सुर्ख़ फूल
स्टोरीलाइन
ये कहानी रूसी मुसन्निफ़ वसेवोलोड गार्शिन (Vsevolod Garshin) के मशहूर अफ़साने 'सुर्ख़ फूल' (The Red Flower) का उर्दू तर्जुमा है। ये एक ऐसे शदीद ज़ेहनी मरीज़ की दास्तान है जिसे पागल-ख़ाने लाया जाता है। मरीज़ ख़ुद को एक अज़ीम आलमी मिशन पर मामूर समझता है जहाँ उसका मक़सद दुनिया से तमाम बुराइयों का ख़ात्मा करना है। हॉस्पिटल के बाग़ में उगे हुए एक शोख़ सुर्ख़ फूल को वो काएनात की तमाम-तर बुराइयों और मन्फ़ी ताक़तों का मरकज़ समझ बैठता है। अपने जुनून में वो उस फूल को तोड़ कर अपने सीने से छुपा लेता है ताकि उसके ज़हर को अपने अन्दर जज़्ब कर के दुनिया को शर से निजात दिला सके। ये कहानी इंसानी नफ़सियात, दीवानगी, और ख़ैर-ओ-शर के दरमियान जारी एक मुबहम मगर दर्दनाक जंग की अक्कासी करती है।
पहला
”शहनशाह मुअज़्ज़म पीटर अव्वल के हुक्म से मैं इस पागलख़ाने का मुआयना करने आया हूँ!“
यह अल्फ़ाज़ उसने निहायत ऊँची, तेज़ और गूँजदार आवाज़ में कहे। पागलख़ाने का सेक्रेटरी स्याही से दाग़दार मेज़ पर रखे हुए एक बड़े, पुराने रजिस्टर में नए मरीज़ का अंदराज कर रहा था। यह बात सुनकर वह मुस्कराए बग़ैर न रह सका। मगर वह दोनों नौजवान, जो इस मरीज़ को यहाँ तक लाए थे, हँसने के मूड में हरगिज़ नहीं थे। गुज़श्ता अड़तालीस घंटों से वह एक लम्हा भी न सोए थे। सारा सफ़र उन्होंने इसी पागल के साथ जागते हुए गुज़ारा था।
उसकी हालत देखने के क़ाबिल न थी। उसकी ख़ून आलूद, फैली हुई आँखें, जिन्होंने दस दिन से नींद न देखी थी, बेहरकत मगर दहकते हुए शोअलों की तरह चमक रही थीं। निचला होंट बार-बार बेइख़्तियार फड़क उठता था। उलझे हुए घुँघरियाले बाल माथे पर कलगी की तरह बिखरे हुए थे। वह भारी मगर तेज़ क़दमों से कमरे के एक कोने से दूसरे कोने तक चक्कर लगा रहा था।
”उसे वार्ड में ले जाओ... दाईं तरफ़।“
”हाँ, मुझे मालूम है। मैं पिछले साल भी यहाँ आ चुका हूँ। तब हमने इस अस्पताल का मुआयना किया था। मैं सब कुछ जानता हूँ, इसलिए तुम लोगों के लिए मुझे धोखा देना आसान नहीं होगा।“ पागल ने जवाब दिया।
उसे मुक़र्ररा वार्ड की तरफ़ ले जाया जा रहा था। यह एक बड़ी पत्थर की इमारत थी। यहाँ तक़रीबन तीन सौ लोग रहते थे। हर छोटे कमरे में चार या पाँच बिस्तर रखे थे। उसे ग़ुस्लख़ाने में ले जाया गया। जब उसकी गर्दन के पिछले हिस्से पर एक ख़ास मरहम लीपा गया तो वह दहशत से काँप उठा। उसके ज़ेहन में कई ख़ौफ़नाक और बेतुकी सोचें तेज़ी से गर्दिश करने लगीं। यह क्या हो रहा था? क्या यह कोई तफ़्तीशी अदालत थी? कोई ख़ुफ़िया अज़ीयतगाह, जहाँ उसके दुश्मनों ने उसे ख़त्म करने का फ़ैसला कर लिया था? या शायद यह ख़ुद जहन्नम थी? आख़िरकार वह इस नतीजे पर पहुँचा कि यह किसी तरह का इम्तिहान है।
उसकी शदीद मुज़ाहमत के बावजूद उसके कपड़े उतार दिए गए। बीमारी ने उसकी ताक़त को दोगुना कर दिया था। उसे क़ाबू करने की कोशिश करने वाले कई मुलाज़िम उसने आसानी से ज़मीन पर पटख दिए। चार आदमियों ने मिलकर उसे क़ाबू किया और पानी में डाल दिया। उसे पानी खौलता हुआ महसूस हुआ। उसके पागल ज़ेहन में एक बेरब्त और टुकड़ों में बँटी हुई सोच चमकी कि शायद उसे खौलते पानी और दहकते हुए लोहे से कोई इम्तिहान देना पड़ रहा है।
पानी उसके मुँह में भर जाने की वजह से उसकी आवाज़ दब गई थी। फिर भी वह हाथ-पाँव मारता रहा। मगर मुलाज़िमों ने उसके बाज़ू और टाँगें मज़बूती से पकड़ रखी थीं। वह कभी दुआएँ माँगता, कभी बद्दुआएँ देता। वह उस वक़्त तक चीख़ता रहा जब तक उसकी सारी ताक़त ख़त्म न हो गई। आख़िरकार आँखों में गर्म आँसू लिए उसने एक ऐसा जुमला कहा जिसका उसकी बाक़ी बातों से कोई तअल्लुक़ नहीं था:
”ऐ अज़ीम शहीद सेंट जॉर्ज! मैं अपना जिस्म तेरे हाथों में देता हूँ। मगर रूह नहीं!“
एक सिपाही ने खुरदरे तौलिये से उसकी गर्दन रगड़ दी। मरहम के लेप के साथ उसकी ऊपर की खाल भी उतर गई और वहाँ एक बदसूरत ज़ख़्म रह गया। यह बहुत अज़ीयतनाक अमल था। वह पूरी शिद्दत से आगे को झपटा, मुलाज़िमों की गिरफ़्त छुड़ाई और उसका नंगा जिस्म पत्थर के फ़र्श पर लुढ़क गया।
दूसरा
वह रात को जागा। हर तरफ़ ख़ामोशी थी। साथ वाले बड़े कमरे से सोए हुए मरीज़ों की साँसों की आवाज़ आ रही थी। अचानक ग़ैरमामूली वुज़ाहत के साथ गुज़श्ता एक महीने के तमाम वाक़ियात उसके सामने आ गए। उसे समझ आ गई कि वह बीमार है और उसकी बीमारी की नौइयत क्या है। टूटे-फूटे ख़यालात, अल्फ़ाज़ और हरकतों की एक पूरी क़तार उसकी याददाश्त में उभर आई, जिससे उसका पूरा जिस्म काँप उठा।
”लेकिन अब सब ख़त्म हो गया है, ख़ुदा का शुक्र है, अब सब ख़त्म हो गया।“ वह बड़बड़ाया और दोबारा सो गया।
यह एक परेशान इंसान की गहरी, भारी नींद थी। ऐसी नींद जिसमें न ख़्वाब थे, न हरकत, और साँस भी बमुश्किल महसूस होती थी।
तीसरा
”तुम्हारी तबीयत कैसी है?“ अगले दिन डॉक्टर ने उससे पूछा।
”बहुत अच्छी!“ उसने जवाब दिया।
”क्या तुम जानते हो तुम कहाँ हो?“
”क्यों नहीं डॉक्टर साहब! मैं पागलख़ाने में हूँ। लेकिन अगर हक़ीक़त समझ ली जाए तो इसकी कोई अहमियत नहीं रहती, बिल्कुल कोई अहमियत नहीं।“
डॉक्टर उसे मुसलसल देखता रहा।
”आप मुझे इतनी ग़ौर से क्यों देख रहे हैं? आप मेरे दिल का हाल नहीं पढ़ सकते। लेकिन मैं आपके दिल को साफ़ पढ़ सकता हूँ! आपने इन बदक़िस्मत लोगों का यह हुजूम क्यों जमा कर रखा है, और उन्हें यहाँ क्यों क़ैद कर रखा है? मेरे लिए तो यह सब बराबर है। जब इंसान उस मक़ाम तक पहुँच जाता है कि उसकी रूह में कोई अज़ीम ख़याल, कोई आलमगीर सोच समा जाए तो फिर उसके लिए यह बेमानी हो जाता है कि वह कहाँ रहता है या क्या महसूस करता है। यहाँ तक कि ज़िंदा रहना या मर जाना भी... क्या ऐसा नहीं है?“
”शायद ऐसा ही हो।“ डॉक्टर ने जवाब दिया।
”मगर वह चीज़ मुझे हासिल हो चुकी है और जब मुझ पर यह हक़ीक़त आश्कारा हुई तो मुझे यूँ महसूस हुआ जैसे मैं दोबारा पैदा हो गया हूँ। मेरे हवास पहले से ज़्यादा तेज़ हो गए हैं। मेरा दिमाग़ पहले से कहीं बेहतर काम करता है। जिस बात तक पहुँचने के लिए पहले लंबी सोच-बिचार और अंदाज़ों की ज़रूरत होती थी, अब मैं उसे फ़ौरन समझ लेता हूँ। मैं उन ख़यालात का तजुर्बा कर रहा हूँ जिनमें वक़्त और जगह बुनियादी हैसियत रखते हैं। मैं तमाम ज़मानों में ज़िंदा हूँ। मैं जगह की क़ैद से आज़ाद हूँ। हर जगह भी हूँ और कहीं भी नहीं। मेरे लिए यह कोई मानी नहीं रखता कि आप मुझे यहाँ क़ैद रखते हैं या आज़ाद कर देते हैं, मैं आज़ाद हूँ या पाबंद! मैंने देखा है कि यहाँ कुछ और लोग भी मेरे जैसे हैं। लेकिन यहाँ के ज़्यादातर मरीज़ों की हालत निहायत ख़ौफ़नाक है। आप उन्हें आज़ाद क्यों नहीं कर देते?“
डॉक्टर ने उसकी बात काटते हुए कहा, ”तुम वक़्त और जगह के बग़ैर ज़िंदगी गुज़ार रहे हो। लेकिन तुम यह तो मानोगे कि हम इस वक़्त इसी कमरे में मौजूद हैं, और अभी छह मई सन 18 की सुबह के साढ़े दस बजे हैं। इसके बारे में तुम क्या कहोगे?“
”कुछ नहीं। मेरे लिए यह कोई अहमियत नहीं रखता कि मैं कहाँ हूँ और कब ज़िंदा हूँ। अगर यह मेरे लिए बराबर है, तो क्या इसका मतलब यह नहीं कि मैं हर जगह और हर वक़्त मौजूद हूँ?“
डॉक्टर मुस्करा दिया।
”क्या ख़ूब मंतिक़ है!“ उसने उठते हुए कहा। ”मेरा ख़याल है तुम दुरुस्त कहते हैं। ख़ुदा हाफ़िज़। क्या सिगार लोगे?“
वह रुका। सिगार लिया और घबराहट में उसका सिरा दाँतों से काट दिया।
”यह सोचने में मदद देता है। यह दुनिया एक छोटी सी कायनात है। एक तरफ़ अल्कली है और दूसरी तरफ़ तेज़ाब... दुनिया में भी यही तवाज़ुन क़ायम है, जहाँ मुख़ालिफ़ क़ुव्वतें एक दूसरे को ख़त्म करके बराबर कर देती हैं। ख़ुदा हाफ़िज़, डॉक्टर साहब।“
डॉक्टर आगे बढ़ गया। मरीज़ को अकेला छोड़ दिया गया। वह फिर भी बेक़रारी से कमरे के एक सिरे से दूसरे सिरे तक तेज़ क़दमों से चलता रहा। उसके लिए चाय लाई गई। वह बैठा तक नहीं, दो घूँटों में पूरा कप ख़ाली कर दिया, और एक सफ़ेद रोटी के बड़े टुकड़े का भी एक लम्हे में सफ़ाया कर दिया। बाद में वह कमरे से बाहर निकल गया और आराम किए बग़ैर कई घंटे तक अपनी मामूल की तेज़ और भारी चाल के साथ पूरी इमारत में एक सिरे से दूसरे सिरे तक चलता रहा।
उस दिन बारिश हो रही थी, इसलिए मरीज़ों को बाग़ में जाने की इजाज़त नहीं थी। जब मुआविन डॉक्टर नए मरीज़ को तलाश करने लगा तो लोगों ने राहदारी के आख़िरी सिरे की तरफ़ इशारा किया। वह वहाँ खड़ा था। शीशे के दरवाज़े की तरफ़ चेहरा किए। और उसकी नज़रें एक फूलों की क्यारी पर जमी हुई थीं। ऐसा लगता था जैसे उसकी पूरी तवज्जोह एक शोख़ सुर्ख़ फूल ने अपनी तरफ़ खींच ली हो, जो पोस्त के फूल जैसा दिखाई देता था।
”तुम्हारा वज़न करना है।“ मुआविन डॉक्टर ने उसके कंधे को छूते हुए कहा।
मरीज़ छोटे से तराज़ू के तख़्ते पर चढ़ गया। मुआविन डॉक्टर ने वज़न किया और रजिस्टर में उसके नाम के सामने लिखा: 109 पाउंड। दूसरे दिन वज़न 107 पाउंड था। तीसरे दिन 106 पाउंड।
अगर यही हाल रहा तो यह ज़िंदा नहीं बचेगा, डॉक्टर ने कहा और ख़ास हुक्म दिया कि उसे अच्छी ख़ुराक दी जाए।
ग़ैरमामूली भूख के बावजूद मरीज़ हर रोज़ कमज़ोर और दुबला होता गया। वह बहुत कम सोता और पूरे-पूरे दिन मुसलसल हरकत में गुज़ारता था।
चौथा
उसे इस बात का शऊर था कि वह पागलख़ाने में है। और यह भी मालूम था कि वह बीमार है। दिन भर की बेचैन और मुसलसल हरकत के बाद जब रात की ख़ामोशी छा जाती तो वह जाग उठता। उस वक़्त उसे अपने पूरे जिस्म में गठिया जैसे दर्द महसूस होते, सर पर एक ख़ौफ़नाक बोझ महसूस होता, मगर उसके बावजूद उसकी समझ-बूझ बिल्कुल मौजूद होती। शायद यह कैफ़ियत रात की ख़ामोशी और धुँधली तारीकी में बैरूनी एहसासात के कम हो जाने की वजह से पैदा होती थी या शायद अचानक जागने वाले दिमाग़ की कमज़ोर सी कोशिशों का नतीजा थी, जिसकी बदौलत उन चंद लम्हों के लिए उसे अक़्ल की एक झलक मिल जाती और वह अपनी हालत को ऐसे समझ लेता जैसे वह बिल्कुल मामूल की हालत में हो।
लेकिन जैसे ही दिन चढ़ता, रोशनी वापस आती और अस्पताल में ज़िंदगी की चहल-पहल दोबारा शुरू होती, वह दूसरी कैफ़ियत फिर उस पर ग़ालिब आ जाती। बीमार दिमाग़ उसका मुक़ाबला न कर पाता और वह दोबारा दीवानगी की हालत में चला जाता। वह एक अजीब हालत में था जहाँ सही समझ-बूझ और बेरब्त ख़यालात एक साथ मिल गए थे। वह जानता था कि उसके इर्दगिर्द मौजूद सब लोग बीमार हैं। लेकिन सब में उसे उनके अंदर का चेहरा नज़र आता था जिससे वह पहले से वाक़िफ़ था।
इस पागलख़ाने में हर उम्र और हर मुल्क के लोग मौजूद थे। यहाँ ज़िंदा भी थे और मुर्दा भी। यहाँ मशहूर शख़्सियात, बहादुर लोग, और हालिया जंग में मारे जाने वाले सिपाही भी थे। उसे महसूस होता था कि वह किसी जादुई दुनिया में पहुँच गया है। ऐसी दुनिया जिसमें पूरी ज़मीन की ताक़त सिमट आई है। वह एक पुरजोश और मग़रूर कैफ़ियत में ख़ुद को इस दुनिया का मरकज़ समझता था। पागलख़ाने में उसके यह सब साथी एक बड़े मक़सद की तकमील के लिए जमा हुए थे। ऐसा मक़सद जो उसके ख़याल में ज़मीन से बुराई के ख़ातमे का कोई अज़ीमुश्शान मंसूबा था। वह नहीं जानता था कि यह काम क्या होगा, मगर उसे अपने अंदर इतनी ताक़त महसूस होती थी कि वह उसे अंजाम दे सकता है।
वह समझता था कि वह दूसरों के ख़यालात पढ़ सकता है। आम चीज़ों में भी उसे पूरी तारीख़ नज़र आती थी। बाग़ के बड़े-बड़े क़दीम दरख़्त उसे माज़ी की बहुत सी दास्तानें सुनाते थे। यह अस्पताल, जो हक़ीक़त में एक पुरानी इमारत थी, वह उसे पीटर-ए-आज़म के ज़माने की तामीर समझता था, और उसे यक़ीन था कि पोल्टावा की जंग के वक़्त ज़ार ने इसी इमारत में क़ियाम किया था। वह यह सब कुछ दीवारों पर, झड़ते हुए प्लास्टर पर, और बाग़ में पड़ी हुई टूटी ईंटों और खपरों पर पढ़ता था। उसे लगता था कि इस मकान और बाग़ की पूरी तारीख़ इन चीज़ों पर लिखी हुई है। वह छोटे से मुर्दाख़ाने को भी बहुत से ऐसे लोगों से आबाद समझता था जो मुद्दतों पहले मर चुके थे।
इसी दौरान मौसम साफ़ और ख़ुशगवार हो गया। मरीज़ कई-कई दिन खुली हवा में गुज़ारने लगे। बाग़ के जिस हिस्से में मुमकिन था, वहाँ फूल लगाए गए थे। बाग़ के एक कोने में घने चेरी के दरख़्त लगे हुए थे। वहाँ दरख़्तों की क़तारें भी थीं। दरमियान में एक छोटी सी ऊँची जगह पर बाग़ की सबसे ख़ूबसूरत गुलाब की झाड़ी खिली हुई थी। किनारों पर शोख़ फूल खिले थे, जबकि दरमियान में एक बड़ा फूल खिला हुआ था जिस पर सुर्ख़ धब्बे थे। यह फूल हक़ीक़त में पूरे बाग़ का मरकज़ मालूम होता था। वह सबसे बुलंद नज़र आता था, और यह बात किसी की नज़र से छिपी न रह सकती थी कि वहाँ रहने वाले लोग इस फूल को किसी पुरअसरार अकीदत की निगाह से देखते थे।
नए मरीज़ को भी यह फूल आम फूलों जैसा न लगता था, बल्कि उसे महसूस होता था जैसे यह बाग़ और इमारत का कोई मुक़द्दस मुहाफ़िज़... प्लाडिम (क़दीम यूनानी रिवायत में कोई ऐसी मुक़द्दस चीज़ या तिलिस्म है जिसे किसी शहर या जगह का मुहाफ़िज़ समझा जाता था) हो।
जब वह पहली बार बाग़ में दाख़िल हुआ तो उसकी नज़र फ़ौरन उन्हीं शोख़ फूलों पर पड़ी। वहाँ सिर्फ़ दो ही फूल थे। इत्तिफ़ाक़ से वह दूसरे पौधों से अलग एक ग़ैरआबाद जगह पर उगे हुए थे, इसलिए घनी जड़ी-बूटियों और ऊँची घास ने उन्हें चारों तरफ़ से घेर रखा था।
मरीज़ एक-एक करके दरवाज़े से बाहर निकल रहे थे। दरवाज़े पर एक ख़िदमतगार खड़ा था जो हर शख़्स को सफ़ेद मोटे सूती कपड़े की एक टोपी देता था, जिसके सामने सुर्ख़ रंग का एक निशान सिला हुआ था। यह टोपियाँ जंग के ज़माने में इस्तेमाल होती थीं और नीलामी से ख़रीदी गई थीं।
मरीज़ को उस सुर्ख़ निशान में कोई पोशीदा मानी नज़र आया। उसने अपनी टोपी उतारी, पहले उस सुर्ख़ निशान को देखा, फिर पोस्त के फूलों को। फूलों का सुर्ख़ रंग उस निशान से कहीं ज़्यादा चमकदार था। वह सीढ़ियाँ उतर गया। इधर-उधर नज़र दौड़ाई और जब देखा कि ख़िदमतगार उसके पीछे नहीं है तो वह क्यारी फाँदकर पोस्त के पौधे की तरफ़ बढ़ा और हाथ आगे बढ़ाया, मगर अभी उसने फूल तोड़ने का फ़ैसला नहीं किया था।
उसे अपने फैले हुए हाथ में एक अजीब सी तपिश और दर्द महसूस हुआ, फिर यही कैफ़ियत पूरे जिस्म में फैल गई, जैसे सुर्ख़ पंखुड़ियों से कोई पुरअसरार ताक़त निकलकर उसके वुजूद में उतर रही हो।
वह मज़ीद क़रीब गया और फूल को छूने के लिए हाथ बढ़ाया, लेकिन उसे महसूस हुआ कि फूल अपना दिफ़ा कर रहा है और उसमें से कोई ज़हरीली, जानलेवा साँस निकल रही है।
उसका सर चकराने लगा। उसने आख़िरी कोशिश की और जैसे ही फूल के तने को पकड़ा, अचानक एक भारी हाथ उसके कंधे पर आ पड़ा। वह चौकीदार था।
”फूल तोड़ना मना है“, बूढ़े किसाननुमा चौकीदार ने कहा।
”और क्यारियों पर क़दम मत रखा करो। तुम बहुत ही पागल हो, अगर हर एक के लिए एक फूल चाहिए तो पूरा बाग़ ही ख़त्म हो जाएगा!“
मरीज़ ने चौकीदार के चेहरे की तरफ़ देखा। ख़ामोशी से उसके हाथों से ख़ुद को छुड़ाया और गहरी बेचैनी के आलम में रास्ते पर चलने लगा।
”ओह, बेचारे! मैं उसे ख़त्म करके रहूँगा। आज नहीं तो कल, हमारी ताक़त का मुक़ाबला होगा। और अगर मैं हार भी गया तो क्या फ़र्क़ पड़ता है?“
वह शाम तक बाग़ में ख़ुद को बहलाता रहा। नए साथी बनाता, अजीब-ओ-ग़रीब बातें करता, और दूसरे मरीज़ भी उसकी बेरब्त और पुरअसरार बातों में ख़ासी दिलचस्पी लेते दिखाई देते थे। वह कभी एक साथी के साथ टहलता, कभी दूसरे के साथ। दिन के आख़िर में उसे यक़ीन हो गया कि सब कुछ तैयार है, जैसा कि वह अपने दिल में कहता था।
”जल्द, बहुत जल्द, लोहे की सलाख़ें टूट जाएँगी। यह सारे क़ैदी यहाँ से निकल जाएँगे और दुनिया के कोने-कोने में फैल जाएँगे। पूरी दुनिया काँप उठेगी। वह अपनी पुरानी चादर उतार फेंकेगी और एक नई शानदार ख़ूबसूरती में ज़ाहिर होगी।“
वह उस फूल को भूल चुका था, लेकिन जब वह दाख़िली सीढ़ियों पर चढ़ने लगा तो फिर उसकी नज़र उस घनी और अँधेरी घास में पड़ी, जिस पर ओस के क़तरे अभी-अभी गिरना शुरू हुए थे। वहाँ उसे दो छोटी सुर्ख़ चीज़ें दिखाई दीं। वह बाक़ी लोगों से पीछे रह गया और उस मौक़े का इंतज़ार करने लगा जब चौकीदार दूसरी तरफ़ देखे। किसी ने नहीं देखा कि वह क्यारी फाँद गया, फूल तोड़ा और जल्दी से उसे अपनी क़मीज़ के अंदर सीने से लगाकर छिपा लिया। जब ओस से भीगे हुए ताज़ा पत्ते उसके जिस्म से लगे तो वह ख़ौफ़ के मारे ज़र्द पड़ गया और उसकी आँखें दहशत से फैल गईं। उसकी पेशानी पर ठंडा पसीना आ गया।
अस्पताल के चराग़ रोशन कर दिए गए थे। खाने के इंतज़ार में ज़्यादातर मरीज़ अपने बिस्तरों पर लेटे थे, सिवाए चंद बेचैन लोगों के जो राहदारी और कमरों में इधर-उधर चल रहे थे। हमारा मरीज़ भी उन्हीं में शामिल था। वह अपने बाज़ू सीने पर ज़ोर से लपेटे हुए मुसलसल चल रहा था। ऐसा लगता था जैसे वह इसी तरह फूल को कुचल देना चाहता हो। जब भी कोई उसके क़रीब आता, वह ख़ौफ़ से पीछे हट जाता कि कहीं उसके कपड़े का किनारा भी फूल से न लग जाए।
”दूर रहो! दूर रहो!“ वह चीख़ उठता।
वह और तेज़ चलने लगा। उसके क़दम और लंबे होते गए। वह एक घंटा, दो घंटे तक इसी तरह चलता रहा, अंदर ही अंदर शदीद इज़्तिराब और बेचैनी में मुब्तला।
”मैं तुम्हें थका दूँगा, मैं तुम्हारा गला घोंट दूँगा।“ वह ग़ुस्से से बड़बड़ाया। कई बार उसने ग़ुस्से में दाँत भी पीसे।
आधे घंटे के अंदर अस्पताल में सब लोग सो चुके थे, सिवाए एक शख़्स के। वह कोने वाले कमरे में अपने बिस्तर पर बग़ैर कपड़े उतारे लेटा हुआ था। उसका जिस्म बुख़ार की तरह काँप रहा था, और वह अपने सीने को शिद्दत से दबाए हुए था। उसे महसूस हो रहा था कि उसके सीने में कोई ऐसी ज़हरीली और जानलेवा चीज़ भर गई है जिसका दुनिया ने कभी नाम तक नहीं सुना।
पाँचवाँ
वो सारी रात एक लम्हे के लिए भी न सोया। उस ने वो फूल इस लिए तोड़ा था कि उसे अपने इस अमल में एक फ़र्ज़ नज़र आता था। जब उस ने पहली बार शीशे के दरवाज़े से बाग़ में झाँका था तो सुर्ख़ पंखुड़ियों वाले इस फूल ने फ़ौरन उस की तवज्जो अपनी तरफ़ खींच ली थी, और अब उसे महसूस होता था कि उस ने वो काम पूरा कर दिया है जो उसे दुनिया में अंजाम देना था। उस चमकदार सुर्ख़ फूल में उसे तमाम बुराई सिमटी हुई नज़र आती थी। उसे मालूम था कि पोस्त से अफ़यून तैयार की जाती है। शायद यही ख़याल था जो उस के ज़ेहन में बढ़ता गया, अजीब व ग़रीब शक्लें इख़्तियार करता गया और आख़िरकार एक ख़ौफ़नाक, ख़याली तसव्वुर बन गया।
उस की नज़र में वो फूल बुराई का हाकिम था। वो अपने अंदर दुनिया का तमाम बेगुनाह बहाया गया ख़ून समेटे हुए था इसी लिए तो उस का रंग इतना सुर्ख़ था। इंसानों के तमाम आँसू और उन की तमाम तल्ख़ियाँ भी उसी में जमा थीं। वो एक ख़ौफ़नाक और पुरअसरार वजूद था۔۔۔ ख़ुदा का उलट। बदी, तारीकी और तबाही की क़ुव्वत जो निहायत मासूम और बेज़रर सूरत में ज़ाहिर हुआ था। ज़रूरी था कि उसे तोड़ा जाए और मार दिया जाए। लेकिन बात सिर्फ़ इतनी न थी। ये भी ज़रूरी था कि मरने के वक़्त वो अपनी बुराई दुनिया पर न उंडेल सके। इसी लिए उस ने उसे अपने सीने से लगा कर छुपा लिया था। उसे उम्मीद थी कि सुबह तक फूल अपनी ताक़त खो देगा। उस की बुराई उस के सीने में, उस की रूह में मुन्तक़िल हो जाएगी, और वहाँ या तो वो उसे शिकस्त देगा या वो उसे शिकस्त देगी। फिर वो तबाह हो जाएगा। मर जाएगा। लेकिन एक सच्चे सिपाही की तरह मरेगा। इंसानियत का पहला मुहाफ़िज़ बन कर। क्योंकि अब तक किसी ने भी पूरी कायनात की तमाम बुराइयों से एक ही बार मुक़ाबला करने की जुरअत नहीं की थी। वो उसी ख़याली, ग़ैर-हक़ीक़ी जंग के बोझ तले पड़ा रहा, जैसे किसी दुश्मन से मुक़ाबला कर रहा हो। सुबह मुआविन डॉक्टर ने उसे तक़रीबन आख़िरी साँसों की हालत में पाया। लेकिन हैरत की बात ये थी कि कुछ ही देर बाद वो फिर कुछ सँभलता हुआ दिखाई दिया। वो बिस्तर से उछल कर उठा और पहले की तरह पूरे अस्पताल में घूमने लगा। वो मरीज़ों से और ख़ुद अपने आप से पहले से भी ज़्यादा ऊँची आवाज़ में और ज़्यादा बे-रब्त बातें करता रहा। उसे बाग़ में जाने की इजाज़त नहीं दी गई।
डॉक्टर ने देखा कि उस का वज़न मुसलसल कम हो रहा है, वो सोता नहीं, और हर वक़्त चलता ही रहता है, तो उस ने उसे मार्फ़ीन देने का हुक्म दिया। उस ने कोई मुज़ाहमत न की। ख़ुश-क़िस्मती से उस वक़्त उस के दीवाना-वार ख़यालात ने इस अमल को क़ाबिल-ए-क़बूल समझा। जल्द ही वो सो गया। वो गहरी नींद में चला गया और हर चीज़ भूल गया, यहाँ तक कि दूसरे फूल को भी, जिसे अभी तने से जुदा करना बाक़ी था। तीन दिन बाद उस ने वो दूसरा फूल भी तोड़ लिया, और ये सब बूढ़े चौकीदार की आँखों के सामने हुआ, जो उसे रोकने के लिए इतनी जल्दी न कर सका।
बूढ़ा उस के पीछे दौड़ा। मरीज़ ख़ुशी भरी चीख़ के साथ अस्पताल की तरफ़ भागा और अपने कमरे में पहुँच कर फूल को अपने सीने में छुपा लिया। ख़याली और पुरअसरार जंग दोबारा शुरू हो गई। मरीज़ को महसूस हुआ कि फूल के लंबे, साँप जैसे रेंगते हुए पत्ते, जो दरअसल बुराई के शिकंजे थे, उसे लपेट रहे हैं, उस का गला घोंट रहे हैं। उसे महसूस हुआ कि वो पत्ते अपने ख़ौफ़नाक ज़हर से उस के पूरे जिस्म को भर रहे हैं। वो रोया, ख़ुदा से दुआ की और अपने दुश्मन को बद-दुआएँ दें। आख़िरकार पागल ने सूखे हुए फूल को अपने पाँव तले कुचल दिया। फिर फ़र्श से उस के बचे हुए टुकड़े उठाए और ग़ुस्ल-ख़ाने में ले गया। उस ने इस बे-शक्ल पौधे को दहकते हुए चूल्हे में फेंक दिया और देर तक देखता रहा कि उस का दुश्मन कैसे सिसकियाँ भरता, सिकुड़ता और आख़िरकार बारीक, बर्फ़ जैसी सफ़ेद राख में बदल जाता है। उस ने मुँह से फूँक मारी और सारी राख बिखर कर ग़ायब हो गई।
अगले दिन मरीज़ की हालत मज़ीद ख़राब हो गई। उस के धँसे हुए गाल ख़ौफ़नाक हद तक ज़र्द पड़ गए थे, जलती हुई आँखें गहराई में धँस गई थीं, और चलते वक़्त वो लड़खड़ाने और ठोकर खाने लगा था। लेकिन फिर भी वो बेचैनी से चलता रहा, और मुसलसल बोलता रहा, बोलता ही रहा।
”इस मामले को रोकना बिलकुल ज़रूरी है। आज इस का वज़न सिर्फ़ तरानवे पाउंड रह गया है। अगर ये सिलसिला जारी रहा तो एक दो दिन में ये मर जाएगा।“ डॉक्टर गहरी सोच में था।
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