aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
इमारत दैर ओ मस्जिद की बनी है ईंट ओ पत्थर से
दिल-ए-वीराना की किस चीज़ से तामीर होती है
महफ़िल-आराई हमारी नहीं इफ़रात का नाम
कोई हो या कि न हो आप तो आए हुए हैं
ज़लज़ला आया और आ कर हो गया रुख़्सत मगर
वक़्त के रुख़ पर तबाही की इबारत लिख गया
मत करो फ़िक्र इमारत की कोई ज़ेर-ए-फ़लक
ख़ाना-ए-दिल जो गिरा है उसे ता'मीर करो
जितना कि है इफ़रात तिरी कम-निगही का
उतना ही इधर देखो तो ये दीदा-ए-नम है
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