बेरोज़गारी शायरी

कॉलेज के सब बच्चे चुप हैं काग़ज़ की इक नाव लिए

चारों तरफ़ दरिया की सूरत फैली हुई बेकारी है

राहत इंदौरी

तलाश-ए-रिज़्क़ का ये मरहला अजब है कि हम

घरों से दूर भी घर के लिए बसे हुए हैं

आरिफ़ इमाम

'असलम' बड़े वक़ार से डिग्री वसूल की

और इस के बा'द शहर में ख़्वांचा लगा लिया

असलम कोलसरी

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