रात पर ग़ज़लें

दिन की भाग-दौड़ और बेचैनियों

को अगर रात का आसरा न हो तो ज़िन्दगी ख़्वाब देखने को भी तरस जाए। रात का अंधेरा और सन्नाटा जितना भी भयानक हो शायरों ने इसे पूरी ईमानदारी के साथ हर रूप में देखा और दिखाया है। लफ़्ज़ जब शायरी में दाख़िल होते हैं तो अपनी हदों को लाँघते हुए कई दुनियाओं की सैर कर आते हैं। रात शायरी को पढ़ते हुए भी आप ऐसा ही महसूस करेंगे, हमें यक़ीन हैः

आप की याद आती रही रात भर

मख़दूम मुहिउद्दीन

फ़ैसला हो गया है रात गए

नईम जर्रार अहमद

सुब्ह को हश्र भी है कट गई गर आज की रात

मुंशी नौबत राय नज़र लखनवी
बोलिए