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मीर तक़ी मीर पर स्कॉलर

ग़ज़ल में 'कैफ़ियत' और 'मानी-आफ़रीनी' का फ़र्क़

ग़ज़ल की शेरियात (काव्य-शास्त्र) में 'कैफ़ियत' तुरंत जज़्बाती असर पैदा करती है जबकि 'मानी-आफ़रीनी' फ़िक्री गहराई को दर्शाती है, और इन दोनों का संतुलन ही बड़े शायर की पहचान है।

ग़ज़ल में इश्क़, मामला-बंदी और इशारों-किनायों का हुस्न

ग़ज़ल बुनियादी तौर पर इश्क़िया और संगीतमय शायरी है, जिसमें हुस्न की ज़ाहिरी तस्वीर-कशी से ज़्यादा आशिक़ के जज़्बे की सच्चाई, दर्द-ओ-तड़प और इशारों-किनायों को अहमियत हासिल है।

मीर तक़ी मीर और रोज़मर्रा की ज़बान का रचनात्मक कमाल

मीर तक़ी मीर का सबसे बड़ा कारनामा यह है कि उन्होंने आम बोल-चाल और रोज़मर्रा की ज़बान को इस्तिआरे (रूपक) और रिआयत (शब्दों के तालमेल) के ज़रिए महान शायरी की ज़बान में बदल दिया।

मीर तक़ी मीर: उर्दू ज़बान के सबसे बड़े साहसी और बे-तकल्लुफ़ शायर

शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी की नज़र में मीर तक़ी मीर ने 'फ़साहत' (भाषा की शुद्धता) पर 'बलाग़त' (प्रभावशाली अभिव्यक्ति) को तरजीह दी और ज़बान के इस्तेमाल में वह अपने समकालीनों के मुक़ाबले में सबसे ज़्यादा बे-बाक और साहसी थे।

महान शायर की नक़्ल की त्रासदी: क्या बड़े फ़नकार का कोई वारिस होता है?

यह मज़मून (लेख) इस हक़ीक़त पर बहस करता है कि एक महान शायर अपने पीछे नक़्ल करने वालों का कोई स्कूल नहीं छोड़ता, बल्कि उसके फ़ौरन बाद आने वाले शायर जाने-अनजाने में उसके अंदाज़ (शैली) से अलग राह अपनाते हैं।

मीर और ग़ालिब के आशिक़ का तुलनात्मक अध्ययन: विशिष्टता और रिवायत की कश्मकश

शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी की नज़र में मीर और ग़ालिब दोनों उर्दू ग़ज़ल के रिवायती आशिक़ से इंहिराफ़ (परंपरा से अलग हटना) करते हैं, लेकिन मीर का आशिक़ एक जीता-जागता इंसान है जबकि ग़ालिब का आशिक़ एक अमूर्त (abstract) और आदर्श रूप है।

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