aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
कभी जो आह के मिसरे कूँ याद करता हूँ
ख़याल-ए-क़द कूँ तिरे मुस्ताज़ाद करता हूँ
चाँद सा मिस्रा अकेला है मिरे काग़ज़ पर
छत पे आ जाओ मिरा शेर मुकम्मल कर दो
या साल ओ माह था तू मिरे साथ या तो अब
बरसों में एक दिन की मुलाक़ात से गया
शजर ने पूछा कि तुझ में ये किस की ख़ुशबू है
हवा-ए-शाम-ए-अलम ने कहा उदासी की
हज़ारों काम मोहब्बत में हैं मज़े के 'दाग़'
जो लोग कुछ नहीं करते कमाल करते हैं
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