नया साल

MORE BYसआदत हसन मंटो

    कैलेंडर का आख़िरी पत्ता जिस पर मोटे हुरूफ़ में 31 दिसंबर छपा हुआ था, एक लम्हा के अंदर उसकी पतली उंगलियों की गिरफ़्त में था। अब कैलेंडर एक टूंड मुंड दरख़्त सा नज़र आने लगा। जिसकी टहनियों पर से सारे पत्ते ख़िज़ां की फूंकों ने उड़ा दिए हों।

    दीवार पर आवेज़ां क्लाक टिक टिक कर रहा था। कैलेंडर का आख़िरी पत्ता जो डेढ़ मुरब्बा इंच काग़ज़ का एक टुकड़ा था, उसकी पतली उंगलियों में यूं काँप रहा था गोया सज़ाए मौत का क़ैदी फांसी के सामने खड़ा है।

    क्लाक ने बारह बजाये, पहली ज़र्ब पर उंगलियां मुतहर्रिक हुईं और आख़िरी ज़र्ब पर काग़ज़ का वो टुकड़ा एक नन्ही सी गोली बना दिया गया। उंगलियों ने ये काम बड़ी बेरहमी से किया और जिस शख़्स की ये उंगलियां थीं और भी ज़्यादा बेरहमी से उस गोली को निगल गया।

    उसके लबों पर एक तेज़ाबी मुस्कुराहट पैदा हुई और उसने ख़ाली कैलेंडर की तरफ़ फ़ातिहाना नज़रों से देखा और कहा, “मैं तुम्हें खा गया हूँ... बग़ैर चबाए निगल गया हूँ।”

    इसके बाद एक ऐसे क़हक़हे का शोर बुलंद हुआ जिसमें उन तोपों की गूंज दब गई जो नए साल के आग़ाज़ पर कहीं दूर दाग़ी जा रही थीं।

    जब तक इन तोपों का शोर जारी रहा, उसके सूखे हुए हलक़ से क़हक़हे आतिशीं लावे की तरह निकलते रहे, वो बेहद ख़ुश था। बेहद ख़ुश, यही वजह थी कि उस पर दीवानगी का आलम तारी था। उसकी मसर्रत आख़िरी दर्जा पर पहुंची हुई थी, वो सारे का सारा हंस रहा था। मगर उसकी आँखें रो रही थीं और जब उसकी आँखें हँसतीं तो आप उसके सिकुड़े लबों को देख कर यही समझते कि उस की रूह किसी निहायत ही सख़्त अ’ज़ाब में से गुज़र रही है।

    बार बार वो नारा बुलंद करता, “मैं तुम्हें खा गया हूँ... बग़ैर चबाए निगल गया हूँ... एक एक करके तीन सौ छियासठ दिनों को, लीप दिन समेत!”

    ख़ाली कैलेंडर उसके इस अ’जीब-ओ-ग़रीब दा’वे की तसदीक़ कर रहा था।

    आज से ठीक चार बरस पहले जब वो अपने काँधों पर मुसीबतों का पहाड़ उठा कर अपनी रोटी आप कमाने के लिए मैदान में निकला तो कितने आदमियों ने उसका मज़हका उड़ाया था... कितने लोग उसकी हिम्मत पर ज़ेरे लब हंसते थे। मगर उसने इन बातों की कोई परवाह की थी और उसे अब भी किसी की क्या पर्वा थी, उसको सिर्फ़ अपने आप से ग़रज़ थी और बस, दूसरों की जन्नत पर वो हमेशा अपनी दोज़ख़ को तर्जीह देता रहा था और अब भी उसी चीज़ पर पाबंद था।

    वो इन दिनों गिद्धों की सी मशक़्क़त कररहा था। कुत्तों से बढ़ कर ज़लील ज़िंदगी बसर कर रहा था मगर ये चीज़ें उसके रास्ते में हाइल होती थीं।

    कई बार उसे हाथ फैलाना पड़ा... उसने हाथ फैलाया, लेकिन एक शान के साथ। वो कहा करता था, “ये सब भिकारी जो सड़कों पर झोलियां फैलाए और कशकोल बढ़ाए फिरते रहते हैं, गोली मार कर उड़ा देने चाहिऐं। भीक लेकर ये ज़लील कुत्ते शुक्रगुज़ार नज़र आते हैं... हालाँकि उन्हें शुक्रिया गालियों से अदा करना चाहिए... जो भीक मांगते हैं वो इतने ला’नती नहीं जितने कि ये लोग जो देते हैं। दान पुन के तौर पर... जन्नत में एक ठंडी कोठड़ी बुक कराने वाले सौदागर!”

    उसको कई मर्तबा रुपये-पैसे की इमदाद हासिल करने की ख़ातिर शहर के धनवानों के पास जाना पड़ा। उसने इन दौलतमंदों से इमदाद हासिल की... उनकी कमज़ोरियां उन्ही के पास बेच कर!... और उसने ये सौदा कभी अनाड़ी दुकानदार की तरह नहीं किया...

    आप शहर की सेहत के मुहाफ़िज़ मुक़र्रर किए गए हैं, लेकिन दरहक़ीक़त आप बीमरियां फ़राहम करने के ठेकेदार हैं। हुकूमत की किताबों में आपके नाम के सामने हैल्थ ऑफीसर लिखा जाता है,मगर मेरी किताब में आपका नाम अमराज़ फ़रोशों की फ़हरिस्त में दर्ज है... परसों मार्कीट में आपने संगतरों के दो सौ टोकरे पास करके भिजवाए जो तिब्बी उसूल के मुताबिक़ सेहत-ए-आ’म्मा के लिए सख़्त मुज़िर थे। दस रोज़ पहले आपने क़रीबन दो हज़ार केलों पर अपनी आँखें बंद करलीं जिनमें से हर एक हैज़ा की पुड़िया थी... और आज आपने इस बोसीदा और ग़लीज़ इमारत को बचा लिया जहां बीमारियां परवरिश पाती हैं और...

    उसे आम तौर पर आगे कहने की ज़रूरत ही पेश आती थी... इसलिए कि उसका सौदा बहुत कम गुफ़्तुगू ही से तय हो जाता था।

    वो एक सस्ते और बाज़ारी क़िस्म के अख़बार का एडिटर था। जिसकी इशाअ’त दो सौ से ज़्यादा थी... दरअसल वो इशाअ’त का क़ाइल ही था... वो कहा करता था, “जो लोग अख़बार पढ़ते हैं बेवक़ूफ़ हैं। और जो लोग अख़बार पढ़ कर उसमें लिखी बातों पर यक़ीन करते हैं। सबसे बड़े बेवक़ूफ़ हैं। जिन लोगों की अपनी ज़िंदगी हंगामे से पुर हो, उनको इन छपे हुए चीथड़ों से क्या मतलब?”

    वो अख़बार इसलिए नहीं निकालता था कि उसे मज़ामीन लिखने का शौक़ था। या वो अख़बार के ज़रिये से शोहरत हासिल करना चाहता था... नहीं, बिल्कुल नहीं। एक दो घंटे की मसरूफ़ियत के सिवा जो उसके अख़बार की इशाअ’त के लिए ज़रूरी थी वो अपना बक़ाया वक़्त उन ख़्वाबों की ता’बीर देखने में गुज़ारा करता था जो एक ज़माने से उसके ज़ेहन में मौजूद थे। वो अपने लिए एक ऐसा मक़ाम बनाना चाहता था जहां उसे कोई छेड़ सके... जहां वो इत्मिनान हासिल कर सके... ख़्वाह वो दो सेकंड ही का क्यों हो।

    “जंग के मैदान में फ़तह, बर लब-ए-गौर ही नसीब हो। मगर हो ज़रूर... और अगर शिकस्त हो जाये, पिटना पड़े तो भी क्या हर्ज है... शिकस्त खाएंगे लेकिन फ़तह हासिल करने की कोशिश करते हुए... मौत उनकी है जो मौत से डरकर जान दें, और जो ज़िंदा रहने की कोशिश में मौत से लिपट जाएं ज़िंदा हैं। और हमेशा ज़िंदा रहेंगे... कम अज़ कम अपने लिए!”

    दुनिया उसके ख़िलाफ़ थी, जो शख़्स भी उससे मिलता था उससे नफ़रत करता था, वो ख़ुश था। नफ़रत में मोहब्बत से ज़्यादा तेज़ी होती है... अगर सब लोग मुझसे मोहब्बत करना शुरू करदें तो मैं उस पहिए के मानिंद हो जाऊं जिसमें अंदर-बाहर, ऊपर-नीचे सब जगह तेल दिया गया हो... मैं कभी उस गाड़ी को आगे धकेल सकूँगा जिसे लोग ज़िंदगी कहते हैं।

    क़रीब क़रीब सब उसके ख़िलाफ़ थे और वो अपने इन मुख़ालिफ़ीन की तरफ़ यूँ देखा करता था गोया वो मोटर के इंजन में लगे हुए पुरज़ों को देख रहा है।

    “ये कभी ठंडे नहीं होने चाहिऐं...”

    और उसने अब तक उनको ठंडा होने दिया था। वो उस अलाव को जलाए रखता था जिस पर वो हाथ ताप कर अपना काम किया करता था। जिस रोज़ वो अपने मुख़ालिफ़ीन में किसी नए आदमी का इज़ाफ़ा करता तो अपने दिल से कहा करता था, “आज मैंने अलाव में एक और सूखी लकड़ी झोंक दी है जो देर तक जलती रहेगी।”

    उसके एक मुख़ालिफ़ ने जलसे में उसके ख़िलाफ़ बहुत ज़हर उगला... उसे बहुत बुरा भला कहा। हत्ता कि उसे नंगी गालियां भी दीं। उसके मुख़ालिफ़ का ख़याल था कि ये सब कुछ सुन कर उसे नींद आएगी। मगर इसके बरअ’क्स वो तो उस रोज़ मा’मूल के ख़िलाफ़ बहुत आराम से सोया और उसे ख़ुद सारी रात आँखों में काटना पड़ी। शब भर उसका ज़मीर उसे सताता रहा। हत्ता कि सुबह उठ कर वो उसके पास आया और बहुत बड़े नदामत भरे लहजा में उससे मा’ज़रत तलब की।

    “मुझे बहुत अफ़सोस है कि मैंने आप जैसे बुलंद अख़लाक़ इंसान को बुरा भला कहा। गालियां दीं... दरअसल... दरअसल मैंने ये सब कुछ बहुत जल्दबाज़ी में क्या। सोचे समझे बग़ैर। मुझे उकसाया गया था, मैं अपने किए पर नादिम हूँ और मुझे उमीद है कि आप मुझे माफ़ फ़रमा देंगे। मुझसे सख़्त ग़लती हुई!”

    बलंद अख़लाक़!... उसे इस लफ़्ज़ अख़लाक़ से बहुत चिड़ थी। अख़लाक़... रुख़-ए-इंसानियत का ग़ाज़ा.. अख़लाक़... अख़लाक़, अख़लाक़... या’नी च? ये करो, वो करो की बेमा’नी गर्दान... इंसान की आज़ादाना सरगर्मियों पर बिठाया हुआ सेंसर!

    उसको मालूम था कि उसके कमज़ोर दिल मुख़ालिफ़ ने झूट बोला। मगर मालूम उसके दिल में ग़ुस्सा क्यों पैदा हुआ... बख़िलाफ़ इसके उसे ऐसा महसूस हुआ कि जो शख़्स उसके सामने बैठा माफ़ी मांग रहा है उसकी कोई निहायत ही अज़ीज़ शय फ़ना हो गई है। वो ग़ायत दर्जा बेरहम तसव्वुर किया जाता था और असल में वो था भी बेरहम, नर्म-ओ-नाज़ुक जज़्बात से उसका सीना बिल्कुल पाक था। मगर उस पत्थर पर से कोई चीज़ रेंगती हुई नज़र आई। उसे उस शख़्स पर रहम आने लगा।

    “आज तुम रुहानी तौर पर मर गए हो और मुझे तुम्हारी इस मौत पर अफ़सोस है!”

    ये सुन कर उसके मुखालिफ़ को फिर गालियां देना पड़ीं। मगर उसके कानों तक कोई आवाज़ पहुंच सकी। मुद्दत हुई वो उसको किसी दूर दराज़ क़ब्रिस्तान में दफ़न कर चुका था।

    चार बरस से वो इसी तरह जी रहा था, ज़बरदस्ती, दुनिया की मर्ज़ी के ख़िलाफ़। बहुत सी क़ुव्वतें उस को पस्पा कर देने पर तुली रहती थीं। मगर वो अपने वजूद का एक ज़र्रा भी जंग के बग़ैर उनके हवाले करने के लिए तैयार था... जंग, जंग, जंग... हर मुख़ालिफ़ क़ुव्वत के ख़िलाफ़ जंग। रहम-ओ-तरह्हुम से नाआशनाई, इशक़-ओ-मोहब्बत से परहेज़। उम्मीद, ख़ौफ़ और इस्तक़बाल से बेगानगी... और फिर जो हो सो हो!

    चार बरस से वो ज़माने की तेज़-ओ-तुंद हवा में एक तनावर और मज़बूत दरख़्त की तरह खड़ा था। मौसमों के तग़य्युर-ओ-तबद्दुल ने मुम्किन है उसके जिस्म पर असर किया हो मगर उसकी रूह पर अभी तक कोई चीज़ असर-अंदाज़ हो सकी थी। वो अभी तक वैसी ही थी... जैसी कि आज से चार बरस पहले थी, फ़ौलाद की तरह सख़्त, ये सख़्ती क़ुदरत की तरफ़ से अता नहीं की गई थी बल्कि ख़ुद उसने पैदा की थी।

    वो कहता था। नर्म-ओ-नाज़ुक रूह को अपने सीने में दबा कर तुम ज़माने की पथरीली ज़मीन पर नहीं चल सकोगे। जो फूल की पत्ते से हीरे का जिगर काटना चाहे उसे पागलखाने में बंद कर देना चाहिए...

    शायराना ख़यालात को उसने अपने दिमाग़ में कभी दाख़िल होने दिया था और अगर कभी कभार ग़ैर इरादी तौर पर वो उसके दिमाग़ में पैदा हो जाते थे तो वो उन हरामी बच्चों का फ़ौरन गला घूँट दिया करता था। वो कहा करता था, “मैं उन बच्चों का बाप नहीं बनना चाहता जो मेरे काँधों का बोझ बन जाएं।”

    उसने अपने साज़-ए-हयात से सारी तरबें उतार दीं थीं। उसने इसमें से वो तमाम तार नोच कर बाहर निकाल दिए थे जिनमें से नर्म-ओ-नाज़ुक सुर निकलते हैं।

    “ज़िंदगी का सिर्फ़ एक राज़ है और वो रज्ज़ है, जो आगे बढ़ने, हमला करने, मरने और मारने का जज़्बा पैदा करता है। इसके सिवा बाक़ी तमाम रागनियां फ़ुज़ूल हैं जो आ’ज़ा पर थकावट तारी करती हैं।”

    उसका दिल शबाब के बावजूद इश्क़-ओ-मोहब्बत से ख़ाली था। उसकी नज़रों के सामने से हज़ार-हा ख़ूबसूरत लड़कियां और औरतें गुज़र चुकी थीं, मगर उनमें से किसी एक ने भी उसके दिल पर असर किया था। वो कहा करता था, “इस पत्थर में इश्क़ की जोंक नहीं लग सकती!”

    वो अकेला था, बिल्कुल अकेला... खजूर के उस दरख़्त के मानिंद जो किसी तपते हुए रेगिस्तान में तन्हा खड़ा हो, मगर वो इस तन्हाई से कभी घबराया था। दरअसल वो कभी तन्हा रहता ही था।

    जब मैं काम में मशग़ूल होता हूँ तो वही मेरा साथी होता है और जब मैं इससे फ़ारिग़ हो जाता हूँ तो मेरे दूसरे ख़यालात-ओ-अफ़्क़ार मेरे गिर्द-ओ-पेश जमा हो जाते हैं। मैं हमेशा अपने दोस्तों के जमगठे में रहता हूँ।

    वो अपने दिन यूं बसर करता था जैसे आम खा रहा है। शाम को जब वो बिस्तर पर दराज़ होता था तो ऐसा महसूस किया करता था कि उसने दिन को चूसी हुई गुठली के मानिंद फेंक दिया है। अगर आप उसके कमरे की एक दीवार होते तो कई बार आपके साथ ये अलफ़ाज़ टकराते जो कभी कभी सोते वक़्त उसकी ज़बान से निकला करते थे, “आज का दिन कितना खट्टा था... इस बरस के टोकरे में अगर बक़ाया दिन भी इसी क़िस्म के हुए तो मज़ा आजाएगा!”

    और रातें... ख़्वाह तारीक हों या मुनव्वर। उसकी नज़र में दाश्ताएं थीं, जिनको वो रोज़ तलूअ-ए-आफ़ताब के साथ ही भूल जाता था।

    चार बरस से वो इसी तरह ज़िंदगी बसर कर रहा था। ऐसा मालूम होता था कि वो एक ऊंचे चबूतरे पर बैठा है। हाथ में हथौड़ा लिये। ज़माने का आहनी फ़ीता उसके सामने से गुज़र रहा है और वो उस फीते पर हथौड़े की ज़र्बों से अपना ठप्पा लगाए जा रहा है। एक दिन जब गुज़रने लगता है तो वो फीते को थोड़ी देर के लिए थाम लेता है और फिर उसे छोड़कर कहता है, “अब जाओ, मैं तुम्हें अच्छी तरह इस्तेमाल कर चुका हूँ।”

    बा’ज़ लोगों को अफ़सोस हुआ करता है कि हमने फ़ुलां काम फ़ुलां वक़्त पर क्यों नहीं किया और ये पछतावा वो देर तक महसूस किया करते हैं। मगर उसे आज तक इस क़िस्म का अफ़सोस या रंज नहीं हुआ। जो वक़्त सोचने में ज़ाए होता है वो उससे बग़ैर सोचे समझे फ़ायदा उठाने की कोशिश किया करता था, ख़्वाह अंजामकार उसे नुक़्सान ही क्यों पहुंचे।

    अगर सोच समझ कर चलने ही में फ़ायदा होता तो उन पैग़म्बरों और नेकोकारों की ज़िंदगी तकलीफों और नाकामियों से भरी हुई हरगिज़ होती, जो हर काम बड़े ग़ौर-ओ-फ़िक्र से किया करते थे। अगर सोच बिचार के बाद भी नुक़्सान हो या नाकामी का मुँह देखना पड़े तो क्या इससे ये बेहतर नहीं कि ग़ौर-ओ-फ़िक्र में पड़ने के बग़ैर ही नताइज का सामना कर लिया जाये।

    उसे इन चार बरसों में हज़ारहा नाकामियों का मुँह देखना पड़ा था। सिर्फ़ मुँह ही नहीं बल्कि उनको सर से पैर तक देखना पड़ा था मगर वो अपने उसूल पर इसी तरह क़ायम था जिस तरह तुन्द लहरों में ठोस चट्टान खड़ी रहती है।

    आज रात बारह बजे के बाद नया साल उसके सामने आरहा था और पुराने साल को वो हज़म कर गया था, बग़ैर डकार लिये।

    नए साल की आमद पर वो ख़ुश था जिस तरह अखाड़े में कोई नामवर पहलवान अपने नए मद्द-ए-मुक़ाबल की तरफ़ ख़म ठोंक कर बढ़ता है। उसी तरह वो नए साल के मुक़ाबले में अपने हथियारों से लैस हो कर खड़ा होगया था। अब वो बलंद आवाज़ में कह रहा था, “मैं तुम जैसे पहलवानों को पछाड़ चुका हूँ। अब तुम्हें भी चारों शाने चित्त गिरा दूंगा।”

    जी भर कर ख़ुशी मनाने के बाद वो नए कैलेंडर की तरफ़ बढ़ा जो मैली दीवार पर ऊपर की तरफ़ सिमट रहा था। तारीख़ नुमा से उसने ऊपर का काग़ज़ एक झटके से अलाहदा कर दिया और कहा, “ज़रा नक़ाब हटाओ तो... देखूं तुम्हारी शक्ल कैसी है... मैं हूँ तुम्हारा आक़ा... तुम्हारा मालिक... तुम्हारा सब कुछ!” यकुम जनवरी की तारीख़ का पत्ता उर्यां होगया। एक क़हक़हा बलंद हुआ और उस ने कहा,“कल रात तुम फ़ना कर दिए जाओगे।”

    स्रोत
    • पुस्तक : دھواں

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