उर्दू बेगी
बहराम यूँ ही सलीम जज को मिलने चला था। इस इलाक़े में कुछ काम था सोचा कि बहुत दिनों बाद क्लासी से मुलाक़ात हो जाए। जज को नाकाम आशिक़ की तरह कूचे कूचे गली गली घुमाया फिराया जाता है। तुरबत का एक टेन्योर भी खरा है। सेशन कोर्ट में उसका आमना-सामना उस वकीलनी से हो गया। वकील इंसाफ़ के ग़मगुसार हैं। ग़म तीन रोज़ होता है। मगर वह बरसों से ग़म मनाए जा रहे हैं। गर्म तरीन मुल्क में सियाह गर्म कोट, सियाह टाई लगाए वह सबी ढाढर की अदालतों में इंसाफ़ समेटते फिरते तो अक़्ल दंग रह जाती। वाक़ई इंसान अशरफ़ुल मख़लूक़ात है। दालबंदीन में भी सियाह कोट से ओढ़े फिरता है। जैसे सेंट्रल एशिया के हमला-आवरों ने दिल्ली फ़तह करके भी अपनी शेरवानी में कोई खिड़की रोशनदान न लगाया। वकीलनी के हाथों में कुछ फ़ाइलें थीं। चंद क्लाइंट्स और मुंशी दो क़दम पीछे मोअद्दब से चले आ रहे थे। एक अजीब सी तमकनत, बाँकपन और वक़ार था। अगर वर्दी न पहन रखी होती तो बसरा की शहज़ादी लगती जो नक़ाब उतार कर आवामी लिबास में आवाम में घुल मिल कर उनकी ज़िंदगी का जायज़ा लेती कि कौन से इक़दामात करते हुए आवाम की ज़िंदगी बेहतर बना सके। जैसे पाकिटमार पास से गुज़रते जेब साफ़ कर जाता है, सियासतदान लूट कर ले जाता है। कानों कान ख़बर नहीं होती। वह भी बहराम का दिल व जिगर किसी गुठली में डाल कर साथ ही लेती गई। मुड़ के देखना वक़ार के मुनाफ़ी था। बहराम सीधी राह चलता रहा।
बहराम के दिल पे बरस्ट मारती लातअल्लुक़ी से गुज़र गई। नैनों से नैन भी न मिलाए। एक नज़र भी न देखा। हालाँकि बहराम ख़ासा वजीह जवान था। कलाई की पीतक फ़िलिप और बाएँ हाथ की उँगली में लशकारे मारते नीलम के बग़ैर भी वह दूर ही से अमीर दिखाई देता। अदालत में कुछ फ़ुर्सत थी। नायब कोर्ट को ख़ुफ़िया इशारा करते हुए सलीम उसे चेंबर में ले आया। सलाम-दुआ के बाद बहराम ने बेताबी से पूछा,
यह वकीलनी कौन है जो अभी तुम्हारी अदालत के बाहर निकली है। जिसने चींटी की तरह अपने वज़्न से कहीं ज़्यादा वज़्न की फ़ाइलें उठा रखी हैं।
सलीम को किसी ऐसे सवाल की उम्मीद न थी। सलीम ने एक आह भरी,
उसका ज़िक्र जाने दो! बहुत दिनों बाद आए हो? तुमने क्या रॉकफ़ेलर बनना है। दोस्तों के लिए भी कुछ वक़्त निकाला करो। पैसा पैसा! बस करो।
मगर बहराम का ज़ेहन उसी पर अटका हुआ था। सलीम जानता था कि बहराम अपनी ही ख़ुदसाख़्ता ज़बान बोलता है। नए नए अल्फ़ाज़, कुछ मुरक्कब, कुछ टेढ़े-मेढ़े बनाता रहता है। जैसे उसे इख़्तिलाफ़ था कि Prince की तानीस Princess है तो Doctor की Doctress होनी चाहिए। लेडी डॉक्टर भला क्यों कहते हैं। इस लिए वह वकील से वकीलनी बना लेता। डॉक्टर से डॉक्टरनी। दोस्त उसकी ज़बान जानते थे।
लगता है कि उस वकीलनी की कील तुम्हारे दिल में उतर गई है। उसका नाम शाहाना है। नाम के कुछ ज़्यादा ही असरात आ गए हैं। बड़े बड़े वकीलों के छक्के छुड़ा देती है। इस लिए कामयाब है। और अंदाज़ तो ख़ैर हैं ही शाहाना। वकील की वर्दी में वह आला कपड़े, डिज़ाइन बनवाती है कि बस! लोग कहते हैं पत्थर की देवी, ग्रेनाइट की बनी हुई। बाज़ तो मछली कहते हैं, फिसलने वाली, हाथ न आने वाली।
बहराम चाय की बजाय बदस्तूर मुहब्बत की चुस्कियाँ ले रहा था।
यह किस की बेटी है? बहराम ने पूछा।
किसी की भी नहीं। सलीम ने जवाब दिया।
बहराम हथ्थे से ही उखड़ गया, जज साब! क्या शकुंतला की तरह आसमान से टपकी थी यार? इस अक़्ल के साथ अदालत चलाते हो?
सलीम ने एक गिलास पानी मंगवाया, हम तो मुलज़िम से भी उसके होश व हवास में बयान लेते हैं। तुम ज़रा पानी पियो। नार्मल तो हो जाओ। दुनिया की कोई अजीब व ग़रीब चीज़ तो नहीं। शाहाना के वालिदैन उसे एक क़रीबी दोस्त के यहाँ छोड़ कर चंद रोज़ के लिए निकले थे। मगर जहाज़ क्रैश हो गया। उसी दोस्त ने दोस्ती निभाई। पढ़ाया-लिखाया और वकील बना दिया। जबकि यह तो L.L.M भी है। लगता है कि कबूतरों के साथ देख कर जिस तरह शहज़ादा सलीम अचानक ही अनारकली पर लट्टू हो गया था, तुम फ़ाइलों के साथ देख कर शाहाना पर मर मिटे। तुम क्या चाहते हो? ख़याल करना कहीं लेने के देने ही न पड़ जाएँ।
बहराम ने ज़रा ताख़ीर न की, उसकी कहानी हमसे मिलती-जुलती है। हमारे वालिदैन भी रोड एक्सीडेंट में दुनिया से गए। मुझे और मेरी छोटी बहन को अंकल ने पाला। बड़ा होने पर वालिद का बिज़नेस मुझे दे दिया। फिर अंकल भी गए। हम दोनों अकेले ही हैं इस भरी दुनिया में।
सलीम ने हौसला दिलाया,
तुम्हें सफ़ाई का पूरा मौक़ा दिया जाता है। खुल कर बयान करो। क्या चाहते हो?
बहराम ने बिजली गिरा दी,
मैं उससे शादी करना चाहता हूँ।
सलीम हड़बड़ा गया। उसका ख़याल था कि महज़ ठरक झाड़ रहा है। उसने होंठ भींच लिए,
इतना जज़्बाती 164 का बयान!
बहराम को ताव चढ़ा,
दोस्त-नुमा दुश्मन! कुछ मदद तो करो।
सलीम ने ज़ेहन लड़ाया।
अपनी फ़र्म का कोई मुक़दमा उसे दे दो। कुछ तआरुफ़ हो। मिलना-जुलना हो, फिर रास्ता बनाना। शेर अपना शिकार ख़ुद करता है। हिम्मत-ए-मर्दाना, मदद-ए-ख़ुदा। Brave deserve beauty.
बहराम कहाँ कम था,
शेर को जंगल का रास्ता तो दिखाओ। जंगल पहुँचाओ। कंधारी बाज़ार में तो हिरन नहीं ढूँढ़ सकता।
सलीम ने शाहाना को आम मैसेज दिया,
अगर फ़ुर्सत हो तो ज़रा चेंबर आएँ। ज़रूरी काम है।
सरकार अक्सर वाइस्टेप बंद रखा करती। आम मैसेज फिर भी पहुँच जाता। थोड़ी ही देर में शाहाना का मैसेज आया कि वह एक मुक़दमे से निपट कर पहुँच जाएगी। थोड़ी ही देर में वह चली आई। सीधा चेंबर का रुख़ किया। सलीम ने बताया कि उसके क्लास फ़ेलो बहराम का एक मुक़दमा है। अगर शाहाना यह केस ले तो बेहतर रहे। दोनों का तआरुफ़ हुआ। मोबाइल नंबरों का और चंद मुस्कुराहटों का तबादला हुआ। वह बहुत क़रीब बैठी। दिल सुलगने लगा था। क्या वक़ार और एतमाद था। वाक़ई किसी मुल्क की शहज़ादी लगती, जिसने सेशन कोर्ट में पनाह ली। बेहद मुख़्तलिफ़ जैसे आमाच का पूर्णमाशी! जैसे शनशोब का जंगल। जैसे दरेंगड़ की शाम। शाहाना की मुस्कुराहट क़ातिलाना की बजाय वकीलाना थी। क्योंकि वकील अपने क्लाइंट को ज़बह करने से पहले मुस्कुराहटों से नवाज़ता है। जैसे ईद-ए-क़ुर्बान पर बकरे को मेहँदी लगा कर हार पहना कर छुरी चलाने से पहले पानी पिलाया जाता है। शाहाना को इस क़दर क़रीब पा कर बहराम ख़ुशी से खिला जा रहा था। मगर तजरबाकार और माहिर Poachers की तरह उसका चेहरा तास्सुरात से यूँ ही आरी था। मगर शाहाना उसकी आँखों में मुहब्बत की लहरें देखते हुए भी जुमाख़ानी कर रही थी। अदालतों ने उसे ज़िंदगी का शऊर दिया था। वह अक्सर मर्दों को लट्टू होते देखती। जैसे क़साई की दुकान को दूर से ताकता कोई भूखा कुत्ता।
बहराम ने चाहा कि अगले रोज़ सेरीना होटल में लंच पर चली आए। वहीं चाइनीज़ रेस्टोरेंट में तसल्ली से फ़ाइल पर बात हो सकती है। शाहाना को अदालतों ने सख़्त Blunt और Vocal बना कर रखा था। वह तुम्प और तुस्प के बग़ोलों की सी थी। जला के राख कर डालती।
यह होटल अफ़ग़ान जंग में रिश्वतों की तक़सीम के लिए बनाया गया था। हम तो वर्किंग क्लास के लोग हैं। ऐसे होटलों में क़दम रखना मयूब समझते हैं।
बहराम ने तनाव कम करने, माहौल को ख़ुशगवार बनाने के लिए मज़ाहिया तजवीज़ दी,
तो सेशन कोर्ट की कैंटीन कैसी रहेगी?
शाहाना ने जवाब देने में देर न लगाई,
जगह तो मुनासिब है, मगर वहाँ शोर बहुत रहता है।
बहराम मज़बूत इरादे का था। वह यूँ टलने पर राज़ी न था।
तो कल आपके घर आ जाऊँ फ़ाइल लेकर। चेंबर जाने से पहले फ़ाइल पढ़ लें। ज़्यादा वक़्त नहीं लूँगा।
तजवीज़ माक़ूल थी। शाहाना ने लोकेशन मोबाइल से भिजवाई। फिर जज से इजाज़त लेकर शाहाना चेंबर से रुख़्सत हुई।
लड़कियाँ तो लटकती-मटकती चलती हैं। यह तो लगता है कि रंगरूट परेड करता जा रहा है।
बहराम ने तबसिरा किया।
सलीम ने दोस्ताना मशविरा दिया,
शादी वारंट-ए-नाक़ाबिल-ए-ज़मानत है। सोच लो। उसके साथ ज़िंदगी गुज़ार लोगे? वकील की बहस करना, दलील देना और 'साबित करो' कहना लेडी वकील की आदत बन जाती है। लेडी वकील पूरे बार का वक़ार होती है। ज़रा घरेलू खटपट हुई तो पूरी बार ही चली आएगी।
बहराम बड़ा दक़ हुआ,
अब ख़ौफ़ज़दा ही करते रहोगे, या उसके मिज़ाज के बारे में भी कुछ बताओगे? कैसी है? क्या पसंद करती है? उमूमी अख़लाक़ कैसा है? जलाली तो नहीं?
सलीम ने अपनी राय दी,
उसका ख़याल है कि हर दौलत के पीछे क्राइम होता है। बाप ने नहीं तो दादा ने किया होगा। Leftist है। सख़्त Feminist है। बस ख़याल करना। Prado या Revo की बजाय आम-सी कार में जाना। घड़ी, अँगूठी या क़ीमती चीज़ न पहनना।
बहुत से मुफ़ीद मशविरे लेकर बहराम घर को चला और सलीम से वादा भी करता गया कि हफ़्तावार नहीं तो हर पंद्रहवाड़े ज़रूर ही मिला करेगा। बुलाने का दूसरा तरीक़ा यह भी हो सकता है कि वारंट-ए-गिरफ़्तारी जारी कर दे, ताकि पुलिस से बचने के लिए अबूरी ज़मानत की ख़ातिर ही दौड़ता आए।
ड्राइवर ने कार ऐन दरवाज़े के सामने रोक कर डोर बेल दी। मुलाज़िम ने बहराम को ड्राइंग रूम में ला बिठाया। जिसे कमरा-ए-मुलाक़ात कहना बेहतर रहता। एक सोफ़ा, हेडमास्टरों वाली बड़ी-सी मेज़ जो दीगर ममालिक में तो मतरूक हो चुकी। मेज़ पर बेतर्तीब फ़ाइलें। एक रिवॉल्विंग चेयर और तेज़ी से चलता बदहवास पंखा, जो हवा देने की बजाय शोर ज़्यादा मचा रहा था। सड़क पर मुहल्ले भर का शोर, ची-पाँ। शाहाना अब मेरून Civvies में थी, जिसके बाइस ज़ाविए कम-कम दिखाई दिए। कोट तो जिस्म छुपाने की बजाय बोलने लगता। अदालत की निस्बत अब वह पुरसुकून थी।
उसने मुलाज़िम से चाय लाने को कहा। रस्मी हाल-अहवाल के बाद वह फ़ाइल पढ़ने लगी।
ठीक है, मैं यह केस करूँगी।
बहराम उसकी ख़ुशबू कशीदा करता, उसके क़ुर्ब में सुलगता रहा। इतने में चाय भी आ गई। बहराम ने फ़ीस का पूछा। शाहाना का अंदाज़ भी शाहाना था।
सलीम साहब ने कहा है, आपसे क्या फ़ीस लेना। वैसे भी तो मैं सेशन कोर्ट्स में ही दिन भर रहती हूँ। ख़ैर है। जो दिल चाहे बाद में आप अदा कर दें।
बहराम इसरार करने लगा तो शाहाना मजबूर हो गई।
केस के आख़िर में जो आपका दिल चाहे, वह रक़म क़बूल कर लूँगी।
शाहाना का अंदाज़ शाहाना था। माया की परवाह न थी। बहराम ने चेक बुक निकाली। शाहाना का नाम लिख कर चेक क्रॉस किया। दस्तख़्त सब्त करते हुए चेक शाहाना के सामने रख दिया। शाहाना बदस्तूर नार्मल रही। इस अदा पर वह हैरान-सी हुई थी।
इतने से मामूली मुक़दमे के लिए आप अरब शहज़ादों की तरह मुझे ब्लैंक चेक दे रहे हैं। आप चाहते क्या हैं?
बहराम भी शफ़ शफ़ की बजाय शफ़तालू कहने वाला था।
मैंने कल आपको देखते ही फ़ैसला किया था कि आपसे शादी करूँगा। यह मुक़दमा तआरुफ़ का, क़रीब आने का एक बहाना है।
शाहाना ज़रा न शर्माई।
क्यों अपने घर को कमरा-ए-अदालत बनाना चाहते हैं। जल्दी के फ़ैसले अक्सर जज़्बाती होते हैं।
शाहाना ने चेक के दो टुकड़े कर के वापस दिया और फ़ाइल भी लौटा दी।
इरफ़ान वकील के पास केस भी कम हैं। उसी के पास केस रहने दें। इस फ़ाइल के बग़ैर भी हम एक दूसरे को समझ सकते हैं।
बहराम ख़ासा रिलैक्स हो गया। न तो रुपये से रग़बत! न ही बनावट। उसे यूँ लगा जैसे बहुत दिनों से साथ-साथ रहे हों। दोनों ने अपनी-अपनी दुख भरी कहानियाँ भी सुनाईं। शाहाना ने चेंबर फ़ोन कर के बता दिया कि आज वह नहीं आ रही। बातों ही बातों में उन्हें अंदाज़ा न हुआ कि वह कितनी बार चाय पी चुके हैं और शाम कब की उतर कर शीशों से झाँक रही है। खाने की दावत बहराम ने क़बूल कर ली। कुछ ही देर में डिलीवरी एजेंट पिज़्ज़ा पहुँचा गया। शाहाना ने ही बताया था कि अगर बहराम अर्दली ख़लीक़ चाचा का खाना खा ले तो शायद उनके यहाँ दोबारा आने की हिम्मत न करे। यूँ लगता था कि जैसे दोनों ने एक दूसरे को क़बूल कर लिया हो। वह कब का आप से तुम पर उतर आए थे। जैसे जनम-जनम के बिछड़े साथी। बहराम ने अगले रोज़ सह-पहर में घर पर मदऊ कर डाला।
मैं ड्राइवर भिजवा दूँगा।
उसने मुलाक़ात को आसान बनाना चाहा। दुनिया भर के 195 ममालिक में सिर्फ़ पाकिस्तान की आबादी अस्सी फ़ीसद बढ़ी थी। सड़कें बेरोज़गारों, विंड स्क्रीन साफ़ करते बच्चों, गदागरों के लश्करों से भरी पड़ी थीं। इन शुतुर-बे-मिहारों में ड्राइविंग छापा-मार जंगों से कम न थी। शाहाना ने ही बताया कि वह किसी को रौंदे बग़ैर, किसी की ब्रेक लाइट तोड़े बग़ैर ही कब की ड्राइविंग सीख चुकी है। अपनी कार में ख़ुद ही चली आएगी।
रात में अंकल और आंटी को भी खाने में शामिल कर लिया। वह पिज़्ज़ा जेनरेशन के लोग न थे। पिज़्ज़ा के टुकड़े बमुश्किल ही उनके हल्क़ से उतर रहे थे। बग़ैर कुछ बताए हुए ही वह समझ गए थे कि बेटी की रुख़्सती क़रीब आ रही है। बहराम से इल्तिफ़ात और अंदाज़-ए-गुफ़्तगू क्लाइंट्स वाला न था। अंकल और आंटी कुछ ख़ौफ़ज़दा से भी हो गए थे। उनकी ज़िंदगी का सहारा तो शाहाना थी। उसके बग़ैर तो घर भी मकान में बदल जाता। वक़्त के कुली कैंप में साँय-साँय करता उक़ूबतख़ाना। उदासी क़ब्ज़ा-गीरों की तरह उनके दिल में उतर आई थी। उदासी उनके मन में थी जो उन्हें हर जानिब दिखाई देती। जैसे ट्रेन निकलने के बाद ख़ाली स्टेशन! जैसे ख़ुदकुश हमले के बाद इबादतगाह! जैसे बग़ैर भगवान के मंदिर!
बहराम का घर शाहाना के तसव्वुर से कहीं ज़्यादा शानदार था। वह बेहद मुतास्सिर हुई। उसे घर की बजाय छोटा-सा महल क़रार दिया जाता तो भी मुनासिब रहता। कमरे तो सिर्फ़ आठ ही थे, मगर सलीक़े से सजे हुए। तमीज़दार मुलाज़िम, जो ख़लीक़ चाचा की तरह फ़ैमिली मेंबर नहीं बल्कि सिर्फ़ मुलाज़िम ही थे। मोअद्दब होकर बात करते। शाहाना एक काग़ज़ पर कुछ शराइत लिख कर ले गई थी कि वह मआशी ग़ुलामी क़बूल नहीं करेगी। बदस्तूर प्रैक्टिस करती रहेगी। उसे Freedom of movement दी जाएगी। उसे space दिया जाएगा। कहाँ हो?, फ़ोन क्यों इतनी देर बिज़ी रहा? जैसे सवाल नहीं किए जाएँगे।
ग़ैर-शादीशुदा हूँ मगर कुँवारी नहीं। वहशी क़बाइल की तरह किसी ख़ास membrane की तलाश भी न करना। और अंकल-आंटी को बदस्तूर सपोर्ट करती रहूँगी। क्योंकि इस पेंशन में अंकल का गुज़ारा नहीं हो सकता। मैं ख़ुद प्रैक्टिस से कमाऊँगी।
बहराम यूरोप घूम चुका था। वह जानता था कि जिन Dark Ages से यूरोप पाँच सौ बरस में निकल आया, वतन-ए-अज़ीज़ के viking वही तारीक चादर ताने खड़े हैं, ताकि वक़्त दाख़िल न हो पाए मुल्क में, ज़ेहनों में। लोग भी ख़ुदा-परस्त होने की बजाय क़दीम क़बाइल की तरह Incestral Worship में डगमगाते, ग़ोते खाते फिर रहे थे। बाज़ फ़िकरे बहराम के दिल पर बम की तरह गिरे, मगर चाय के कप में ज़रा-सा इर्तिआश न हुआ। उसकी यूरोपियन गर्लफ़्रेंड्स क़हक़हे लगाया करतीं,
तुम लोग तो Urethra को मुक़द्दस क़रार देते हुए औरत क़त्ल कर देते हो, और उस घिनौने जुर्म को Honour Killing क़रार देते हो। हमारी Nuns कभी Bathrobes पहन कर नहाया करतीं कि ख़ालिक़ की नज़र न पड़ जाए।
बहराम को हैरत भी हुई कि Denting Painting की बजाय अस्ल हालत में ही शरीक-ए-हयात बनने पर रज़ामंद है। वरना तो Virginity का एक लाख रुपया प्लास्टिक सर्जन को अदा कर सकती थी। बहराम के साथ भी गुज़रे हादिसात की छाप थी। वह औरत को टुकड़ों की बजाय मजमूई तौर पर देखने का आदी था। वकीलनी की तो मुहब्बत भी दरख़्वास्त, दावा, जवाब-ए-दावा, बयान-ए-हलफ़ी, शवाहिद व दस्तावेज़ात की तरह मशीनी हुआ करती है। चाहने वाला भी उससे मुहब्बत का हक़ तलब करता। दावाबाज़ू जैसा साहिल ही लगता है।
तुम्हारे सच ने तुम्हारी मुहब्बत और भी बढ़ा दी। अब Judgement announce करो। या कि फ़ैसला महफ़ूज़ कर लिया है?
शाहाना पहली बार खिलखिला के हँसी।
क़बूल है, क़बूल है, क़बूल है।
शादी सादगी से हुई। शाहाना अब चेंबर और ग़ैर-अदालती मस्रूफ़ियात को कम-कम वक़्त देती। सह-पहर में अपने घर यानी बहराम के यहाँ चली आती। माहौल अच्छा था। बहराम की बहन ईमान बड़ी प्यारी-सी थी। बहराम ने ज़िद करके MBA Finance में दाख़िला करवाया था, जबकि ईमान लिटरेचर पढ़ना चाहती थी। इधर बहराम का इसरार था कि दुनिया गाय के सींग की बजाय Finance पर खड़ी है, जो समाज अकीदों, वफ़ादारियों को बदल देता है। महँगाई से क़ब्ल लोग पर्दों में ही ख़वातीन को कहीं ले जाया करते। अब बाइक पर दो बच्चे आगे, दरमियान में ख़ुद सैंडविच बने, पीछे बीवी और माँ लिए जाते हैं। बच्चों के पाँव तो ख़ैर लटकते हैं, चार पाँव एक ही Footrest पर टिकाना भी तो Finance का ही शुबदा है।
मुलाज़िम नई मालकिन के तेवर देख कर ही समझ गए थे कि ईमान की तरह उससे हीरा-फेरी मुश्किल होगी। उन्होंने भी तरीक़ा-ए-वारदात बदलने का सोच लिया। बेकारी से कम चोरी-चकारी बेहतर हुआ करती है। सिर्फ़ फ़क़ीरों की असामियाँ ख़ाली रहतीं। बंगी चीबी फ़क़ीरनी की दुआओँ पर लोगों को यक़ीन रहता कि उनके दिन बदल देगी। ईमान ने शाहाना को खुले दिल से क़बूल कर लिया। अपनी तबीयत के बाइस ही शाहाना ने मजबूर किया था कि शादी सादगी से हो। क्योंकि चाव-चोंचले अहद-ए-जागीरदारी के थे, जब ग़रीब हारियों को लूट कर रुपया ऐंठ कर जागीरदार शायर, पहलवान, शिकारी कुत्ते और कस्बियाँ पालते। क्योंकि स्टॉक एक्सचेंज या कोई इदारा न था कि जो उनका सरमाया बढ़ा सकता। उनके लिए बहली या ताँगे में बैठ कर थाईलैंड जाना भी मुमकिन था। अंकल और आंटी इस शादी से मुतमइन थे कि शाहाना उनकी ख़बरगीरी करती रहेगी—माली भी, जज़्बाती भी। एक-दो रोज़ बाद चक्कर भी लगा लेती है। शाहाना और बहराम ने उन्हें मजबूर भी किया कि उन्हीं के साथ रहा करें। मगर उन दोनों को घर से मुहब्बत थी, जिसके दर-ओ-दीवार से उनकी जवानी चिपकी हुई थी। अंकल की अना भी इजाज़त न देती कि दामाद के घर में एक मुस्तक़िल बसेरा कर लें। ताँगे वाली जेनरेशन के अपने उसूल थे, जिन पर वह कम्प्रोमाइज़ न करते।
एक रोज़ बहराम ने चौंका देने वाला इन्किशाफ़ किया,
लगता है जैसे कल कोई मेरे घर आया हो। ज़ोर की बारिश के बाद ज़मीन नरम हो गई थी। मैंने मर्दाना बूट के निशान देखे, ड्राइंग रूम की खिड़की के पास थे।
वह परेशान-सा था।
शाहाना बात को रद्द करने वाली न थी।
मगर घर से तो कुछ भी ग़ायब नहीं। चोर होता तो टाइगर ही पकड़ लेता। वह तो भौंका भी नहीं।
दोनों में से किसी ने भी बात रद्द न की।
बहराम बदस्तूर सोच में था।
कुत्ता कैसे ग़ाफ़िल हो गया। यह तो जर्मन अल्सेश है। इसे तो Watch Dog कहते हैं।
शाहाना ने वादा किया कि वह घर की कड़ी निगरानी करेगी। नौकरों को भी ख़बरदार कर दिया कि चौकन्ना रहें। बहराम ने जल्द ही मुजरिम को रंगे हाथों पकड़ लिया। नौजवान ड्राइंग रूम में बैठा ईमान के साथ चाय पी रहा था। तभी अल्सेश ला-तअल्लुक़ रहा करता। नौकरों की भी ज़बानबंदी हो गई थी।
मुजरिम वकील की वर्दी में ही था। उसने भागने-दौड़ने की भी कोशिश न की। ईमान का तो रंग ही उड़ गया। संदली के फूलों-सी ज़र्द हो गई। मगर मुजरिम बदस्तूर चाय पीता रहा।
बहराम दौड़ कर पिस्तौल ले आया। बदहवासी में उसने डबल कॉक किया, जिससे पहली गोली क़ालीन पर गिर गई। मगर गोली चलाने की हिम्मत न थी।
पागल हो गए हो!
शाहाना ने पिस्तौल वाले हाथ की कलाई थाम ली। फिर वह मुजरिम से मुख़ातिब हुई,
उस्मान, तुम हमारे जूनियर हो। मुझसे ही बात कर लेते। ऐसे चोरों की तरह हमारे घर आने की क्या ज़रूरत थी?
उस्मान बदस्तूर पुरसुकून था।
मौक़ा तलाश कर रहा था। हम शादी करना चाहते हैं।
ईमान के आँसू बह रहे थे।
हाँ! हम शादी करना चाहते हैं।
वह भी ग़मगीन थी मगर ख़ौफ़ज़दा न थी। दोनों ही पक्के आशिक़ लग रहे थे।
शाहाना ने बहराम के हाथ से पिस्तौल ले लिया। बहराम ने पिस्तौल तान तो लिया था, मगर क़त्ल करने की ताक़त उसमें न थी। वह जानता था कि क़त्ल के बाद क्या होता है। शतरंज और बाइकर की एक ही ग़लती उसे ले डूबती है।
तुम अंदर जाओ, मैं फ़ैसला करके आती हूँ।
बहराम आलम-ए-बदहवासी में अंदर चला गया। बहन ने वालिदैन की मुहब्बत नहीं देखी थी। कोई ख़ाली हबीब वकील ईमान को अपनाए, यह बहराम को क़बूल न था। दौलत तो हो कि आराम से रखे। बात शादी नहीं, दौलत की थी। अगर उस्मान दौलतमंद होता तो बहराम क़बूल कर लेता। शाहाना तो फाँसी दिलवा कर भी इत्मीनान से फ़ाइल रख कर अगले मुक़दमे की मिस्ल पढ़ने लगती। उसने आते ही एलान किया।
शादी के लिए दोनों राज़ामंद हैं! मैंने कल पाँच बजे का वक़्त दिया है। बारात आएगी। निकाहख़्वाँ को भी फ़ोन कर दिया है। तुम कल जल्दी आ जाना। कल बहन को रुख़्सत करना। उसकी ज़िंदगी पर उसका अपना हक़ है।
बहराम Male Chauvinism से दस्तबरदार होने पर आमादा न था।
मेरा ख़याल था कि धूमधाम से शादी हो। किसी अमीर आदमी से और मेरी बहन ठाठ से रहेगी।
शाहाना बहस पर उतर आई।
अफ़सोस! 2026 में भी लोग सातवीं सदी की जागीरदारी में रहते हैं। तीन-चार फ़ीसद नवाब, जागीरदार, सरदार आवाम का ख़ून चूसते। धूमधाम से शादी ग़रीबों के लहू पर होती। ख़ुद तो वह हाथ-पाँव न हिलाते। उस्मान भी कामयाब वकील साबित होगा। देख लेना, वह मेहनती है। वकालत में जगह नहीं होती, मगर टॉप पोज़ीशन हमेशा ख़ाली रहती है।
बहराम अब इश्तिआल की बजाय दुखी हो गया था।
बच्चों की तरह बाप बन के पाला। अब मुझसे जुदा हो जाएगी।
शाहाना ने हिम्मत बढ़ाई।
इसी शहर में होगी, रोज़ मिल आना। घर बुला लिया करेंगे। हम लोग assumptions पर जीने के आदी हो गए हैं। और सोचें भी सदियों पुरानी हैं। दौलत ही ख़ुशी देती तो सारे कफ़नकश ख़ुश रहते। वह तो डिप्रेशन की गोलियाँ फाँकते हैं।
अगले रोज़ उस्मान चंद दोस्तों के साथ चला आया। थकी हुई दो कारें थीं, वह भी माँगे-ताँगे की। बहराम का कोई क़रीबी अज़ीज़ इस शहर में था नहीं और न ही वह ऐसी ग़रीबाना शादी दिखाना चाहता था।
सादा-सी चाय पार्टी में निकाह हो गया। रुख़्सत होती बहन को बहराम ने सर पर हाथ रख कर दुआएँ दीं और एक सफ़ेद लिफ़ाफ़ा ईमान को थमा दिया।
जल्दी में दहेज न दे सका। यह फ़ाइव मिलियन का चेक रख लो।
बहराम अपने आँसू पी रहा था।
ईमान ने लिफ़ाफ़ा वापस करना चाहा।
मुझे इसकी ज़रूरत नहीं है। आपकी दुआएँ ही काफ़ी हैं।
शाहाना ने डाँट पिलाई।
रखो लिफ़ाफ़ा। तुम्हारा और भी हक़ बनता है, क़ानूनी भी, शरई भी। जायदाद में भी।
पाँच वकीलों की बारात के जाते ही बहराम धम्म से कुर्सी पर जा गिरा।
क्या सोचा था... क्या हुआ...
वह सर पकड़ के रह गया। शाहाना ने उसका कंधा हिलाया।
Behave like a man। सब कुछ हमारी पसंद-नापसंद से तो नहीं होता। तुम ख़ुशी और दौलत को बाहम जोड़ रहे हो, जबकि मैं दिल को दिल से जोड़ने पर यक़ीन रखती हूँ।
चाय पी कर बहराम की ढारस बँधी। Morale High हुआ।
मैंने जब सेशन कोर्ट की राहदारी में तुम्हें देखा तो मुझे तुम्हारी आँखों में कोई उर्दू बेग़ी दिखाई दी। इसी लिए तुमसे शादी कर ली। इसी पर मर मिटा था।
शाहाना सिप लिए बदस्तूर मुस्कुरा रही थी।
और मैंने तुम्हें यूँ क़बूल कर लिया कि तुम्हारी आँखें बोल रही थीं, Dedipus Complex का शिकार हो। मेरी उँगली थाम कर चलोगे।
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