मुझ को अता हुआ है ये कैसा लिबास-ए-ज़ीस्त
बढ़ते हैं जिस के चाक बराबर रफ़ू के साथ
नेज़ा हो कि प्याला लब-ए-इंकार सलामत
ये सिलसिला सुक़रात से शब्बीर तलक है
जगह जगह थे भँवर 'इश्क़ के समुंदर में
वो ख़ुद भी डूब गया था मुझे बचाते हुए
पासबानी करते करते उस की आँखें बुझ गईं
'उम्र भर जो ख़्वाहिश-ए-ता'मीर-ए-दर करता रहा
मैं हवाओं से लड़ा हूँ जिस की ख़ातिर 'उम्र भर
उस दिए ने ही मिरे घर को जला कर रख दिया