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चार दिन!

MORE BYवसेवोलोड मिखाइलोविच गार्शिन

    स्टोरीलाइन

    ये कहानी व्यूवोलोड गारशन के अफ़साने "Four Days" का उर्दू तर्जुमा है, जो एक ज़ख्मी सिपाही की कहानी है, जो मैदान-ए-जंग में चार दिन तक मौत के इंतिज़ार में पड़ा रहता है। अपने ज़ख्मों, प्यास और तन्हाई के दौरान वो जंग, क़त्ल और इंसानियत के बारे में गहरी सोच में मुब्तिला हो जाता है। ये अफ़साना जंग की बहादुरी के पर्दे के पीछे छुपी इंसानी अज़ियत और अलमिये को बे-नक़ाब करता है।

    मुझे याद है कि हम किस तरह जंगल में पूरी तेज़ी से दौड़े चले जा रहे थे। गोलियों की सनसनाहट कानों में गूँज रही थी। गोलियों से कटी हुई शाखें टूट-टूट कर हमारे इर्दगिर्द गिर रही थीं। और हम काँटेदार झाड़ियों को चीरते हुए आगे बढ़ रहे थे। फ़ायरिंग की शिद्दत मुसलसल बढ़ती जा रही थी।

    जब हम जंगल के किनारे पर पहुँचे तो इधर-उधर एक सुर्ख़ सी चमकती हुई चीज़ दिखाई दी। वह पहली कम्पनी का एक कम उम्र सिपाही, सिद्रोफ़ था। मेरे दिल में ख़याल आया, यह हमारी सफ़ में कैसे आ गया? अचानक वह ज़मीन पर बैठ गया और हैरतज़दा आँखों से मेरी तरफ़ देखने लगा। उसके मुँह से ख़ून का एक फव्वारा सा फूट निकला।

    हाँ, मुझे वह मंज़र बिल्कुल साफ़ याद है। मुझे यह भी याद है कि जैसे ही हम जंगल के किनारे पर पहुँचे, मैंने उसे घनी झाड़ियों में देखा था। वह एक लंबा-चौड़ा, ताक़तवर तुर्क सिपाही था, लेकिन उसके बावजूद, हालाँकि मैं ख़ुद कमज़ोर और दुबला-पतला था, मैं सीधा उसकी तरफ़ लपक पड़ा। अचानक एक ज़ोरदार धमाका हुआ, यूँ लगा जैसे कोई बहुत बड़ी चीज़ मेरे बिल्कुल क़रीब से गुज़र गई हो; मेरे कानों में एक अजीब सी गड़गड़ाहट होने लगी।

    मैंने सोचा, ज़रूर उसने मुझ पर गोली चलाई है। वह ख़ौफ़ से चीख़ता हुआ पीछे हटा और एक घनी झाड़ी में जा घुसा। ख़ौफ़ ने उसकी सोचने-समझने की सलाहियत छीन ली थी और वह काँटों भरी शाखों में उलझ कर रह गया। मैंने एक ही वार से उसकी बंदूक उसके हाथों से गिरा दी और फ़ौरन एक झटके से संगीन उसके जिस्म में उतार दी। एक ऐसी आवाज़ निकली जिसमें दहाड़ और कराह दोनों की मिली-जुली कैफ़ियत थी। फिर मैं आगे की तरफ़ लपका। हमारे सिपाही नारे लगा रहे थे। कुछ गिर रहे थे, कुछ गोलियाँ चला रहे थे।

    मुझे याद है कि जब मैं जंगल से निकल कर खुले मैदान में आया तो मैंने भी बाक़ियों की तरह कई गोलियाँ चलाईं। अचानक हुर्रे का नारा बुलंद हुआ और हम सफ़ें बना कर आगे बढ़ने लगे। मैं पीछे रह गया था। यह बात मुझे अजीब लगी।

    इससे भी ज़्यादा अजीब तब महसूस हुआ जब अचानक सब कुछ ग़ायब हो गया। तमाम नारे और बंदूकों की घनघर्ज आहिस्ता-आहिस्ता ख़ामोश हो गई। मुझे बिल्कुल कुछ सुनाई नहीं दे रहा था, बस एक झलक सी नज़र आई। कोई नीली सी चीज़ थी। शायद आसमान था। फिर वह भी नज़रों से ओझल हो गया।

    मैंने कभी ख़ुद को ऐसी अजीब-ओ-ग़रीब हालत में नहीं पाया था। मैं पेट के बल ज़मीन पर पड़ा था और मेरे सामने मिट्टी की एक छोटी सी ढेरी के सिवा कुछ न था। चंद बिखरे हुए घास के तिनके, उनमें से एक पर रेंगती हुई कुछ चींटियाँ, और पुरानी सूखी घास का एक बिखरा हुआ ढेर। बस यही मेरी पूरी दुनिया थी।

    मैं उसे सिर्फ़ एक आँख से देख रहा था, क्योंकि दूसरी आँख किसी मज़बूत चीज़ के दबाव से बंद थी। ग़ालिबन वह शाख थी जिस पर मेरा सिर टिका हुआ था। यह हालत बेहद तकलीफ़देह और अजीब थी। मैंने बहुत कोशिश की, मगर बिल्कुल समझ न सका कि मैं हरकत क्यों नहीं कर पा रहा। कुछ देर इसी तरह गुज़र गई। मुझे झींगरों की टर-टर और एक भँवरे की भनभनाहट सुनाई दे रही थी। उसके सिवा हर तरफ़ ख़ामोशी थी।

    आख़िरकार मैंने हिम्मत करके ज़ोर लगाया, अपना दायाँ बाज़ू अपने नीचे से निकाला और दोनों हाथों की मुसलसल कोशिश से घुटनों के बल उठने की कोशिश की।

    अचानक कोई तेज़ और चुभती हुई चीज़, बिजली की एक चमक की तरह, मेरे पूरे जिस्म में घुटनों से लेकर सीने और सिर तक दौड़ गई, और मैं दोबारा पीछे गिर पड़ा। फिर अँधेरा छा गया और मुझे कुछ होश न रहा।

    मुझे होश आया। मैंने देखा कि बुल्गारिया के सियाह-नीले आसमान में सितारे कितने तेज़ रोशन चमक रहे थे। लेकिन मैं अपने ख़ेमे में क्यों नहीं था? मैं वहाँ से बाहर क्यों आया था? मैंने ज़रा सा हिलने की कोशिश की तो मेरी टाँगों में बहुत तेज़ दर्द उठा। हाँ, जंग में मुझे गोली लगी थी। लेकिन ज़ख़्म कितना गहरा था, यह मालूम नहीं था। मैंने अपनी टाँगों को हाथ लगाया जहाँ दर्द हो रहा था। वाक़ई मेरी दाईं और बाईं टाँगें जमे हुए ख़ून से भरी हुई थीं। जब मैंने हाथ लगाया तो दर्द और भी बढ़ गया। यह दर्द दाँत के दर्द जैसा था, मुसलसल और ऐसा जैसे अंदर तक उतर रहा हो।

    मेरे कानों में मुसलसल आवाज़ गूँज रही थी और मेरा सिर भारी हो गया था। मुझे बस इतना समझ आ रहा था कि मेरी दोनों टाँगों पर ज़ख़्म आए हैं।

    लेकिन उसका मतलब क्या है? वह लोग मुझे लेने क्यों नहीं आए? क्या तुर्कों ने हमें शिकस्त दे दी है?

    मैं अपने साथ पेश आने वाले वाक़िए को याद करने लगा। पहले तो सब कुछ धुँधला-धुँधला याद आया, फिर आहिस्ता-आहिस्ता बातें साफ़ होने लगीं। आख़िर में मुझे यक़ीन हो गया कि हम हरगिज़ नहीं हारे थे।

    क्योंकि मैं गिर गया था। लेकिन कैसे गिरा, यह मुझे याद नहीं। मुझे बस इतना याद था कि हम सब पूरी क़ुव्वत से आगे बढ़े थे, मगर मैं दौड़ न सका। फिर मेरी आँखों के सामने सिर्फ़ नीला सा कुछ था और मैं उस टीले के ऊपर हमवार ज़मीन पर गिर पड़ा था।

    हमारे छोटे से दस्ते के कमांडर ने उसी हमवार जगह की तरफ़ इशारा करके कहा था, जवानो, हम वहाँ पहुँच कर रहेंगे!

    और हम वहाँ पहुँच गए थे। ज़ाहिर है, हम शिकस्त नहीं खा सकते थे।

    फिर वह मुझे उठाने क्यों नहीं आए? यहाँ इस खुले मैदान में तो हर तरफ़ साफ़ नज़र आता है। कोई छिपने की जगह भी नहीं। आख़िर क्यों? मैंने बड़ी मुश्किल से ख़ुद को उठाया और बैठ गया। दोनों टाँगें बेजान पड़ी थीं, इसलिए यह बहुत मुश्किल था। कई बार मुझे मायूसी हुई कि शायद मैं ऐसा कर ही नहीं सकूँगा, मगर आख़िरकार तकलीफ़ से आँखों में आँसू लिए मैं बैठने में कामयाब हो गया।

    मेरे ऊपर गहरे नीले आसमान का एक टुकड़ा था जिसमें एक बड़ा सितारा चमक रहा था और उसके साथ चंद छोटे सितारे भी थे। मेरे चारों तरफ़ कोई सियाह और ऊँची चीज़ थी। यह झाड़ियाँ थीं। मैं झाड़ियों में पड़ा था। वह मुझे ढूँढ़ नहीं सके थे। यह ख़याल आते ही मेरे सिर के बाल खड़े हो गए।

    अब यह कैसे हुआ कि मैदान में गोली लगने के बाद मैं झाड़ियों तक आ पहुँचा? शायद ज़ख़्म की तकलीफ़ में बेहाल होकर रेंगता हुआ यहाँ तक आ गया था। लेकिन अजीब बात है, अब तो मुझमें हिलने की भी ताक़त नहीं। फिर उस वक़्त इतनी दूर कैसे आ गया? शायद उस वक़्त एक ही ज़ख़्म था, और यहाँ पहुँच कर दूसरी गोली भी लग गई। मेरे गिर्द हल्की सुर्ख़ी माइल रोशनी फैलने लगी। बड़ा सितारा मद्धिम पड़ गया, कुछ छोटे सितारे ग़ायब हो गए। यह चाँद निकल रहा है। घर में इस वक़्त कितना ख़ूबसूरत मंज़र होगा...

    कुछ अजीब आवाज़ें आ रही हैं। कोई कराह रहा है। क्या मेरे क़रीब भी कोई ज़ख़्मी पड़ा है? टूटी टाँगों वाला या गोली का निशाना बना हुआ? नहीं! यह आवाज़ तो बहुत क़रीब से आ रही है, मगर यहाँ कोई नहीं। ख़ुदाया, यह तो मेरी अपनी आवाज़ है। कितनी दर्द भरी कराहें हैं। मैं इतनी तकलीफ़ कैसे बर्दाश्त कर रहा हूँ? शायद इसलिए कि मेरा सिर सुन्न हो चुका है, जैसे सीसे से भरा हो। बेहतर है लेट जाऊँ और सो जाऊँ... मगर फिर आँख कब खुलेगी? छोड़ो!

    उसी वक़्त चाँदनी की एक चौड़ी लकीर मुझ पर पड़ी। मैंने चंद क़दम दूर कोई बड़ी सी सियाह चीज़ देखी। चाँदनी में धाती चीज़ें चमक रही थीं, शायद बटन या फ़ौजी सामान। वह या तो कोई लाश थी या कोई ज़ख़्मी। छोड़ो... मैं लेट जाता हूँ...

    नहीं, यह मुमकिन नहीं। हमारे सिपाही जा नहीं सकते। वह यहीं हैं। उन्होंने तुर्कों को शिकस्त देकर इसी जगह पड़ाव डाला है। लेकिन फिर आवाज़ें क्यों नहीं आ रहीं? आग जलने की चटख-चटख भी सुनाई नहीं देती। यक़ीनन इसलिए कि मैं इतना कमज़ोर हूँ कि कुछ सुन नहीं पा रहा। वह ज़रूर यहीं होंगे।

    मदद! मदद!

    मेरे गले से बे-रब्त, भारी और ख़ौफ़नाक चीख़ें निकलीं, मगर कोई जवाब न आया। वह रात की ख़ामोश हवा में दूर तक फैल गईं। उसके सिवा मुकम्मल ख़ामोशी थी। बस झींगर की मुसलसल आवाज़ आ रही थी। चाँद अपने गोल चेहरे से मुझ पर तरस भरी नज़र डाल रहा था। अगर वह सिर्फ़ ज़ख़्मी होता तो मेरी चीख़ से जाग जाता।

    यह लाश है। हमारे किसी सिपाही की या किसी तुर्क की? आह! ख़ुदा जाने, उससे क्या फ़र्क़ पड़ता है!

    और फिर मेरी जलती हुई आँखों पर नींद उतर आई। मैं आँखें बंद किए पड़ा हूँ, हालाँकि जागे हुए काफ़ी देर हो चुकी है। आँखें खोलने को दिल नहीं चाहता, क्योंकि बंद पलकों से भी सूरज की रोशनी महसूस हो रही है। आँखें खोलूँगा तो तकलीफ़ होगी। वैसे भी हिलना बेहतर नहीं।

    कल... मुझे गोली लगी थी। चौबीस घंटे गुज़र चुके हैं। एक दिन और एक रात में मर जाऊँगा।

    अच्छा है। बेहतर है हिलूँ नहीं। जिस्म को ख़ामोश पड़ा रहने दो। काश दिमाग़ को भी रोक सकता।

    मगर ऐसा मुमकिन नहीं। ख़यालात, यादें, सब मेरे ज़ेहन में उमड़े चले आ रहे हैं। लेकिन यह सब ज़्यादा देर नहीं चलेगा। जल्द ही सब ख़त्म हो जाएगा। अख़बारों में बस चंद सतरें छपेंगी कि हमारी तरफ़ नुक़सान मामूली रहा, चंद सिपाही ज़ख़्मी हुए। एक रज़ाकार सिपाही इवानोफ़ मारा गया।

    नहीं, शायद नाम भी न लिखें। बस इतना लिख दें कि एक सिपाही हलाक हुआ। जैसे वह कोई इंसान नहीं, कोई जानवर हो। एक पूरा मंज़र अचानक मेरे ज़ेहन में साफ़ उभर आया। यह बहुत पुरानी बात है। लेकिन यहाँ पड़े-पड़े, टूटी हुई टाँगों के साथ अपनी पूरी ज़िंदगी भी मुझे बहुत दूर, बहुत पुरानी लग रही है। मुझे याद है, मैं एक सड़क पर जा रहा था। लोगों का एक हुजूम रास्ता रोके खड़ा था। सब ख़ामोशी से किसी सफ़ेद सी चीज़ को देख रहे थे, जो ख़ून में लथपथ थी और दर्द से कराह रही थी। वह एक ख़ूबसूरत सा नन्हा कुत्ता था। एक घोड़ा-गाड़ी उसे कुचल गई थी। वह भी उसी तरह मर रहा था जैसे मैं अब मर रहा हूँ। चौकीदार भीड़ को चीरता हुआ आगे आया, कुत्ते को गर्दन से उठाया और ले गया। हुजूम छँट गया।

    क्या कोई मुझे उठा कर ले जाने नहीं आएगा? नहीं! यहीं पड़े रहो और मर जाओ! और फिर भी ज़िंदगी कितनी ख़ूबसूरत है!

    जिस दिन उस कुत्ते के साथ वह हादसा हुआ था, मैं ख़ुश था। मैंने शराब पी रखी थी, शायद इसी लिए। ऐ यादो, मुझे मत सताओ! मुझे सुकून से रहने दो! गुज़री हुई ख़ुशियाँ, मौजूदा अज़ाब... काश मुझे सिर्फ़ जिस्म का दर्द ही सहना पड़ता। ये यादें मुझे न तड़पाएँ, क्योंकि ये मुझे बेइख़्तियार मुक़ाबला करने पर मजबूर कर देती हैं। आह! पछतावा! पछतावा ज़ख़्मों से भी ज़्यादा तकलीफ़देह है।

    लेकिन अब गर्मी बढ़ रही है। सूरज झुलसा रहा है। मैं आँखें खोलता हूँ। वही झाड़ियाँ हैं, वही आसमान, बस फ़र्क़ इतना है कि अब सब कुछ दिन की रोशनी में नज़र आ रहा है। और यहाँ मेरा पड़ोसी भी पड़ा है। हाँ, यह एक तुर्क है, एक लाश। कितना बड़ा आदमी है! मैं उसे पहचानता हूँ। यह वही है जिसे...

    मेरे सामने वह शख़्स पड़ा है जिसे मैंने मार डाला। मैंने उसे क्यों मारा? वह ख़ून में लथपथ मुर्दा पड़ा है। क़िस्मत उसे यहाँ क्यों ले आई? वह कौन था? शायद उसकी भी मेरी तरह एक बूढ़ी माँ होगी। वह हर शाम अपनी ख़स्ता हाल झोंपड़ी के दरवाज़े पर बैठ कर दूर उत्तर की तरफ़ देखती होगी। उसका प्यारा बेटा, उसका सहारा, उसका कमाने वाला, अब कभी वापस नहीं आएगा।

    और मैं? मेरा क्या होगा...?

    मैं तो उससे अपनी जगह बदलने को भी तैयार हूँ! वह कितना ख़ुशनसीब है। न उसे कुछ सुनाई देता है, न दर्द महसूस होता है, न ज़ख़्मों की तकलीफ़, न मौत की अज़ीयत, न ज़ेहनी अज़ाब, न यह जलती हुई धूप। संगीन सीधी उसके दिल में उतरी थी। उसकी वर्दी में एक बड़ा सा सियाह सुराख़ है, और उसके गिर्द ख़ून जमा हुआ है।

    यह मैंने किया था! मैं उसे मारना नहीं चाहता था। जब हमें लड़ने के लिए भेजा गया था तो मेरे दिल में किसी से दुश्मनी नहीं थी। मैंने कभी नहीं सोचा था कि मुझे किसी इंसान की जान लेनी पड़ेगी। मैं तो सिर्फ़ यह सोचता था कि मुझे गोलियों के सामने अपना सीना करना होगा। और मैं गया, और यही कर गुज़रा।

    लेकिन फिर? उसका क्या मतलब है? अहमक़! अहमक़!

    और यह बदक़िस्मत आदमी... (उसने मिस्री वर्दी पहन रखी है) तो मुझसे भी कम क़ुसूरवार था। जब उसे दूसरों के साथ एक बैरल में बंद मछलियों की तरह जहाज़ में भर कर क़ुस्तुनतुनिया लाया गया होगा, तब तक उसने शायद रूस या बुल्गारिया का नाम भी न सुना होगा। उसे हुक्म मिला कि यहाँ आओ, और वह आ गया। अगर इंकार करता तो छड़ियों से मारा जाता, या शायद कोई पाशा उसे पिस्तौल की गोली से ख़त्म कर देता।

    उसने इस्तांबुल से रुश्चुक तक का तवील और मुश्किल सफ़र किया। हमने हमला किया, उसने अपना दिफ़ा किया। लेकिन जब उसने देखा कि हम अजनबी लोग, उसकी अंग्रेज़ी बंदूकों... पीबाडी या मार्टिनी... से ख़ौफ़ज़दा नहीं हो रहे और मुसलसल आगे बढ़ते चले आ रहे हैं, तो उसका हौसला टूट गया। वह भागने ही वाला था कि एक छोटा सा आदमी, जिसे वह अपनी एक काली मुट्ठी के वार से भी गिरा सकता था, दौड़ता हुआ आया और उसके दिल में संगीन उतार दी।

    उसका क्या क़ुसूर था? और मेरा ही क्या क़ुसूर है, अगरचे उसे मैंने मारा? आख़िर मेरा जुर्म क्या है?

    मगर उस वक़्त एक ही चीज़ मुझे खाए जा रही है। प्यास... प्यास! जो उसे झेलता नहीं, वह इस लफ़्ज़ का मतलब भी नहीं जान सकता। रोमानिया से गुज़रते हुए हम सख़्त गर्मी में बिना रुके पचास-पचास मील चले थे। मगर तब भी मुझे मालूम न था कि अस्ल प्यास क्या होती है। काश कोई आ जाए! ऐ ख़ुदा! इस तुर्क के पास जो बड़ी सी पानी की बोतल पड़ी है, शायद उसमें पानी हो। मगर वहाँ तक पहुँचूँ कैसे? जितनी भी तकलीफ़ उठानी पड़े, मुझे उस तक पहुँचना ही होगा।

    मैं रेंगने की कोशिश करता हूँ। मेरी टाँगें बिल्कुल बेकार हो चुकी हैं, और कमज़ोर हाथ बमुश्किल जिस्म को घसीट पा रहे हैं। लाश मुझसे सिर्फ़ बारह-चौदह फ़ुट दूर है, मगर यह फ़ासला मुझे दस मील से भी ज़्यादा दुश्वार लगता है। फिर भी जाना तो होगा। मेरा गला आग की तरह जल रहा है, और पानी न मिला तो मौत और भी जल्द आ जाएगी।

    मैं आहिस्ता-आहिस्ता ख़ुद को घसीटता हूँ। टाँगें ज़मीन से अटकती हैं, और ज़रा सी हरकत भी नाक़ाबिले-बर्दाश्त दर्द बन जाती है। मैं चीख़ता हूँ, कराहता हूँ, मगर रेंगता रहता हूँ। आख़िरकार मैं लाश तक पहुँच जाता हूँ। यह रही उसकी बोतल! इसमें पानी भी है, और ख़ासा है। लगता है आधी भरी हुई है। इतना पानी कि शायद मौत आने तक काफ़ी रहे।

    ऐ प्यास! आज तूने मेरी जान बचा ली। मैं एक कुहनी के सहारे ढक्कन खोलने लगा, मगर अचानक तवाज़ुन बिगड़ गया और मैं मुँह के बल अपने उसी नजात-देहंदा के सीने पर जा गिरा। उसी लम्हे मेरी नाक में सड़े हुए गोश्त की तेज़ बू भर गई।

    मैंने पानी पिया। वह गर्म था, मगर ख़राब नहीं हुआ था, और काफ़ी मात्रा में था। शायद अब मैं कई दिन और ज़िंदा रह सकता था। मुझे एक किताब याद आई, रोज़मर्रा ज़िंदगी की जिस्मानियात, जिसमें लिखा था कि अगर पानी मिलता रहे तो इंसान खाने के बग़ैर भी एक हफ़्ते से ज़्यादा ज़िंदा रह सकता है। उसमें एक ऐसे शख़्स का भी ज़िक्र था जिसने ख़ुद को भूखा मारने का फ़ैसला किया था, मगर सिर्फ़ पानी पीते रहने की वजह से वह काफ़ी देर तक ज़िंदा रहा।

    लेकिन उसका फ़ायदा ही क्या? मान लिया मैं पाँच-छह दिन और जी लूँ, फिर क्या होगा? हमारी फ़ौज जा चुकी है, बुल्गारी बिखर गए हैं, आस-पास कोई सड़क भी नहीं। अंजाम तो वही है... मौत। फ़र्क़ सिर्फ़ इतना होगा कि जो अज़ीयत तीन दिन में ख़त्म हो सकती थी, वह एक हफ़्ता चलती रहेगी। तो क्या बेहतर न होगा कि उसका ख़ातमा ख़ुद ही कर दूँ?

    मेरे पड़ोसी की बंदूक उसके पास पड़ी है, एक उम्दा अंग्रेज़ी बंदूक। बस हाथ बढ़ाऊँ, घोड़ा दबा दूँ, और सब कुछ ख़त्म। कारतूस भी इधर-उधर बिखरे पड़े हैं। उसे सब चलाने का मौक़ा ही नहीं मिला।

    क्या ख़ुद ही इस क़िस्से का ख़ातमा कर दूँ या इंतज़ार करूँ? मगर किस चीज़ का इंतज़ार? नजात का? मौत का? या उस वक़्त का जब तुर्क आएँ और मेरी ज़ख़्मी टाँगों की खाल उधेड़ना शुरू कर दें? उससे बेहतर है, मैं ख़ुद ही...

    नहीं, हिम्मत नहीं हारनी चाहिए। जब तक जिस्म में जान है, लड़ूँगा। अगर कोई मुझे ढूँढ़ ले तो शायद बच जाऊँ। मुमकिन है हड्डियाँ न टूटी हों। शायद इलाज हो जाए। फिर मैं अपने वतन, अपनी माँ और माशा को दोबारा देख सकूँ।

    ऐ ख़ुदा! बस उन्हें यह कभी न मालूम हो कि मुझ पर क्या गुज़री। वह यही समझें कि मैं गोली लगते ही मर गया था। अगर उन्हें पता चल गया कि मैं दो, तीन, चार दिन तक इस अज़ाब में तड़पता रहा, तो उन पर क्या गुज़रेगी?

    मेरा सिर चकरा रहा था। लाश तक रेंग कर आना ही मुझे निढाल कर चुका था। ऊपर से उसकी लाश से उठती सड़ाँध नाक़ाबिले-बर्दाश्त थी। वह कितनी काली पड़ चुकी है। कल या परसों उसका क्या हाल होगा? मैं तो सिर्फ़ इसलिए उसके पास पड़ा हूँ कि वापस रेंगने की भी ताक़त नहीं रही। ज़रा दम ले लूँ, फिर अपनी पुरानी जगह चला जाऊँगा। वैसे भी हवा उधर से चल रही है, शायद बदबू मुझ तक न पहुँचे।

    मैं बिल्कुल बेजान होकर पड़ा रहा। सूरज मेरे चेहरे और हाथों को झुलसा रहा था, मगर उन्हें ढाँपने की भी हिम्मत न थी। दिल चाहता था किसी तरह जल्द रात हो जाए।

    यह दूसरा दिन है... शायद। मेरे ख़यालात उलझने लगे, और मुझे ख़ुद अपनी ख़बर न रही। मैं ग़ालिबन काफ़ी देर सोता रहा, क्योंकि जब आँख खुली तो रात हो चुकी थी। सब कुछ वैसा ही था। ज़ख़्म अब भी उसी तरह जल रहे थे, और मेरा पड़ोसी उसी तरह बे-हिस-ओ-हरकत पड़ा था।

    मैं बार-बार उसी के बारे में सोचने लगा। क्या वाक़ई मैंने अपने घर, अपने प्यारों, अपनी सारी ख़ुशियाँ छोड़ीं, हज़ारों मील का सफ़र किया, भूख, सर्दी और धूप बर्दाश्त की, सिर्फ़ इसलिए कि यह बेचारा आदमी ज़िंदा न रहे? क्या जंग में मेरा सारा कारनामा सिर्फ़ एक इंसान को क़त्ल करना था?

    क़त्ल...! क़ातिल...! और वह क़ातिल... मैं?

    जब मैंने फ़ौज में रज़ाकार बनने का फ़ैसला किया था तो मेरी माँ और माशा ने मुझे रोकने की कोशिश नहीं की, हालाँकि वह मेरे लिए बहुत रोईं। मगर उस वक़्त एक ख़याल ने मेरी आँखों पर पर्दा डाल रखा था। मैं उनके आँसू न देख सका। आज समझ आता है कि मैं अपने सबसे अज़ीज़ लोगों पर कैसा ज़ुल्म करके आया था। मगर अब यह सब सोचने से क्या हासिल? गुज़रा हुआ वक़्त तो वापस नहीं आ सकता।

    और अजीब बात यह है कि मेरे बहुत से जानने वालों ने मेरे इस कारनामे को भी मज़ाक ही समझा। वह कहते थे, देखो, बेवक़ूफ़ को! ख़ुद ही मुसीबत में जा फँसा।

    मैं हैरान होता था। यही लोग तो बहादुरी, वतनपरस्ती और क़ुर्बानी के क़सीदे पढ़ते थे। उनकी नज़र में मैं उन्हीं आला सिफ़ात का नमूना था, फिर अचानक मैं बेवक़ूफ़ कैसे बन गया?

    फिर मैं किशिनेफ़ पहुँचा। मेरी पीठ पर थैला लाद दिया गया, हर तरह का फ़ौजी सामान थमा दिया गया, और मैं हज़ारों दूसरे सिपाहियों के साथ चल पड़ा। उनमें बहुत से मेरी तरह रज़ाकार थे, मगर बाक़ी तो मजबूरी में आए थे। अगर उन्हें इजाज़त मिलती तो वह कभी घर से न निकलते। लेकिन वह भी हमारे साथ हज़ारों मील चले, लड़े, बल्कि शायद हमसे भी ज़्यादा बहादुरी से लड़े। उन्होंने सिर्फ़ इसलिए जंग की कि उनके पास और कोई चारा न था।

    उसी दौरान सुबह की हल्की हवा चलने लगी। झाड़ियाँ आहिस्ता-आहिस्ता हिलने लगीं। किसी नीम-ख़्वाबीदा परिंदे ने पर फड़फड़ाए। सितारे एक-एक करके बुझने लगे। गहरा नीला आसमान रोशन होने लगा, नर्म रुई जैसे बादल तैरने लगे, और ज़मीन से हल्की सी धुंध उठने लगी। यूँ मेरी... उसे क्या कहूँ? ज़िंदगी? या आख़िरी अज़ीयत...? का तीसरा दिन तुलूअ हुआ।

    तीसरा दिन... न जाने अब कितने दिन और बाक़ी हैं। शायद ज़्यादा नहीं। मैं इतना कमज़ोर हो चुका हूँ कि अब लाश से दूर भी नहीं जा सकता। जल्द ही उस और मुझमें कोई फ़र्क़ नहीं रहेगा, फिर न उसे मेरी मौजूदगी नागवार गुज़रेगी, न मुझे उसकी। मुझे पानी पीना है। अब मैंने तय कर लिया है कि दिन में सिर्फ़ तीन बार पानी पियूँगा; सुबह, दोपहर और रात।

    सूरज निकल आया है। झाड़ियों की शाखों के दरमियान से उसका बड़ा सा गोल चेहरा ख़ून की तरह सुर्ख़ दिखाई दे रहा है। लगता है आज भी सख़्त गर्मी पड़ेगी। और मेरा पड़ोसी? अब उसका क्या हाल होगा? वह अब नाक़ाबिले-दीद हो चुका था। उसके बाल झड़ने लगे थे। साँवली जिल्द ज़र्द और बे-रंग हो गई थी। चेहरा इतना फूल चुका था कि कान तक फट गया था। पूरा चेहरा कीड़ों से भरा हुआ था, और सारा जिस्म सड़ते हुए गोश्त का एक उभरा हुआ ढेर बन गया था। आज की धूप में न जाने उसका क्या हाल होगा।

    उसके इतने क़रीब पड़े रहना नाक़ाबिले-बर्दाश्त था। मुझे किसी तरह उससे दूर होना होगा, चाहे एक-एक इंच ही क्यों न रेंगना पड़े। मगर क्या मुझमें इतनी ताक़त बाक़ी है? पानी की बोतल उठाने और ढक्कन खोलने के लिए तो बाज़ू अभी हरकत कर लेता है, मगर क्या पूरा जिस्म घसीट सकूँगा? फिर भी कोशिश करूँगा। चाहे एक घंटे में सिर्फ़ एक फ़ुट ही आगे बढ़ सकूँ।

    यूँ सारी सुबह गुज़रती रही। दर्द अब भी वही था, मगर अब उसकी भी आदत हो चुकी थी। सेहतमंद आदमी की कैफ़ियत तो जैसे मैं भूल ही गया था। सुबह भर की मशक़्क़त के बाद मैं बमुश्किल चौदह फ़ुट रेंग सका और फिर अपनी पहली जगह आ पहुँचा। कुछ देर के लिए साफ़ हवा नसीब हुई, अगरचे सड़ती हुई लाश से चंद क़दम के फ़ासले पर किसी हवा को साफ़ नहीं कहा जा सकता।

    फिर हवा का रुख़ बदल गया। ऐसी सड़ी हुई बदबू आई कि मतली होने लगी। ख़ाली मिदा बार-बार मरोड़ खाता, जैसे अंदर की सारी आँतें बाहर निकल आएँगी। और वह ज़हरीली, तअफ़्फ़ुनज़दा हवा मुसलसल मेरी तरफ़ आती रही। मैं मायूसी से टूट गया और फूट-फूट कर रोने लगा। मैं बिल्कुल निढाल, मायूसी से पागल और नीम-बेहोश पड़ा था कि अचानक... क्या यह मेरा वह्म था? शायद नहीं।

    हाँ, यह आदमियों की आवाज़ें थीं। घोड़ों की टापें भी सुनाई दे रही थीं। मैं तक़रीबन चीख़ पड़ा, मगर ख़ुद को रोक लिया। अगर वह तुर्क हुए तो? फिर क्या होगा? अब तक जितनी अज़ीयतें झेल चुका हूँ, उनसे भी बदतर अज़ाब मेरा इंतज़ार करेगा। अख़बारों में पढ़ा था, वह क़ैदियों की खाल ज़िंदा उतार देते हैं, ज़ख़्मी हाथ-पाँव को धीमी आग पर भूनते हैं... और यह तो उनके ज़ुल्म का सिर्फ़ एक नमूना है। वह अज़ीयत देने के नए-नए तरीक़े ईजाद कर लेते हैं।

    फिर दिल में ख़याल आया, शायद वह हमारे ही सिपाही हों। आह, यह मनहूस झाड़ियाँ! उन्होंने मुझे इस तरह ढाँप रखा है कि कुछ दिखाई ही नहीं देता। बस शाखों के दरमियान एक छोटा सा सुराख़ है, जहाँ से नीचे की तरफ़ नज़र जाती है। वहाँ शायद वही नाला है जहाँ जंग से पहले हमने पानी पिया था। हाँ, उस पर रेतीले पत्थर की एक बड़ी सिल रखी थी, जैसे पुल हो।

    लगता है वह उसी पर से गुज़र रहे हैं। अब आवाज़ें बंद हो गई हैं। मेरी समाअत भी इतनी कमज़ोर हो चुकी है कि यह भी समझ नहीं आता वह कौन सी ज़बान बोल रहे थे। ऐ ख़ुदा! काश वह हमारे ही आदमी हों। मैं उन्हें आवाज़ देता हूँ। अगर वह नाले के पास हैं तो मेरी आवाज़ ज़रूर सुन लें। यह ख़तरा मोल लेना भी बेहतर है, बजाय इसके कि बाशी-बाज़ूक़ों के हाथ लग जाऊँ। मगर वह आ क्यों नहीं रहे? बेचैनी मुझे अंदर ही अंदर खाए जा रही थी। यहाँ तक कि अब मुझे लाश की बदबू भी महसूस नहीं हो रही थी, हालाँकि वह पहले की तरह ही जानलेवा थी।

    अचानक झाड़ियों के बीच बने एक शिगाफ़ में से कज़ाक सिपाही नमूदार हुए। नीली वर्दियाँ, सुर्ख़ पट्टियाँ, नेज़े... पूरी एक टुकड़ी। आगे एक सियाह दाढ़ी वाला अफ़सर शानदार घोड़े पर सवार था। जूँही वह झाड़ियों से निकले, उसने ज़ीन पर मुड़कर हुक्म दिया, आगे बढ़ो।

    रुको! ख़ुदा के लिए रुको! मदद करो, साथियो!

    मैं पूरी क़ुव्वत से चीखा, मगर घोड़ों की टापों, तलवारों की झंकार और कज़ाकों की बुलंद आवाज़ों में मेरी कमज़ोर पुकार दब कर रह गई। किसी ने न सुनी।

    हाय बदक़िस्मती! मैं बे-हिस-ओ-हरकत मुँह के बल गिर पड़ा और फिर रोने लगा। उसी दौरान पानी की बोतल उलट गई। मेरा पानी... मेरी ज़िंदगी... मेरी आख़िरी उम्मीद... सब सूखी ज़मीन ने पी लिया। जब मेरी नज़र उस पर पड़ी तो आधे गिलास के बराबर पानी के सिवा सब ज़ाया हो चुका था।

    उस हादसे के बाद मुझ पर जो सक्ता तारी हुआ, उसे लफ़्ज़ों में बयान नहीं किया जा सकता। मैं नीम-वा आँखों के साथ बे-हिस पड़ा रहा। उस दिन हवा बार-बार रुख़ बदलती रही। कभी ताज़ा हवा का झोंका आता, कभी सड़ती हुई लाश की तअफ़्फ़ुनज़दा बू साँस रोक देती।

    शाम तक मेरे पड़ोसी की लाश नाक़ाबिले-बयान हद तक मस्ख़ हो चुकी थी। एक बार मैंने उसकी तरफ़ देखा तो दहशत से काँप उठा। उसके चेहरे की खाल हड्डियों से अलग हो चुकी थी। अब वहाँ सिर्फ़ एक ख़ौफ़नाक खोपड़ी थी, जिसके दाँत हमेशा के लिए एक भीषण मुस्कराहट में नंगे रह गए थे। मैंने ज़िंदगी में इंसानी खोपड़ियाँ देखी थीं, उनका मुतालिआ भी किया था, मगर चमकते बटनों वाली फ़ौजी वर्दी में लिपटी यह हड्डियों की शक्ल मुझे लरज़ा गई।

    मैंने दिल ही दिल में कहा, जंग का अस्ल चेहरा यही है।

    उधर सूरज बदस्तूर आग बरसा रहा था। मेरे हाथ और चेहरा झुलस कर छालों से भर चुके थे। मैं पानी का आख़िरी क़तरा भी पी चुका था। प्यास इस क़दर बे-रहम थी कि इरादा तो सिर्फ़ एक घूँट पीने का था, मगर पूरी बोतल ख़ाली कर बैठा। आह! मैंने कज़ाकों को इतनी ज़ोर से क्यों न पुकारा? अगर वह तुर्क भी होते तो इस हालत से बेहतर था। ज़्यादा से ज़्यादा एक-दो घंटे मुझे अज़ीयत देते, मगर यहाँ न जाने कितने दिन और तड़पना था।

    अम्मी जान! मेरी प्यारी माँ, अगर आपको मालूम होता कि आपका बेटा किस हाल में पड़ा है, तो आप अपने सफ़ेद बाल नोच लेतीं, दीवारों से सिर टकरातीं, और उस दिन को कोसतीं जब मुझे जन्म दिया था। आप जंग को भी कोसतीं, जिसने इंसान को यह अज़ाब दिया। मगर आप और माशा तो मेरी इस अज़ीयत से बेख़बर हैं। ख़ुदा हाफ़िज़, माँ! ख़ुदा हाफ़िज़, मेरी प्यारी माशा, मेरी होने वाली दुल्हन! आह! यह कैसा दर्द है! ऐसा लगता है जैसे कोई चीज़ मेरे दिल को चीरती हुई गुज़र रही हो।

    वह नन्हा कुत्ता फिर याद आ गया। चौकीदार ने उस पर भी रहम नहीं किया था। उसका सिर दीवार से दे मारा और उसे कूड़े के गड्ढे में फेंक दिया था, मगर वह फिर भी एक दिन तक तड़पता रहा। लेकिन मैं उससे भी ज़्यादा बदक़िस्मत हूँ। मैं तो तीन दिन से इस अज़ाब में मुब्तला हूँ। कल चौथा दिन होगा, फिर पाँचवाँ, फिर छठा... ऐ मौत! तू कहाँ है? आ, आकर मुझे अपने साथ ले जा! मगर मौत भी नहीं आती।

    मैं इसी झुलसा देने वाली धूप में पड़ा हूँ, प्यास से हलक जल रहा है, पानी का एक क़तरा भी नहीं, और यह सड़ती हुई लाश मेरे लिए ज़हर बनी हुई है। अब तो वह तक़रीबन गल-सड़ कर बिखर चुकी है। उससे बेशुमार कीड़े गिर रहे हैं, हर तरफ़ रेंगते फिर रहे हैं। जब उसका जिस्म मुकम्मल ख़त्म हो जाएगा और सिर्फ़ हड्डियाँ और वर्दी रह जाएगी, तो फिर मेरी बारी होगी। मैं भी उस जैसा हो जाऊँगा।

    एक दिन गुज़रा, फिर एक रात, फिर एक और सुबह... सब कुछ वैसा ही रहा। झाड़ियाँ मुसलसल सरगोशियाँ करती रहीं, जैसे आपस में बातें कर रही हों।

    यहीं मर जाओगे... यहीं मर जाओगे...

    दूसरी तरफ़ की झाड़ियाँ जवाब देतीं,

    यहाँ देखने को है ही क्या?

    अचानक मेरे क़रीब किसी की आवाज़ आई,

    अरे, यहाँ क्या रखा है?

    मैं चौंक कर होश में आया। झाड़ियों के दरमियान से हमारे हवालदार याकोवलेफ़ की नीली, मेहरबान आँखें मेरी तरफ़ देख रही थीं।

    उसने आवाज़ दी,

    बेलचे ले आओ। यहाँ दो और मिल गए हैं। एक हमारा, एक उनका।

    मैं कहना चाहता था,

    मुझे बेलचा नहीं चाहिए... मुझे दफ़्न न करो... मैं ज़िंदा हूँ...

    मगर मेरे सूखे होंठों से सिर्फ़ एक मद्धिम सी कराह निकल सकी। याकोवलेफ़ घबरा कर चिल्लाया,

    अरे! यह तो ज़िंदा है! बैरन इवानोफ़ ज़िंदा है! जल्दी आओ! सर्जन को फ़ौरन बुलाओ!

    आधे मिनट के अंदर ही किसी ने मेरे मुँह में पानी उंडेला, फिर ब्रांडी पिलाई, और कुछ और भी दिया। उसके बाद मुझे कुछ याद नहीं। जब होश आया तो मैं स्ट्रेचर पर था। चार सिपाही एक ही रफ़्तार से मुझे उठाए चले जा रहे थे। उनके क़दमों की हमवार जुंबिश मुझे मदहोश सी कर रही थी। कभी आँख लग जाती, कभी खुल जाती। ज़ख़्मों पर पट्टियाँ बँध चुकी थीं और अब दर्द भी पहले जैसा न था। पूरे जिस्म में एक अजीब सा सुकून उतर आया था।

    रुक जाओ... स्ट्रेचर नीचे रखो... चौथी टीम तैयार... आगे बढ़ो।

    यह आवाज़ हमारे अस्पताल के अफ़सर, प्योत्र इवानोविच की थी। वह लंबे, दुबले-पतले और निहायत नर्मदिल आदमी थे। उनका क़द इतना लंबा था कि स्ट्रेचर पर लेटे हुए भी उनका चेहरा और लंबी दाढ़ी मुझे साफ़ नज़र आती थी।

    मैंने आहिस्ता से पुकारा,

    प्योत्र इवानोविच!

    वह फ़ौरन झुक आए।

    क्या बात है, बेटे?

    मैंने बमुश्किल कहा,

    डॉक्टर क्या कहते हैं?... क्या मैं जल्द मर जाऊँगा?

    वह मुस्कराए।

    अरे नहीं, इवानोफ़! तुम नहीं मरोगे। तुम्हारी हड्डियाँ सलामत हैं, कोई बड़ी रग भी नहीं कटी। तुम तो बड़े ख़ुशनसीब निकले। हैरत है, साढ़े तीन दिन तुम ज़िंदा कैसे रहे? कुछ खाया भी था?

    नहीं।

    और पिया?

    एक तुर्क सिपाही की पानी की बोतल मिल गई थी... प्योत्र इवानोविच, अभी मुझसे बात नहीं हो रही। बाद में बात करेंगे।

    उन्होंने शफ़क़त से कहा,

    ठीक है, बेटे। अब आराम करो।

    मैं फिर नींद में डूब गया। जब दोबारा आँख खुली तो मैं डिविज़न के फ़ौजी अस्पताल में था। मेरे ऊपर डॉक्टर, सर्जन और नर्सें खड़े थे। उनके दरमियान सेंट पीटर्सबर्ग के एक मशहूर प्रोफ़ेसर भी थे, जो मेरी टाँगों का मुआयना कर रहे थे। उनके हाथ ख़ून से लथपथ थे। कुछ देर बाद वह मेरी तरफ़ मुतवज्जेह हुए और बोले,

    नौजवान, तुम मौत के मुँह से वापस आए हो। अब तुम ज़िंदा रहोगे। अलबत्ता हमें तुम्हारी एक टाँग काटनी पड़ी है, मगर उसकी फ़िक्र न करो। क्या तुम बात कर सकते हो?

    मैं बोल सकता था। और मैंने उन्हें वह सब कुछ सुना दिया, जो आप अभी पढ़ चुके हैं।

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