Font by Mehr Nastaliq Web

aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

jis ke hote hue hote the zamāne mere

रद करें डाउनलोड शेर

सुंदरता का राक्षस

मुमताज़ मुफ़्ती

सुंदरता का राक्षस

मुमताज़ मुफ़्ती

MORE BYमुमताज़ मुफ़्ती

    स्टोरीलाइन

    यह समाज में औरतों के बराबरी के अधिकार के डिस्कोर्स के गिर्द घूमती कहानी है, जिसमें दो लड़कियाँ एक स्वामी के पास औरत की गै़र-बराबरी का सवाल लेकर जाती हैं। मगर वहाँ उनकी स्वामी से तो मुलाक़ात नहीं होती, उनके शिष्य मिलते हैं। उनमें से एक उन्हें रानी विजयवंती की कहानी के ज़रिए बताता है कि पुरुष औरत को देवी बना सकता है, उसकी सुंदरता के लिए उसकी पूजा कर सकता है। उस पर जान तक न्यौछावर कर सकता है। मगर कभी उसे अपने बारबर नहीं समझ सकता है।

    शाम दबे-पाँव रेंग रही थी।

    टीले पर दरख़्तों के साये फैलते जा रहे थे लेकिन चोटी की झोली सूरज की थकी माँदी किरनों से अभी तक भरी हुई थी,

    स्वामी जी की कुटिया का दरवाज़ा सुबह से बंद था। बालका और दास दोनों दरख़्तों की छाँव तले बैठे अपने अपने काम में मसरूफ़ थे। हर-चंद साअत बाद वो सर उठा कर स्वामी जी की कुटिया के दरवाज़े की तरफ़ उम्मीद भरी निगाहों से देखते कि कब दरवाज़ा खुले और दर्शन के भाग जागें लेकिन दरवाज़ा नहीं खुला था।

    सुबह दास ने थाली में भोजन परोस कर स्वामी जी के दरवाज़े पर रख दिया लेकिन अब तक थाली जूं की तूं धरी थी। दरवाज़ा खुला, स्वामी जी ने भोजन उठाया। अब वो रात के भोजन की तैयारी में लगा हुआ था।

    पास ही बालका मंझ के बने हुए जूते की मरम्मत कर रहा था।

    दूर टीले के मग़रिबी कोने के परे शहर के मकानात साफ़ दिखाई दे रहे थे। जैसे माचिस की रोग़नी डिबियां नीचे ऊपर धरी हों। शहर के लू भी भंवरे की मद्धम भिन भिन साफ़ सुनाई दे रही थी।

    दफ़अतन उसके मुँह से एक चीख़ सी निकली। 'हे राम' और चाक़ू उसके हाथ से गिर गया।

    हाथ कट गया था? बालके ने सर उठा कर पूछा।

    नाहीँ महाराज, वो देखो... उधर।

    बालके ने इधर देखा। उसकी आँखें खुली की खुली रह गईं। टीले के मग़रिबी किनारे पर दो लड़कियां उनकी तरफ़ रही थीं। चुस्त लिबास पहने, बाल फैलाए, मुख सजाये, पर्स झुलाती हुई। यूं जैसे वो स्वामी जी का आश्रम नहीं बल्कि पिकनिक स्पाट हो।

    ये तो कॉलेज की दिखती हैं महाराज। दास ने कहा।

    आजकल तो सभी कॉलेज की दिखती हैं। बालके ने जवाब दिया। क्या माता की पुत्री... बालका उठकर खड़ा हो गया और घबराहट में टहलने लगा।

    दास छिले हुए आलूओं को फिर से छीलने में लग गया। टीले पर घबराहट भरी ख़ामोशी के ढेर लग गए।

    वक़्त थम गया।

    फिर एक लोचदार आवाज़ ने तितली की तरह पर फड़फड़ाये। हमें स्वामी जी से मिलना है।

    बालके ने सर उठाया।

    शीला और बिमला की कटोरा सी आँखें देखकर बालके ने घबरा कर सर झुका लिया और बोला, स्वामी जी की कुटीया के द्वार के पट कल से बंद हैं देवी। उन्होंने सुबह का भोजन भी नहीं उठाया।

    तो द्वार के फट खोल दो। शीला बोली।

    हमें इसकी आज्ञा नहीं देवी।

    स्वामी जी को भी तो द्वार बंद करने की आज्ञा नहीं। बिमला ग़ुस्से में चिल्लाई, अगर परमात्मा का द्वार भी बंद हो गया तो मंगतों का क्या होगा?

    ये सुनकर बालके के हाथ पांव फूल गए। सुध-बुध मारी गई। अब क्या जवाब दे। कोई हो तो दे। टीले पर ख़ामोशी तारी हो गई।

    फिर दास उठा। उसने लपक कर चटाई उठाई और कन्याओं के सामने बिछा कर नीची निगाहों से बोला, बैठो श्रीमती बैठो।

    हमारे पास बैठने का टाइम नहीं। शीला ने कहा।

    स्वामी जी से कोई मांग करना है या पूछना है? दास ने पूछा।

    मांग भी, पूछना भी। शीला ने कहा।

    हम तुम्हारा सन्सदे पहुंचा देंगे देवी। बालका बोला।

    उंह। शीला ने तेवरी चढ़ा कर कहा, हम ख़ुद स्वामी जी से बात करेंगे।

    पर देवी जी! स्वामी जी स्त्रियों से नहीं मिलते। बालके ने कहा।

    क्या कहा? शीला और बिमला दोनों चिल्लाईं।

    क्या वो पुरुष-स्त्री को बराबर नहीं जानते? शीला ने तल्ख़ी से कहा।

    बालके ने सर लटका लिया और चुप साध ली। अब वो क्या कहे, क्या जवाब दे।

    टीले पर ख़ामोशी छा गई, गहरी लंबी ख़ामोशी।

    आख़िर शीला ज़ेर-ए-लब बोली, जैसे ख़ुद से कह रही हो। उसकी आवाज़ में मायूसी की झलक थी, बेकार है बिमला। स्त्री के लिए परमात्मा का द्वार भी बंद है। यहां भी अंधेर नगरी है। ये देश भी पुरुष का देश निकला।

    बिमला का चेहरा ग़ुस्से से सुर्ख़ हो गया। वो चिल्ला कर बोली, स्वामी जी पुरुष से मिलते हैं, स्त्री से नहीं, क्या स्वामी जी स्त्री से डरते हैं।

    बालके ने जवाब दिया, स्त्री से स्वामी जी नहीं, उनके अंदर का पुरुष डरता है और पुरुष स्त्री से नहीं, ख़ुद से डरता है। उस में इतनी शक्ति नहीं देवी कि वो अंदर के मर्द को रोक में रख सके।

    ये सुनकर दोनों कन्याएं सोच में पड़ गईं।

    इस सहमे दास ने दो प्याले चाय की थाली में धरे और कन्याओं के सामने रखकर बोला,

    देवी चाय पियो। तुम थक गई होगी। बड़ी कठिन चढ़ाई है इस टीले की।

    बीबी ये तो हमारा अंदर का खोट है। बालके ने कहा, कि स्त्री से बचने के लिए हम उसे देवी बना देते हैं।

    तुम्हारे अंदर भी खोट है क्या? तुम जो दिन रात राम नाम की धुनकी से दिल को पवित्र करने में वक़्त गुज़ारते हो। बिमला ने पूछा।

    देवी। बालका बोला, मन का खोट कुवें के पानी की तरह होता है। जितना निकालो, इतना ही भीतर से रिस कर बाहर जाता है।

    ये सुनकर वो दोनों चुप हो गईं। दफ़अतन उन्होंने महसूस किया कि वो बहुत थक गई हैं। इसलिए चटाई पर बैठ कर चाय पीने लगीं।

    हाँ ! शीला सोच में गुम बड़ बड़ाई, मेरे पति ने भी मुझे देवी बना रखा था। इतना प्यार करता था कि वो पूजा लगती थी। मैं कहती, प्रकाश मुझे देवी बनाओ। मुतरन्नुम बनाओ, साथी जानो, बराबर का साथी...

    उंह। बिमला ने आह भरी, वो बराबर का नहीं जानते। साथी नहीं मानते या तो देवी बना कर पूजा करते हैं और या बांदी समझ कर हुक्म चलाते हैं।

    ऐसा क्यों है बालका जी? बिमला ने पूछा।

    क्या स्वामी जी से यही पूछने आई हो देवी? बालके ने कहा।

    हाँ ! शीला बोली, जब पुरुष और स्त्री एक गाड़ी के दो पाए हैं तो फिर बड़ा छोटा क्यों?

    सच कहती हो श्रीमती... सच कहती हो। बालके ने आह भरी, ये तो स्त्री की जन्म जन्म की पुकार है। उस दिन से स्त्री बराबर की भीक माँगती फिरे है जिस दिन रानी विजयवंती ने राज पाट को त्याग कर बराबरी के खोज में राज भवन से पांव बाहर धरा था। ये कह कर बालका चुप हो गया।

    विजयवंती कौन थे बालके जी? बिमला ने पूछा।

    तुम्हें नहीं पता क्या? बालका बोला, आज भी राज गढ़ी की ढेरी में आधी रात के वक़्त रानी विजयवंती की आवाज़ें सुनाई देती हैं।

    आज भी...? बिमला ने पूछा।

    हाँ आज भी, उसकी ढूंढ आज भी जारी है।

    ये सुनकर शीला-बिमला को चुप लग गई।

    साये और भी लंबे हो गए।

    दरख़्तों की टहनियां एक दूसरे से लिपट लिपट कर रोने लगीं। सूरज के लहू ने रिस रिस कर बादलों को रंग दिया।

    वक़्त रुक गया।

    फिर शीला की मद्धम आवाज़ आई, बालका जी, विजयवंती कौन थी?

    और फिर बालके ने विजयवंती की कहानी सुनानी शुरू की। बालका बोला, विजयवंती राज गढ़ी के महाराज मात्री राज की रानी थी। महाराज का सिंघासन उसके चरणों में धरा था। महाराज उसे आँखों पर बिठाते। वारे न्यारे जाते... उसकी कोई बात टालते, उल्टा पल्ले बांध लेते। उन्हें विजय सब रानियों से प्यारी थी। कैसे होती, सुंदरता में वो सबसे उत्तम थी। सिर्फ़ नाक नक़्शा ही नहीं, उसकी चाल-ढाल, रंग-रूप सुभाव सभी कुछ सुंदरता में भीगा हुआ था। पलकें उठाती तो दिए जल जाते। होंट खोलती तो फूल खिल उठते। बांह हिलाती तो नाग झूलते। भरपूर नजर से देखती तो रंग पिचकारी भिगो कर रख देती। महारानी राज भवन में बड़े आनंद से जीवन गुजार रही थी।

    बालका रुक गया। फिर कुछ देर बाद बोला, फिर एक रोज़ आधी रात के समय महारानी का द्वार बजा, वो समझी, महाराज आए हैं। उठकर दरवाज़ा खोला तो क्या देखती है कि महाराज नहीं एक बूढ़ी खूसट स्त्री खड़ी है।

    कौन है तू? वो ग़ुस्से से चिल्लाई।

    उसकी आवाज़ सुनकर महारानी की बांदी शोषी जाग उठी और दौड़ कर दरवाज़े पर गई। उसकी इतनी जान कि आधी रात को महारानी का दरवाज़ा खटखटाए। रानी ने शोषी से कहा, कौन है तू? शोषी बुढ़िया की तरफ़ झपटी।

    मैं शिव बाला हूँ। बुढ़िया ने जवाब दिया, मेरा दारू खत्म हो गया है। दारू बिना मेरी रात नहीं कटेगी। मैंने सोचा कि रानी के आगे झोली फैलाऊँ। जो कृपा करें तो मेरी रात कट जाये।

    तू स्त्री हो के दारू पीती है। रानी ने घुन खा कर झुरझुरी ली।

    महारानी, जो मैं स्त्री होती तो दारू पीने की क्या ज़रूरत थी। जब मैं स्त्री थी तो दारू पीती नहीं थी। पिलाया करती थी। लेकिन अब... अब मैं वो दिन भूलने के लिए दारू पीती हूँ।

    ये क्या बोल रही है शोषी? विजय ने कहा, कहती है, मैं स्त्री नहीं।

    शिव बाला बोली, स्त्री एक सुगन्द होती है जो कुछ दिनां रहती है, फिर उड़ जाती है और फिर फूल की जगों डंठल रह जाता है।

    तू राज भवन की बांदी है क्या? शोषी ने पूछा।

    नहीं, शिव बाला ने कहा, मैं बांदी नहीं हूँ। आज से तीस वर्ष पहले मैं भी इसी रंग भवन में रहती थी। इसी दिलाँ में जिसमें तू रहती है। इसी सेज पर सोती थी। जब महाराज मात्री राज के पिता राज-सिंघासन पर बिराजमान थे। महाराज मुझे आँखों पर बिठाते थे। जैसे तुझे बिठाते हैं। बात मुँह से निकलती तो पूरी हो जाती। ये सौ चोंचले सुंदरता के कारन थे। जैसे आज तेरे चाव-चोंचले हैं। फिर एक दिन आएगा जब तू भी उन दिनों को भूलने के लिए दारू का सहारा लेगी।

    ये सुनकर विजय का दिल धक से रह गया। वो सोच में पड़ गई। तो क्या ये सारी चाननी रूप की है? मैं कुछ भी नहीं?

    कुछ भी नहीं। शिव बाला ने जवाब दिया, जब तक दुकान सजी है। ग्राहकों की भीड़ है। जब दुकान लुट जाये तो स्त्री को कौन जाने है महारानी।

    तू बकती है, सब झूटी है। विजय ने चीख़ कर कहा, ऐसा नहीं हो सकता, नहीं हो सकता।

    बालका रुक गया।

    दास ने चौंक कर देखा। तो पड़ा हुआ फल जल कर काला हो गया था।

    बिमला सर झुकाए चटाई को कुरेद रही थी।

    शीला की निगाहें चलते बादलों पर टिकी हुई थीं।

    फिर क्या हुआ बालक महाराज? दास की आवाज़ सुनकर वो सब चौंक पड़े, बालके ने बात चला दी। बोला,

    शिव बाला के जाने के बाद विजय रानी बेकल हो गई। क्या ये सच है सुंदरता ही सभी कुछ है? स्त्री किसी गिनती में नहीं? नहीं, ये नहीं हो सकता। ये झूट है। शोषी ने उसे बहुत समझाया। महारानी सच के खोज की लगन लगा। सच कोई मीठा फल नहीं। वो झूट जो शांत कर दे, उस सच से अच्छा है जो अंदर भट्टी सुलगावे है। परंतु महारानी को सच की ढूंढ का ताप चढ़ा था। बोली, मनुश की रथ में दो पहिये लगे हैं। पुरुष और स्त्री। रथ कैसे चल सकती है, जद तोड़ी दोनों पहिये बराबर हों।

    नहीं रानी। शोषी ने कहा, दो पहिये बराबर नहीं। कारन ये कि पुरुष का पहिया चले है। स्त्री खाली सजाट के लिए है। चलता नहीं।

    बांदी ने विजय को बहुत समझाया पर वो मानी। बालका रुक गया। फिर उसने सर उठा कर बिमला शीला की तरफ़ देखा। बोला, कन्याओ! जिसके मन में सच की ढूंढ का कीड़ा लग जाये फिर जीवन भर उसे सुख मिलता है शांति।

    ये क्या कह दिया बालक महाराज? दास बोला।

    द्वार का दास बालक ने कहा, सच को अपनाओ, सच जियो परंतु सच की ढूंढ में निकलना। सदा चलते रहोगे। चलने के भर में जाओगे। रस्ता होगा। डंडी, और... और कहीं पहुँचोगे। सिर्फ़ चलना, चलते रहना। बालके ने आह भरी और कहानी सुनाने लगा, लाख समझाने पर भी विजय रानी सच की ढूंढ में चल निकली। सबसे पहले उसने महाराज को परखने की ठानी कि वो मुझे बराबर का जानें हैं कि नहीं। उसके मन में चिंता का कांटा लग गया। जूँ-जूँ उस की चिंता बढ़ती गई, तूं तूं महाराज उसे अपने ध्यान की गोद में झल्लाते गए। उसके सामने यूं सीस नवाते गए जैसे वो सचमुच की देवी हो। जूँ-जूँ वो देवी को मनाते गए, तूं तूं रानी की कल्पना बढ़ती गई, महाराज मुझे मूर्ती बनाइऐ। मंदिर में बिठाईए। अपने पास बिठाईए, अपने बराबर जानिए।

    महाराज को समझ में आता था कि बराबर कैसे जानें। जिसे ध्यान दिया जाये। मान दिया जाये, ऊंचा बिठाया जाये, वो बराबर क्यों चाहे। जिसे सारा दिया जाये वो आधा क्यों मांगे?

    विजय रानी को जल्द ही पता चल गया कि महाराज उसे देवी के समान बना सकते हैं, महारानी बना सकते हैं, चहेती समझ सकते हैं, साथी नहीं बना सकते।

    ये जान कर विजय ने ठान ली कि वो राज भवन को छोड़ देगी। रानी नहीं बल्कि स्त्री बन कर जिएगी। सुंदरता के ज़ोर पर नहीं, जीओ के ज़ोर पर। भभूत मलकर सुंदरता छुपाए रखेगी और किसी के साथ ब्याह करेगी जब तक वो उसे बराबर की समझे, साथी जाने।

    फिर एक रात जब गरज-चमक जोरों पर थी और राज भवन के चौकीदार कोनों में सहमे बैठे थे तो विजय ने भेस बदला और शोषी को साथ लेकर चोर दरवाज़े से बाहर निकल गई। चलते चलते वो राज नगरी से दूर एक शहर में रुकीं। विजय गुजारे के लिए फुलकारियां बनाती, शोषी उन्हें बाजार में बेच कर देती।

    कुछ दिनों में विजय की फुलकारियों की मांग बढ़ गई। इतनी साफ़ सुथरी फुलकारियां कौन बनावे है? मंडी में बातें होने लगीं। फिर बिदेश से एक घबरो ब्योपरी आनंद निकला। फुलकारियां देखकर भौंचक्का रह गया। उसने शोषी को ढूंढ निकाला। बोला, ये फुलकारियां कौन काढ़ती है? मुझे उसके पास ले चल। शोषी उसे घर ले आई। विजय को देखकर वो फुलकारियां भूल गया। विजय फुलकारियां दिखाती रही। आनंद विजय को देखता रहा। विजय समझती थी कि भभूत सुंदरता को ढाँप लेती है। आनंद सोचता रहा कि जिस गुण को स्त्री उछालती है, ये श्रीमती उसे छुपा रही है। अवश् कोई भेद है।

    आनंद बहुत सयाना था। उसने शहर शहर का पानी पी रखा था। उसने सोचा, पांव धीरे धीरे धरो। बड़ी फिसलन है और जो गिरा तो यहां सहारा देकर उठाने वाला कोई नहीं। पहले तेल देख, तेल की धार देख, फिर पांव धरना, तो वो तेल की धार जांचने के लिए फुलकारियों के बहाने विजय के घर आने जाने लगा।

    दो-चार फेरों में उसे पता चल गया कि सुंदरता की बात नहीं चलेगी। प्रेम की बात नहीं चलेगी। मुलायम बात नहीं चलेगी, लगाव की नहीं, बेलाग, खुरदुरी, गँवार।

    वो बोला, बी काढ़न। तो तू चियूंटी की चाल चले है। पर मुझे तो बहुत सी फुलकारियां चाहिऐं ताकि उन्हें बेच कर अपना पेट पाल सकूँ।

    फिर चार एक दिन के बाद आनंद विजय से बहुत बिगड़ा। सब झूट-मूट, बोला, तू काम-चोर है री। मैं तेरे सर पर बैठ कर काम कराऊँगा। इस बहाने वो सारा सारा दिन विजय के घर रहने लगा। जूँ-जूँ वो उसके नेड़े होता गया। उसका मन हाथों से निकलता गया।

    फिर एक दिन आनंद ने उसकी बांह पकड़ ली। बोला, बी काढ़न, मेरा धंदा नहीं चलता। इतनी कमाई भी नहीं होती कि सूखा गुजारा कर सकूँ। जो तू मुझसे ब्याह कर ले तो जीवन सुखी हो जाये। तू फुलकारियां काढ़े, मैं उन्हें बेचूं, काम तेरा, दौड़ धूप मेरी।

    विजय उसकी चाल में गई, उसकी ममता जाग उठी, बोली, मैं तो उससे ब्याह करूँगी जो पत्नी को बराबर का समझे। उसे देवी बनाए बांदी। अपना जीवन साथी जाने, दुख सुख का साथी।

    ठीक है। आनंद बोला, तू मेरी साथिन है, साथिन रहेगी।

    जब विजय दुल्हन बनी तो भभूत का पर्दा भी उठ गया। अंदर से रानी निकल आई। आनंद धक से रह गया। पर भू ऐसी मूर्ती...! बालका रुक गया।

    दास मुँह खोले बैठा था। चूल्हा जल रहा था। तवा जो खाली पड़ा था तप तप कर काला हो गया था। पेड़ा हाथ में यूं धरा था जैसे बालक के हाथ का कद्दू हो।

    शीला की निगाहें घास पर बिछी हुई थीं जैसे ढूंढ में लगी हों। बिमला की आँखें डबडबा रही थीं। अब रोई कि अब रोई।

    टीले पर साये मंडला रहे थे। बादलों में आग चल रही थी।

    शाम दबे-पाँव जा रही थी। रात अपने पर फड़फड़ा रही थी।

    फिर क्या हुआ बालक जी? दास ने जैसे हिचकी ली।

    बालक बोला, आनंद बहुत बड़ा सौदागर था। हवेलियाँ थीं, नौकर-चाकर थे। धन-दौलत थी। किस बात की कमी थी उसे, वो तो विजय को राम करने के लिए उसने निर्धन का स्वाँग रचाया था। बस एक बात सच थी। वो तन-मन धन से विजय का हो चुका था।

    उसका बाहर जाने को जी नहीं चाहता पर क्या करता, इतना बड़ा व्यापार था। उसकी देख-भाल तो करनी ही थी। उसे जाना ही पड़ता। फुलकारियां बेचने के बहाने चला जाता, दिनों बाहर रहता। चला जाता तो जैसे घर का ध्यान ही हो। जाता तो जैसे जाने से होल खाता हो।

    फिर ये भी था कि उसने विजय को फुलकारियां काढ़ने से रोक दिया था। बोला, पत्नी तू साल में एक ठाठ की फुलकारी बना दिया कर। ऐसी जो राजा-रानी जोगी हो। ऐसी जो एक बेच ली तो घर में लहर बहर हो गई।

    इस पर विजय सोच में पड़ गई। सोचती रही, सोचती रही। जब वो आया तो उसे कहने लगी, रे तू मुझसे अपने व्योपार की बात क्यों नहीं करता?

    आनंद ने जवाब दिया, साथिन व्योपार में ऊंच नीच होती है। फन फ़रेब होता है। छल बट्टे होते हैं, व्योपार की बात सुनकर क्या करेगी?

    विजय बोली, देख में तेरी साथिन हूँ, बराबर की साथिन और साथी खाली सुख का नहीं होता, दुख का भी होता है। ऊंच का नहीं नीच का भी होता है। तू मुझे अपने व्योपार की सारी बात बता। अपने दुख गिनवा।

    इस पर आनंद ने एक लं