जिलानी बानो का परिचय
पहचान: प्रसिद्ध अफ़साना-निगार, उपन्यासकार, स्त्री एवं सामाजिक चेतना की प्रतिनिधि तथा हैदराबादी तहज़ीब की विश्वसनीय कहानीकार
जीलानी बानो का जन्म 14 जुलाई 1936 को बदायूँ, उत्तर प्रदेश में हुआ। उनके पिता हैरत बदायूँनी अपने दौर के प्रसिद्ध शायर थे, और साहित्यिक रुचि उन्हें विरासत में मिली। बाद में उनका परिवार हैदराबाद दकन आ बसा, जहाँ उनकी परवरिश एक गहरे साहित्यिक और बौद्धिक वातावरण में हुई। उनके घर साज्जाद ज़हीर, मख़दूम मोहिउद्दीन, जिगर मुरादाबादी, कृष्ण चंदर, मजरूह सुल्तानपुरी और अन्य प्रमुख साहित्यकारों का आना-जाना रहता था, जिसने उनकी बौद्धिक और साहित्यिक परवरिश में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
उनकी पहली कहानी "एक नज़र इधर भी" 1952 में लिखी गई, जबकि "मोम की मरियम" के प्रकाशन ने उन्हें व्यापक ख्याति दिलाई और उर्दू अफ़साने में उनकी पहचान स्थापित कर दी।
जीलानी बानो उन महत्त्वपूर्ण उर्दू फ़िक्शन-लेखकों में गिनी जाती हैं जिन्होंने हैदराबादी तहज़ीब, जागीरदारी समाज, वर्ग-संघर्ष, स्त्री-संबंधी प्रश्नों और मानवीय पीड़ा को अपने लेखन का विषय बनाया। उनके अफ़सानों और उपन्यासों में समाज के दबे-कुचले वर्ग, विशेषकर स्त्री, उत्पीड़ित और वंचित मनुष्य, केंद्रीय स्थान रखते हैं। उनका स्पष्ट मत था कि वे केवल स्त्रियों के नहीं, बल्कि मानवता के प्रश्नों पर लिखती हैं।
प्रमुख कृतियाँ:
अफ़साना-संग्रह: रोशनी के मीनार, पराया घर, रोज़ का क़िस्सा, यह कौन हँसा, तिरयाक, सच के सिवा, कुन, रास्ता बंद है
उपन्यास और नॉवलेट: ऐवान-ए-ग़ज़ल, बारिश-ए-संग, निर्वाण, नग़्मे का सफ़र, जुगनू और सितारे
अन्य: नरसिया की बावड़ी (नाटक), मैं कौन हूँ (आत्मकथा), दूर की आवाज़ें (पत्र-संग्रह)
उनका उपन्यास "ऐवान-ए-ग़ज़ल" उर्दू साहित्य में मील का पत्थर माना जाता है, जिसमें हैदराबाद दकन की पतनशील जागीरदारी संस्कृति, तेलंगाना आंदोलन, विभाजन के प्रभाव और आसफ़िया सल्तनत के पतन को कलात्मक गहराई के साथ प्रस्तुत किया गया है। इसी प्रकार "बारिश-ए-संग" भी एक महत्त्वपूर्ण वैचारिक उपन्यास माना जाता है, जिसमें सामाजिक, मनोवैज्ञानिक और राजनीतिक संघर्ष का प्रभावशाली चित्रण है।
जीलानी बानो ने अफ़साना और उपन्यास के अतिरिक्त नाटक, अनुवाद, निबंध और पटकथा-लेखन में भी काम किया। हैदराबाद पर बनी प्रसिद्ध डॉक्यूमेंट्री "Hyderabad: Ek Shehar, Ek Tehzeeb" की पटकथा भी उन्होंने लिखी।
उनकी साहित्यिक सेवाओं के सम्मान में उन्हें अनेक प्रतिष्ठित पुरस्कारों से नवाज़ा गया, जिनमें आंध्र प्रदेश साहित्य अकादमी पुरस्कार (1960), सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार (1985), क़ौमी हाली पुरस्कार, हरियाणा उर्दू अकादमी (1989) तथा भारत सरकार का प्रतिष्ठित नागरिक सम्मान पद्मश्री (2001) शामिल हैं।
उर्दू साहित्य में जीलानी बानो का स्थान एक ऐसी संवेदनशील और गरिमामयी रचनाकार का है जिसने स्त्री, समाज, संस्कृति, इतिहास और मानवीय त्रासदियों को गहरे वैचारिक और कलात्मक बोध के साथ अपने साहित्य का विषय बनाया और उर्दू फ़िक्शन को नई दिशा प्रदान की।
निधन: 1 मार्च 2026 को उनका निधन हुआ।
सहायक लिंक : | https://en.wikipedia.org/wiki/Jeelani_Bano
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