Font by Mehr Nastaliq Web

aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

jis ke hote hue hote the zamāne mere

रद करें डाउनलोड शेर

क़दीम हिंदी स्टेज

अंसार नासिरी


अनुवाद : Rekhta Editor

अंसार नासिरी

क़दीम हिंदी स्टेज

अंसार नासिरी

MORE BYअंसार नासिरी

    प्राचीन हिंदी स्टेज

     

    इस लेख के पहले हिस्से में हम प्राचीन हिंदी ड्रामा की शुरुआत, ड्रामा के प्रकारों, प्लॉट की तरतीब, प्राचीन हिंदी ड्रामों की कुछ विशेषताओं वग़ैरह के बारे में विस्तार से बातचीत कर चुके हैं। मौजूदा लेख में प्राचीन हिंदी स्टेज के बारे में जानकारी देना मक़सद है। अफ़सोस की बात है कि इस विषय पर उर्दू ज़बान में आज तक कुछ भी नहीं लिखा गया। मोहम्मद उमर नूर इलाही साहबान ने अपनी क़ीमती रचना 'नाटक सागर' (जो यक़ीनन उर्दू ज़बान में अपनी तरह की पहली किताब है) में भी इस सिलसिले में कुछ नहीं लिखा। सिर्फ़ इतना लिखकर इस बयान को ख़त्म कर दिया कि, हक़ीक़त यह है कि किसी थियेटर के निर्माण का ख़याल उस वक़्त की सभ्यता से परे था... लोगों का रहन-सहन और देश की आब-ओ-हवा किसी ऐसे निर्माण की मांग नहीं करती थी जिससे थियेटर का काम लिया जाता।

     

    ताज्जुब है कि ऐसे ज़िम्मेदार हज़रात ने एक अहम मसले के बारे में बिना सोचे-समझे यह सरसरी सी राय पास कर दी। अगर वे इस सिलसिले में मामूली सी भी तवज्जो से काम लेते तो ख़ुद ही अपनी ग़लती मान लेते। इसमें कोई शक नहीं कि इस सिलसिले में बहुत ज़्यादा कोशिश, रिसर्च और गहरी नज़र से काम लेना पड़ता। लेकिन अंग्रेज़ी ज़बान में इस तरह की बहुत सी किताबें हैं जिनसे ज़रूरत से ज़्यादा सामग्री मिल सकती थी और इस तरह यह काम रिसर्च और छानबीन के साथ बेहतरीन तरीक़े से पूरा हो सकता था। मगर बदक़िस्मती से 'नाटक सागर' के क़ाबिल लेखकों ने इस ज़हमत को उठाना मुनासिब नहीं समझा। बहरहाल, अब हम कुछ अंग्रेज़ी और अन्य किताबों की मदद से प्राचीन हिंदी स्टेज के बारे में यह लेख पेश करते हैं।

     

    प्राचीन हिंदी स्टेज की बनावट, सजावट और प्रबंध के बारे में तमाम बातें भरत के 'नट शास्त्र' (जिसके 12 अध्यायों का अनुवाद अंग्रेज़ी ज़बान में हो चुका है) और अभिनवगुप्त की व्याख्याओं में विस्तार के साथ दर्ज हैं। 'संगत रतन कार' और 'मित्रोगुप्त आचार्य' वग़ैरह से भी काफ़ी मदद मिलती है।

     

    प्राचीन हिंदी ड्रामा और स्टेज के उसूलों और तरतीब वग़ैरह पर ग़ौर करने से पहले यह बात अच्छी तरह समझ लेनी चाहिए कि प्राचीन हिंदी सभ्यता हर लिहाज़ से प्राचीन यूनानी सभ्यता के बिल्कुल उलट थी। यूनान में लोकतंत्र सत्ता में था और यहाँ राजशाही, और यही एक चीज़ सारे मतभेदों की जड़ थी। इसलिए एथेंस के प्राचीन खेलों का माहौल, दर्शकों की भीड़, जजों का मुक़र्रर होना, इनामों का बंटवारा वग़ैरह, इन चीज़ों का प्राचीन हिंदी खेलों में नाम-ओ-निशान भी न था। ईसा पूर्व पाँचवीं सदी में एथेंस के थियेटर की शक्ल यह थी कि एक्रोपोलिस (पहाड़ी) की तलहटी में ऑर्केस्ट्रा और स्टेज मुक़र्रर होता था, और पहाड़ी की ढलान पर दर्शकों के बैठने की जगह तय होती थी। इसके बरख़िलाफ़ प्राचीन हिंदी थियेटर ख़ुद महाराजा के महल के एक हिस्से में बना होता था। यूनानी तमाशों को हज़ारों दर्शक देख सकते थे और हिंदुस्तानी खेलों को सिर्फ़ गिने-चुने अमीर और दरबारी वग़ैरह। इन्हीं चंद बातों से दोनों के फ़र्क़ का अंदाज़ा हो सकता है।

     

    भरत जी की मशहूर रचना नट शास्त्र का दूसरा अध्याय थियेटर की इमारत (संगत साल) के बारे में बेशुमार विवरणों से भरा पड़ा है, जिनमें से हम कुछ अहम बातों का ज़िक्र करेंगे। ज़मीन जो थियेटर की इमारत के लिए चुनी जाए, सख़्त और हर क़िस्म के झाड़-झंखाड़ से अच्छी तरह साफ़ होनी चाहिए। हदबंदी वग़ैरह की अच्छी तरह पैमाइश (नाप) कर लेनी चाहिए ताकि तयशुदा लंबाई-चौड़ाई में फ़र्क़ न आए। नींव का पत्थर रखना एक भव्य धार्मिक रस्म समझी जाती थी जिसमें नाच-रंग और ब्राह्मण, ब्रह्मचारियों वग़ैरह का भोज भी शामिल था। कंपनी के डायरेक्टर पर तीन दिन का उपवास (रोज़ा) फ़र्ज़ था।

     

    भरत जी ने साइज़ के लिहाज़ से थियेटर की तीन क़िस्में तय की हैं लेकिन हम सिर्फ़ स्टैंडर्ड साइज़ के थियेटर का ज़िक्र करेंगे। आम तौर से यही क़िस्म प्रचलित थी और इसको नट वशमान कहते थे। यह 96 फ़ुट लंबी, 48 फ़ुट चौड़ी और 20-25 फ़ुट ऊँची एक आयताकार इमारत होती थी। जिसकी छत गुंबदनुमा होती थी और दीवारें पक्के चूने-गारे की। चारदीवारी पर शेरों, हाथियों, पहाड़ियों और हरे-भरे मैदानों की रंग-बिरंगी तस्वीरें बनी होती थीं। मंडप के चारों कोनों पर चार खंभों का होना ज़रूरी था। ये चार खंभे चारों हिंदू जातियों ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र के नाम पर समर्पित होते थे। पर्दे पर भी चार रंग का एक झंडा सा बना रहता था। ये चार रंग नीला, लाल, पीला और सफ़ेद होते थे। हर एक रंग एक-एक जाति से जुड़ा होता था।

     

    इस तरह की शुद्ध लोकतांत्रिक भावनाओं का उस ज़माने की सभ्यता में नज़र आना अजीब सी बात है, लेकिन शायद मक़सद यह हो कि महाराजा की नज़र में हर एक जाति का दर्जा एक सा है और राजमहल की इन गतिविधियों में जिनका संबंध किसी ख़ास कला से हो, हर दर्जे के लोग बराबर की हैसियत से शामिल समझे जाते थे। नट वशमान यानी थियेटर के दो बराबर के हिस्से होते थे। पहले हिस्से को प्रेक्षाघर (Auditorium) यानी दर्शकों के बैठने की जगह कहते थे और दूसरे को रंगभूमि यानी स्टेज। प्राचीन हिंदी थियेटर की इमारत का नक़्शा एक ख़ाके (स्केच) की मदद से अच्छी तरह समझ में आ सकता है।

     

    ख़ाके पर एक नज़र डालने से यह साफ़ तौर पर ज़ाहिर हो जाता है कि प्रेक्षाघर (दर्शकों के बैठने की जगह) 48 फ़ुट गुणा 48 फ़ुट का एक वर्ग (स्क्वायर) है। रंगभूमि यानी स्टेज दो बराबर के हिस्सों में बंटा है। पिछला हिस्सा कलाकारों के कपड़े बदलने और स्वांग वग़ैरह रचने के लिए तय था, इसको नेपथ्यघर यानी ग्रीन रूम कहते थे। नेपथ्यघर और रंगभूमि के बाक़ी हिस्से के बीच एक दीवार जिस पर तरह-तरह के रंगीन चित्र बने होते थे, एक स्थायी बैकग्राउंड (back-ground) के तौर पर मौजूद होती थी और इस दीवार के आगे वाला हिस्सा ही असल रंगभूमि कहलाता था।

     

    नेपथ्यघर यानी ग्रीन रूम असल रंगभूमि (फ़्रंट स्टेज) से ज़रा ढलान (नीचे) में होता था। और इसमें दाख़िल होने के लिए एक-दो सीढ़ियाँ उतरनी पड़ती थीं। असल रंगभूमि फिर दो बराबर के हिस्सों में बंटी होती थी, हालाँकि बीच में कोई विभाजन रेखा नहीं थी। लेकिन पर्दा (यवनिका) इन्हीं दोनों हिस्सों के बीच मौजूद होता था। यह पर्दा ऊपर से नहीं गिरता था बल्कि आम तौर पर बीच में से हट कर इधर-उधर हो जाता था। पर्दे की वजह से जो दो काल्पनिक हिस्से हो जाते थे, उसे हम आसानी के लिए अगला और पिछला स्टेज कहेंगे। (front and back stage) अगले स्टेज के दोनों बाज़ुओं पर 12 वर्ग फ़ुट के दो साइड विंग्स बने होते थे, जिसको मत्तदरनी यानी Proscenia कहते थे। इनकी ज़रूरत ज़ाहिर है।

     

    प्राचीन ज़माने में मत्तदरनी (विंग्स) ऑर्केस्ट्रा यानी साज़िंदों वग़ैरह के लिए तय थे। कभी-कभी प्रॉम्प्टर भी यहीं से अपना फ़र्ज़ अदा करता था। सूत्रधार (मैनेजर और प्रबंधक) भी कई बार कलाकारों के काम का मुआयना यहीं से किया करता था। स्टेज का साज़-ओ-सामान (प्रॉपर्टी) इन्हीं विंग्स में रखा जाता था। यह चीज़ नोट करने के लायक़ है कि अगले स्टेज के सामने कोई ड्रॉप या पर्दा नहीं होता था और वह स्थायी तौर पर सामने से खुला रहता था।

     

    प्रेक्षागृह यानी बैठने की जगह एक चौड़ी सीढ़ी की शक्ल में बनाई जाती थी, ताकि आखिरी कतार में बैठने वाले लोग भी आसानी से देख सकें। सारे प्रेक्षागृह में लकड़ी की सीढ़ियां सी बनी होती थीं और पहली सीढ़ी फर्श से ढाई फुट ऊंची होती थी। इन सीढ़ियों पर लोग पालथी मारकर बैठते थे। राजा एस. एम. टैगोर बैठने की जगह की तरतीब के मुताल्लिक लिखते हैं कि, संगत साल का पूर्वी हिस्सा महाराजा या सभापति के लिए रखा जाता था जो एक सिंहासन पर विराजमान होता था। ब्राह्मण, कवि, ज्योतिषी और अन्य विद्वान महाराजा के दाईं तरफ और संगत साल के दक्षिणी हिस्से में बैठते थे। अमीर, वज़ीर और सल्तनत के अधिकारी वगैरह उत्तरी हिस्से में और राजमहल के कुंवर-कुमारी, लड़के-बाले स्टेज के बिल्कुल करीब बैठते थे। रानियां और रनिवास की अन्य महिलाएं महाराजा के बाईं तरफ बैठती थीं। पहरेदार हाथ में छड़ी लिए शांति और खामोशी कायम रखने के लिए जगह-जगह खड़े रहते थे। नास्तिकों, हथियारबंद, अजनबी और संदिग्ध लोगों को संगत साल में आने की इजाज़त नहीं थी।

     

    प्रोफेसर होर्डनर आज से चौदह सौ साल पहले उज्जैन में शकुंतला के नाटक का नक़्शा दिलचस्प अंदाज़ में बयान करते हैं। 'नाटक सागर' में भी उनका यह बयान दर्ज है। हम वहीं से नीचे दिया गया दिलचस्प हिस्सा नक़्ल करते हैं:

     

    कालिदास ने एक नया ड्रामा तैयार किया है, जिसका पहला मंचन वसंत के मौसम में तय हुआ है। उज्जैन के लोग अपने मधुरभाषी कवि पर नाज़ कर रहे हैं और गहरी अकीदत (श्रद्धा) में कहते फिरते हैं कि ज़बान की रवानी और जज़्बात की सच्चाई में हिंदुस्तान का कोई ड्रामा शकुंतला का मुक़ाबला नहीं कर सकता। महाराजा बिक्रमाजीत का फरमान है कि यह ड्रामा राजमहल में स्टेज किया जाए। ज़माने के बेहतरीन अदाकार, अपने वक़्त के उस्ताद कवि और फिर वसंत की दिलकशी से जो कैफ़ियत पैदा होगी, सब उसका बेसब्री से इंतज़ार कर रहे हैं।

     

    महल का संगत साल जो आमतौर पर नाच-गाने की महफ़िलों के लिए रखा जाता था, शकुंतला के मंचन के लिए सजाया गया। एक चौड़े आंगन में दर्शकों के बैठने का इंतज़ाम है। आंगन के चारों तरफ संगमरमर के खूबसूरत खंभे घेरा बनाए खड़े हैं, जिन पर ताज़ा फूलों के हार चढ़ाए जा रहे हैं। आंगन के बिल्कुल बीच में शाही शामियाना लगा है, जिसकी सुनहरी झालरें चकाचौंध पैदा कर रही हैं। शामियाना चांदी के छह खंभों पर टिका है। थियेटर के बगल में शाही झंडा लहरा रहा है। स्टेज का पर्दा लाल और हीरे की एक कीमती ज़ंजीर से बंधा हुआ है। यह ज़ंजीर कवि को भेंट की जाएगी क्योंकि महाराजा अदब (साहित्य) के बड़े कद्रदान हैं।

     

    पौ फटने के साथ ही स्टेज के पीछे साज़ छिड़ते हैं और महाराजा बिक्रमाजीत सिर पर ताज रखे, शाही लिबास पहने अपने लाव-लश्कर के झुरमुट में पधारते हैं। मातहत राजाओं को दाईं तरफ और महारानी और दासियों को बाएं हाथ पर जगह मिलती है। महारानी की खास दासी के हाथ में एक सोने की बांसुरी और सदाबहार फूलों का गुलदस्ता है, जो राजकवि को महारानी की तरफ से पेश किया जाएगा। काले रंग के गुलाम लाल वर्दियां पहने और बैंगनी कमरबंद लटकाए फल और मेवे बांटते फिर रहे हैं। इस काली घटा में सफेद गर्दनों वाली चांद सी सुंदर महिलाएं मोतियों की माला पहने, सिर पर छोटा ताज रखे बिजली सी चमका रही हैं। दूर-दराज़ की जगहों से आए हुए मेहमान अपनी-अपनी सीटों पर बैठे बातों में मशगूल हैं। सल्तनत के अधिकारी, धर्मगुरु, विद्वान और ज्ञानी, ग़रज़ यह कि उज्जैन के समाज की रूह इस महफ़िल में मौजूद है।

     

    कहीं कुछ सियासतदां नेपाल की किसी बग़ावत को कुचलने के उपायों पर बहस कर रहे हैं। एक शांत कोने में शाही ज्योतिषी वराहमिहिर एक सफेद दाढ़ी वाले ईरानी से बातचीत में मगन हैं। शाही संपादक संस्कृत शब्दकोश के आखिरी हिस्से अपने उस अजनबी दोस्त के हवाले कर रहा है जो दक्षिणी चीन से सिर्फ इसी मक़सद से आया था... अचानक सारंगी, सितार और बांसुरी के मदहोश करने वाले सुर गूंज उठते हैं। सारा संगत साल दिलकश नग्मों से झूमने लगता है। कुछ सुरीली आवाज़ वाले नौजवान सामने आकर भजन गाते हैं और महाराज और अन्य इज़्ज़तदार मेहमानों का स्वागत करते हैं। इसके बाद सूत्रधार आशीर्वाद देता है और मज़ाकिया नज़्म में हाज़िरीन से खास तवज्जो की गुज़ारिश करता है। शाही सेवक जवाहरात की ज़ंजीर खोलकर कालिदास के सिर पर रख देता है। पर्दा दो हिस्सों में बंटकर खुलता है। हाज़िरीन के शोर-गुल से संगत साल गूंज उठता है। ड्रामा शुरू होता है और हर तरफ सन्नाटा छा जाता है... वगैरह।

     

    जहां तक सीन बिल्डिंग और स्टेज मशीनरी का ताल्लुक़ है, प्राचीन हिंदी स्टेज इससे बहुत कम वाकिफ़ था। हालांकि भरत जी ने मामूली मशीनों और छोटे-छोटे स्टेज ट्रिक का ज़िक्र किया है, जिसे नेतर कहते थे, मगर ये चीज़ें आमतौर पर नायाब थीं। अलग-अलग सीन-सीनरी अलबत्ता कभी-कभार इस्तेमाल होती थी।

     

    भरत जी ने स्टेज प्रॉपर्टी (साज़ो-सामान) जिसे पुस्त कहते थे, की तीन किस्में तय की हैं। संधिमा यानी वो चीज़ें जो बांस की खपच्चियों से बनाई जाएं और जिन पर हिरन, चीते वगैरह की खाल या कोई कपड़ा मढ़ा हुआ हो। व्याजिमा जो किसी नेतर की मदद से तैयार हों और वन्ष्टत्या यानी सिर्फ कपड़े की चीज़ें। हथियार वगैरह किसी ठोस धातु के नहीं होते थे बल्कि लकड़ी और लाख के बनते थे। यह हमेशा याद रखना चाहिए कि प्राचीन हिंदी ड्रामे का मक़सद सिर्फ माया यानी नज़र का धोखा पैदा करना था और इसी वजह से वो लोग सीन-सीनरी और असली साज़ो-सामान के कुछ ज़्यादा कायल नहीं थे।

     

    अदाकारों के लिबास के मुताल्लिक हालांकि यह एहतियात ज़रूरी थी कि वे रिवाज के मुताबिक हों, फिर भी कुछ खास किस्म के लिबास रस्मी तौर पर अदाकारों के लिए तय हो गए थे। ये लिबास चटक रंग के, चमकीले, बहुत भड़कीले और झूठे गोटे-किनारी से लदे हुए थे। राजा-महाराजा और औरतों के लिबास में बेशुमार ज़ेवर भी शामिल होते थे, मगर सारे ज़ेवर मोम या लाख के होते थे जिन पर सुनहरा या रुपहला पतरा चढ़ा हुआ होता था ताकि रोशनी में खूब चमक सकें। मेकअप यानी स्वांग भरने के लिए आमतौर पर राल (resin), गुलाल और अभ्रक वगैरह इस्तेमाल की जाती थी।

     

    तमाशे ज़्यादातर त्योहारों या शादी-ब्याह के मौकों पर किए जाते थे। 'रत्नावली' और 'मुद्राराक्षस' दोनों ड्रामे पहली बार त्योहारों पर ही किए गए। वसंत के मौके पर कामदेव (क्यूपिड) का त्योहार ड्रामों के मंचन के लिए रखा गया था। यूं महाराजा या किसी और रईस के यहां लड़का पैदा होने पर, दुश्मन पर फतह पाने या सुलह होने पर, किसी नई इमारत के बनने के मौके पर खुशी और जश्न का इज़हार आमतौर पर ड्रामे से ही होता था। दोपहर के बाद का वक़्त ड्रामों के मंचन के लिए तय था। आमतौर पर एक ड्रामा चार-पांच घंटे में खत्म हो जाता था। यह बात भी ज़िक्र के लायक़ है कि यूनान में एक ही वक़्त में दो-तीन ट्रेजेडीज़ और एक-आध कॉमेडी की जाती थी और यहां उतने ही वक़्त में सिर्फ एक मुकम्मल और तफ़सीली ड्रामा होता था।

     

    एक्टर्स और एक्ट्रेसेस समाज में इज़्ज़त की निगाह से देखे जाते थे। चूंकि ये लोग राजा-महाराजाओं के साथ उठने-बैठने वाले होते थे, इसलिए उनके पेशे की इज़्ज़त की जाती थी। अदाकारी का पेशा लंबे अरसे तक ब्राह्मणों के लिए मखसूस रहा।

     

    इस जगह पुराने हिंदी थिएटर और महारानी एलिज़ाबेथ के ज़माने के अंग्रेज़ी थिएटर की तुलना बेमौक़ा मालूम होगी, इसलिए कि हर दौर में कुछ बातों के लिहाज़ से अजीब समानता पाई जाती है। पहली बात जो नोट करने के लायक़ है, वह यह है कि दोनों में यह समझ आम थी कि दर्शक अपनी कल्पना से कहानी की जगह और आस-पास के माहौल का अंदाज़ा ख़ुद-ब-ख़ुद कर लेते हैं। अंग्रेज़ी थिएटर में यह इस तरह होता था कि हर एक सीन के शुरू में इस तरह की छोटी-छोटी तख़्तियाँ दिखा दी जाती थीं:

     

    यह एथेंस है।

     

    अँधेरी रात मूसलाधार बारिश

     

    आर्डन का जंगल

     

    दर्शक इन हिदायतों को पढ़कर सीन और माहौल मान लेते थे। हिंदुस्तान में इस क़िस्म की तख़्तियों की भी ज़रूरत नहीं होती थी बल्कि सूत्रधार (मैनेजर) ख़ुद सामने आकर साफ़ और असरदार ज़बान में सीन की जगह बयान कर देता था। दूसरी बात यह कि दोनों थिएटरों में सिर्फ़ एक ही परदे का इस्तेमाल प्रचलित था। दोनों जगह की पोशाकें भड़कीली होती थीं। दोनों थिएटर्स के ड्रामों की ज़बान जोशीली, मुहावरों और पेचीदा रूपकों से भरी होती थी। विलायत में औरतों का पार्ट लड़के करते थे और यहाँ औरतें। दोनों इस चीज़ को भी बराबर मानते थे कि हीरो या हीरोइन की मुसीबत के वक़्त आसमानी ताक़तें उनकी मदद करती हैं... वग़ैरह-वग़ैरह।

     

    पुराने हिंदी स्टेज और एलिज़ाबेथन स्टेज की तुलना से हम यह नतीजा निकाल सकते हैं कि जो-जो बातें हिंदुस्तान में चौथी-पाँचवीं सदी ईसा पूर्व में प्रचलित थीं, उनमें से कुछ बातें विलायत में सोलहवीं सदी ईस्वी में प्रचलित हुईं। यह फ़र्क़ देखिए!

     

    हिंदुस्तान के ड्रामे के इतिहास पर नज़र रखते हुए हम पुराने हिंदुस्तानियों की बेमिसाल सभ्यता और उनकी कमाल की बुद्धिमत्ता और कलाकारी की तारीफ़ करने पर मजबूर हैं। लेकिन कितने अफ़सोस की बात है कि हमने तमाम पुराने ज्ञान और कलाओं को अपनी नाक़द्री, जड़ता और उदासीनता के कारण एक पुरानी कहानी बना दिया है। इसी ड्रामे को लीजिए। यह कला पूरी तरह हिंदुस्तानी ईजाद है और आज से हज़ारों साल पहले जब दुनिया की क़ौमें ड्रामे के नाम से भी बिल्कुल अनजान थीं, यहाँ यह कला इस हद तक मुकम्मल, सुव्यवस्थित और नियमबद्ध थी कि दुनिया के ड्रामे का इतिहास इसकी मिसाल पेश नहीं कर सकता। लेकिन आज हम इसी कला को सीखने के लिए अंग्रेज़ी और दूसरी ग़ैर ज़बानों के मोहताज हैं, यह इसलिए कि हमने अपने पूर्वजों के शानदार कारनामों और उनकी कामयाबियों को भुला दिया है। ग़ैर क़ौमों और ग़ैर ज़बानों से भीख माँगने पर तैयार हैं लेकिन ख़ुद अपने पूर्वजों के कारनामों से मार्गदर्शन लेना अपने लिए शर्म की बात समझते हैं।

     

    फिर यह नहीं कि पुराने ज्ञान और कलाएँ सब की सब नष्ट हो गईं। ईश्वर की कृपा से अभी यह नौबत नहीं आई है। ज़्यादातर चीज़ें मौजूद हैं, हालाँकि हमारी नाक़द्री और रुचि की कमी के कारण ख़राब हालत में उनके बिखरे हुए हिस्से इधर-उधर पड़े हुए हैं। हमारी ज़रा सी तवज्जो उन्हें नए सिरे से ज़िंदा कर सकती है। लेकिन किसे ग़रज़ पड़ी है कि मुफ़्त का सिरदर्द मोल ले!

     

    हाशिए

    (1) यह बात भी ज़िक्र के लायक़ है कि राजमहल के अलावा यात्रा के मेलों और त्योहारों के मौक़े पर हर शहर और क़स्बे में भी तमाशे हुआ करते थे। मिसाल के तौर पर भवभूति के बहुत से ड्रामे पहली बार ऐसे ही त्योहारों के मौक़े पर अलग-अलग शहरों में हुए।

    (2) हिंदू ड्रामा। लेखक: राजा एस. एम. टैगोर।

    (3) इंडियन थिएटर। लेखक: ई. पी. होर्डनर।

    मूल लेख पढ़िए :
    स्रोत :

    Additional information available

    Click on the INTERESTING button to view additional information associated with this sher.

    OKAY

    About this sher

    Close

    rare Unpublished content

    This ghazal contains ashaar not published in the public domain. These are marked by a red line on the left.

    OKAY
    Click on any word to get its meaning
    बोलिए