मुझे यूं लगा जैसे गिरते ही मेरी कनपटी से हल्की सी ख़ून की धार निकली।

    “इस वक़्त आधी रात को तू कहाँ से आरही है माँ? बोल, बता... और दूसरी मंज़िल में तेरा क्या काम था इस वक़्त?”

    मैं चुप रही। जवान बेटे को मैं क्या बताती कि बेटों को पालने में माओं को क्या कुछ कर गुज़रना पड़ता है।

    “मैंने इधर उधर से बहुत सी बातें सुन रखी हैं। तेरा क्या ताल्लुक़ है मालिक मकान से, बोल... शेख़ साहब से तेरा क्या नाता है?”

    मैं चुप रही। मैं उसे क्या बताती कि शेख़ साहब हमारे मुहसिन थे। उन्होंने बरसों हमारा साथ दिया था। किराए के पैसे कभी वसूल नहीं किए थे और इसके इलावा हर तरह मदद की थी।

    “मैं... मैं तुझे क्या समझता था माँ... मैं... मैं समझता था तू जन्नत की हूर है, फ़रिश्ता है। मैं समझता था कि... कि क्या हुआ मेरा बाप दीवाना था, मेरी माँ तो...”

    जवान आदमी के आँसू बे दरेग़ उसकी आँखों से बरस रहे थे। वो बचपन से लेकर आज तक की सारी महरूमियाँ गिनवा रहा था। बाप के घर से टूटी हुई हर आस उसे डस रही थी। वो अपने आप से झगड़ रहा था, दुनिया से झगड़ रहा था।

    “बोल कौन था ऊपर... बोल माँ, शेख़ साहब से तेरा क्या नाता है?”

    पहली बार मेरी ज़बान खुली... चुप के मुहीब दहाने से आवाज़ आई, “मेरा किसी से कभी कोई नाता नहीं रहा बेटा... मेरा किसी से कभी भी कोई नाता नहीं रहा... किसी से भी नहीं... किसी से भी नहीं... मैं इस क़ाबिल थी कि कोई मुझसे रिश्ता जोड़ता...”

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