तिश्नगी शायरी

यूँ तो प्यास पानी की तलब का नाम है लेकिन उर्दू शायरी या अदब में किसी भी शय की शदीद ख़्वाहिश को प्यास का ही नाम दिया गया है। प्यास के हवाले से कर्बला के वाक़ेआत की तरफ़ भी उर्दू शायरी में कई हवाले मिलते हैं। साक़ी शराब और मैख़ाने का भी शायरी ने तश्नगी से रिश्ता जोड़ रखा है। तश्नगी शायरी के ये बे-शुमार रंग मुलाहिज़ा फ़रमाइयेः

साजन हम से मिले भी लेकिन ऐसे मिले कि हाए

जैसे सूखे खेत से बादल बिन बरसे उड़ जाए

जमीलुद्दीन आली

नदिया ने मुझ से कहा मत मेरे पास

पानी से बुझती नहीं अंतर्मन की प्यास

अख़्तर नज़्मी

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