इस्मत फ़रोशी
इस्मतफ़रोशी कोई अक़्ल या क़ानून के ख़िलाफ़ चीज़ नहीं है। यह एक पेशा है जिसे अपनाने वाली औरतें कुछ सामाजिक ज़रूरतें पूरी करती हैं। जिस चीज़ के गाहक मौजूद हों, अगर वह बाज़ार में नज़र आए तो हमें हैरानी नहीं होनी चाहिए। अगर हमें हर शहर में ऐसी औरतें नज़र आती हैं जो इस जिस्मानी व्यापार से अपना पेट पालती हैं, तो हमें उनके रोज़ी-रोटी के ज़रिए पर कोई एतराज़ नहीं होना चाहिए। इसलिए कि हर शहर में उनके गाहक मौजूद हैं।
इस्मतफ़रोशी को बहुत बड़ा गुनाह माना जाता है। मुमकिन है यह बहुत बड़ा गुनाह हो, मगर हम मज़हबी नज़रिए से इसे जाँचना नहीं चाहते। पाप और पुण्य, सज़ा और इनाम की भूल-भुलैया में फँसकर आदमी किसी मसले पर ठंडे दिमाग़ से ग़ौर नहीं कर सकता। मज़हब ख़ुद एक बहुत बड़ा मसला है, अगर इसमें लपेटकर किसी और मसले को देखा जाए तो हमें बहुत ज़्यादा मग़्ज़मारी करनी पड़ेगी। इसलिए मज़हब को इस्मतफ़रोशी से अलग करके हमने एक तरफ़ रख दिया है।
इस्मतफ़रोशी क्या है...? इस्मत (आबरू) को बेचना। यानी उस मोती को बेचना जिसे औरत की ज़िंदगी का सबसे क़ीमती ज़ेवर माना जाता है। इस ज़ेवर की क़ीमत इसलिए बहुत ज़्यादा बढ़ गई है कि तजुर्बे ने हमें बताया है कि औरत जब एक बार इसे खो देती है तो समाज की नज़रों में उसकी कोई इज़्ज़त नहीं रहती। यह मोती कई तरीक़ों से बर्बाद होता है। जब औरत की शादी हो जाए तो यह मोती पति की जेब में चला जाता है। कई बार मर्द इसे ज़बरदस्ती हासिल कर लेते हैं और कई बार शादी के बिना औरतें इसे अपने मनपसंद मर्दों के हवाले कर देती हैं। कुछ हालात से मजबूर होकर इसे बेच देती हैं और कुछ इसका व्यापार करती हैं।
हम उन औरतों के बारे में कुछ कहना चाहते हैं जो पेशे के तौर पर अपनी इस्मत बेचती हैं, हालाँकि यह बिल्कुल साफ़ बात है कि इस्मत सिर्फ़ एक बार खोई या बेची जा सकती है, बार-बार इसे बेचा या खोया नहीं जा सकता। लेकिन चूँकि इस पेशे को आम बोलचाल में इस्मतफ़रोशी कहा जाता है, इसलिए हम इसे इस्मतफ़रोशी ही कहेंगे। इस्मतफ़रोश औरत एक ज़माने से दुनिया की सबसे ज़लील हस्ती समझी जाती रही है, मगर क्या हमने ग़ौर किया ہے कि हम में से ज़्यादातर ऐसी ज़लील और ख़्वार हस्तियों के दर पर ठोकरें खाते हैं...? क्या हमारे दिल में यह ख़याल पैदा नहीं होता कि हम भी ज़लील हैं।
अफ़सोस की बात है कि मर्दों ने इस पर कभी ग़ौर नहीं किया। मर्द अपने दामन पर ज़िल्लत के हर धब्बे को इस्मतफ़रोश औरत के दिल की कालिख का नाम देगा। हक़ीक़त इसके बिल्कुल उलट है। औरतों में चाहे वे धंधा करने वाली हों या न हों, निन्यानवे फ़ीसदी ऐसी होंगी जिनके दिल इस्मतफ़रोशी के इस काले व्यापार के बावजूद बदकार मर्दों के दिल के मुक़ाबले कहीं ज़्यादा रौशन होंगे। मौजूदा निज़ाम के तहत जिसकी बागडोर सिर्फ़ मर्दों के हाथ में है, औरत चाहे वह इस्मतफ़रोश हो या इज़्ज़तदार, हमेशा दबी रही है। मर्द को हक़ होगा कि वह उसके बारे में जो चाहे राय क़ायम करे। हमने कई बार अपने कानों से ऐश-पसंद अमीरों को अपना माल-असबाब हवस के तंदूर में ईंधन के तौर पर जलाकर यह कहते सुना है कि फलाँ तवायफ़ या फलाँ वेश्या ने उनको तबाह और बर्बाद कर दिया है... यह पहेली अभी तक हमारी समझ में नहीं आई।
वेश्या या तवायफ़ अपने व्यापारिक उसूलों के तहत हर मर्द से जो उसके पास गाहक के तौर पर आता है, ज़्यादा से ज़्यादा मुनाफ़ा हासिल करने की कोशिश करेगी। अगर वह मुनासिब दामों पर या हैरान करने वाली क़ीमत पर अपना माल बेचती है तो यह उसका पेशा है, बनिया भी तो सौदा तौलते वक़्त डंडी मार जाता है। कुछ दुकानें ज़्यादा क़ीमत पर अपना माल बेचती हैं, कुछ कम क़ीमत पर। हैरानी तो इस बात की है कि जब सदियों से हम यह सुन रहे हैं कि वेश्या का डसा हुआ पानी नहीं माँगता, तो हम क्यों अपने-आप को उससे डसवाते हैं और फिर क्यों ख़ुद ही रोना-पीटना शुरू कर देते हैं। वेश्या जानबूझकर या किसी बदले की भावना के तहत मर्दों के माल और दौलत पर हाथ नहीं डालती। वह सौदा करती है और कमाती है। मर्द अपनी जिस्मानी ख़्वाहिशों को पूरा करने की क़ीमत अदा करते हैं और बस!
मुमकिन है वेश्या किसी मर्द से मुहब्बत करती हो, लेकिन हर वह गाहक जो एक ख़ास जज़्बे के तहत उसकी दुकान में जाता है, दिल में यह ख़्वाहिश भी पैदा कर ले कि वह उससे सच्ची मुहब्बत करे, तो यह कैसे मुमकिन है...? हम अगर किसी दुकान से एक रुपये का आटा लेने जाएँ तो हमारी यह उम्मीद बिल्कुल बेतुकी होगी कि वह हमें अपने घर में दावत देगा और सिर के गंजेपन का कोई लाजवाब नुस्ख़ा बताएगा। वेश्या अपने उस गाहक के सामने जो उससे मुहब्बत चाहता है, अपने चेहरे पर बनावटी मुहब्बत के जज़्बात पैदा करेगी। यह चीज़ गाहक को ख़ुश कर देगी, मगर यह औरत अपने सीने की गहराइयों में से हर मर्द के लिए जो शराब पीकर उसके कोठे पर झूमने लगता है और रोमांस की एक नई दुनिया बसाना चाहता है, मुहब्बत की पाक और साफ़ आवाज़ नहीं निकाल सकती।
वेश्या को सिर्फ़ बाहर से देखा जाता है। उसके रंग-रूप, उसकी भड़कीली पोशाक और उसके मकान की सजावट देखकर यही नतीजा निकाला जाता है कि वह ख़ुशहाल है। यह सही नहीं। जिस औरत के दरवाज़े शहर के हर उस शख़्स के लिए खुले हैं जो अपनी जेबों में चाँदी के चंद सिक्के रखता हो। चाहे वह मोची हो या भंगी, लँगड़ा हो या लूला, ख़ूबसूरत हो या बदसूरत, उसकी ज़िंदगी का अंदाज़ा बख़ूबी लगाया जा सकता है। एक बदसूरत मर्द जिसके मुँह से पायरिया लगे दाँतों की बदबू के भभके निकलते हैं, एक सफ़ाई-पसंद वेश्या के यहाँ आता है, चूँकि उसकी जेब में उस वेश्या के जिस्म को एक ख़ास वक़्त तक ख़रीदने के लिए दाम मौजूद हैं। वह नफ़रत के बावजूद उस गाहक को नहीं लौटा सकती। सीने पर पत्थर रखकर उसको अपने इस गाहक की बदसूरती और उसके मुँह की बदबू बर्दाश्त करनी ही पड़ेगी। वह अच्छी तरह जानती है कि उसका हर गाहक अपोलो नहीं हो सकता।
टाइपिस्ट औरतों को हैरानी से नहीं देखा जाता। वे औरतें जो दाई का काम करती हैं, उन्हें हैरानी और नफ़रत से नहीं देखा जाता। वे औरतें जो गंदगी सिर पर उठाती हैं, उनकी तरफ़ हिक़ारत (तिरस्कार) से नहीं देखा जाता, लेकिन ताज्जुब है कि उन औरतों को जो ओछे या भोंडे तरीक़े से अपना जिस्म बेचती हैं, हैरानी, नफ़रत और हिक़ारत से देखा जाता है। हज़रात, यह जिस्मफ़रोशी ज़रूरी है। आप शहर में ख़ूबसूरत और शानदार गाड़ियाँ देखते हैं... ये ख़ूबसूरत और शानदार गाड़ियाँ कूड़ा-करकट उठाने के काम नहीं आ सकतीं। गंदगी और मैला उठाकर बाहर फेंकने के लिए और गाड़ियाँ मौजूद हैं जिन्हें आप कम देखते हैं और अगर देखते हैं तो फ़ौरन अपनी नाक पर रुमाल रख लेते हैं... इन गाड़ियों का वजूद ज़रूरी है और उन औरतों का वजूद भी ज़रूरी है जो आपकी गंदगी उठाती हैं। अगर ये औरतें न होतीं तो हमारे सब गली-कूचे मर्दों की गंदी हरकतों से भरे होते। ये औरतें उजड़े हुए बाग़ हैं, घूरे (कूड़े के ढेर) हैं जिन पर गंदे पानी की नालियाँ बह रही हों, ये इन गंदी नालियों ही पर ज़िंदा रहती हैं... हर इंसान कैसे एक जैसे शानदार तरीक़े पर ज़िंदगी बसर कर सकता है?
ज़रा सोचिए, शहर के एक कोने में एक वेश्या का मकान है, रात के अंधेरे में एक मर्द जो अपने सीने में उससे भी ज़्यादा काला दिल रखता है, अपने जिस्म की आग ठंडी करने के लिए बेधड़क उसके मकान में चला जाता है। वेश्या उस मर्द के दिल के कालेपन से वाक़िफ़ है। उससे नफ़रत भी करती है। अच्छी तरह जानती है कि उसका वजूद इंसानियत के दामन पर एक बदनुमा धब्बा है। उसको मालूम है कि वह बर्बरता के ज़माने का एक ख़ौफ़नाक नमूना है, मगर वह अपने घर के दरवाज़े उस पर बंद नहीं कर सकती। जो दरवाज़े आर्थिक मजबूरी ने एक दफ़ा खोल दिए हों, बहुत मुश्किल से बंद किए जा सकते हैं।
यह वेश्या जो औरत पहले है, वेश्या बाद में, उस मर्द को चंद सिक्कों के बदले अपना जिस्म हवाले कर देती है लेकिन उसकी रूह उस वक़्त जिस्म में नहीं होती। एक वेश्या के अल्फ़ाज़ सुनिए, लोग मुझे बाहर खेतों में ले जाते हैं... मैं लेटी रहती हूँ बिल्कुल सुन्न और बिना हिले-डुले, लेकिन मेरी आँखें खुली रहती हैं। मैं दूर... बहुत दूर उन पेड़ों को देखती रहती हूँ, जिनकी छाँव में कई बकरियाँ आपस में लड़-झगड़ रही होती हैं। कितना प्यारा मंज़र होता है। मैं बकरियाँ गिनना शुरू कर देती हूँ या पेड़ों की टहनियों पर कौओं को गिनने लगती हूँ। उन्नीस, बीस... इक्कीस बाईस... और मुझे मालूम भी नहीं होता कि मेरा साथी अपने काम से निपट कर एक तरफ़ हाँप रहा है।
तजुर्बा बताता है कि वेश्याएँ आम तौर पर ईश्वर से डरने वाली होती हैं। हर हिंदू वेश्या के मकान पर किसी न किसी कमरे में आपको कृष्ण भगवान या गणेश महाराज की मूर्ति या तस्वीर ज़रूर नज़र आएगी। वह उस मूर्ति की उसी क़दर सच्चे दिल से पूजा करती है जितनी एक इज़्ज़तदार या घरेलू औरत कर सकती है। इसी तरह वह वेश्या जो मुसलमान है, रमज़ान के महीने में रोज़े ज़रूर रखेगी, मुहर्रम में अपना कारोबार बंद रखेगी, काले कपड़े पहनेगी, ग़रीबों की मदद करेगी और ख़ास-ख़ास मौक़ों पर ख़ुदा के हुज़ूर में दुआ और इबादत का नज़राना भी ज़रूर पेश करेगी। पहली नज़र में अपनी इज़्ज़त गँवा चुकी औरतों का मज़हब से यह लगाव एक ढोंग मालूम होता है मगर हक़ीक़त में यह उनकी रूह का वह हिस्सा पेश करता है जो समाज के ज़ंग से यह औरतें बचा-बचा के रखती हैं।
दूसरे मज़हब की वेश्याएँ भी आपको रूहानी तौर पर अपने मज़हब के साथ बड़ी मज़बूती के साथ जकड़ी नज़र आएँगी। क्रिश्चियन वेश्या गिरजे में प्रार्थना के लिए ज़रूर जाएगी। कुँवारी मरियम की तस्वीर के पास दीया ज़रूर जलाएगी। दरअसल इस व्यापार में वेश्या अपने जिस्म को लगाती है न कि रूह को। भाँग या चरस बेचने वाला ज़रूरी नहीं कि इन नशों का आदी हो, ठीक इसी तरह हर मौलवी या पंडित पवित्र नहीं हो सकता। जिस्म पर दाग़ लग सकता है मगर रूह पर दाग़ नहीं लग सकता। वेश्या अपने काले व्यापार के बावजूद रौशन रूह की मालिक हो सकती है। वह अपने जिस्म की क़ीमत बड़ी बेदर्दी से वसूल करती है। मगर वह ग़रीबों की बड़े पैमाने पर मदद भी कर सकती है। बड़े-बड़े अमीर उसके दिल में अपनी मुहब्बत पैदा न कर सके हों, मगर वह सड़कों पर सोने वाले एक आवारागर्द की फटी हुई जेब में अपना दिल डाल सकती है।
वेश्या दौलत की भूखी होती है, लेकिन क्या दौलत की भूखी मुहब्बत की भूखी नहीं हो सकती? यह ऐसा सवाल है जिसके जवाब में हमें तफ़्सील से काम लेना पड़ेगा। ख़ानदानी वेश्या और नई बनी वेश्या में बहुत फ़र्क़ है और फिर वह औरतें या लड़कियाँ जो अपने ग़रीब माँ-बाप या अपने अनाथ बच्चों की परवरिश के लिए मजबूरन अपना जिस्म छुप-छुप कर बेचती हैं, उनकी हैसियत ऊपर बताई गई क़िस्मों से बिल्कुल अलग है।
ख़ानदानी वेश्या से हमारा मतलब वह पेशेवर औरत है जो वेश्या की कोख से पैदा होती है और उसी के घर में पाली-पोसी जाती है। दूसरे लफ़्ज़ों में वह औरत जिसको ख़ास उसूलों के तहत वेश्या बनने की तालीम दी जाती है। ऐसी औरतें जो इस माहौल में परवरिश पाती हैं, इश्क़ और मुहब्बत को आम तौर पर ऐसा सिक्का मानती हैं जो उनके बाज़ार में नहीं चल सकता। यह नज़रिया दुरुस्त है इसलिए कि अगर वह हर उस मर्द को जो उनके पास चंद लम्हे गुज़ारने के लिए आए, अपना दिल हवाले कर दें तो ज़ाहिर है कि वह अपने कारोबार में कामयाब नहीं हो सकतीं।
आम तौर पर यही देखने में आया है कि इस स्कूल की वेश्याओं के सीने में इश्क़ और मुहब्बत का अंश कम होता है। दूसरे लफ़्ज़ों में यह दूसरी औरतों के मुक़ाबले में मर्दों से इश्क़ करने में बड़ी एहतियात और बड़ी कंजूसी से काम लेती हैं। मर्दों से रोज़ाना मेल-जोल उनके दिल में एक ऐसी कड़वाहट पैदा कर देता है जिसे बयान नहीं किया जा सकता। वह मर्दों को हैवानों से बदतर समझने लगती हैं, यही वजह है कि वह इस मामले में एक हद तक मुनकिर (इनकार करने वाली) हो जाती हैं, मगर इसका यह मतलब नहीं कि उनका सीना मुहब्बत के कोमल जज़्बात से ख़ाली होता है।
जिस तरह भंगन की लड़की को गंदगी का पहला टोकरा उठाते वक़्त घिन नहीं आएगी उसी तरह अपने पेशे का पहला क़दम उठाते वक़्त ऐसी वेश्याओं को भी झिझक महसूस नहीं होगी। आहिस्ता-आहिस्ता हया और झिझक से जुड़े क़रीब-क़रीब तमाम जज़्बात उनमें घिस-घिसा कर हट जाते हैं... चकले के अंदर जहाँ हवस के पुजारी मर्दों के लिए इन औरतों के मकान खुले रहते हैं, कोमल जज़्बात कैसे दाख़िल हो सकते हैं। जिस तरह इज़्ज़तदार औरतें वेश्याओं की तरफ़ हैरत और ताज्जुब से देखती हैं, ठीक उसी तरह वह भी उनकी तरफ़ उसी नज़र से देखती हैं। पहली क़िस्म की औरतों के सामने यह सवाल होता है, क्या औरत इस क़दर ज़लील हो सकती है? और दूसरी क़िस्म की औरतें यह सोचती हैं, यह पवित्र औरतें कैसी हैं... क्या हैं?
वेश्या जिसकी माँ वेश्या थी, जिसकी दादी वेश्या थी, जिसकी परदादी वेश्या थी, जिसने वेश्या का दूध पिया, जो जिस्मफ़रोशी के पालने में पली, वहीं बड़ी हुई, जिसके व्यापार की शुरुआत भी वहीं हुई, वह इज़्ज़त और इज़्ज़तदार औरतों के बारे में क्या समझ सकती है। उन सौ लड़कियों में से जो वेश्याओं के घर में पैदा होती हैं, शायद एक-दो के दिल में अपने आस-पास के माहौल से नफ़रत पैदा होती है और वह अपने जिस्म को सिर्फ़ एक मर्द के हवाले करने का फ़ैसला करती हैं, लेकिन बाक़ी सब उसी रास्ते पर चलती हैं जो उनकी माओं ने उनके लिए चुना होता है।
जिस तरह एक दुकानदार का बेटा अपनी नई दुकान खोलने का शौक़ रखता है और इस शौक़ का इज़हार अलग-अलग तरीक़ों से करता है, ठीक उसी तरह वेश्याओं की जवान लड़कियाँ अपना पेशा शुरू करने का बड़ा चाव रखती हैं, चुनाँचे देखा गया है कि ऐसी लड़कियाँ नित-नए तरीक़ों से अपने जिस्म और हुस्न की नुमाइश करती हैं। जब वह अपने व्यापार की शुरुआत करती हैं तो बाक़ायदा रस्में अदा की जाती हैं। एक ख़ास इंतज़ाम के तहत यह सब कुछ किया जाता है जैसा कि दूसरे व्यापारिक कामों की बुनियाद रखते वक़्त ख़ास रस्मों का ध्यान रखा जाता है। इन हालात के तहत जैसा कि ज़ाहिर है, ऊपर बताई गई क़िस्म की वेश्याओं के दिल में इश्क़ पैदा होना मुश्किल है, यहाँ इश्क़ से हमारा मतलब वही इश्क़ है, जो हमारे यहाँ लंबे समय से प्रचलित है। हीर-राँझा और सस्सी-पुन्नू वाला इश्क़।
ऐसी वेश्याएं इश्क़ करती हैं, मगर उनका इश्क़ बिल्कुल अलग क़िस्म का होता है। ये लैला-मजनूं और हीर-रांझे वाला इश्क़ नहीं कर सकतीं। इसलिए कि यह उनके व्यापार पर बहुत बुरा असर डालता है, अगर कोई वेश्या अपने व्यापार के समय में से चंद लम्हे ऐसे मर्द को दे जिससे उसे रुपये-पैसे का लालच न हो तो हम उसे इश्क़ और मुहब्बत कहेंगे। आमतौर पर वेश्या को सिर्फ़ मर्द की दौलत से मुहब्बत होती है, अगर वह किसी मर्द से उसकी दौलत की ख़ातिर नहीं बल्कि सिर्फ़ उसकी ख़ातिर मिले तो यह उसूल टूट जाएगा और इसके साथ ही यह भी ज़ाहिर हो जाएगा कि उस वेश्या की जेब नहीं बल्कि उसका दिल काम कर रहा है। जब दिल काम कर रहा हो तो इश्क़ और मुहब्बत के जज़्बे का पैदा होना लाज़िमी है।
चूंकि आम तौर पर औरत से इश्क़ और मुहब्बत करने का इकलौता मक़सद जिस्मानी लज़्ज़त होता है, इसलिए हम यहां भी जिस्मानी लज़्ज़तों ही को इश्क़ के इस जज़्बे का प्रेरक समझेंगे, हालांकि इसके अलावा और बहुत सी चीज़ें इसे पैदा करने का कारण होती हैं। मिसाल के तौर पर वेश्या जो अपने कोठे पर हर मर्द पर हुक्म चलाने की आदी होती है, कभी ख़त्म न होने वाली नाज़-बरदारियों से सख़्त तंग आ जाती है। उसको मालिक बनना पसंद है, मगर कभी-कभी वह ग़ुलाम बनना भी चाहती है। हर फ़रमाइश पूरी हो जाने में उसको बहुत फ़ायदा है मगर इनकार में और ही मज़ा है। वह हर तरफ़ से दौलत समेटती है। यह काम उसकी रोज़मर्रा की आदत बन जाता है। इसलिए कभी-कभी उसके दिल में यह ख़्वाहिश पैदा होती है कि वह भी किसी के लिए ख़र्च करे, अगर सब उसकी ख़ुशामद करते हैं तो वह भी किसी की ख़ुशामद करे, अगर वह ज़िद करती है तो कोई उससे भी ज़िद करे। वह सबको दुत्कारती है तो कोई उसे भी दुत्कारे, सताए, मारे-पीटे। ये तमाम चीज़ें मिलकर उसके दिल में एक ख़ास मर्द को अपना साथी बनाने पर मजबूर करती हैं, इसलिए वह चुनाव करती है।
चुनाव का यह वक़्त बहुत नाज़ुक होता ہے۔ बहुत मुमकिन है वह किसी रईसज़ादे पर अपने दिल के ख़ास दरवाज़े खोल दे और यह भी मुमकिन है कि वह अपने कोठे पर चिलमें भरने वाले चरस पीने वाले मिरासी के गंदे क़दमों में अपना वह सिर रख दे जिसके बालों को चूमने के लिए बड़े-बड़े राजाओं और महाराजाओं ने कई-कई हज़ार सोने की अशरफ़ियां पानी की तरह बहा दी थीं और फिर उस वक़्त भी कोई हैरानी नहीं होनी चाहिए जब वह गंदा आदमी उस सिर को ठोकर मारकर परे हटा दे। इस क़िस्म की घटनाएं देखने और सुनने में आ चुकी हैं। हमारे यहां एक मशहूर तवायफ़ इस वक़्त तक मौजूद है, जिसके इश्क़ में एक नवाब मुद्दतों लट्टू बना रहा मगर वह एक निहायत ही मामूली आदमी के इश्क़ में गिरफ़्तार थी। तवायफ़ नवाब के इश्क़ का मज़ाक़ उड़ाती थी और उधर उसके अपने इश्क़ का मज़ाक़ उड़ाया जाता था। नवाब तवायफ़ के इश्क़ में रुसवा हुआ और तवायफ़ उस आदमी के इश्क़ में बदनाम हुई।
आम औरतों के मुक़ाबले में इन वेश्याओं के इश्क़ की शिद्दत बहुत ज़्यादा होती है। इसलिए कि ये मर्दों के साथ मिलने-जुलने से नित-नए आशिक़ाना जज़्बात से वाक़िफ़ होती रहती हैं। जब ये ख़ुद इसमें गिरफ़्तार होती हैं तो इनको जलन ज़्यादा महसूस होती है। ऐसे बाज़ारों में जहां ये औरतें रहती हैं, आपको ऊपर बताई गई क़िस्म की कई कहानियां सुनने में आ सकती हैं। ख़ासकर उन ऐश-पसंद अमीरों को जिनकी थैलियों के मुंह इन जिस्म-फ़रोश औरतों के कोठों पर खुलते हैं, ऐसी कहानियां ज़ुबानी याद हैं, जिनको वे अक्सर मज़े ले-लेकर दूसरों को सुनाने के आदी हैं। सारंगिए, मिरासी, तबलची और वे लोग जिनका आना-जाना ऐसे कोठों पर आम रहता है, आपको बहुत दिलचस्प क़िस्से सुनाएंगे।
इन्हीं लोगों से सुने-सुनाए क़िस्सों में हम एक ऐसी वेश्या की कहानी मिसाल के तौर पर पेश कर सकते हैं जो कि हज़ारों और लाखों में खेलती थी, मगर उसका दिल एक चीथड़े लटकाए मज़दूर के खुरदरे पैरों तले हर रोज़ रौंदा जाता था। वह हर रात अपने दौलतमंद चाहने वालों से सोने-चांदी के ढेर जमा करती थी मगर एक मज़दूर के मैले-कुचैले सीने में धड़कते हुए दिल तक उसका हाथ नहीं पहुंच सकता था। कहते हैं कि यह नाज़ुक-बदन उस मज़दूर की ख़ुशी हासिल करने के लिए कई बार सड़क के पत्थरों पर सोई।
इस क़िस्म का विरोधाभास जो इश्क़ और मुहब्बत का असली रंग है, वेश्यालयों में देखा जाए तो बहुत शोख़, रहस्यमयी हद तक रूमानी नज़र आता है। इसकी वजह सिर्फ़ पृष्ठभूमि है जो सामने के दृश्य के हर नक़्श को उभारती है। चूंकि आम तौर पर वेश्या के बारे में यही ख़याल किया जाता है कि वह सोना खोदने वाली कुदाल है और मुहब्बत के जज़्बात से पूरी तरह ख़ाली है, इसलिए जब कभी किसी वेश्या के इश्क़ की ऐसी दास्तान सुनने में आती है तो बड़ी अजीब-ओ-ग़रीब और रहस्यमयी मालूम होती है। हम ऐसी दास्तानों को इसी वजह से आम औरतों और मर्दों के प्रेम-प्रसंगों की तुलना में ज़्यादा दिलचस्पी से सुनते हैं। जैसे किसी असाधारण हादसे का विवरण सुन रहे हों। हालांकि दिल और उसकी धड़कनों से जिस्मफ़रोशी या सतीत्व का कोई ताल्लुक़ नहीं... एक सती-सावित्री औरत के सीने में मुहब्बत से ख़ाली दिल हो सकता है और इसके विपरीत चकले की एक सबसे मामूली वेश्या मुहब्बत से भरपूर दिल की मालिक हो सकती है। हर औरत वेश्या नहीं होती लेकिन हर वेश्या औरत होती है। इस बात को हमेशा याद रखना चाहिए।
वेश्याओं के इश्क़ में एक ख़ास बात क़ाबिल-ए-ज़िक्र है। उनका इश्क़ उनके रोज़मर्रा के कामों पर बहुत कम असर डालता है। ऐसी बहुत कम तवायफ़ें मिलेंगी जिन्होंने इस जज़्बे की ख़ातिर अपना कारोबार पूरी तरह बंद कर दिया हो (किसी शरीफ़ लड़की के इश्क़ में गिरफ़्तार होकर शहर का शरीफ़ दुकानदार भी अपनी दुकान बंद नहीं करेगा)। आम तौर पर यही देखने में आया है कि वे अपने इश्क़ के साथ-साथ अपना कारोबार भी जारी रखती हैं। दरअसल माल-ओ-दौलत हासिल करने की एक व्यापारिक तलब उनमें पैदा हो जाती है। नित-नए गाहक बनाना और हर रोज़ अपना माल बेचना एक आदत-सी बन जाती है और यही आदत बाद में स्वभाव की शक्ल इख़्तियार कर लेती है। इस तरह कि फिर उसकी ज़िंदगी के दूसरे पहलुओं से कोई सरोकार नहीं रहता। जिस तरह घर के नौकर झटपट अपने मालिकों के बिस्तर लगाकर अपने आराम का ख़याल करते हैं। ठीक इसी तरह ये औरतें भी अपने गाहकों को निबटाकर अपनी ख़ुशी और राहत की तरफ़ पलट आती हैं।
दिल ऐसी चीज़ नहीं जो बांटी जा सके और मर्द के मुक़ाबले में औरत कम हरजाई होती है। चूंकि वेश्या औरत है, इसलिए वह अपना दिल तमाम गाहकों में बांट नहीं सकती। औरत के बारे में मशहूर है कि वह अपनी ज़िंदगी में सिर्फ़ एक मर्द से मुहब्बत करती है। हम समझते हैं कि यह बहुत हद तक ठीक है। वेश्या सिर्फ़ उसी मर्द पर अपने दिल के तमाम दरवाज़े खोलेगी, जिससे उसे मुहब्बत हो। हर आने-जाने वाले मर्द के लिए वह ऐसा नहीं कर सकती। वेश्याओं के बारे में आम तौर पर यह शिकायत सुनने में आती है कि वे बड़ी बेरहम और जल्लाद स्वभाव वाली होती हैं। मुमकिन है सौ में से पांच-छह इस तरह की हों मगर सब की सब ऐसी नहीं होतीं, बल्कि यूं कहिए कि नहीं हो सकतीं। वेश्या और पवित्र औरत का मुक़ाबला हरगिज़-हरगिज़ नहीं करना चाहिए। इन दोनों का मुक़ाबला हो ही नहीं सकता। वेश्या ख़ुद कमाती है और पवित्र औरत के पास कमाकर लाने वाले कई मौजूद होते हैं। हमारे कानों में एक वेश्या के ये लफ़्ज़ अभी तक गूंज रहे हैं, जो उसके दिल की तमाम गहराइयां पेश करते हैं। आप भी सुनिए!
वेश्या एक बेबस और बेसहारा औरत है। उसके पास हर रोज़ सैकड़ों मर्द आते हैं, एक ही ख्वाहिश लेकर... वह अपने चाहने वालों की भीड़ में भी अकेली रहती है... बिल्कुल अकेली... वह रात के अंधेरे में चलने वाली रेलगाड़ी है जो मुसाफिरों को अपने-अपने ठिकाने पर पहुंचा कर एक लोहे की छत के नीचे खाली खड़ी रहती है। बिल्कुल खाली, धुएं और धूल-मिट्टी से अटी हुई... लोग हमें बुरा कहते हैं। मालूम नहीं क्यों...? वही मर्द जो रात के अंधेरे में हमसे सुकून खरीद कर जाते हैं, दिन के उजाले में हमें नफ़रत और हिकारत से देखते हैं... हम खुलेआम अपना जिस्म बेचती हैं और इसको राज़ बना कर नहीं रखतीं। वह हमारे पास यह चीज़ खरीदने के लिए आते हैं और इस सौदे को राज़ बना कर रखते हैं... समझ में नहीं आता क्यों?
ज़रा उस वेश्या की कल्पना कीजिए जिसका इस दुनिया में कोई भी न हो। न भाई, न बहन, न मां, न बाप और न कोई दोस्त। अपने गाहकों से फुरसत पाकर जब वह कमरे में अकेली, बिल्कुल अकेली रह जाती होगी तो उसके दिलो-दिमाग की क्या हालत होती होगी...? यह अंधेरा इस अंधेरे में और कितना गहरा हो जाता होगा। अगर सारा दिन टोकरी ढोने के बाद मज़दूर को अपनी थकान दूर करने का कोई ज़रिया नज़र न आए, अपना दिल बहलाने के लिए बीवी की बातें उसे नसीब न हों, न उसकी मां हो जो उसके थके हुए कंधे पर हाथ रख कर उसकी तमाम तकलीफें दूर कर दे, तो बताइए उस मज़दूर की क्या हालत होगी? उस मज़दूर और उस वेश्या, दोनों की हालत एक जैसी है।
वेश्या एक रंगीन चीज़ नज़र आती है... क्यों? इस सवाल के जवाब के लिए हमें अपना दिल टटोलना पड़ेगा। यह कमज़ोरी हम मर्दों की निगाहों की है और इस कमज़ोरी के कारण तलाश करने के लिए हमें अपने आप ही से बातचीत करनी पड़ेगी। इस बारे में सोच-विचार के बाद हम जो मालूम कर सके हैं, वह यह है।
वेश्या का नाम लेते वक्त हमारे दिमाग में एक ऐसी औरत की तस्वीर पैदा होती है, जो मर्द की कामुक ख्वाहिशें उसकी मर्ज़ी और ज़रूरत के मुताबिक पूरी कर सकती है। हालांकि औरत और वेश्यापन दो बिल्कुल अलग चीज़ें हैं, मगर जब हम किसी वेश्या के बारे में कुछ सोचते हैं तो उस वक्त औरत अपने पेशे समेत सामने आ जाती है। इसमें कोई शक नहीं कि इंसान पर उसके माहौल और उसके पेशे का बहुत असर होता है, मगर कोई वक्त ऐसा भी होता है जब वह इन तमाम चीज़ों से अलग हट कर सिर्फ इंसान होता है। इसी तरह कोई ऐसा वक्त भी ज़रूर आता होगा जब वेश्या अपने पेशे का लिबास उतार कर सिर्फ औरत रह जाती होगी, मगर अफ़सोस है कि हम हर वक्त औरत और वेश्या को एक ही जगह देखने के आदी हैं। जब वेश्या को हम इस चश्मे से देखते हैं तो हमें उसके साथ ही वह चीज़ भी नज़र आती है जिसे हम मर्द ऐशो-आराम का नाम देते हैं, और ऐशो-आराम का मतलब आम तौर पर जिस्मानी मज़ा होता है।
जिस्मानी मज़ा क्या है? एक वक्ती मज़ा जो हमें अपनी बीवी या किसी और औरत की मदद से हासिल होता है। अब यहां सवाल पैदा होता है कि शादीशुदा मर्द अपनी बीवियां छोड़ कर इस वक्ती मज़े के लिए बाज़ारी औरतों के पास क्यों जाते हैं? जब इन लोगों की जिस्मानी ख्वाहिशें घर में पूरी हो सकती हैं तो वह इसके लिए बाहर क्यों मारे-मारे फिरते हैं? इस सवाल का जवाब मुश्किल नहीं। आपको ऐसे कई आदमी नज़र आएंगे जो घर के बढ़िया और लज़ीज़ खाने छोड़ कर होटलों में जाते हैं। इसकी वजह सिर्फ यह है कि उनको होटलों के खाने का चस्का लग जाता है। होटल की चीज़ों में पौष्टिकता कम होती है मगर उनमें एक और चीज़ होती है जो इन लोगों को अपनी तरफ खींचती है। इसे हम होटलियत कह सकते हैं, एक ऐसी बुराई जो खूबी बन जाती है, बल्कि यूं कहिए कि एक कशिश बन जाती है। इसमें होटल के मालिकों के फन का दखल भी होता है।
इसके अलावा जो माहौल होटल में मयस्सर आ सकता है, उन्हें अपने घर में नसीब नहीं हो सकता। इंसान स्वभाव से बदलाव पसंद है, इसलिए जब वह अपने रोज़मर्रा के प्रोग्राम में तब्दीली चाहे तो ताज्जुब नहीं होना चाहिए। इसमें कोई शक नहीं कि होटलों में इन लोगों को अच्छा खाना नहीं मिल सकता और इसमें किसी शक की गुंजाइश नहीं कि यहां घर के मुकाबले ज़्यादा खर्च उठाना पड़ता है, मगर यही चीज़ तो ये लोग चाहते हैं। यही फर्क तो इन्हें घर से खींच कर होटलों में लाता है। यह नादानी है मगर मज़े की बात यह है कि उन्हें इसी नादानी में ही तो मज़ा आता है।
उन शादीशुदा मर्दों का भी यही हाल है जो अपनी बीवियां छोड़ कर बाज़ारी औरतों की आगोश में मज़ा तलाश करने आते हैं। अब आप पूछेंगे कि क्या इन लोगों को इस तलाश में कामयाबी मिलती है...? हम कहेंगे यकीनन... जिन औरतों के पास ये लोग जाते हैं, वे इस फन की माहिर होती हैं। वे यही चीज़ तो बेचती हैं। उनका पेशा ही यह है कि घरेलू औरतों से बिल्कुल अलग तरह का मज़ा पेश करें, अगर वे ऐसा न करें तो उनका कारोबार कैसे चल सकता है?
जैसा कि हम इस लेख की शुरुआत में कह चुके हैं, जिस्मफरोशी कोई अक्ल के खिलाफ चीज़ नहीं है।
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