पहुँचा के मेरी ख़ाक दर-ए-यार तक सबा
रुख़्सत हुई ये कह कर अब आगे तिरा नसीब
गुनाहगार सही फिर भी मेरे हिस्से का
तिरी तरफ़ जो निकलता है वो सवाब तो दे
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टैग्ज़ : उर्दू शायरीऔर 2 अन्य
लिख दिया कातिब-ए-तक़दीर ने जो कुछ 'हैरत'
हर घड़ी बस इसी तहरीर से हम उलझे हैं