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aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

jis ke hote hue hote the zamāne mere

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शारिक़ कैफ़ी

1961 | बरेली, भारत

उपमहाद्वीप के प्रख्यात समकालीन शायरों में शुमार। ग़ज़ल व नज़्म दोनों में महारथ हासिल

उपमहाद्वीप के प्रख्यात समकालीन शायरों में शुमार। ग़ज़ल व नज़्म दोनों में महारथ हासिल

शारिक़ कैफ़ी

ग़ज़ल 176

नज़्म 72

अशआर 67

रात थी जब तुम्हारा शहर आया

फिर भी खिड़की तो मैं ने खोल ही ली

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घर में ख़ुद को क़ैद तो मैं ने आज किया है

तब भी तन्हा था जब महफ़िल महफ़िल था मैं

वो बात सोच के मैं जिस को मुद्दतों जीता

बिछड़ते वक़्त बताने की क्या ज़रूरत थी

अब मुझे कौन जीत सकता है

तू मिरे दिल का आख़िरी डर था

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कौन था वो जिस ने ये हाल किया है मेरा

किस को इतनी आसानी से हासिल था मैं

पुस्तकें 4

 

चित्र शायरी 6

 

वीडियो 18

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ऑडियो 18

इंतिहा तक बात ले जाता हूँ मैं

एक मुद्दत हुई घर से निकले हुए

कहीं न था वो दरिया जिस का साहिल था मैं

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