काशिफ़ सय्यद के शेर
रास्ते भर मिरी हम-सफ़री का दम भरते रहे
अपनी मंज़िल पे पहुँचते ही पराए हुए लोग
वो दीवारों में चुनवाने का मंज़र अब नहीं दिखता
मोहब्बत पर मगर बंदिश जो पहले थी सो अब भी है
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मुफ़लिसी थी और हम थे घर के इकलौते चराग़
वर्ना ऐसी रौशनी करते के दुनिया देखती
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राजा का बेटा राजा नहीं बनता बनते हम
बस इस लिए कहानी में मारा गया हमें
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ऐसा न हो कि दोस्ती भी जाए हाथ से
हम हाथ में गुलाब लिए सोचते रहे
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सर्द-मेहरी आप की रिश्ते में हाइल हो गई
वर्ना हम वो आशिक़ी करते के दुनिया देखती
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ज़रा सा वक़्त जो बदला तो हम पे हँसने लगे
हमारे काँधे पे सर रख के रोने वाले लोग
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यही इक बात अब दोनों की पेशानी पे लिक्खी है
मुझे तेरी ज़रूरत है मुझे तेरी ज़रूरत है
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इस पराए शहर में ऐ काश कोई ये कहे
रात का खाना हमारे साथ खाना है तुम्हें
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हम 'जौन-एलिया' के ज़माने में दोस्तो
'ग़ालिब' का इंतिख़ाब लिए सोचते रहे
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लोग हम से सीखते हैं ग़म छुपाने का हुनर
आओ तुम को भी सिखा दें मुस्कुराने का हुनर
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हिजरतों के कर्ब को ऐसे छुपाना है तुम्हें
कोई जब भी हाल पूछे मुस्कुराना है तुम्हें
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शिकस्ता नाव समझ कर डुबोने वाले लोग
न पा सके मुझे साहिल पे खोने वाले लोग
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आँखों में अपनी ख़्वाब लिए सोचते रहे
जैसे कोई किताब लिए सोचते रहे
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क्या ग़ज़ब है तज्रबे की भेंट तुम ही चढ़ गए
तुम से ही सीखा था हम ने दिल दुखाने का हुनर
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