हुस्न की तख़लीक़

सआदत हसन मंटो

हुस्न की तख़लीक़

सआदत हसन मंटो

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    स्टोरीलाइन

    यह एक ऐसे जोड़ी की कहानी है, जो अपने समय में सबसे ख़ूबसूरत और ज़हीन जोड़ी थी। दोनों की मोहब्बत की शुरुआत कॉलेज के दिनों में हुई थी। फिर पढ़ाई के बाद उन्होंने शादी कर ली। अपनी बे-मिसाल ख़ूबसूरती के कारण वे अपने आने वाले बच्चे की ख़ूबसूरती के बारे में सोचने लगे। होने वाले बच्चे की ख़ूबसूरती की सोच उनके ज़ेहन पर कुछ इस तरह हावी हो गई कि वे दिन-रात उसी के बारे में बातें किया करते। फिर उनके यहाँ बच्चा पैदा भी हुआ, लेकिन वह कोई साधारण बच्चा नहीं था बल्कि अपने आप में एक नमूना था।

    कॉलिज में शाहिदा हसीनतरीन लड़की थी। उसको अपने हुस्न का एहसास था। इसीलिए वो किसी से सीधे मुँह बात करती और ख़ुद को मुग़लिया ख़ानदान की कोई शहज़ादी समझती। उसके ख़द्द-ओ-ख़ाल वाक़ई मुग़लई थे। ऐसा लगता था कि नूरजहां की तस्वीर जो उस ज़माने के मुसव्विरों ने बनाई थी, उसमें जान पड़ गई है।

    कॉलिज के लड़के उसे शहज़ादी कहते थे, लेकिन उसके सामने नहीं, पर उसको मालूम हो गया था कि उसे ये लक़ब दिया गया है। वो और भी मग़रूर हो गई।

    कॉलिज में मख़्लूत ता’लीम थी। लड़के ज़्यादा थे और लड़कियां कम। आपस में मिलते जुलते, लेकिन बड़े तकल्लुफ़ के साथ, शाहिदा अलग अलग रहती। इसलिए कि उसको अपने हुस्न पर बड़ा नाज़ था। वो अपनी हम जमाअ’त लड़कियों से भी बहुत कम गुफ़्तगू करती थी। क्लास में आती तो एक कोने में बैठ जाती और बुत सी बनी रहती। बड़ा हसीन बुत... उसकी बड़ी बड़ी स्याह आँखें जिन पर घनी पलकों की छाओं रहती थी, साकित-ओ-सामत रहतीं। लड़के उसे देखते और जी ही जी में बहुत कुढ़ते कि ये हुस्न ख़ामोश क्यों है, इस क़दर मुंजमिद किसलिए है, उसे तो मुतहर्रिक होना चाहिए।

    उसका रंग गोरा था... बहुत गोरा, जिसमें थोड़ी सी ग़लत रवी भी घुली हुई थी। अगर ये होती तो शक्कर की बनी हुई पुतली थी जो दीवाली के त्यौहार पर बिका करती हैं।

    उसमें मिठास थी, लेकिन वो ज़ाहिर ये करना चाहती थी कि बड़ी कड़वी-कसैली है... कॉलिज में उस का रवैय्या ही कुछ इस क़िस्म का था कि हर वक़्त नीम की निबोली बनी रहती थी।

    एक दिन उसके एक हम जमाअ’त लड़के ने जुरअत से काम ले कर उससे कहा, “हुज़ूर... ख़ाकसारी में अपनी जगह दे कर कभी किसी को सरफ़राज़ तो करें!”

    उसने कोई जवाब दिया। दूसरे दिन उस तालिब-ए-इल्म को प्रिंसिपल ने बुलाया और उसे निकाल बाहर किया।

    इस हादिसे के बाद तमाम लड़के मुहतात हो गए। उन्होंने शाहिदा को देखना ही छोड़ दिया कि मबादा उनका वही हश्र हो, जो उस तालिब-ए-इल्म का हुआ।

    शाहिदा अब बी.ए में थी। ख़ूबसूरत होने के इलावा काफ़ी ज़हीन थी। उसके प्रोफ़ेसर उसकी ज़हानत और ख़ूबसूरत से बड़े मरऊ’ब थे। प्रिंसिपल की चहेती थी, इसलिए कि वो उसकी बड़ी बहन के बड़े लड़के की बेटी थी।

    कॉलिज में चे-मी-गोईयां होती ही रहती हैं। शाहिदा के मुतअ’ल्लिक़ क़रीब क़रीब हर रोज़ तालिब-ए-इल्मों में बातें होती थीं। वो उसके मुतअ’ल्लिक़ कोई बुरी राय क़ायम नहीं कर पाते थे, इसलिए कि उसका करेक्टर बड़ा मज़बूत था।

    टुक शाप में बातें होतीं और शाहिदा का हुस्न ज़ेर-ए-बहस होता। सब सोचते कि ये हसीन क़िला कौन सर करेगा।

    शाहिदा को, जैसा कि सबको मालूम था, सिर्फ़ ख़ूबसूरत चीज़ें पसंद थीं। वो किसी बदसूरत चीज़ को बर्दाश्त नहीं कर सकती थी।

    एक दिन क्लास में एक लड़के की रेंठ बह रही थी। शाहिदा ने जब उसकी तरफ़ देखा तो फ़ौरन उठ कर चली गई।

    वो बड़ी नफ़ासत-पसंद थी। उसको वो हर चीज़ खलती थी जो बदनुमा हो।

    कॉलिज में एक लड़की जमीला थी... बड़ी बदसूरत, मगर शाहिदा के मुक़ाबले में कहीं ज़्यादा ज़हीन। उसको वो नफ़रत की निगाहों से देखती थी। वैसे वो उसकी ज़हानत की क़ाइल थी और कोई रश्क महसूस नहीं करती थी।

    कॉलिज के सब लड़के सोचते थे कि शाहिदा अगर हसीन होती तो कितना अच्छा होता, वो उससे बातचीत तो कर सकते। मगर वो अपने हुस्न के ग़रूर में सरशार रहती और किसी को मुँह ही नहीं लगाती थी।

    एक दिन कॉलिज में हंगामा सा बरपा हो गया... एक लड़का जिसके वालिद की तबदीली हो गई थी, इस कॉलिज में दाख़िला लेने के लिए आया। लड़कों और लड़कियों ने उसे देखा और शशदर रह गए। वो शाहिदा से ज़्यादा ख़ूबसूरत था।

    उसका नाम शाहिद था... उसको दाख़िला मिल गया।

    जिस क्लास में शाहिदा थी, उसी में शाहिद था... इत्तफ़ाक़ की बात है कि जब शाहिद पहले रोज़ क्लास-रूम में आया तो शाहिदा मौजूद नहीं थी। उसको ज़ुकाम हो गया था और इसके बाइ’स उसने दो रोज़ के लिए छुट्टी ले ली थी।

    दो दिन के बाद जब शाहिद कॉलिज के बाग़ में टहल रहा था तो उसने देखा कि एक ख़ूबसूरत, मगर बेजान सी मूरत रही है। उसने अपनी किताबें बेंच पर रखीं और आगे बढ़ा।

    शाहिदा ने उसे देखा। वो उसकी ख़ूबसूरती से मुतअस्सिर हुई और थोड़ी देर के लिए उसके क़दम रुक गए। ज़मीन गीली थी, कीचड़ सी हो रही थी। शाहिद जब उसकी तरफ़ बढ़ा तो वो घबरा सी गई। इस घबराहट में उसका पांव फिसला और वो औंधे मुँह ज़मीन पर गिर पड़ी।

    शाहिद ने लपक कर उसे उठाया... शाहिदा के टख़ने में मोच गई थी, मगर उसने मुस्कुरा कर कहा, “शुक्रिया, आप कौन हैं?”

    शाहिद ने जवाब दिया, “ख़ादिम!”

    “आप ख़ादिम तो दिखाई नहीं देते।”

    “क्या दिखाई देता हूँ... बा’ज़ औक़ात सही शक्लें ग़लत दिखाई दिया करती हैं।”

    शाहिदा को ये बात पसंद आई। उसके टख़ने में दर्द हो रहा था मगर वो उसे चंद लम्हों के लिए भूल गई, “आपका नाम?”

    “शाहिद!”

    शाहिदा ने सोचा कि शायद वो उसका नाम सुन चुका है और शरारत के तौर पर शाहिद बन रहा है।

    “आप ग़लत कह रहे हैं।”

    “आप कॉलिज के रजिस्टर से इसकी तसदीक़ कर सकती हैं।”

    “आप इस कॉलिज में पढ़ते हैं?”

    “जी हाँ, आप यहां कैसे चली आईं?”

    “वाह, मैं भी तो यहीं पढ़ती हूँ।”

    “किस क्लास में?”

    “बी.ए में?”

    “मैं भी तो बी.ए मैं हूँ।”

    “झूट... आप तो माली मालूम होते हैं।”

    “इस शक्ल के आदमी वाक़ई माली मालूम होते हैं... लेकिन अफ़सोस है कि मैंने अभी तक कोई फूल नहीं तोड़ा।”

    “फूल क्या तोड़ने के लिए होते हैं, उन्हें तो सिर्फ़ सूँघना चाहिए।”

    शाहिद एक लहज़ा के लिए ख़ामोश हो गया। फिर उसने सँभल कर कहा, “मैं आपको सूंघ रहा हूँ।”

    शाहिदा भन्ना गई, “आप बड़े बदतमीज़ हैं।”

    शाहिद ने बेंच पर से किताबें उठाते हुए मुस्कुरा कर कहा, “मैंने आप को तोड़ा तो नहीं... सिर्फ़ सूंघ लिया है... और मैं समझता हूँ कि आपकी पंखुड़ियों में से ग़रूर की बू आती है। ओह, माफ़ कीजिएगा, ग़रूर मैं कर सकता हूँ लेकिन मर्दों के साथ। मैं भी एक फूल हूँ, पर आप कली हैं। मैं आप से मुक़ाबला नहीं कर सकता।”

    शाहिदा अपना टख़ना पकड़े बैठी थी। एक दम कराहने लगी, “हाय... हाय, बड़ा दर्द हो रहा है।”

    शाहिद ने उससे इजाज़त तलब की, “क्या में इसे दबा दूं?”

    “दबाईए... ख़ुदा के लिए दबाईए।”

    शाहिद ने उसके मोच आए हुए टख़्ने पर इस तौर पर मसास किया कि पंद्रह मिनट के अंदर अंदर शाहिदा का दर्द दूर हो गया।

    इस वाक़ये के बाद कॉलिज में वो दोनों ख़ाली पीरियडों में इकट्ठे बाहर जाते और बाग़ में बैठ कर जाने क्या बातें करते रहते। शायद वो ये कोशिश कर रहे थे कि दोनों गीली ज़मीन पर फिसलें और उनके दिल के टख़्नों में मोच जाए और वो सारी ज़िंदगी उनको सहलाते रहें।

    दोनों ने बी.ए पास कर लिया, बड़े अच्छे नंबरों पर। शाहिदा के नंबर शाहिद के मुक़ाबले में पाँच ज़्यादा थे। उसने इसका बदला लेना चाहा, “शाहिदा! मैं ये पाँच नंबर अभी लिए लेता हूँ।”

    “कैसे?”

    शाहिद ने उसको पहली मर्तबा अपनी गोद में उठाया और उसको पाँच मर्तबा चूम लिया।

    शाहिदा ने कोई ए’तराज़ किया, वो बहुत ख़ुश हुई लेकिन थोड़ी देर के बाद उसने शाहिद से बड़ी संजीदगी से कहा, “हमारे नंबर पूरे हो गए। लेकिन आज के इस वाक़ये के बाद मैंने फ़ैसला कर लिया है कि आपकी मेरी शादी हो जानी चाहिए... मैं अपने होंट अब किसी और के होंटों से आलूदा नहीं करूंगी।”

    शाहिद बहुत ख़ुश हुआ। उसे यक़ीन ही नहीं था कि उसकी दिली आरज़ू कभी पूरी होगी। उसने इसी ख़ुशी में पाँच नंबर और हासिल कर लिये और शाहिदा से कहा, “मेरी जान! मैं इसी उम्मीद में तो अब तक जीता रहा हूँ।”

    शाहिदा के वालिदैन ने उसकी शादी की एक जगह बातचीत की, मगर शाहिदा ने साफ़ साफ़ इनकार कर दिया कि वो किसी बदसूरत मर्द से रिश्ता-ए-इज़दिवाज क़ायम करने के लिए तैयार नहीं।

    बहुत झगड़े हुए। आख़िर शाहिदा ने बताया कि वो अपने हम जमाअ’त शाहिद को, जो बहुत ख़ुश शक्ल है, पसंद करती है। इसके इलावा किसी और मर्द को अपनी रिफ़ाक़त में नहीं लेगी।

    उसके माँ-बाप शाहिद के वालिदैन से मिले। बड़े शरीफ़ और मुतमव्विल आदमी थे... रौशन ख़याल भी।

    शाहिद को जब उन्होंने देखा तो बहुत ख़ुश हुए। आ’ला ता’लीम के लिए विलायत जा रहा था, लेकिन उसकी ख़्वाहिश थी कि पहले शादी करे और अपनी बीवी को साथ ले कर जाये ताकि वो भी बाहर की दुनिया देखे।

    जब वालिदैन रज़ामंद हो गए तो उनकी शादी हो गई। वो बहुत ख़ुश थे। पहली रात शाहिद ने अपनी बीवी से कहा, “हमारा बच्चा... लड़की हो या लड़का... जब पैदा होगा तो उसे दुनिया देखने आएगी।”

    शाहिदा ने पूछा, “क्यों?”

    शाहिद हंसा, “मेरी जान! तुम इतनी हसीन हो। मैं भी कुछ बदशक्ल नहीं। हमारा बच्चा यक़ीनन हम दोनों से कहीं ज़्यादा ख़ूबसूरत होगा।”

    हनीमून मनाने के लिए वो स्विटज़रलैंड चले गए। वो यहां चार महीने रहे। उसके बाद लंदन चले गए। जहां शाहिद को पी.एचडी. की डिग्री लेनी थी।

    शाहिद के बाप मियां हिदायतुल्लाह की वहां एक कोठी थी जो उनकी आमद से पहले ही ख़ाली करा ली गई। शाहिदा बहुत ख़ुश थी और शाहिद भी, इसलिए कि वो एक बच्चे की आमद का इंतिज़ार कर रहे थे।

    शाहिद कहता था, “हमारा बच्चा इतना हसीन और ख़ूबसूरत होगा कि उसका जवाब होगा।”

    शाहिदा कहती, “ख़ुदा नज़र-ए-बद से बचाए... ज़रूर गुल गोथना सा होगा।”

    पूरे दिन हुए तो बच्चा होने के आसार पैदा हुए। शाहिद ने अपनी बीवी को मैटरनिटी होम में दाख़िल करा दिया।

    लेबर वार्ड के बाहर शाहिद बड़े इज़तराब में इधर से उधर टहल रहा था... उसकी नज़रों के सामने एक ऐसे बच्चे की तस्वीर थी जिसके ख़द्द-ओ-ख़ाल उसके और उसकी बीवी के आपस में बड़े हसीन तौर पर मुदग़म हो गए हों।

    लेबर वार्ड से नर्स बाहर आई। शाहिद ने लपक कर उससे पूछा, “ख़ैरियत है?”

    “जी हाँ!”

    “लड़का हुआ या लड़की?”

    नर्स परेशान सी थी। उसने सिर्फ़ इतना कहा, “पता नहीं, लड़का है या लड़की... पर हमने ऐसा बच्चा कभी नहीं देखा।”

    शाहिद ने ख़ुश हो कर पूछा, “बहुत ख़ूबसूरत है ना?”

    नर्स ने मुँह बना कर जवाब दिया, “बड़ी अगली है... उसके सर पर ऐसा मालूम होता है सींग हैं। दाँत भी हैं... नाक बड़ी टेढ़ी है... दो आँखें हैं पर एक आँख ऐसा लगता है, माथे पर भी है। तुम लोग इतने ख़ूबसूरत हो कर कैसे बच्चे पैदा करता है?”

    शाहिद अपने बच्चे को देखने के लिए गया... लेकिन दूसरे दिन मैटरनिटी होम में टिकट लगा दी गई कि जो आदमी चाहे, इस अ’जीब-उल-ख़िलक़त बच्चे को देख सकता है।

    स्रोत :
    • पुस्तक : سرکنڈوں کے پیچھے

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