शिकवा शिकायत

प्रेमचंद

शिकवा शिकायत

प्रेमचंद

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    स्टोरीलाइन

    यह आत्मकथ्यात्मक शैली में लिखी गई चरित्र प्रधान कहानी है। शादी के बाद एक लंबा अरसा गुज़र जाने पर भी उसे हर वक़्त अपने शौहर से शिकायतें है। उसकी कोई भी बात, काम, सलीक़ा या फिर तरीक़ा पसंद नहीं आता। शिकवे इस क़दर हैं कि सारी ज़िंदगी बस जैसे-तैसे गुज़र गई है। मगर इन शिकायतों में भी एक ऐसा रस है जिससे शौहर के बिना एक लम्हें के लिए दिल भी नहीं लगता।

    ज़िंदगी का बड़ा हिस्सा तो इसी घर में गुज़र गया, मगर कभी आराम नसीब हुआ। मेरे शौहर दुनिया की निगाह में बड़े नेक, ख़ुशखल्क़, फ़य्याज़ और बेदार मग़ज़ होंगे, लेकिन जिस पर गुज़रती है वही जानता है, दुनिया को तो उन लोगों की तारीफ़ में मज़ा आता है जो अपने घर को जहन्नुम में डाल रहे हों और ग़ैरों के पीछे अपने आप को तबाह किए डालते हों, जो घर वालों के लिए मरता है, उसकी तारीफ़ दुनिया वाले नहीं करते, वो तो उनकी निगाह में ख़ुदग़रज़ है, बख़ील है, तंग दिल है, मग़रूर है, कोर बातिन है, उसी तरह जो लोग बाहर वालों के लिए मरते हैं, उनकी तारीफ़ घर वाले क्यों करने लगे, अब इन्हीं को देखो, सुबह से शाम तक मुझे परेशान किया करते हैं, बाहर से कोई चीज़ मँगवाओ तो ऐसी दुकान से समान लाएंगे जहां कोई गाहक भूल कर भी जाता हो, ऐसी दुकानों पर चीज़ अच्छी मिलती है, वज़न ठीक होता है, दाम ही मुनासिब, ये नक़ाइस होते तो वो दुकान बदनाम ही क्यों होती, उन्हें ऐसी ही दुकानों से सौदा सुल्फ़ ख़रीदने का मर्ज़ है। बारहा कहा कि किसी चलती हुई दुकान से चीज़ें लाया करो, वहां माल ज़्यादा खपता है, इसलिए ताज़ा माल आता रहता है, मगर नहीं टूटपुंजियों से उनको हमदर्दी है और वो उन्हें उल्टे उस्तरे से मूंडते हैं। गेहूं लाएंगे तो सारे बाज़ार से ख़राब, घुना हुआ, चावल ऐसा मोटा कि बैल भी पूछे, दाल में कंकर भरे हुए, मनों लकड़ी जला डालो क्या मजाल के गले, घी लाएंगे तो आधों आध तेल और नर्ख़ असली घी से एक छटांक कम, तेल लाएंगे तो मिलावट का, बालों में डालो तो चिकट जाएं, मगर दाम दे आएँगे आला दर्जे के चम्बेली के तेल के, चलती हुई दुकान पर जाते तो जैसे उन्हें डर लगता है, शायद ऊंची दुकान और फीके पकवान के क़ाइल हैं, मेरा तजुर्बा कहता है कि नीची दुकान पर सड़े पकवान ही मिलते हैं।

    एक दिन की बात हो तो बर्दाश्त कर ली जाये। रोज़ रोज़ की ये मुसीबत नहीं बर्दाश्त होती, मैं कहती हूँ आख़िर टूटपुंजियों की दुकान पर जाते ही क्यों हैं। क्या उनकी परवरिश का ठेका तुम ही ने ले लिया है। आप फ़रमाते हैं, मुझे देख कर बुलाने लगते हैं, ख़ूब! ज़रा उन्हें बुला लिया और ख़ुशामद के दो चार अलफ़ाज़ सुना दिए, बस आपका मिज़ाज आसमान पर जा पहुंचा, फिर इन्हें सुध ही नहीं रहती कि वो कूड़ा करकट बांध रहा है या क्या। मैं पूछती हूँ, तुम उस रास्ते से जाते ही क्यों हो? क्यों किसी दूसरे रास्ते से नहीं जाते? ऐसे उठाईगिरों को मुँह ही क्यों लगाते हो? इसका कोई जवाब नहीं, एक ख़मोशी सौ बलाओं को टालती है।

    एक बार एक ज़ेवर बनवाना था, मैं तो हज़रत को जानती थी, उनसे कुछ पूछने की ज़रूरत समझी, एक पहचान के सुनार को बुला रही थी, इत्तिफ़ाक़ से आप भी मौजूद थे, बोले ये फ़िर्क़ा बिल्कुल एतबार के क़ाबिल नहीं, धोका खाओगी। मैं एक सुनार को जानता हूँ, मेरे साथ का पढ़ा हुआ है, बरसों साथ खेले हैं, मेरे साथ चाल बाज़ी नहीं कर सकता, मैंने समझा जब उनका दोस्त है और वो भी बचपन का तो कहाँ तक दोस्ती का हक़ निभाएगा, सोने का एक ज़ेवर और पच्चास रुपया उनके हवाले किये और उस भले आदमी ने वो चीज़ और रुपया जाने किस बेईमान को दे दिए कि बरसों के पैहम तक़ाज़ों के बाद जब चीज़ बन कर आई तो रुपया में आठ आने ताँबा और इतनी बदनुमा कि देख कर घिन आती थी। बरसों का अरमान ख़ाक में मिल गया, रो पीट कर बैठ रही, ऐसे ऐसे वफ़ादार तो उनके दोस्त हैं, जिन्हें दोस्त की गर्दन पर छुरी फेरने में भी आर नहीं, उनकी दोस्ती भी उन्ही लोगों से है, जो ज़माने भर के फ़ाकामस्त, क़लांच, बे सर-व-सामान हैं, जिनका पेशा ही उन जैसे आँख के अंधों से दोस्ती करना है। रोज़ एक एक साहब मांगने के लिए सर पर सवार रहते हैं और बिना लिए गला नहीं छोड़ते, मगर ऐसा कभी नहीं हुआ कि किसी ने रुपया अदा किए हों, आदमी एक बार खो कर सीखता है, दो बार खो कर सीखता है, मगर ये भले मानुस हज़ार बार खो कर भी नहीं सीखते। जब कहती हूँ, रुपया तो दे आए, अब मांग क्यों नहीं लाते, क्या मर गए तुम्हारे वो दोस्त, तो बस बग़लें झांक कर रह जाते हैं। आप से दोस्तों को सूखा जवाब नहीं दिया जाता। ख़ैर सूखा जवाब दो, मैं भी नहीं कहती कि दोस्तों से बेमुरव्वती करो, मगर टाल तो सकते हो, क्या बहाने नहीं बना सकते, मगर आप इनकार नहीं कर सकते, किसी दोस्त ने कुछ तलब किया और आप के सर पर बोझ पड़ा। बेचारे कैसे इनकार करें। आख़िर लोग जान जाऐंगे कि ये हज़रत भी फ़ाकामस्त हैं, दुनिया उन्हें अमीर समझती रहे, चाहे मेरे ज़ेवर ही क्यों गिरवी रखने पड़ें। सच कहती हूँ, बा'ज़ औक़ात एक एक पैसे की तंगी हो जाती है और इस भले आदमी को रुपया जैसे घर में काटते हैं। जब तक रूपयों के वारे न्यारे कर ले, उसे किसी पहलू क़रार नहीं। उनके करतूत कहाँ तक कहूं, मेरा तो नाक में दम गया। एक एक मेहमान रोज़ बुलाए बे दरमां की तरह सर पर सवार, जाने कहाँ के बे फ़िक्रे उनके दोस्त हैं। कोई कहीं से आकर मरता है, कोई कहीं से, घर क्या है अपाहिजों का अड्डा है ।ज़रा सा तो घर, मुश्किल से दो चार चारपाई, ओढ़ना बिछौना भी बा-इफ्ऱात नहीं, मगर आप हैं कि दोस्तों को दावत देने के लिए तैयार। आप तो मेहमान के साथ लेटेंगे, इसलिए उन्हें चारपाई भी चाहिए और ओढ़ना बिछौना भी चाहिए, वर्ना घर का पर्दा ख़ुल जाये, जाती है तो मेरे और बच्चों के सर, ज़मीन पर पड़े सिकुड़ कर रात काटते हैं, गर्मियों में ख़ैर मज़ाइक़ा नहीं, लेकिन जाड़ों में तो बस क़ियामत ही आजाती है। गर्मियों में भी खुली छत पर तो मेहमानों का क़ब्ज़ा हो जाता है, अब बच्चों को लिए क़फ़स में तड़पा करूं। इतनी समझ भी नहीं कि जब घर की ये हालत है तो क्यों ऐसों को मेहमान बनाऐ, जिनके पास कपड़े लत्ते तक नहीं, ख़ुदा के फ़ज़ल से उनके सभी दोस्त ऐसे ही हैं, एक भी ख़ुदा का बंदा ऐसा नहीं, जो ज़रूरत के वक़्त उन्हें धैले से भी मदद कर सके। दो एक बार हज़रत को इसका तजुर्बा और बेहद तल्ख़ हो चुका है। मगर उस मर्द-ए-ख़ुदा ने आँखें खोलने की क़सम खा ली है। ऐसे ही नादारों से उनकी पटती है। ऐसे ऐसे लोगों से आपकी दोस्ती है कि कहते शर्म आती है। जिसे कोई अपने दरवाज़े पर खड़ा भी होने दे, वो आपका दोस्त है। शहर में इतने अमीर कबीर हैं, आपका किसी से रब्त ज़ब्त नहीं, किसी के पास नहीं जाते, उमरा मग़रूर हैं, ख़ुशामद पसंद हैं, उनके पास कैसे जाएं। दोस्ती गांठेंगे ऐसों से जिनके घर में खाने को भी नहीं।

    एक बार हमारा ख़िदमतगार चला गया और कई दिन दूसरा ख़िदमतगार मिला, मैं किसी होशियार और सलीक़ामंद नौकर की तलाश में थी, मगर बाबू साहब को जल्द से जल्द आदमी रख लेने की फ़िक्र सवार हुई। घर के सारे काम बदस्तूर चल रहे थे, मगर आप को मालूम हो रहा था कि गाड़ी रुकी हुई है। एक दिन जाने कहाँ से एक बांगड़ों पकड़ लाए, उसकी सूरत कहे देती थी कि कोई जंगली है, मगर आपने उसकी ऐसी ऐसी तारीफ़ें कीं कि क्या कहूं, बड़ा फ़र्मांबरदार है, परले सिरे का ईमानदार, बला का मेहनती, ग़ज़ब का सलीक़ा शआर और इंतिहा दर्जे का बा-तमीज़, ख़ैर मैंने रख लिया। मैं बार बार क्यों कर उनकी बातों में जाती हूँ, मुझे ख़ुद ताज्जुब है। ये आदमी सिर्फ़ शक्ल से आदमी था। आदमियत की कोई अलामत उसमें थी। किसी काम की तमीज़ नहीं, बे-ईमान था, मगर अहमक़ अव़्वल नंबर का, बे-ईमान होता तो कम से कम इतनी तस्कीन तो होती कि ख़ुद खाता है। कमबख़्त दुकानदारों की फ़ितरतों का शिकार हो जाता था, उसे दस तक गिनती भी आती थी। एक रुपया दे कर बाज़ार भेजूं तो शाम तक हिसाब समझा सके। गु़स्सा पी पी कर रह जाती थी। ख़ून जोश खाने लगता था के सूअर के कान उखाड़ लूं, मगर इन हज़रत को कभी उसे कुछ कहते नहीं देखा। आप उसके ऐबों को हुनर बना कर दिखाया करते थे, और इस कोशिश में कामयाब होते तो उन अयूब पर पर्दा डाल देते थे। कमबख़्त का झाड़ू देने की भी तमीज़ थी।मर्दाना कमरा ही तो सारे घर में ढंग का एक कमरा है, उसमें झाड़ू देता तो इधर की चीज़ उधर, ऊपर की नीची, गोया सारे कमरे में ज़लज़ला गया हो और गर्द का ये आलम कि सांस लेना मुश्किल। मगर आप कमरे में इत्मिनान से बैठे रहते, गोया कोई बात ही नहीं। एक दिन मैंने उसे ख़ूब डाँटा और कह दिया, अगर कल से तूने सलीक़े से झाड़ू दी तो खड़े खड़े निकाल दूंगी।

    सवेरे सो कर उठी तो देखती हूँ, कमरे में झाड़ू दी हुई है, हर एक चीज़ करीने से रखी हुई है, गर्द-व-गुबार का कहीं नाम नहीं, आप ने फ़ौरन हंस कर कहा, देखती क्या हो, आज घूरे ने बड़े सवेरे झाड़ू दी है, मैंने समझा दिया, तुम तरीक़ा तो बताती नहीं हो, उल्टा डाँटने लगती हो, लीजिए साहब ये भी मेरी ही ख़ता थी, ख़ैर मैंने समझा, उस नालायक़ ने कम अज़ कम एक काम तो सलीक़े के साथ किया। अब रोज़ कमरा साफ़ सुथरा मिलता और मेरी निगाहों में घूरे की कुछ वक़अत होने लगी।

    एक दिन मैं ज़रा मामूल से सवेरे उठ बैठी और कमरे में आई तो क्या देखती हूँ कि घूरे दरवाज़े पर खड़ा है और ख़ुद बदौलत बड़ी तनदेही से झाड़ू दे रहे हैं। मुझ से ज़ब्त हो सका, उनके हाथ से झाड़ू छीन ली और घूरे के सर पर पटक दी। हरामख़ोर को इसी वक़्त धुतकार बताई। आप फ़रमाने लगे, उसकी तनख़्वाह तो बेबाक़ कर दो। ख़ूब, एक तो काम करे, दूसरे आँखें दिखाए, उस पर तनख़्वाह भी दे दूं। मैंने एक कौड़ी भी दी। एक कुर्ता दिया था, वो भी छीन लिया। इस पर हज़रत कई दिन मुझ से रूठे रहे। घर छोड़कर भागे जा रहे थे, बड़ी मुश्किलों से रुके।

    एक रोज़ मेहतर ने उतारे कपड़ों का सवाल किया, इस बेकारी के ज़माने में फ़ालतू कपड़े किस के घर में हैं, शायद रईस के घरों में हों, मेरे यहां तो ज़रूरी कपड़े भी काफ़ी नहीं, हज़रत ही का तोशा ख़ाना एक बुक़ची में जाएगा, जो डाक के पार्सल से कहीं भी भेजा जा सकता है। फिर इस साल सर्दी के मौसम में नए कपड़े बनवाने की नौबत आई थी। मैंने मेहतर को साफ़ जवाब दे दिया। सर्दी की शिद्दत थी। इसका मुझे ख़ुद एहसास था, ग़रीबों पर क्या गुज़रती है, इसका इल्म था, लेकिन मेरे या आप के पास इसके अफ़सोस के सिवा और क्या ईलाज है, जब रऊसा और उमरा के पास एक एक मालगाड़ी कपड़ों से भड़ी पड़ी है तो फिर गुरबा क्यों ब्रहनगी का अज़ाब झेलें, ख़ैर मैंने तो उसे जवाब दे दिया। आपने क्या किया, अपना कोट उतार कर उसके हवाले कर दिया, हज़रत के पास यही एक कोट था, मेहतर ने सलाम किया, दुआएं दीं और अपनी राह ली। कई दिन सर्दी खाते रहे। सुबह घूमने जाया करते थे। वो सिलसिला बंद हो गया, मगर दिल भी क़ुदरत ने उन्हें एक अजीब क़िस्म का दिया है। फटे पुराने कपड़े पहनते, आप को शर्म नहीं आती। मैं तो कट जाती हूँ, आख़िर मुझ से देखा गया तो एक कोट बनवा दिया। जी तो जलता था कि ख़ूब सर्दी खाने दूं, मगर डरी कि कहीं बीमार पड़ जाएं तो और भी आफ़त जाये। आख़िर काम तो इन ही को करना है।

    ये अपने दिल में समझते होंगे, मैं कितना नेक नफ़स और मुन्कसिर मिज़ाज हूँ, शायद उन्हें इन औसाफ़ पर नाज़ हो, मैं उन्हें नेक नफ़स नहीं समझती हूँ, ये सादा लोही है, सीधी सादी हमाक़त, जिस मेहतर को आपने अपना कोट दिया,