खम्बा
रोचक तथ्य
" बिजली के महकमे वाले आराम बाग़ में एक खम्बा गाड़ कर लोगों के मीटर बाहर लाते हैं जिस पर मुहल्ले में खलबली मच जाती है।
अरे भाई ये इतना बड़ा सतून गाड़ने की भला क्या ज़रूरत पेश आई? एक अज़ाब डाल दिया है
ये नया मसला ऐसे पेश आया कि जब बिजली के महकमे वालों ने हिसाब लगाया तो उन को अपनी माहाना आमदनी में अच्छा-ख़ासा ख़सारा नज़र आया। उनको इस बात का पक्का यक़ीन था कि हमारा सारा मुहल्ला बिजली चोरी में मुलव्वस है । बिजली के मीटर घरों के अंदर थे सो उनका इरादा ये बना कि तमाम लोगों के मीटर इसी खम्बे पर नसब किए जाएँ। देखते देखते वहाँ अच्छा ख़ासा शहद का छत्ता सा बन गया जिस पर बिजली के मीटर बड़ी बड़ी शहद की मक्खीयों की मानिंद विर्द करती भिनभिना ने लगीं। इस खम्बे से अलबत्ता लोगों की आमद-ओ-रफ़्त में सख़्त मुश्किल पेश आने लगी।
हमारा मुहल्ला आराम बाग़ में एम-ए जिनाह रोड के आस-पास है और एक ज़िमनी बात बताता चलूँ ये नाम का आराम बाग़ है, आराम वग़ैरा यहाँ नापैद है। मत पूछिए साहब यहाँ तजाविज़ात की भर मार है आए दिन हुकूमत की धमकीयाँ और इस से लोगों में तनाव की कफ़ियत रहती है, जीना मुहाल हो गया है।
बिजली चोरी जो मैंने देखी है इस से मुझे अपने बचपन की एक बात याद है । उस ज़माने में बिजली के मीटर काले रंग के हुआ करते थे और उनमें एक पहिया मुसलसल चक्कर खाता रहता था जिसमें एक सुर्ख़ कमान नुमा निशान होता था। बिल्क़ीस ख़ाला को इस से बड़ी चिड़ थी और वो कहती होती थीं।
अरे देखियो ये पहिया जो मोई चक्की की तरह चल रिया है उसे तो देखो ज़रा। सारी बत्तियाँ गुल कर दी हैं मैंने लेकिन ये है चक्कर पे चक्कर खाए जा रिया है और मेरे सीने पर मूंग दल रिया है, कुछ कीजो उस का।
ख़ालू सबसे पहले तो बिजली वालों के दफ़्तर गए और उनका एक आदमी भी आया जिसने अपनी दबीज़ ऐनकों के पीछे से इस चक्कर खाते पहीए का बग़ौर मुशाहिद किया, फिर अपना सर खुजाया और दुबारा कुछ सोच कर एक पतले पलास नुमा औज़ार से इस सेल का तार कतर दिया जो इस बात की ज़मानत थी कि मीटर को किसी ने नहीं छेड़ा था।
मीटर खोल कर उसने एक मुहद्दिब उदसे से पहिये को दुबारा देखा और फिर एक बारीक पेचकस से कुछ डीबरयाँ हिलाने की कोशिश कीं लेकिन वो टस से मस ना हुईं। आख़िर में नाउम्मीदी से सर हिलाते अपने रजिस्टर में कुछ लिखा और नफ़ी में सर हिलाया।
लगता ये है कि इस के पेच घिस गए हैं । मै इस को आहिस्ता यानी उस के असल रफ़्तार पर नहीं ला सकता
तो अब उस का क्या ईलाज हो?
हूँ, मै नया मीटर लगवा सकता हूँ
और ये मुआ नया मीटर कितने का आएगा
कमरे में पर्दे के पीछे से बिल्क़ीस ख़ाला ने बड़बड़ाती आवाज़ में कराहत से कहा।
नहीं मुहतरमा मीटर हम लगा के देंगे, अपनी जेब से, यानी ये महकमे की ज़िम्मेदारी है । आपको अपनी तरफ़ से कुछ भी नहीं भरना होगा। ये देखें मैंने नोट कर लिया है कि इस के पेच घिस गए हैं या शायद गरारी के दांत टूट गए हैं, बस चंद ही दिनों की बात है
तीन दिन बाद नया मीटर लग गया और वाक़ई बड़ी गरारी की रफ़्तार अब बहुत आहिस्ता थी या यूँ कहीए मुनासिब थी।ख़ाला ने सर हिलाते और मुट्ठीयाँ भींचते हुए नए मीटर का बग़ौर मुशाहिदा किया।
हूँ तो इस का मतलब ये हुआ कि पिछले दो तीन सालों से हमने दुगना या तिगुना बिल भरा है।
रहने दो बिल्क़ीस बेगम अब उस का क्या करें, आक़िबत में काम आएगा।
आक़िबत वाकबत को छोड़ें आप। किसी तरीक़े से इस को मज़ीद अहिस्ता करीए, आपने सुना नहीं वो मुआ बिजली वाला कह रिया था कि इस के अंदर गरारी या मुआ पेच सा होता है। अब वो तो था नगोड़ा पुराना मीटर , जिसकी पेच घिस चुकी थी लेकिन ये तो नया है। कोई तरीक़ा ऐसा करीए कि बस ये मुआ आहिस्ता हो जाएगी। मुझे तो तब ही चैन की नींद आए।
आपने शायद ये नहीं देखा कि ये काम एक बारीक पेचकस से होता है और वो तो ख़ैर कहीं से दस्तयाब हो ही जायेगा लेकिन इस धात की बनी तार का क्या करूँ? ये सेल तोडूँगा तो अगले महीने जब वो साला मीटर रीडिंग वाला आए गा तो उस को तो साफ़ पता चल जाएगा और धर लिए जायेगे।। हम दोनों।।। जेल भी हो सकती है।
ख़ाला ने क़रीब जा कर नए चमकते मीटर का मुशाहिदा किया जो रंग में काला था और तक़ाबुल की किसी दर्जे में एक संदूक़ की तरह था। उस के दोनों पट्टों को जोड़ने के लिए दो होंट नुमा उभार थे जिसके दरमयान चांदी की तरह चमकती एक तार थी जिसको ताव दिया गया था और फिर इस पर सीसे की सेल लगा दी गई थी।
मुझे कुछ नहीं पता, मुझे तो अपने पैसे वापिस चाहिए।
नाज़िम ख़ालू ने लांढी में एक दोस्त से पूछा तो उसने कहा
अरे ये भी कोई बात है परेशानी की?
फिर उसने मीटर के दाहिनी तरफ़ वाली दर्ज़ से ऐक्सरे फ़िल्म की एक पत्री ।।तीर नुमा।।काट कर ऐसे घिसा दी की कि वो फिसल कर पहीए को छूने लगी और पहिया रुक रुक कर चलने लगा।
जब मीटर वाला आए तो आप पत्री निकाल दीजिएगा। उधर वो रीडिंग ले और घर से निकले उधर आप ये पत्री दुबारा घिसा दीजिएगा
ये सब ठीक था और एक तरह से मुआमला हल हो गया। इस में अलबत्ता एक क़बाहत थी और वो ये कि इस बात का ख़्याल रखना पड़ता था कि दिन में कुछ घंटे मीटर बग़ैर पत्री के रहे वर्ना अगर मीटर पैहम मद्धम चलता रहे तो ख़ुदा-न-ख़्वास्ता उनको शक भी हो सकता था। । बेईमान होना अलग बात है और किसी का बईमान साबित होना बिल्कुल ही अलग बात है।
जब ये मसला हल हुआ तो अब हिसाब की बारी आई और ये कहना ख़ासा मुश्किल था कि महकमे ने उनसे कितने पैसे आहिस्ता मीटर की मद में ऐठे थे। उसे कोई बिजली चोरी कहे या बरामदगी माल लेकिन कुछ हिसाब जोड़ कर ख़ालू ने ये तख़मीना ज़रूर लगाया कि अगर साढे़ एक सौ इकत्तीस दिन मीटर इसी आहिस्ता रविश पर चले तो उनके तीन सालों का हिसाब महकमे से वापिस वसूल हो जाएगी। होते होते साढे़ एक सौ इकतीसवाँ दिन आ गया।
अब बस। हमारा हिसाब उनके साथ बराबर हो गया मेरा ख़्याल है इस छुपन छुपाई को अब ख़त्म होना चाहीए।
लेकिन ये छुपन छुपाई ख़त्म ना हो सकी। वो इसलिए कि जो पैसे उस हीले से बचत क़रार पाए वो दूसरे कामों में इस्तिमाल होना शुरू हो गए थे और अगर अब इस मीज़ान के तवाज़ुन को छेड़ते तो अपना पेट काटने वाली बात होती। फिर इस बात पर फ़ैसला हुआ कि आमदनी और ख़र्च के इस निसबत को इसी सूरत बरक़रार रखा जाये और पत्री को फ़िलहाल ना छेड़ा जाये और अगर कुछ पैसे बच जाते हैं तो वो सदक़े में दिए जाएं। ज़बानी कलामी दूसरी बात लेकिन घर में आक़िबत सानवी हैसियत की हामिल थी।
इस क़िस्म की बिजली चोरी अलबत्ता नए डीजीटल मीटरों में मुम्किन ही ना थी लेकिन फिर भी बिजली के महकमे वालों का इसरार था कि तमाम मीटर बाहर आएँगे ।इस में एक फ़ायदा था और वो ये कि घरों में ख्वातीन का पर्दा क़ायम रहेगा क्योंकि कोई पराया मर्द घरों के अंदर जा कर रीडिंग नहीं लेगा, लेकिन बस सिर्फ यही फ़ायदा था।
इस भद्दे और बेहंगम सतून नुमा खम्बे से लोगों को कोफ़त हुई और अमीन भाई जिनकी बग़ैर बत्ती की मोटर साइकिल पिछली रात इस से टकराई थी ख़ासे नाराज़ थे। अगली शाम उस के बेटे ने अपने कम्पुटर से कुछ इश्तिहार छापे और पूरे मुहल्ले में बांट दिए। उस रात जव्वाद भाई के घर एक मीटिंग बुलाई गई।
हमें ये खम्बा यहाँ से हर सूरत हटाना होगा।
ये सुना तो ज़ुबैरी साहब उठ खड़े हुए और बिना एक लफ़्ज़ कहे अपने बेटे को आँखों ही आँखों में इशारा किया और वो दोनों घर से निकल गए। उनकी देखा देखी तीन और आदमी भी वहाँ से खिसक गए।
नवेद भाई तनी भंवें और मुक्के बना बना कर बोले।
ये कोई बड़ा मसला नहीं। मेरा लौंडा अभी सुहराब गोठ से अपने दोस्तों को बुलाता है और कल तक इस खम्बे को उखाड़ देता है, इस में कोई मुश्किल नहीं ।। एक घंटे का काम है बस।
नहीं नहीं नवेद भाई इस तरह तो काफ़ी मसला हो जाएगा । याद नहीं ग़फ़्फ़ार भाई ने अपने घर के सामने स्पीड ब्रेकर बनाई थी जिस पर बलदीए वाले ख़ासे ब्रहम हुए और उन्होंने इस को गै़रक़ानूनी तजावुज़ात का नाम देकर ना सिर्फ हटवाया बल्कि उनको अच्छा-ख़ासा जुर्माना भी भरना पड़ा । याद करें पुलिस भी दरमयान में आई थी।। ये तरीक़ा ठीक नहीं।।आप उनसे लड़ नहीं सकते।। आख़िर को ये कोई राह चलते ठग नहीं , हुकूमत की पुश्तपनाही हासिल है उनको।
तौफ़ीक़ भाई ने इंतिहाई भारी आवाज़ में हद दर्जा आहिस्तगी से उन्हें समझाया।इस से कुछ ग़ैर यक़ीनी सूरत-ए-हाल पैदा हुई।
हाँ नवेद आप भाई ठीक ही कहते हैं उखाड़ना मुश्किल काम तो नहीं लेकिन ये भी देखें तौफ़ीक़ भाई की बात भी ग़लत नहीं। पुलिस का मसला ज़रूर पैदा होगा क्योंकि नज़र ये आता है कि शायद सरकारी खम्बा इस तरह उखाड़ना गै़रक़ानूनी काम है। मेरी सलाह है कोई मुतबादिल तरीक़ा निकालें।।बिच का।। जो काबिल-ए-क़बूल हो।
अपने ख़िलाफ़ राय यूँ उभरती देखी तो नवेद भाई उठकर खड़े हो गए , लरज़ने लगे और उनका चेहरा ग़ुस्से से तमतमाने लगा।
फिर ये खम्बा ज़रूर हटा। मुझे समझ नहीं आती आप लोगों में अमल की इतनी कमी क्यों है कि महज़ इस इमकान के मुताल्लिक़ सोचते हुए कि पुलिस कूद पड़ेगी, आप पर मिर्गी के दौरे शुरू हो जाते हैं । अरे देख लेंगे साली पुलिस को ,बलदिया को और बिजली के महकमे को, ऐसी की तैसी। । एक बात ये भी बताएं अगर क़ानून की उतनी ही पासदारी करनी है तो हम में से जो बिजली चोरी करता है वो बिजली चोरी बंद क्यों नहीं करता? ।
नोमान भाई बीच में आ गए और कहा।
नवेद भाई आप ख़ाह मख़ाह हस्सास हो रहे हैं ये मुआमला बिजली के महकमे का नहीं हुकूमती अमल-दारी का है। आप क्या समझते हैं कि ज़ोर ज़बरदस्ती से हम पूरे कराची को यरग़माल बना लेंगे ? मुफ़्त की बिजली के मज़े लूटेंगे? सरकारी इमलाक को नुक़्सान पहुंचाना बहरहाल एक गै़रक़ानूनी और ग़लत तर्ज़-ए-अमल है।
आपके घर एक मोटी एअर कंडीशन की तार सीधी खम्बे से गई है तो मेरी बात तो होगी ही ग़ैर क़ानूनी। ख़ैर मेरा तास्सुर ये है कि आप में से किसी में भी दम-ख़म नहीं।। में चला । ।जब आप कोई हल निकाल लें तो मुझे इत्तिला दे दीजिएगा लेकिन याद रखें लातों के भूत बातों से नहीं मानते।
जाफ़री साहब जो हम में सबसे अधेड़ उम्र वाले थे और सख़्त माज़ी-परस्त क़िस्म के आदमी थे होंठ काटने लगे।
ये मुआमले वहाँ नहीं थे भाई । वहाँ तो शाइस्ता और सुलझे हुए लोग थे।। अलेक् सलेक वाले।। ईद अज़ादारी साथ मिलकर मनाने वाले।। यहाँ आकर ये मसाइल झेलने पड़ रहे हैं।। दस दस ईदें हो रहीं हैं ।।आवे का आवाह बिगड़ा हुआ है।।कोई सुनता ही नहीं।”
क़िबला जाफ़री साहब आप भी बस पुरानी बातों को ले बैठे ।हमारे सामने एक खम्बे का मसला है ।। आज का मसला।। दो हज़ार एक का।। एक आप हैं कि अभी तक सन सैतालिस को रो रहे हैं।
बेहस जारी रही और आख़िर में इस बात पर इत्तिफ़ाक़ हुआ कि हम में से तीन लोग बिजली के महकमे में जाऐंगे और उनसे दर्ख्वास्त करें कि खम्बे को रास्ते से हटाईं जाए।
बिजली के महकमे वाला आदमी इंतिहाई मुअम्मर था। उसने अपने बोसीदा वास्कट की जेब में एक छोटा और चौकोर सा रेडीयो रखा हुआ था जिससे हल्की सुरमई रंग की दो तारें पेच खाते निकल कर उस के दाहने कान में घुस रही थीं ।इस मशीनरी से इस्तेफ़ादे के बावजूद वो समाअत से तक़रीबन आरी था। जब हमने काफ़ी कोशिश करके देख लिया कि जब तक हम चीख़ कर आसमान सर पर ना उठा लें वो नहीं सुनता तो अब्बास भाई ने अंदाज़ा लगाया।
मेरा ख़्याल है इस आले की बैटरियाँ ढल गईं हैं।
फिर उसने , इस से पहले कि वो मुअम्मर आदमी, जिनका नाम या तख़ल्लुस उम्मीद था , कुछ समझता, उस की जेब से रेडीयो निकाल कर मदारी के से अंदाज़ में फुर्ती से उस की बैटरियाँ झटक कर निकाल लें और दो सानियों में उसे दाँतों से चबा कर और फिर दोनों हथेलियों में रगड़ रगड़ कर गर्म कीं और उसी चाबुकदसती से जब दुबारा इस चौकोर रेडीयो में डालें तो इस आदमी को सुनाई देने लगा।अब्बास भाई ने फ़ातिहाना अंदाज़ में मेरी तरफ़ देखा।
बैट्रीयों के अंदर बर्क़ी मसालिहा होता है और वो चबाने से ताज़ा हो जाता है और नर्दी बैटरियाँ फ़आल हो जाती हैं।”
मुझे नहीं इल्म कि उनके करतब के पीछे कौनसी साईंसी वजह थी लेकिन जब हमने अपना मसला दुबारा उम्मीद साहब के सामने रखा तो उसने एक लंबी सांस भरी।
यहाँ मसला पेचीदा है और इस के अंदर दो गहराइयाँ हैं। पहली तो ये है कि इस बात में शक नहीं कि यहाँ बिजली की चोरी होती है और ये बात आला सतह के इजलास में तै हो चुकी है कि तमाम आराम बाग़ के मीटर अब बाहर आएँगे । दूसरी बात खम्बे का मुतबादिल तरीक़ा ढूंढना है और असल मुश्किल यहाँ है।। आप सादा अलफ़ाज़ में ऐसा समझें कि खम्बे पर सरकार का ख़र्चा आया है और अब इस को उखाड़ने पर भी ख़र्चा आएगा।
फिर उसने मेरी जेब में क़लम की तरफ़ देखा जिस पर यू बी -ई लिखा हुआ था।
आप क्या काम करते हैं? ।
मैं बैंक में मुलाज़िम हूँ, लेकिन उस का इस बात से किया ताल्लुक़? ।
देखें साहब अव्वल तो ये बात नामुमकिन है कि महकमा खम्बा उखाड़ के ले जाएगा क्योंकि इस में वक़्त लगेगा, दरख़ास्तें दीनी पड़ेंगी। चलें अगर हम तमाम महकमाना कार्रवाई को , जो उमूमन दस महीने चलती है किसी मफ़रुज़े के तहत दो दिन शुमार करलें और बिल-फ़र्ज़ महकमा ये दरख़ास्त मान भी जाये फिर भी मीटरों के लिए मुतबादिल जगह तो चाहीए।
ये कहते हुए उसने फ़ाइलों के एक अंबार की तरफ़ इशारा किया।
ये दरख़ास्तें देख रहीं हैं आप? एक एक दरख़ास्त को छांट कर देखने में महीने लगते हैं।
फिर उसने एक नक़्शे की तरफ़ इशारा किया।
इस गली में नुक्कड़ वाली दुकान के ऊपर हम सारे मीटर लगा सकते हैं, यूं खम्बा बीच से हट जाएगा , साँप भी मर जाएगा
और लाठी भी नहीं टूटेगी।
अब्बास भाई ने लुक़मा दिया।
दो दिन के मफ़रुज़े वाली बात हमें बाद में समझ आई।असल में मुझे बैंक का मैनेजर समझ कर उम्मीद साहब मुझसे कुछ कर्जे़ और बाक़ी सबसे कुछ रिश्वत की उम्मीद लगा बैठे। हमने उनको साफ़ इनकार तो नहीं किया लेकिन घर चले आए ताकि इस मसले पर अज़ सर-ए-नौ मश्वरा कर सकें।
जब हमने खम्बे के मुतबादिल मुक़ाम का ज़िक्र किया तो नुक्कड़ वाली दुकान , जो सईद भाई के लौंडे की थी और जिसमें उस के वीडीयो गेम का बिज़नस था, उन्होंने वहाँ बिजली के मीटर लगाने से साफ़ इनकार कर दिया।
मियाँ हम ग़ाज़ीआबाद के सादात हैं।।रिश्वत ना तो मेरे अज्दाद ने ली है और ना हम देंगे, मुझे इस मसले से बाहर ही समझें
आप उस को रिश्वत ही क्यों कहते हैं ?ये तो चाय पानी है।
वो ना माने और अपनी बात पर अड़े रहे। उनके टूटने के बाद ग्रुप में पंद्रह लोग रह गए । दो बंदों ने उनका उसूली मौक़िफ़ सराहा ज़रूर लेकिन इस मसले के हल में हमारे साथ शामिल रहे। हम सब सर जोड़ के बैठे रहे कि नक़वी साहब ने पान से लुथड़े हुए होंठों पर ज़बान फेरते हुए कहा
अरे उस की बातों में ना आइयो उस के लौंडे ने इतनी मोटी तार खम्बे से सीधी अपने दुकान में अड़सी हुई है, खम्बा हटेगा तो उस की रोज़ी रोटी का मसला बनेगा। बड़े पार्सा हैं जैसे हम जानते नहीं।। ग़ाज़ीआबाद के सादात हैं।।हूँ हर कोई उठकर सादात बना फिरता है
हमने नए ज़ावीए से पूरे मसले को देखा । उम्मीद साहब ने जो हल बताया था अब वो मुम्किन ना रहा और अगरचे एक तजवीज़ ये भी सामने आई कि कुछ रुपय जोड़ कर सईद भाई को दे दिए जाएं तो शायद।।।
मैं घर आया तो बीवी ने आड़े हाथों लिया।
ज़रूरत किया है इन मसअलों में उलझने की, मेरी एक बात कहीं लिख रखें ये लोग ये खम्बा नहीं हटाने लगे। मेरी सुनें इस सियासत से दो रहें तो बेहतर है।
कैसे नहीं हटाने लगे? हम कोई गै़रक़ानूनी बात थोड़ी कर रहे हैं, हमारा हक़ है ये
अगली शाम को मुराद भाई भी मीटिंग में आए जो मुक़ामी नाज़िम के चचेरे भाई थे। उन्होंने इस बेरबत ग्रुप में एक नई रूह फूंक दी
जद्द-ओ-जहद हमेशा एक ग्रुप ही से मुम्किन है।।अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता और इस ग्रुप का नाम होगा।।
वो रुक से गए जैसे नाम सोच रहे हूँ
कई लोगों ने नाम तजवीज़ किए जैसे; खंबा हटाव ग्रुप, तंज़ीम रह कुशाई, ऐन्टी खंबा वग़ैरा-ओ-वग़ैरा। उनमें से कोई भी नाम ऐसा उभर कर ना आया जिसके अंदर एक निराली जिहत हो लेकिन आख़िर-ए-कार रिज़वी साहिब के तजवीज़ करदा नाम पर सब में जैसे बिजली कौंदी तंज़ीम आराम। अब जब तंज़ीम वजूद में आगई और नाम पर भी इत्तिफ़ाक़ हो गया तो उस के लिए एक नारे का इंतिख़ाब भी ज़रूरी पाया । खंबा हटाव रास्ता खोलो , आराम बाग़ को आराम दो जैसे नारे ज़ेर-ए-बहस आए और आख़िर में खम्बे को हटाना होगा, आराम को बचाना होगा पर सब लोग मुत्तफ़िक़ हो गए
इस शाम जब मीटिंग ख़त्म हुई तो सब के दिलों में इतमीनान था कि अब हमारी जद्द-ओ-जहद रंग लाएगी और ये खंबा जो इस गली के सीने में एक ख़ंजर की तरह पैवस्त था अब वहां से हर हालत में हटेगा और मीटर घरों के अंदर आएँगे
अगली सुबह मुराद भाई दूसरे महलों से भी कुछ लोग ले आए जिसके देखा देखी हमारे मुहल्ले के कुछ लोग जो ग्रुप छोड़ के जा चुके थे ,दुबारा हमारे साथ शामिल हो गए। होते होते अगली शाम सौ से ऊपर लोग इस ग्रुप में आगए। सब हश्शाश बश्शाश , चेहरे जोश से तमतमा रहे थे
पहले मरहले में हमें इस खम्बे पर कुछ लिख कर चस्पाँ करना होगा
इस का क्या फ़ायदा होगा मुराद भाई?
फ़ायदा है। दुश्मन को ललकारना मतलूब है, बबानग दहल
मुराद भाई ने अपनी बात शुरू की तो सबने ख़ामोशी इख़तियार की
इस से मसले को उजागर करना होता है। दूसरे मरहले में हमें बिजली के महिकमे मैं ख़ुद जाना पड़ेगा, एक जलूस की शक्ल में लेकिन पुरअम्न, इंतिहाई पुरअम्न
जलूस भला कैसे पुरअम्न रह सकता है मुराद भाई दीढ़ सौ से ऊपर बंदा है , ला-मुहाला कुछ नाख़ुशगवार वाक़िया पेश आ सकता है और इस की ज़िम्मेदारी पता नहीं किस पर होगी। मेरा ख़्याल है इस पूरे हंगामे में पड़ने की बजाय, खम्बे को इस की जगह पर रहने देते हैं
लोगों में चह मेगोयां शुरू हुईं, कुछ ने ताईद और कुछ ने मुख़ालिफ़त की। मुआमले को यूं हाथ से निकलते देखकर मुराद भाई ने सबको ख़ामोश रहने का हुक्म दिया
ख़ामोश !आप लोगों को ये बातें अब याद आरही हैं, अब अमल का वक़्त है कि सिंध की हुकूमत को बताया जाये कि अवाम पर ज़ुलम और ना इंसाफ़ी ना क़बूल है। ये ठटा या सिखर नहीं आराम बाग़ है
मौलवी तासीर मदनी साहिब भी उनकी हिमायत में बोले
ये खंबा हटाना हमारे ऊपर वाजिब के दर्जे में आता है, ये दीनी हमीयत का तक़ाज़ा है
अगले दिन हमने एक जलूस की शक्ल में आराम बाग़ से चलना शुरू किया और बिजली के दफ़्तर जा पहुंचे। शुरू में उनको समझ नहीं आई और वो शायद कोई जनाज़ा या बारात समझ बैठे लेकिन जब हम उन के दफ़्तर के बिलकुल सामने खड़े हो गए तो उनका इंचार्ज बाहर आया और सिर्फ इतना कहा कि मेरा नाम बशीर अहमद है और फिर हमसे कुछ पूछना चाहा कि नारा बाज़ी शुरू हो गई
वो घबरा कर अंदर गया और पुलिस को फ़ोन किया कि मिलाकुंड के लोग सरकारी इमलाक को नुक़्सान पहुंचा रहे हैं। क़रीबी थानों से दो एक हवालदार और पंद्रह सोला कांस्टेबल शोर मचाती गाड़ीयों में आगए और हमारे और दफ़्तर के बीच रुकावटें खड़ी कीं। थोड़ी देर बाद कंधे पर चमकते सितारों वाला कोई मजाज़ अफ़्सर आया और मेगा फ़ोन से कहा
आप लोगों का ये इजतिमा गै़रक़ानूनी है और ये दहश्तगर्दी के ज़ुमरे में आता है। आप लोगों का लीडर मिलाकुंड में गिरफ़्तार हो चुका है। आप लोग यहाँ से हट जाएँ अभी
मुराद भाई को अभी तक इस पूरी सूरत-ए-हाल का जायज़ा ले रहे थे, ऊंची अवाज़ में बोले
हम मुक़ामी लोग हैं ।।हम कोई दंगा फ़साद नहीं चाहते, हमारी कुछ मांगें हैं जो हम वापडा के मजाज़ अफ़्सर के साथ मुज़ाकरात में सामने रखना चाहते हैं । हम यहाँ मसला हल करने आए हैं, लड़ने मारने नहीं आए हैं
मैं , मुराद भाई, अब्बास भाई और वीडीयो गेम वाले सईद भाई का लौंडा मुज़ाकरात के लिए अंदर गए। लंबी बेहस हुई और वहाँ खम्बे की असल वजह सामने आई जो वो नहीं थी जो हम समझ रहे थे। मुआमला ख़ुश-उस्लूबी के साथ तै पाया। खम्बा वहीं का वहीं रहा
बाहर आकर मुराद भाई ने एक लंबी तक़रीर की और वसीअ-तर क़ौमी मुफ़ाद की ख़ातिर की ख़ातिर जलूस से मुंतशिर होने की इस्तिदा की। इस के बाद हम वहां से रवाना हो गए। बाद में लाठी चार्ज हुआ , आँसू गैस के शैल चले या कुछ और लेकिन इतना ज़रूर पता चला कि कुछ लोग हस्पताल पहुंचे और कुछ थाने। हम अलबत्ता घर आगए
अगले हफ़्ते मुझे, मुराद भाई , अब्बास भाई और वीडीयो गेम की दुकान वाले को छोटे मक़नातीस लगे डिब्बे बिसमिल्लाह इलैक़्ट्रोनिक मार्कीट से दस्तयाब हुए जो मुराद भाई ने रात की तारीकी में खम्बे से लगे अपने, मेरे, अब्बास भाई और सईद भाई के मीटरों की अक़ब में महारत से चिपका दिए
अब सब ठीक चल रहा है
अगले हफ़्ते आराम बाग़ के दो और महलों में खम्बे गाड़ दिए गए और इसी शाम जमील भाई के घर मीटिंग बुलाई गई
Additional information available
Click on the INTERESTING button to view additional information associated with this sher.
About this sher
rare Unpublished content
This ghazal contains ashaar not published in the public domain. These are marked by a red line on the left.