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शराब का फंदा!

एडगर एलन पो

शराब का फंदा!

एडगर एलन पो

MORE BYएडगर एलन पो

    स्टोरीलाइन

    ये एडगर एलन पो की कहानी "The Cask of Amontillado" का उर्दू तर्जुमा है, जिसमें एक आदमी अपने दोस्त को लालच दे कर तहख़ाने में ले जाता है और वहाँ उसे दीवार में ज़िंदा बंद कर देता है ताकि उस से मुकम्मल और ख़ामोश इंतिक़ाम ले सके।

    फोरचुनीटो ने मुझ पर बे-शुमार जु़ल्म ढाए थे और मैंने जहाँ तक हो सका, सब कुछ ख़ामोशी से सह लिया। मगर जब उसने मेरी तौहीन की, तो मैंने दिल ही दिल में इंतकाम लेने का फै़सला कर लिया।

    तुम, जो मेरे मिज़ाज और मेरी फ़ितरत से अच्छी तरह वाक़िफ हो, हरगिज़ यह गुमान नहीं करोगे कि मैंने कभी उसे धमकी दी थी। नहीं, मैंने अपने इरादे की भनक तक उसे ना पड़ने दी। अलबत्ता एक बात हमेशा के लिए तय हो चुकी थी, ‘‘इंतिकाम ज़रूर लिया जाएगा।’’

    लेकिन यही अटल फ़ैसला मुझे हर क़िस्म के ख़तरे से बचने पर भी मजबूर करता था। मेरा मक़्सद सिर्फ़ सज़ा देना नहीं था, बल्कि ऐसी सज़ा देना था जिसकी कोई क़ीमत मुझे खु़द ना चुकानी पड़े।

    अगर बदला लेने वाला खु़द भी उसकी ज़द में जाए तो समझो इंसाफ अभी पूरा नहीं हुआ। और अगर जिस शख़्स ने जु़ल्म किया है, उसे आख़िर तक ये एहसास ही ना हो कि उस पर यह ज़र्ब किसने लगाई है?, तो ऐसा इंतिकाम भी अधूरा रह जाता है।

    ये बात ज़ेहन में रहे कि ना कभी मेरी किसी बात से, ना किसी रवैये से, फोरचुनीटो को मुझ पर बद-गुमानी का मौक़ा मिला। मैं हस्ब-ए-मामूल उससे मुस्कुरा कर मिलता रहा, और उसे ज़र्रा बराबर एहसास ना हुआ कि अब मेरी हर मुस्कुराहट के पीछे उसकी हलाकत का ख़्याल छिपा हुआ था।

    फ़ोरचुनीटो की एक कमज़ोरी थी, अगरचे बाक़ी हर एतिबार से वो ऐसा शख़्स था जिसकी इज़्ज़त भी की जाती थी और जिससे लोग ख़ौफ़-ज़दा भी रहते थे। उसे अपने ज़ौक-ए-शराब शनासी पर ग़ैर-मामूली नाज़ था। वैसे सच्ची बात ये है कि अतालवियों में शराब की हक़ीक़ी पहचान रखने वाले बहुत कम होते हैं। अक्सर लोग तो वक़्त, मौक़ा और मफ़ाद के मुताबिक़ शौक़ का लिबादा ओढ़ लेते हैं ताकि दौलत-मंद अंग्रेज़ों और ऑस्ट्रियाइयों को धोखा दे सकें।

    मुसव्विरी और जवाहिरात की परख में फ़ोरचुनीटो भी अपने बेश्तर हम-वतनों की तरह महज़ डींगें मारने वाला था, लेकिन पुरानी शराबों के मामले में वो वाक़ई साहिब-ए-ज़ौक था। इस मामले में मेरे और उसके दरमियान भी कोई ख़ास फ़र्क़ ना था। मुझे भी अतालवी शराबों की अच्छी ख़ासी पहचान थी, और जब कभी मौक़ा मिलता, मैं दिल खोल कर ख़रीदारी करता।

    कारनीवाल के हंगामे ख़ेज़ दिनों की एक शाम, जब अंधेरा उतरने ही वाला था, अचानक मेरी मुलाक़ात अपने इसी दोस्त से हो गई। वो मुझे इस बे-तकल्लुफ़ी से मिला जैसे बरसों का बिछड़ा हुआ यार मिल गया हो, मगर उसकी इस गर्म-जोशी की वजह साफ़ ज़ाहिर थी। वो ख़ासा नशे में था।

    उसने रंग-बिरंगे मसख़रे का लिबास पहन रखा था। बदन पर चुस्त, मुख़्तलिफ़ रंगों की धारियों वाला जोड़ा था, और सर पर नुकीली टोपी सजी थी जिसके सिरों से नन्हीं-नन्हीं घंटियां लटक रही थीं। उसे देख कर मैं इस क़दर ख़ुशी ज़ाहिर करने लगा कि यूँ महसूस हुआ जैसे उसका हाथ छोड़ने का इरादा ही ना हो।

    मैंने कहा, मेरे अज़ीज़ फ़ोरचुनीटो! क्या ख़ूब वक़्त पर मुलाक़ात हुई। आज तो तुम बहुत तर-ओ-ताज़ा दिखाई दे रहे हो। मगर एक मुसीबत आन पड़ी है। मैंने एक पूरा पीपा ख़रीदा है जिसे बेचने वाला आमोनतीयादो (एक क़िस्म की शराब) बता रहा था, लेकिन मुझे उसकी असलियत पर शुब्हा है।

    क्या कहा? उसने चौंक कर कहा। आमोनतीयादो? पूरा पीपा? ना-मुम्किन! वो भी कारनीवाल के बीचों-बीच?

    बस यही तो मसअला है, मैंने जवाब दिया। मुझे शक है। और हिमाक़त ये कि तुमसे पूछे बग़ैर ही आमोनतीयादो की पूरी क़ीमत अदा कर दी। तुम कहीं मिल ही नहीं रहे थे, और मुझे डर था कि कहीं ये सौदा हाथ से ना निकल जाए।

    आमोनतीयादो!

    मुझे अब भी यक़ीन नहीं।

    आमोनतीयादो!

    और उसका इत्मीनान करना ज़रूरी है।

    आमोनतीयादो!

    चूंकि तुम ग़ालिबन मसरूफ़ हो, इसलिए मैं सोच रहा हूँ लुकीज़ी के पास चला जाऊँ। अगर किसी को शराब की पहचान है तो वही है। वो देख कर फ़ौरन बता देगा।

    लुकीज़ी? वो हक़ारत से हँसा। वो आमोनतीयादो और शीरी में फर्क़ तक नहीं कर सकता!

    मगर अजीब बात है, कुछ लोगों का इसरार है कि उसकी परख तुमसे कम नहीं।

    चलो! उसने फ़ौरन कहा। अभी चलते हैं।

    कहाँ?

    तुम्हारे तहख़ाने में।

    नहीं, मेरे दोस्त, मैं तुम्हें तकलीफ़ नहीं देना चाहता। लगता है तुम्हें कहीं जाना है। लुकीज़ी से ही काम चला लेता हूँ।

    मुझे कहीं नहीं जाना। चलो।

    नहीं, दोस्त। बात मसरूफ़ियत की नहीं। मैं देख रहा हूँ तुम्हें सख़्त नज़्ला है। मेरे तहख़ाने हद से ज़ियादा नम हैं, और दीवारों पर शोरे की मोटी तह जमी हुई है।

    उसकी परवाह ना करो, उसने बे-परवाही से कहा। यह जु़काम कोई ऐसी चीज़ नहीं। पहले आमोनतीयादो देखते हैं। यक़ीनन तुम्हारे साथ धोखा हुआ है। और जहाँ तक लुकीज़ी का ताल्लुक़ है, वो शीरी और आमोनतीयादो में तमीज़ करने की सलाहियत ही नहीं रखता।

    ये कहते हुए फोरचुनीटो ने मेरा बाजू़ अपने बाजू़ में डाल लिया। मैंने सियाह रेशम का नक़ाब चेहरे पर चढ़ाया, चोग़ा अच्छी तरह लपेटा और उसके साथ चल पड़ा।

    वह मुझे खींचता हुआ मेरे महल तक ले आया। घर पहुंचे तो वहाँ कोई मुलाज़िम मौजूद ना था। सब कारनीवाल की रंग-रेलियाँ मनाने निकल खड़े हुए थे। जाते वक़्त मैं उन्हें साफ़ कह गया था कि सुबह से पहले वापस नहीं आऊंगा और ख़बरदार कर दिया था कि मेरे आने तक कोई शख़्स घर से बाहर क़दम ना रखे। मैं जानता था, मेरा ये हुक्म सुन कर वो सब के सब मेरे निकलते ही ग़ायब हो जाएंगे। चुनांचे हुआ भी यही।

    मैंने दीवार पर लगे शमा-दानों से दो जलती हुई मशअलें उतारीं। एक फ़ोरचुनीटो के हवाले की और उसे साथ लिए एक के बाद एक कमरा उबूर करता उस मेहराबी दरवाज़े तक पहुंचा जो तहख़ानों में उतरता था। नीचे जाने के लिए एक लम्बी, पेच-दर-पेच सीढ़ी थी। मैं आगे-आगे चलता जाता और उसे बार-बार ख़बर-दार करता कि संभल कर क़दम रखे। आख़िर हम सीढ़ी उतर कर नीचे पहुंच गए। चारों तरफ़ नमी ही नमी थी। हम दोनों मोनट्रेसोर के ख़ानदानी क़ब्रिस्तान में खड़े थे।

    मेरे दोस्त के क़दम पहले ही से लड़खड़ा रहे थे, और हर क़दम पर उसकी नोक-दार टोपी की घंटियाँ बज उठती थीं।

    वो पीपा कहाँ है? उसने पूछा।

    आगे है, मैंने कहा। लेकिन ज़रा इन दीवारों पर जमी हुई इस सफे़द जाली को तो देखो।

    उसने मेरी तरफ़ मुड़ कर देखा। उसकी आँखें नशे से धुंधला रही थीं और उनमें वो सी नमी थी जो मदहोशी के साथ उतर आती है।

    शोरे की तह है? उसने आख़िरकार पूछा।

    हाँ, शोरा है, मैंने जवाब दिया। तुम्हें ये खाँसी कब से है?

    खुख... खुख... वो कुछ देर बोल ना सका, बस खाँसता रहा। फिर ब-मुश्किल संभल कर बोला, ये कुछ नहीं।

    चलो फिर, मैंने संजीदगी से कहा, वापस चलते हैं। तुम्हारी सेहत मेरे लिए अहम है। तुम अमीर हो, बा-इज़्ज़त हो, सब के चहीते हो… खु़श हो, जैसे मैं कभी था। तुम्हारी ग़ैर-मौजूदगी महसूस की जाएगी। मेरे लिए तो खै़र कोई बात नहीं, लेकिन चलो वापस चलते हैं। कहीं ऐसा ना हो कि तुम बीमार पड़ जाओ और मैं उसका ज़िम्मेदार ठहरूँ। और फिर… लुकीज़ी भी तो है।

    बस करो, उसने कहा। ये खाँसी कुछ नहीं, ये मुझे नहीं मारेगी। मैं खाँसी से नहीं मरने वाला।

    हाँ, हाँ, बिल्कुल, मैंने नर्मी से कहा। मेरा मक़्सद तुम्हें डराना नहीं, मगर एहतियात तो ज़रूरी है। ज़रा इस मेडीरा शराब का एक घूंट ले लो तो इस नमी का असर कम हो जाएगा।

    मैंने एक बोतल खोली और उसके आगे बढ़ा दी जिसे उसने एक टेढ़ी सी मुस्कुराहट के साथ पी लिया। उसकी घंटियाँ हल्की-हल्की बजती रहीं।

    मैं पीता हूँ उन लोगों के नाम जो हमारे गर्द-ओ-पेश दफ़्न हैं, उसने कहा।

    और मैं तुम्हारी दराज़ी-ए-उम्र के नाम, मैंने जवाब दिया।

    फिर वो दोबारा मेरा बाजू़ थाम कर चल पड़ा। ये तहख़ाने ख़ासे वसीअ हैं, उसने कहा।

    मोनट्रेसोर ख़ानदान बहुत क़दीम और बड़ा रहा है, मैंने जवाब दिया।

    तुम्हारा ख़ानदानी निशान मुझे याद नहीं रहा, उसने कहा।

    सुनहरी मैदान में एक बड़ा सा इंसानी पाँव बना हुआ है, जो एक साँप को कुचल रहा है। वो साँप ऊपर उठा हुआ है और उसके दाँत पाँव की एड़ी में पैवस्त हैं।

    और उस पर लिखा क्या है? उसने पूछा।

    जो मुझे छेड़ेगा, वो बच कर नहीं जाएगा।

    अच्छा! वो बोला। शराब के असर से उसकी आँखें चमकने लगीं और उसकी टोपी की घंटियाँ हिलने लगीं। इधर मेडीरा शराब का असर मुझ पर भी रहा था।

    हम तहख़ाने के अंदर गहरे हिस्सों में जा चुके थे, जहाँ हर तरफ़ हड्डियाँ, लकड़ी के पीपे और संदूक़ पड़े थे। मैंने फिर रुक कर उसका बाजू़ थाम लिया।

    देखो, ये शोरा और बढ़ गया है, मैंने कहा। ये दीवारों पर काई की तरह लटक रहा है। हम दरिया के नीचे तक गए हैं। यहाँ नमी टपक रही है। चलो वापस चलते हैं, कहीं देर ना हो जाए। तुम्हारी खाँसी...

    ये कुछ नहीं, उसने कहा। चलो आगे चलते हैं। बस एक और घूंट दे दो।

    मैंने उसे एक और बोतल दी। उसने फ़ौरन पी ली। उसकी आँखों में जोश गया। वो हँसा और बोतल को ऊपर उछाल दिया, जैसे कोई इशारा कर रहा हो। मैं हैरान हुआ। उसने वही हरकत दोबारा की।

    समझ नहीं आया? उसने पूछा।

    नहीं, मैंने कहा।

    फिर तुम हमारे आदमी नहीं हो।

    क्या मतलब?

    तुम फ़्री मेसन नहीं हो।

    हाँ, हाँ, हूँ, मैंने जल्दी से कहा।

    वाक़ई? तुम फ़्री मेसन हो?

    हाँ, मैं फ़्री मेसन हूँ।

    कोई निशान है?

    मैंने अपनी चुग़ा के अंदर से एक छोटा सा औज़ार निकाल कर दिखाया।

    वो पीछे हट गया। तुम मज़ाक कर रहे हो! वह बोला। फिर उसने कहा, चलो, हमें आमोनतीयादो की तरफ़ जाना है।

    ठीक है, मैंने कहा और वो औज़ार चुग़े के अंदर छुपा कर दोबारा उसका बाज़ू थाम लिया। वो भारी अंदाज़ में मुझ पर टेक लगा कर चलने लगा। हम आमोनतीयादो की तलाश में आगे बढ़ते रहे। रास्ते में हम नीचे को उतरते हुए कई कम ऊँची मेहराबों से गुज़रे, फिर आगे बढ़े, फिर मज़ीद नीचे उतरे, यहाँ तक कि एक ऐसे गहरे तहख़ाने में पहुंच गए जहाँ हवा इस क़दर बोझल और ख़राब थी कि हमारी मशअलें जलने के बजाए बस मद्धम सी चमक दे रही थीं।

    उस तहख़ाने के सबसे आख़री कोने में एक और छोटा सा कमरा नज़र आया। उसकी दीवारें इंसानी हड्डियों से यूँ ढकी हुई थीं जैसे पेरिस के क़दीम कब्रिस्तानों में होता है। तीन तरफ़ तो दीवारें मुकम्मल तौर पर हड्डियों से बनी हुई थीं, मगर चौथी तरफ हड्डियाँ हटा दी गई थीं और ज़मीन पर बे-तरतीबी से बिखरी पड़ी थीं, यहाँ तक कि एक जगह उनका एक ढेर सा बन गया था। उसी खुली हुई दीवार के अंदर हमें एक और अंदर की तरफ़ जाता हुआ खोखला हिस्सा नज़र आया। ये तक़रीबन चार फ़ीट गहरा, तीन फ़ीट चौड़ा और छह-सात फ़ीट ऊँचा था। ऐसा लगता था जैसे इसे किसी ख़ास इस्तेमाल के लिए नहीं बनाया गया, बल्कि ये महज़ दो बड़े सतूनों के दरमियान छोड़ा गया एक ख़ला (ख़ाली जगह) हो, और उसके पीछे तहख़ाने की मज़बूत ग्रेनाइट दीवार मौजूद थी।

    फोरचुनीटो ने अपनी मद्धम सी मशअल ऊँची कर के उस खोखले हिस्से के अंदर झाँकने की बहुत कोशिश की, मगर उसकी रौशनी इतनी कमज़ोर थी कि वो उसकी आख़री हद तक कुछ भी ना देख सका।

    आगे चलो, मैंने कहा। यहीं आमोनतीयादो है। और लुकीज़ी की...

    वो तो एक जाहिल है, उसने बात काटते हुए कहा और लड़खड़ाते हुए आगे बढ़ गया। मैं उसके पीछे था। चंद ही लम्हों में वो उस जगह के आख़री सिरे तक पहुंच गया, मगर जब रास्ता एक चट्टान से बंद पाया तो वो रुक गया।

    इसी लम्हे मैंने उसे मज़बूती से पत्थर की दीवार के साथ जकड़ दिया। वहाँ दो लोहे के कड़े लगे हुए थे, तक़रीबन दो फ़ीट के फ़सले पर। एक कड़े से छोटी सी ज़ंजीर लटक रही थी और दूसरे से क़ुफ़्ल (ताला)। मैंने ज़ंजीर उसकी कमर के गिर्द डाल दी और चंद लम्हों में उसे क़ैद कर दिया। वो इतना हैरान था कि मुज़ाहिमत (विरोध) भी ना कर सका। मैं चाबी निकाल कर फ़ौरन पीछे हट गया।

    दीवार को हाथ लगा कर देखो, मैंने कहा। तुम्हें फ़ौरन शोरे की तह महसूस होगी। वाक़ई यहाँ बहुत नमी है। एक बार फिर कहता हूँ, वापस चलने की कोशिश करो। नहीं? अच्छा, फिर मैं अब तुम्हें छोड़ कर जा रहा हूँ… लेकिन उससे पहले मुझे वो छोटी सी ख़िदमत ज़रूर अंजाम देने दो जो मेरे बस में है।

    आमोनतीयादो! मेरे दोस्त ने हैरत से चीख़ कर कहा। वो अभी तक सदमे से संभला ना था।

    बिल्कुल, मैंने जवाब दिया, आमोनतीयादो ही है।

    ये कहते हुए मैं हड्डियों के उस ढेर में मसरूफ़ हो गया जिसका मैं पहले ज़िक्र कर चुका हूँ। उन्हें एक तरफ़ हटाते ही मुझे वहाँ ईंटें और गारा नज़र आया। मैंने अपने औज़ार की मदद से फ़ौरन उस जगह की दीवार चुनना शुरू कर दी।

    मैंने अभी पहली सफ़ ही लगाई थी कि मुझे अंदाज़ा हो गया कि फोरचुनीटो का नशा बहुत हद तक उतरने लगा है। सबसे पहले मुझे अंदर से एक हल्की सी कराह सुनाई दी۔۔۔ ये किसी नशे में धुत आदमी की आवाज़ नहीं थी। फिर कुछ देर तक मुकम्मल खामोशी रही। मैंने दूसरी, तीसरी और चौथी ईंटों की सफ़ चुन दी। इस दौरान अचानक ज़ंजीर ज़ोर-ज़ोर से हिलने लगी। ये आवाज़ कई मिनट तक चलती रही। मैंने काम रोक दिया और हड्डियों के ढेर पर बैठ कर ये शोर सुनता रहा। जब आवाज़ थम गई तो मैंने दोबारा काम शुरू किया और पाँचवीं, छठी और सातवीं सफ़ भी मुकम्मल कर दी। अब दीवार उसके सीने तक पहुंच चुकी थी। मैंने एक बार फिर रुक कर मशअल अंदर रखी और उस पर रौशनी डाली।

    अचानक अंदर से चीख़ों का एक सिलसिला बुलन्द हुआ। ये आवाज़ें इतनी तेज़ थीं कि जैसे मुझे पीछे धकेल दिया हो। एक लम्हे के लिए मैं हिचकिचाया, मगर फ़ौरन संभल गया। मैंने अपनी तलवार निकाली और दीवार के अंदर टटोलने लगा, फिर मुझे एहसास हुआ कि मैं महफूज़ हूँ। मैंने दोबारा दीवार की तरफ़ रुख़ किया और उसकी चीख़ों का जवाब देने लगा... हत्ता कि मेरी आवाज़ उसकी आवाज़ से ज़ियादा बुलन्द हो गई। आख़िरकार वो ख़ामोश हो गया।

    अब आधी रात गुज़र चुकी थी और मेरा काम अपने इख़्तेताम के क़रीब था। मैंने आठवीं, नौवीं और दसवीं सफ़ भी मुकम्मल कर ली। ग्यारहवीं सफ़ का कुछ हिस्सा बाक़ी था और बस एक आख़री ईंट रह गई थी। मैंने उसे बड़ी मुश्किल से उठाया और अपनी जगह पर रख दिया। उसी वक़्त अंदर से एक हल्की सी हँसी सुनाई दी जिसने मेरे रोंगटे खड़े कर दिये। फिर वो आवाज़ आई जिसे पहचानना मुश्किल था... ये फोरचुनीटो की आवाज़ थी।

    वो कह रहा था, हा! हा! हा! क्या ख़ूब मज़ाक़ है! हम महल जा कर इस पर ख़ूब हसेंगे... शराब के साथ... हा! हा! हा!

    आमोनतीयादो! मैंने कहा।

    हा! हा! हा! हाँ आमोनतीयादो! लेकिन क्या अब देर नहीं हो रही? क्या लोग हमारा इंतिज़ार नहीं कर रहे होंगे... लेडी फोरचुनीटो और बाक़ी सब? चलो, वापस चलते हैं।

    हाँ, मैंने कहा, चलो वापस चलते हैं।

    ख़ुदा के वास्ते, मोनट्रेसोर! उसने कहा।

    हाँ, मैंने कहा, खुदा के वास्ते!

    इसके बाद कोई जवाब ना आया। मैंने आवाज़ दी, फोरचुनीटो! कोई जवाब नहीं मिला। मैंने फिर पुकारा, फोरचुनीटो! मगर ख़ामोशी रही। मैंने मशअल अंदर फेंकी तो सिर्फ़ घंटियों की हल्की झंकार सुनाई दी। मेरा दिल बोझल हो गया... शायद तहख़ाने की नमी की वजह से। मैंने जल्दी से आख़री ईंट अपनी जगह पर रख दी, उसे गारे से बंद किया। फिर पुरानी हड्डियों का ढेर दोबारा उसके सामने जमा दिया।

    और उसके बाद पचास बरस तक किसी ने इन दीवारों को नहीं हिलाया। उसे अबदी सुकून नसीब हो!

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