तिलोकचंद महरूम
ग़ज़ल 62
नज़्म 13
अशआर 20
अक़्ल को क्यूँ बताएँ इश्क़ का राज़
ग़ैर को राज़-दाँ नहीं करते
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साफ़ आता है नज़र अंजाम हर आग़ाज़ का
ज़िंदगानी मौत की तम्हीद है मेरे लिए
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तलातुम आरज़ू में है न तूफ़ाँ जुस्तुजू में है
जवानी का गुज़र जाना है दरिया का उतर जाना
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फ़िक्र-ए-मआश ओ इश्क़-ए-बुताँ याद-ए-रफ़्तगाँ
इन मुश्किलों से अहद-बरआई न हो सकी
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इस का गिला नहीं कि दुआ बे-असर गई
क्या सुनाएँ किसी को हाल अपना
ख़ुदा से वक़्त-ए-दुआ हम सवाल कर बैठे
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