जीवन जल

सलीम अख़्तर

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सलीम अख़्तर

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    ज़ी-वक़ार शहज़ादी ! ये है राज़ कोह-ए-निदा का।

    अजनबी हवाओं की ज़ायक़ा शनास और तवील मसाफ़तों की धूल में अटे हातिम ने कोह-ए-निदा का तमाम माजरा गोश-ए-गुज़ार किया...मुकम्मल दिलजमई से!

    हातिम की आमद का ऐलान होने के बाद, हर-चंद शहज़ादी मिस्र रही कि उसने बहुत हर्ज-मर्ज खींचा है, पहले आब ख़ु खुन्क-ओ-मुअत्तर से जिस्म से नादीदा ज़मीनों की धूल साफ़ कर ले, आज़ा से मेहनत-ओ-मशक़्क़त के पसीना की बू धो डाले, तब पाकीज़ा पोशाक ज़ेब-ए-तन करने के बाद, लज़्ज़त काम-ओ-दहन से तन कर तवाना करले...बल्कि यूँही चंदे लैल-ओ-नहार करे, जब अच्छी तरह आसूदा और मसरूर हो ले तो फिर किसी दिन, दीवान ख़ास में, तक़रीब ख़ास में, मुक़र्रबीन, मुसाहिबीन और अमाइदीन के रूबरू, अहवाल कोह-ए-निदा की मुहिम का गोश-ए-गुज़ार करे तो मर्ग़ूब ख़ातिर होगा। हातिम ने दस्त-बस्ता अर्ज़ की:

    दानिशमंद और ज़ीरक शहज़ादी! तुम जानती हो कि मेरा दोस्त मुनीर शामी, शर्बत-ए-वस्ल के पीने को तन-ए-ज़ार और दिल-फ़िगार के साथ ख़ुद पे दिन का आराम और रात की नींद हराम किए है। लिहाज़ा जिस्म के आराम और मामूली सी आसाइश के लिए मुनीर शामी को ताख़ीर के तनाव और तज़बज़ुब के अज़ाब में मुब्तला करना ग़ैर दर्दमंदाना फे़ल होगा और दोस्त भी ऐसा जिसके लिए मैंने ये हर्ज-मर्ज खींचा।

    शहज़ादी, कि हुस्न की भी शहज़ादी थी, मुस्कुरा मुस्कुरा कर उसे मीठी मीठी नज़रों से तका की, चंदे तवक़्क़ुफ़ किया, तब लब-ए-लालीं को ग़ुन्चा सा, यूं वाक़िया। आफ़रीन है हातिम!

    मुतल्ला हाशिया से बने नुक़री तारों वाले पर्दा के उधर शहज़ादी, सत्ता रवी जैसी ख़वासों के झुरमुट में मिसल माह चहार दहम, इधर हातिम मुनीर शामी और मर्हबा! !का ग़लग़ला बुलंद करते हुए चीदा दरबारी। पर्दे के नुक़री तार मुहीन-ओ-मुलाइम और नफ़ीस, इतने कि दस्त तसव्वुर से भी लर्ज़ां, और इस धुआँ धुआँ बुराक़ पर्दा के पीछे हुस्न-ए-जहाँ सोज़ का शोला ।।।। लपकता, दमकता, झमकता! वो हुस्न जिसने मुनीर शामी के ख़िरमन होश-ओ-ख़िरद पर बिजली गिराई, घरबार से बेगाना किया और आशिक़ हिर्मांनसीब बनाकर छोड़ा।

    शहज़ादी हातिम को जिन नज़रों से देख रही थी वो मुनीर शामी को इन नज़रों से ना देख सकती थी कि हातिम बहरहाल फ़ातिह मुहिम जो था। शहज़ादी के गुलनार लबों पर शबनम की किरनों ने रुख़-ए-रौशन को यूं मुनव्वर कर दिया कि वही तार निक़ाब में तबदील हो गया। हर-चंद के मुनीर शामी की हद्द-ए-अदब से तजावुज़ कुर्ती गुस्ताख निगाहें, दस्त तमअ की मानिंद तार निक़ाब से खेल रही थीं। शहज़ादी ने लब-ए-लालीं को जुंबिश दी।

    हातिम ! जब ऐसे हो तभी ऐसे भी हो। हातिम कोरनिश बजा लाया।

    शहज़ादी ने जुंबिश अब्रू से इशारा किया, तरत मस्नद ज़रीं मुकल्लिफ़-ओ-पर तकल्लुफ़, कल्ला बुतों की डोरियों से मुज़य्यन, आरास्ता कर दी, मुअद्दब कनीज़ों ने दस्तर-ख़्वान ज़रनिगार सजा दिया, ख़ुश-रू बांदी जवाहर से जग-मग करता तिलाई आफ़ताबा और नक़्शें चलमची लेकर हाथ धुलाने को हाज़िर दूसरी दस्त पोशी को मुस्तइद। नाज़नीनों ने सर्द मशरूब और मेवा हाय ख़ुशक-ओ-तर, ज़रीन मुज़य्यन दस्तर-ख़्वानों पर सलीक़ा और क़रीना से सजा दीए।

    शहज़ादी और हाज़िरीन, हातिम के हिलते लब देख रहे थे। जहां से अलफ़ाज़ गोया मानिंद तस्वीर अदा हो रहे थे। हातिम की तक़रीर दिल पज़ीर, गोया उंगली थामे, ग़ैर मानूस, अजनबी मुनाज़िर और नादीदा ज़मीनों की सैर करा रही थी। जब बार कलाम से हातिम का हलक़ बोझल हो जाता, चंदाँ तवक़्क़ुफ़ करता, शर्बत का घूँट भरता, हमा-तन गोश बने सामईन पर निगाह डालता और फिर गोयाई की डोर थाम लेता।

    सबकी निगाहों में हातिम के हिलते लब थे। सिर्फ मुनीर शामी का तन नातवां, चश्म-ए-बेदार में तबदील हो चुका था। पलकें झपकाए बग़ैर शहज़ादी को तके जा रहा था। नुक़रई मुहीन तारों के पर्दे में कुछ छिपी कुछ दिखाई देती शहज़ादी, रोशनी की मानिंद मुनीर शामी की आँखों की राह-ए-दिल में चांदनी बिखेर रही थी। अब ये मग़रूर हसीना मेरी है, आज ये मुश्किल-पसंद दोशीज़ा मेरी सेज आबाद करेगी, संग हिजर से शिकस्ता तन-ए-दाग़ दाग़, वस्ल से शाद-काम होगा। वो इस तसव्वुर ही से लरज़ गया कि ये लाम्बी स्याह नागिनें उस के बाज़ू पर खिलेंगी और नैन में लर्ज़िश पैदा करेंगी, ये ग़ुंचा-दहन मेरे लबों पर फूल खिलाएगा। तन निगार गुलज़ार में तबदील होगा। मुनीर शामी में उसे से ज़्यादा सोचने की ताब ना थी ताहम नज़र की प्यास चशमा हुस्न से सेराब होती रही।।। अगर इख़तिलात बालनज़र मुम्किन होता तो मुनीर शामी पर ग़ुसल वाजिब हो चुका होता।

    ज़ी-वक़ार शहज़ादी! ये है राज़ कोह-ए-निदा का।

    हातिम ख़ामोश!

    शहज़ादी मानिंद तस्वीर , अहल-ए-महफ़िल मानिंद दीवार।

    चंदाँ ख़ामोशी की रुवातनी रही।

    बारे शहज़ादी, हुस्न के तख़त-ए-ताऊस से शाख़-ए-गुल की मानिंद झूम कर उठी। नाज़ुक कलाइयों से पर्दा उठाया जो कि आतिश हुस्न से ख़ुद ही भस्म होता जा रहा थाम। महफ़िल में चांद इतराया, आहिस्ता ख़िराम, क़दम क़दम , हातिम की जानिब रवां, फिर वो सर्व-क़द, घुटनों के बल हातिम के सामने झुक गई, वो हातिम या किसी और की जानिब ना देख रही थी, निगाहें हातिम की गर्द-आलूद नालैन पर मर्कूज़ थीं।

    आफ़रीन ! सद आफ़रीन!!

    हातिम सिर्फ मुस्कुरा दिया।

    क़बीला तै के जरी फ़र्ज़ंद! तू ने जो क़ौल दिया, उसे पूरा कर दिखाया।

    हातिम ने जवाब दिया क़ौल मर्दां जान मर्दां।

    बजा फ़रमाया शहज़ादी अब सर्व-क़द थी। हातिम ने नज़रें उठा कर हुस्न बे-नक़ाब को देखा मगर रुख़-ए-रौशन की ताब ने लासका। गुलशन हुस्न में जवानी ने अँगारे भर दीए थे नज़रें पकारें।।। साहिब परे ! परे !!

    शहज़ादी ने ग़ुन्चा साँ दहन वाक़िया बहादुर और फ़य्याज़ हातिम ! तू ने मेरी शर्त पूरी कर दी अब मैं तेरी शर्त पूरी करूँगी। ख़ुशी से। ! दिलजमई से!!

    शहज़ादी हातिम को जिन नज़रों से देख रही थी शायद ही किसी शहज़ादी ने ऐसी नज़रों से कभी किसी शहज़ादा को भी देखा होगा, नज़र मानिंद दस्त सुबुक। हातिम के चेहरा के नुक़ूश टटोल रही थीं। हातिम, रीढ़ की हड्डी के निचले हिस्से से, ख़ून को चेहरा की जानिब रवां महसूस करसकता था। फ़िशार ख़ून-ए-दिल की धड़कनों का आहंग बे-तरतीब कर रहा था।

    शहज़ाए लब ख़ामोशी से गोया हुई।

    तो मेरे तन की सलतनत का मुख़तार है, मैं तेरे तसर्रुफ़ में हूँ, जो चाहे कर, तो मेरा आक़ा है।

    दोनों बाज़ू फैलाए, सर झुकाए, ख़ुदसपुर्दगी की मुकम्मल तस्वीर!

    मुनीर शामी कि आशिक़ था इस पर साविकाॱएॱ जमाल गिरनी ही थी ख़ुद हातिम ठिठक कर रह गया, लारीब!वो पहले से भी कहीं ज़्यादा पर जमाल, पुरकशिश और पर तरग़ीब बन चुकी थी।

    शहज़ादी ने एक मर्तबा फिर हातिम के चेहरा को नज़र भर कर देखा। सफ़र की सऊबतों ने चेहरा की लकीरों में मुहिम्मात की दास्तान रक़म की थी, उस के क़दबाला के सामने वो ख़ुद को कोताह महसूस कर रही थी, गोया वो बची हो। वो उस का पर मशक़्क़त जिस्म तक रही थी जिसमें से मर्दानगी की महक मशक के मानिंद ख़ारिज हो कर आसाब पर नशा तारी कर रही थी। वो उस के फ़ौलादी बाज़ुओं की रेशमी मछलीयों की हक़ीक़त जानना चाहती थी और मज़बूत हाथों की क़ुव्वत आज़माना!

    शहज़ादी का तन-ए-नाज़ुक बोला मैं मफ़तूह!

    मुनीर शामी कि मुहिम जो ना था, महिज़ आशिक़ था।।। आलम हिरास में! हातिम की कुशादापेशानी पर सोच की गहिरी लकीरें थीं उसने मीज़ान नज़र से आमादगी की तस्वीर बनी शहज़ादी को तौला तो सैर की सवा सैर पाई, शहज़ादी स्याह आँखें पूरी तरह खोले उसी को तक रही थी, उस की आँखें भेद खोल रही थीं कि छुपा रही थीं? कोह-ए-निदा से भी ज़्यादा भेद भरी बुझारत! हातिम इन सवालात का जवाब देने की ख़ुद में सकत ना पारहा था। ऐसे में जबकि निगाहें सवाल जवाब कर रही थीं, पुल सदीयों में और सदीयां पलक झपकते लमहात में तबदील हो रही थीं तो नेको कारों का अज़ली दुश्मन शैतान मर्दूद, हातिम के दिल में वस्वसे पैदा कर रहा था।

    हातिम! ये अरमूग़ान हुस्न के बाइस दिल-कशी, शबिस्तान शाही है। तो उसे इस एस नाकारा मुनीर शामी के हवाले कर देगा?

    हातिम डगमगाया, मुनीर शामी का दिल लरज़ा, शहज़ादी का दिल मज़ीद धड़का, देख आँखें खोल कर देख! किया तो ने अपनी तमाम मुहिम्मात में ऐसा तिलसमी हुस्न देखा? नहीं नाँ! तो कैसे देख सकता था कि कायनात में हुस्न का ये कामिल नमूना वाहिद है।।।। देख हातिम देख! उस का क़दर इना कमान जैसा जिस्म देख और ये होंट और वो सब कुछ भी जो तो नहीं देख सकता।

    शैतान मज़े ले-ले कर हातिम की आँखों को शहज़ादी के एक एक उज़ू पर ले जा रहा था, गोया शीशे में से दिखा रहा हो, शैतान का लहजा पर तरग़ीब था।

    सन हातिम! तू ने उम्र-ए-अज़ीज़ दूसरों के लिए बसर कर दी, तुझे क्या मिला? ख़ाक धूल पसीना? और ज़रा सी नेक-नामी? बेमानी शौहरत? तो ने आँखों से इसलिए कांटे चने कि नामर्द और निकम्मा मुनीर शामी समर हुस्न से कैफ़-आगीं हो? तुझे क्या मिलेगा? मर्हबा और शाबाश! तो शाद आफ़रीं और शादबाद जैसे मुर्दा लफ़्ज़ों की माला बना कर गले में पहन लेना जबकि शहज़ादी के मुलाइम बाज़ू मुनीर शामी के गले का हार होंगे।

    हातिम, शहज़ादी, मुनीर शामी सभी धड़कन की ज़िद पर!

    हातिम ख़ुद को किसी तिलसमी दो राहे पर डाँवा-डोल महसूस कर रहा था, शहज़ादी को मुस्तक़बिल तेज़ आंधीयों में चिराग़ की मानिंद नज़र आरहा था जबकि मुनीर शामी ग़ैर मुरई दलदल में नीचे नीचे और नीचे।

    शैतान अपने दलायल का असर देख रहा था। उसने आख़िरी वार किया, और आख़िरी बात सन! हातिम! मुनीर शामी की नसल चलेगी,अब उस की ऑल वारिस तख़्त होगी। मुनीर शामी जैसे बुज़दिल को देख और ख़ुद को भी।।। तेरी क़ुव्वत तसख़ीर और शहज़ादी के हुस्न-ए-जहाँ सोज़ से बच्चे जन्म लेंगे वो जरीदा-ए-आलम पर अपना, तेरा और क़बीला तै का नाम सब्त कर देंगे और मुनीर शामी! सन! उस की रानों मैं तुझ ऐसी क़ुव्वत कहाँ?

    हातिम जैसे चकरा कर गिरने को हो। शहज़ादी ने इस का हाथ थाम लिया, दूसरा हाथ मुनीर शामी ने दोनों के गर्म और सर्द लम्स ने, हातिम के आसाब को झिंझोड़ डाला, उसने झुरझुरी ली फ़ैसला की घड़ी आन पहुंची थी, फ़ैसला अटल था, कारकुनान क़ज़ाव क़दर बहुत पहले ही हातिम के लिए मुहिम जोई और मुनीर शामी के लिए शहज़ादी लिख चुके थे। साहिब क़ौल हातिम फ़ैसला बदलने का मजाज़ ना था, फ़ैसला दरुस्त साबित करने के लिए उसे बाअमल होने की इजाज़त थी मगर अमल का हासिल तबदील ना हो सकता था। फ़ैसला इंतिख़ाब से और इंतिख़ाब भी मुक़द्दर। लिहाज़ा ख़ुशी ख़ुशी बुला किसी जब्रो कराह के उसने दोनों के हाथ एक दूसरे के हाथ में दे दीए। मुनीर शामी की आँखों में ख़ुशी के आँसू थे वैसे आँसू शहज़ादी की आँखों में भी थे।

    मर्हबा! शाद बाद! शाबाश! के नारों की गूंज में शैतान मलऊन बड़बड़ाता जा रहा था।

    अहमक़! अहमक़ हातिम! बिलकुल पागल और बेवक़ूफ़।।। आक़िबत ना अंदेश हातिम!

    उफ़ुक़ के किनारे पर फटे बादबान वाली क्षति जैसा चांद। हुआ का दस्त ख़ुनुक हातिम की पेशानी सहला रहा था गोया नरम उंगलियां नरम लम्स दे रही हूँ मुनक़्क़श सतून के साथ टेक लगाए हातिम की आँखों में नींद किसी तिलसमी तहय्युर की मानिंद थी। नुक़रई कटोरा में मुअत्तर आब ख़ुनुक पीता रहा मगर सुकून ना-आश्ना रहा। ये गर्मी की तिश्नगी है या तिश्नगी की गर्मी? अपना सीना आतिश-फ़िशाँ का सीना महसूस हो रहा था मगर इस फ़र्क़ के साथ कि आतिश-फ़िशाँ की आग और धुआँ नज़र भी आता है।

    हातिम ने बेबसी से सोचा ये मुझे क्या होता जा रहा है। वो ये सोच कर लरज़ गया कि कहीं अनजाने में वो किसी नादीदा तिलसम का असीर तो नहीं हो गया। गर्म ख़ून और तने अज़लात वाला जिस्म जैसे बतदरीज पत्थर में तबदील होता जा रहा था। तो क्या हरकत-ओ-अमल की ज़िंदा तस्वीर और मुहिम जो महिज़ पत्थर का मुजस्समा बन कर रह जाएगा?

    उसने ख़ुद को झिंझोड़ कर वस्वसों के भंवर में मज़ीद डूबने से बचाने की सई की।

    अगरचे कामयाब मुहिम की वजह से इस का क़लब तमानीयत से यूं मामूर था जैसे पियाला शराब से।।। मगर सवाल का दरुस्त जवाब हासिल कर लेने के बाद, इनाम में जो आसाबी सरशारी मिलती थी इस मर्तबा ख़ुद को इस से महरूम पारहा था।

    गर्म सेना से सर्द आह निकली।

    कोह-ए-निदा की मुहिम का अहवाल सुनने के बाद, जब शहज़ादी बाज़ू फैलाए, ख़ुद सुपुर्दगी के उस्लूब में, बे-नक़ाब हुई तो हातिम ने एक नज़र हुस्न पर डाली जो ख़ुद ही अपना मुहाफ़िज़ था। हातिम का दिल धड़का कि धड़कन भोला? एहसास ना था। नज़रें गिरें, उठें, ठिठकें, भटकें? ख़बर ना थी।।।

    ख़ाब था या ख़्याल था किया था?

    हातिम की नज़रों के सामने, महल का वो हिस्सा था जहां शहज़ादी और मुनीर शामी शब बाश थे। पर्दे गिराए जा चुके थे, मोमी शमएँ गुल की जा चुकी थीं। शबिस्तान नाज़ भेद भरी तारीकी में और हातिम की नज़रें नक़बज़न।

    मुनक़्क़श सतून से सर टिकाए वो ख़ाबीदा था या बेदार? इलम ना था। बस था। शायद वो भी ना था, उस का साया मुनक़्क़श सतून की परछाईऐं बन चुका था। कौन जाने?

    हातिम बिस्तर पर ढय् गया नींद गोया किसी तिलिस्मी-ग़ार में बंद थी जिसके बाहर, देव पलीद की सूरत में बख़्त-ए-ना-रसा पहरादार था। मगर वो इस पर क़ुव्वत देव को तसख़ीर करने वाली क़ुव्वत गंवा बैठा था।

    फ़ज्र की अज़ान के साथ उठ बैठा, सर्द पानी से वुज़ू किया तो शब-बेदारी की कसल मंदी में कमी महसूस की, ख़ुदा के हुज़ूर सरबसजूद हो कर दुआ मांगी। सुकून की ! तमानीयत की! तालिब अफ़व हुआ नाकर्दा गुनाह की ख़ाहिश से, बेलगाम सोच से। आवारा ख़्यालात से, फ़ासिद ख़ाहिशात से।शहज़ादी अब मुनीर शामी की हो चुकी है।

    लाहौल पढ़ कर शैतान मलऊन को दूर किया मगर वो मलऊन तो गोया ख़ून की गर्दिश में शामिल हो गया था, रगों में दौड़ता नारे लगा रहा था।

    अहमक़ हातिम! अहमक़ हातिम!

    हातिम सजदा हाय सहव कर रहा था। शैतान के ताने सुने बग़ैर!

    पर ताय्युश ज़ीनत हातिम को ख़ुश ना आरही थी!

    ख़ुशगुलू मुग़न्निया की मौसीक़ी बहरे कानों की तान साबित हुई, दारोगा, मतबख़ अन्वा-ओ-इक़साम के लज़ीज़ खाने तैयार करता, मुअद्दब कनीज़ें, वसीअ दुस्तर ख़वान पर, चांदी के बासीनों में ख़ुश-रंग और ख़ुश-ज़ाएक़ा पकवान चुन देतीं मगर हातिम ख़ुश-दिल्ली से ना खा पाता, चंद नवाले बेदिली से लेता और ज़ायक़ा का एहसास किए बग़ैर चबाता जाता।दस्त सुबुक वाली बांदियां, आब ख़ुनुक-ओ-मुअत्तर से ग़ुसल करातीं, मश्शाक़ी उंगलीयों से गुदगुदी करतीं मगर ठंडे पिंडे में हरारत ना पैदा कर पातीं, जिस पर वो ख़ुद भी हैरत-ज़दा थीं। जब देखा आब ख़ुनुक महिज़ मुअत्तर पानी ही साबित हो रहा है तो पानी में ओवया-ए-मिला कर ग़ुसल शुरू कर दिया मगर हातिम का बुत फिर भी ठंडा ही रहा।

    रात को अंगारों भरे बिस्तर पर, कबाब सीख़ की मानिंद करवटें बदलता, पहलू पे पहलू बदलता!

    मुनीर शामी शबिस्तान नाज़ से बरामद ना हुआ कि आकर हातिम का हाल दरयाफ़त करता।

    वो वहशत-ज़दा से महल से निकल जाता। जंगल की राह लेता जहां ख़िराम हुआ से शजर कलाम करते। हातिम वीरानों में सुकून का गुमशुदा दफ़ीना तलाश करता, मगर अफ़सोस हासिल का!

    मुहिम्मात सर करने वाले हातिम को अपना जिस्म किसी तिलसमी जाल में फंसी मुर्दा मछली जैसा महसूस होता, सख़्त कोष हातिम आराम की ज़िंदगी से तंग आचुका था।जब करने को कुछ ना रहा तो ज़िंदगी से अचम्भा ख़त्म हो गया। नादीदा ख़तरात में तहय्युर था जो महल की ज़िंदगी में उनका हो गया। ना जिन भूत, ना परियाँ और पछल पाईआं, ना तिलसम के कारख़ाने और जादू के शल्य, ना माफ़ौक़-उल-फ़ित्रत मख़लूक़ात ना ख़ारिक़-ए-आदात वाक़ियात। सूरज ने वक़्त पर तलूअ होना है, उतनी कन्ट्री पर खाना इतनी घड़ीयों बाद रात की आमद और फिर मानूस कमरा में मानूस बिस्तर। ख़्वाब-ए-राहत की लज़्ज़त से आरी! शायद ये सब ग़ैर मुरई क़फ़स में क़ैद किया जा चुका है।

    या मज़्हरुल अजाइब!

    वो बे किसी से सोचता। क्या रोय आलम से हुस्न-ए-जहाँ सोज़ की हामिल शहज़ादीयाँ रुख़स्त हो गईं कि मुनीर शामियों ने शेवा-ए-इश्क़ तर्क किया?हातिम तो हाज़िर था मगर मुतजस्सिस ज़हन वाली कोई शहज़ादी ना थी जो सवालात के जवाबात की मुतलाशी होती। शर्त वस्ल ना सही जज़बा तजस्सुस की तसकीन की ख़ातिर, ज़ौक़ तहक़ीक़ की तश्फ़ी के लिए !

    हातिम हिरासाँ हो कर सोचता जब ज़िंदगी में से सवालात ख़त्म होजाएं तो करने को क्या रह जाता है। ये सवाल ही तो है जो ज़हन को बेदार, रूह को मुख़्बिर और बशर को सरगर्म अमल रखता है, सवाल के बग़ैर ज़िंदगी ख़ाली बर्तन में तबदील होजाती है।

    हातिम की ज़िंदगी सवालात के जवाबात की तलाश में गुज़री थी लिहाज़ा सवालात के बग़ैर ज़िंदगी बे-मक़्सद महसूस हो रही थी और फिर सवालों का एक सवाल। ना जाने अब शहज़ादियों को सवाल की हाजत क्यों नहीं महसूस होती? क्या वाक़ई वो इतनी दानिशमंद हो गई हैं कि हर सवाल का जवाब जान चुकी हैं? और सरा-ए-इश्क़ में ख़ाक उड़ाने वाले मुनीर शामी कहाँ गुम हो गए?

    अब हातिम क्या करे? सवालात से ज़िंदगी मशरूत थी, अब बिना सवाल वो कैसे ज़ीस्त करे?

    बैज़वी क़ता का आईना जली उसे गुरेज़ां उम्र का एहसास कराता और फिर सवाल करता। ऐसा सवाल जिसका जवाब हातिम के पास ना था कि ये सवाल उम्र-ए-राएगाँ के बारे में नहीं बल्कि मुस्तक़बिल के बारे में था।

    चंदे यही लील-ओ-निहार रहे तो मैं सेहत मंद से मरीज़ हातिम में तबदील होजाऊंगा। उसे वो शहज़ादा याद आरहा था जो ममनूआ खोंट में आबाद शहर-ए-संग में, पीछे मुड़ कर देखने की पादाश में पत्थर के मुजस्समा में तबदील हो गया था और हातिम भी ख़ुद को पथरीला महसूस कर रहा था। गो जिस्म पत्थर का ना था मगर आसाब-ओ-एहसासात का बोझल-पन संगी ही था।

    वक़्त ग़ुसल क्योंकि कनीज़ों के गुदगुदाते हाथ जल में ज्वाला जगाने में नाकाम रहे थे इसलिए तंग आकर उन्होंने उसे पथरीली नज़रों से ग़ुसल कराना शुरू कर दिया मगर ख़ुद में गुम हातिम को तो अपनी सुध-बुध ना थी कनीज़ों की नज़रों की संगसारी ने इस पर किया असर करना था।

    हातिम आलिम बदमज़गी मैं, ख़ुद को बहलाने के लिए, दार-उल-हकूमत की सैर को निकल गया, यूंही दिल-ए-गिरफ़्ता सा कूचा-ओ-बाज़ार में बे-मक़्सद घूमता ना देखने वाली आँखों से अफ़राद इश्याय को तका किया और चलता गया तकान के हथौड़े से जिस्म के पत्थर तोड़ने के लिए, दार-उल-हकूमत में सब उसे पहचानते थे लिहाज़ा एहतिरामन रास्ता छोड़कर ताज़ीम देते मगर वो यूँही बे-ख़याली में सर हिला देता,नरम कूल्हों और सख़्त छातीयों वाली ज़न ना-हंजार ने मअनी उस्लूब में खांस कर अपनी जानिब मुतवज्जा करना चाहा मगर हातिम गोया नाबीना हो चुका था।

    बे-मक़्सद चलते चलते उसने ख़ुद को कारवां सराय के सामने पाया जहां अतराफ़-ओ-जवानिब के तजार और सय्याह दूरो नज़दीक के क़ियाम पज़ीर थे, सब के जुदा-जुदा लिबास और जद्दी जद्दी बोलियाँ। ऊंट, घोड़े, ख़च्चर, गधे, ग़ुलाम, मर्दों का अंबोह कसीर, हातिम यूँही देखता रहा, किसी ख़ास शैय या चेहरा पर नज़रें डाले बग़ैर!

    मुतह्हर हातिम ठिठका।।। या मज़्हरुल अजाइब! किया जानवर? इन्सान नहीं मगर इन्सान से मशाबहा, पिचके गालों और अंदर धंसी ज़र्द आँखों के बाइस वो ख़ास्सा मुअम्मर दिखाई दे रहा था। जिस मर्द के कंधे पर दम लटकाए बैठा था वो भी निराली वज़ा का स्याह तन ऊपर तक ब्रहना,मुंडे सर पर बालों की छोटी सी चोटी लटक रही थी, बालों से ख़ाली स्याह सेना पर सफ़ैद धागा लिपटा, मुंडे सर के नीचे पिचके गालों पर गोया चमड़ा मढ़ दिया गया हो, बारीक लबों पर, नीचे को लटकी मूँछें, सूखे बाज़ुओं पर रगों का जाल और मुरझाए हाथों के आरपार देखा जा सके। पांव में लक्कड़ी की अजब वज़ा की जूती। स्याह माथे पर तीन सफ़ैद लकीरें! हातिम उस की जानिब लपका और अपनाईयत से हाथ थाम कर उस का अहवाल दरयाफ़त किया। हातिम ने जैसे ही उसे छुवा उसे अंदाज़ा हो गया कि ये कोई मामूली इन्सान नहीं और जब उसने हातिम की आँखों में आँखें डाल कर देखा तो उनकी आग की ताब ना लासका। एक दम लरज़ कर हाथ छोड़ दिया।

    हुस्न-ए-इत्तिफ़ाक़ से वो मर्द हातिम की ज़बान समझ सकता था लिहाज़ा दोनों में गुफ़्तगु शुरू हो गई वो बता रहा था।

    यहां से कई सौ सूरज और कई सौ चांद की मुसाफ़त पर मेरा देस है। अहल-ए-दुनिया इसे हिन्दोस्तान के नाम से पुकारते हैं।

    हातिम ने इस मुल्क का नाम ना सुना था मारे इश्तियाक़ के बोला कुछ और बताओ उस के बारे में।

    वो बोला मेरा देस इतना बड़ा है कि चलते चले जाओ, चलते जाओ, मैदानों और सहराओं में से चलते जाओ, दरिया उबूर करते जाओ पर्बत चढ़े जाओ मगर मलिक ख़त्म ना होगा, हमारा पवित्र दरिया गंगा है जो हमारे महान देवता विष्णु की जटाओं से निकला है इस के किनारे बड़े बड़े तीर्थ हैं। गंगा जब पहाड़ों से मैदानों में उतरती है तो दो हिस्सों में बट जाती है और एक गंगा और एक मंदाकिनी। मैं मंदाकिनी के किनारे, एक मठ में, अपने गुरु के साथ रहता हूँ। ज्ञान ध्यान और पूजा पाठ में मगन रहता हूँ ये मेरे कंधे पर जो जनावर है और जो तुझ अजनबी को देख कर ख़ामोश हो गया, मेरा संगी है, अगरचे लोग उसे बंदर कहते हैं मगर हमारे लिए ये देवता महान है। जय बजरंग बली!

    तब हातिम ने जाना ये मर्द बुतपरस्त है। हातिम ने सवालात की मुहिम्मात के सिलसिला में दुनिया देखी थी हर वज़ा के लोगों से मिला था और ये जान लिया था कि तमाम दुनिया वैसी नहीं जैसी के हम आदी होते हैं। दुनिया का तनव्वो ग़ैर मानूस इश्याय तहय्युर ख़ेज़ वाक़ियात और अजनबी अफ़राद से मामूर है। बल्कि इसी में इस का अपनापन मशहूर है लिहाज़ा अफ़राद, वुक़ूआत, इश्याय, अजाइबात को अपनी फ़हम की रोशनी में देखने की बजाय, उन्हें उनकी असल सिम्त तस्लीम कर के क़बूल कर के, समझना चाहे, सौ बुतपरस्ती की वजह से नफ़ूर ना हुआ। एहतिराम से हाथ थाम कर गोया हुआ।

    मेरे मेहमान बन कर चंदाँ ग़रीबख़ाना पर क़ियाम फ़रमाओ सफ़र की कुलफ़त दूर करो, मुझे ख़िदमत का मौक़ा दो और जब तक जी चाहे दिलजमई से क़ियाम करो।

    उसने कुछ ताम्मुल के बाद हातिम की दरख़ास्त क़बूल करली, हातिम ख़ुश ख़ुश उसे ले आया। हर-दम उस की ख़िदमत में मुस्तइद रहता और इस से इस के अजीब-ओ-ग़रीब मलिक के बारे में सवालात करता रहता कमाल है! एक दिन हातिम ने अजब एहसास से सोचा, में कि सवालात के जवाबात तलाश करता था, आज ख़ुद सवालात कर रहा हूँ। तो क्या मेरी ज़िंदगी सवालात से मशरूत हो चुकी है? मैं सवालों के जवाब तलाश करता हूँ या फिर जवाबात के लिए सवालात!

    हातिम ख़ुश था कि अब वो पज़मुर्दगी, बेज़ारी, इज़मिहलाल आसाबी थकन, दरूँ बैन, मायूसी और दिल शिकस्तगी के हुजरा-ए-हफ़्त बाद से बच निकला था।

    एक रात दोनों, ज़िंदगी, उस की हक़ीक़त और एहमीयत के बारे में गुफ़्तगु कर रहे थे, हातिम ने सवाल किया।

    तुम्हारे मुर्शिद ने ज़िंदगी के बारे में क्या बताया है।

    वो बोला सन हातिम! ये गुप्त विद्या है, बड़े बड़े बध्धी मानूँ और वददानों नून उसे समझने के लिए उमरें बतादें मगर इस सागर का और छोर ना पा सके लेकिन हातिम! तो सवाल करता है और इसी लिए तो अच्छा लगता है कि तो भी विद्यार्थी है तो शिक्षा चाहता है, तो समझना और जानना चाहता है और यही एक सच्चे शिक्षक का करतबे होना चाहिए।

    हातिम ने इनकिसारी से सर झुका कर कहा ज़िंदगी मुख़्तसर और सवालात बहुत ज़्यादा हैं।

    हिन्दुस्तानी ने उंगली उठा कर तसदीक़ की फिर बोला।

    मैं कल विद्या तो नहीं दे सकता अलबत्ता तुझे उस के कुछ रंग बताता हूँ। हमारे गुण दानों ने जीवन की भाव नाँव के लिए रस विद्या दी है।

    और रस किया है? हातिम ने सवाल किया।

    प्रतिष् और इस्त्री की भाव नाँव को नौरिसों में बांट दिया है।

    और वो नो।।।।?

    वो हैं हिन्दुस्तानी उसे समझा रहा था, अजब अलफ़ाज़, अजब मफ़हूम सन हातिम! वो हैं शर नग़ारा (मुहब्बत , जिन्स) शांति (सुकून) रो दर्रा (ग़ुस्सा) वीरा (शुजाअत) ओभाशा (इस्तिजाब) हंसिया (मज़ाह) करूणा (रहमदिली) भया निका (ख़ौफ़) और र्द्ध भूता (तहय्युर ख़ेज़ी)।

    हातिम की पेशानी पर सोच की गहिरी लकीरें।

    वो बता रहा थाआकाश और प्रकाश, पृथ्वी और प्राकृति बीच जो अनेक रंग दिखाई देते हैं, सब इसी कारन हैं, उनसे बाहर कुछ नहीं।

    और अगर होतो।।।।?

    माया है।

    हातिम कुछ देर तक सर झुकाए इस गुण दानों की बातों पर ग़ौर करता रहा, फिर सवाल किया ये रस और उनके नवरूप मगर उनका कोई मर्कज़ या बुनियाद भी तो होगी वो किया है?

    हिन्दुस्तानी ने तौसीफ़ी नज़रों से देखते हुए कहा जय हो! तो वाक़ई बध्धी मान है, जिस सवाल तक पहुंचने में मुझे युग बीत गए तो चंद छिनों में वहां पहुंच गया।

    तारीफ़ से ख़ुश होने के बजाय हातिम संजीदा नज़र रहा था।

    हिन्दुस्तानी ने सर झुका लिया, उस के टकले सर पर पसीना की बूँदें चमक रही थीं, एक दो मर्तबा बेचैनी से सर की चोटी कूछवा, उस की आँखों में तशवीश थी या झिजक? वो ख़ौफ़ज़दा था कि हैजान ज़दा, हातिम उसे अजब नज़रों से तक रहाथा।

    हिन्दुस्तानी जब बोला तो बहुत ही धीमी आवाज़ में गोया हुआ, कहीं दूर से , सरगोशी आरही हो।

    मैं दबधे में हूँ। वो रुका गोया भागता सांस लेने को रुके बेहतर होता मैंने कुछ ना कहा होता ना तुमने कुछ सुना होता, अच्छा होता तेरे घर ना आता, बहुत ही अच्छा होता, में इस खोंट आया ही ना होता वो फिर रुका, गोया सेना में सांस भर कर ग़ोता लगाने को हो होनी हो कर रहती कैसी चिंता और कैसी दुबधा हातिम क़व्वास की जलती आँखें आसाब सुलगाती महसूस हो रही थीं वो कह रहा था।

    नहीं हातिम! मेरे गुरु ने मुझे बताया और मेरे गुरु को इस के गुरु ने बताया। ।। और मैं तुझे बता रहा हूँ असल ताक़त जीवन जल में है।

    हातिम ने ये नया लफ़्ज़ सुना बल्कि इस ग़ैर मुल्की से गुफ़्तगु के दौरान उसने बहुत से नए अलफ़ाज़ सुने थे, कुछ के मअनी बूझे तो कुछ के पूछे ये ।।। ये जीवन जल किया है।

    तुम्हारी भाषा में एक शब्द है आब-ए-हयात, जीवन देने वाला पानी, मृत्यू से मुक्त करने वाला।

    है तो, मगर उस का जीवन जल से किया ताल्लुक़?

    ग़ौर नहीं किया हातिम वो पुरजोश लहजा में बोला ग़ौर करो, हमारी भाषा में यही जीवन जल है।

    ओह! हातिम बोला, ये तो नई मुहिम शुरू हो गई।

    नहीं।

    क्यों नहीं।

    इसलिए कि हर जीव के पास जीवन जल है।

    मगर।।।।

    वो हातिम के कान के पास मुँह ले जा कर बोला जब पुरुष और इस्त्री भोग करते हैं तो दोनों बीच जो फ़व्वारा उछलता है वही जीवन जल है।

    वो हातिम की सुने बग़ैर अपनी धन में मस्त बोले जा रहा था यही जीवन जल मनिश को फिर जन्म देता है मगर औलाद की सूरत में। मरने के बाद तुम ज़िंदा रहोगे मगर अपनी संतान के रूप में। ये है जीवन जल, जीवन शक्ति का अटल कारन।।। इसलिए हम शीवलनग पूजते हैं।

    फिर नया लफ़्ज़-ए-मगर हातिम ने उसे ना टोका जो अपनी रो में बहे जा रहा था।

    जीवन की तरह ये ज्ञान ध्यान का भी कारन है, इस से कौन किस तरह का काम लेता है उसी से जीवन कत्था में रंग भरा जाता है यही तांत्रिक विद्या है। दोनों ख़ामोश थे , बार्ने हातिम से सवाल किया।

    मर्द दाना! ये बता, तेरी नसल मेरा मतलब तेरी संतान तो बहुत हो गई।

    वो फीकी हंसी हिंसा ये आख़िरी भेद है हातिम! ज्ञान ध्यान की डगर पर चलने वालों को ये सब त्याग करना पड़ता है।

    यानी।।।?

    ये अनमोल शक्ति यूँही इस्त्री पर ज़ाए नहीं की जा सकती, उस की रखशा करनी होती है।

    तो?

    हाँ! हातिम हम सबसे पहले उसी की बलि देते हैं।

    बाहर रात दबे-पाँव गुज़र रही थी। इंद्र ख़ामोशी की चादर में लिपटे वो दोनों ख़ामोश, आलती पालती मारे, अपने आप में गुम।

    तब हातिम के सेना से सर्द आह निकली। तो क्या मेरी ज़ीस्त कार-ए-ज़ियाँ में रायगां गई, उसने ख़ुद से आख़िरी सवाल किया।

    जवाब में हुआ ख़ामोश

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