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तलमीहात

वहीदुद्दीन सलीम


अनुवाद : Rekhta Editor

MORE BYवहीदुद्दीन सलीम

    अल्फ़ाज़ क्या हैं?

    वे आवाज़ें हैं जिनसे हम अपने ख्यालात ज़ाहिर करते हैं, या उनके ज़रिए चीज़ों की तरफ़ इशारा करते हैं। दुनिया की जिन असभ्य क़ौमों में अल्फ़ाज़ नहीं हैं, वे अपने ख्यालात या चीज़ों को बताने के लिए हाथ-पाँव और आँखों से इशारा करते हैं। अगर ख्यालात ज़ाहिर करते वक़्त तुम उनको देखो, तो बहुत हैरत होगी कि वे कैसी-कैसी अजीब हरकतें करते हैं और उनको अपने दिल की बात बताने में कितनी दिक़्क़तों का सामना करना पड़ता है। जब इंसानी अक़्ल ने तरक़्क़ी की और अल्फ़ाज़ ईजाद हुए, तो ये दिक़्क़तें दूर हो गईं। एक ख़ास आवाज़ एक ख़ास ख्याल या चीज़ या काम की तरफ़ इशारा होने लगा और हर शख़्स इस इशारे को समझने लगा। इंसानी तरक़्क़ी का यह दौर बहुत अहम था, जिसमें ज़बान की नींव रखी गई।

    तल्मीह और इस्तेलाह से क्या मुराद है?

    ज़बान के शुरुआती दौर में छोटे-छोटे सादे ख्यालात और मामूली चीज़ों को बताने के लिए अल्फ़ाज़ बनाए गए थे। धीरे-धीरे इंसान ने तरक़्क़ी का क़दम और आगे बढ़ाया। लंबे-लंबे क़िस्सों और वाक़ियात व हालात की तरफ़ ख़ास-ख़ास लफ़्ज़ों के ज़रिए इशारे होने लगे। जहाँ वे अल्फ़ाज़ ज़बान पर आए, फ़ौरन क़िस्से या वाक़ये आँखों के सामने आ गए जिनकी तरफ़ वे इशारा करते थे। ऐसा हर इशारा तल्मीह कहलाता है। फिर इल्मी मसलों या उसूलों को बताने के लिए भी ख़ास-ख़ास अल्फ़ाज़ मुक़र्रर किए गए। इनमें से हर लफ़्ज़ इस्तेलाह (पारिभाषिक शब्द) कहलाता है।

    दुनिया की जो ज़बानें विकसित हैं, उनमें तल्मीहें और इस्तेलाहें बहुत ज़्यादा हैं। तल्मीहों और इस्तेलाहों के शब्दकोश अलग-अलग तैयार किए गए हैं, जिनमें हर तल्मीह और हर इस्तेलाह की तशरीह (व्याख्या) की गई है। लंबे क़िस्सों और कहानियों और इल्मी मसलों और उसूलों को बार-बार बयान करने में जो वक़्त ज़ाया करना पड़ता है, उससे इन तल्मीहों और इस्तेलाहों ने बचा लिया है।

    जो हज़रात इस्तेलाहें बनाते वक़्त इस बात पर ज़ोर देते हैं कि हर इस्तेलाही लफ़्ज़ से पूरा मतलब अदा होना चाहिए, वे बड़ी ग़लती पर हैं। दुनिया में कोई इस्तेलाह ऐसी नहीं है जिससे पूरा मतलब अदा होता हो और वह पूरा इल्मी मसला या उसूल समझ में आता हो जिसके लिए वह इस्तेलाह बनाई गई है। ये हज़रात ज़बान की तरक़्क़ी के रास्ते से पीछे हटना चाहते हैं और उस मंज़िल की तरफ़ लौट जाना चाहते हैं, जहाँ पूरे इल्मी मसले या उसूल को बार-बार दोहराने की ज़रूरत पेश आती थी और हर दफ़ा ऐसा करने में बेइंतहा वक़्त ज़ाया करना पड़ता था। वक़्त की बर्बादी से बचने के लिए ही ये इशारे ईजाद किए गए हैं, जिनका नाम इस्तेलाहात है और यह उस वक़्त की ईजाद है जब इंसानी अक़्ल की तरक़्क़ी के साथ ज़बान भी तरक़्क़ी की बुलंदी पर पहुँच गई थी।

    जो हाल इस्तेलाहों का है वही तल्मीहों का। तूफ़ान-ए-नूह कहते ही वे तमाम तूफ़ानी वाक़ियात आँखों के सामने आ जाते हैं, जो हज़रत नूह के ज़माने में पेश आए थे। सूर-ए-इसराफ़ील का लफ़्ज़ ज़बान पर लाते ही वे तमाम भयानक वाक़ियात दिल में फिरने लगते हैं, जो क़यामत की शुरुआत के वक़्त पेश आएँगे। इनमें से पहला इशारा गुज़रे हुए वाक़ियात के एक ख़ौफ़नाक मंज़र को याद दिलाता है। दूसरा इशारा आने वाले वाक़ियात के एक डरावने नज़ारे को आँखों के सामने लाता है। इन इशारों के लिए जो अल्फ़ाज़ मुक़र्रर किए गए हैं, वे किसी तरह पिछले और आने वाले वाक़ियात का पूरा मतलब अदा नहीं करते।

    बलाग़त के मानी यह हैं कि कम से कम अल्फ़ाज़ से ज़्यादा से ज़्यादा मानी समझे जाएँ। यह बात जिस क़दर तल्मीहात में पाई जाती है, अल्फ़ाज़ की दूसरी क़िस्मों में नहीं पाई जाती। जिस ज़बान में तल्मीहात कम हैं या बिल्कुल नहीं हैं, वह बलाग़त के दर्जे से गिरी हुई है। ऐसी ज़बानों में बोलने वालों, लिखने वालों और शेर कहने वालों को अपनी बात अदा करने में बहुत ज़्यादा वक़्त ज़ाया करना पड़ता है। सुनने वाले एक ही वाक़ये को बार-बार सुनने से उकता जाते हैं। अगर वह वाक़िया एक मुख़्तसर लफ़्ज़ से बयान किया जाए, तो उसका दोहराना बोझिल नहीं होता बल्कि एक ख़ास लुत्फ़ महसूस होता है। ज़मीर (सर्वनाम) इस्म (संज्ञा) की जगह इस्तेमाल होती है। वह इसीलिए बनाई गई है कि बार-बार किसी इस्म को दोहराना न पड़े और सुनने वालों को नागवार न गुज़रे। तल्मीहात को और तल्मीहात के साथ इस्तेलाहात को इसी क़ुदरती ज़रूरत पर आधारित समझो।

    तल्मीहात से हम क्या कुछ जान सकते हैं?

    अगर किसी ज़बान की तल्मीहात का ग़ौर से मुताला किया जाए, तो उनसे उस ज़बान को बोलने वालों के पिछले वाक़ियात और तारीख़ पर रोशनी पड़ती है। उनके मज़हबी अक़ीदे, उनके वहम, उनके सामाजिक हालात और उनकी रस्में और मशाग़िल (शौक़) मालूम होते हैं। किसी क़ौम ने जिस तरह सभ्यता की मंज़िलें धीरे-धीरे तय की हैं और जो तब्दीलियाँ उसकी ज़िंदगी में एक के बाद एक होती रही हैं, उसकी ज़बान की तल्मीहात के मुताले से सब नज़र के सामने आ जाती हैं। मसलन अगर आप मालूम करना चाहते हैं कि जर्मनों, फ्रांसीसियों और अंग्रेज़ों के पूर्वज किन वहमों और अंधविश्वासों पर यक़ीन रखते थे, फिर उनके मज़हबी ख्यालात में क्या तब्दीली हुई, कौन से अहम तारीखी वाक़ियात उन्हें पेश आए, उनके पूर्वजों में से कौन-कौन लोग मशहूर हुए और उनमें क्या-क्या ख़ूबियाँ और हालात पाए जाते थे, तो आप जर्मन, फ्रांसीसी या अंग्रेज़ी ज़बान के किसी ऐसे शब्दकोश को उठा लीजिए जिसमें उस ज़बान की तल्मीहात दर्ज की गई हों। एक सरसरी नज़र इस शब्दकोश पर डालने से आप पर सब कुछ ज़ाहिर हो जाएगा।

    फ़र्ज़ी क़िस्सों में जिन लोगों के ख़ास हालात और ख़ास ख़ूबियों की तस्वीर खींची गई है, आजकल उनसे भी तल्मीह का काम लिया जाता है। जब कोई इंशा-परदाज़ (लेखक) या शायर किसी ऐसे शख़्स का ज़िक्र अपनी तहरीर या नज़्म में करता है जिसके हालात और ख़ूबियाँ क़िस्से के किसी मशहूर शख़्स से मिलते-जुलते हों, तो वह अपने शख़्स को उससे तश्बीह (उपमा) देना काफ़ी समझता है। नज़्म और गद्य के पढ़ने वाले इस तश्बीह से फ़ौरन समझ जाते हैं कि ज़िक्र किए गए शख़्स में कौन सी ख़ूबियाँ और कौन से हालात पाए जाते हैं। फ़र्ज़ी क़िस्सों की तल्मीहात से उस क़ौम के लेखकों की क़ुव्वत-ए-तख़य्युल (कल्पना शक्ति) का सुराग़ मिलता है, जिसकी ज़बान में इस क़िस्म की तल्मीहों से काम लिया जाता है। इंसानी ज़िंदगी, इंसानी अख़लाक़ और इंसानी समाज के इतने पहलू हैं कि उन्हें गिना नहीं जा सकता। हर पहलू के लिए एक नमूना हमारी आँखों के सामने मौजूद है।

    हम जानते हैं कि फ़लाँ इंसान इस क़िस्म की ज़िंदगी बसर करता है, फ़लाँ आदमी में इस क़िस्म के अख़लाक़ मौजूद हैं, मगर यह ज़रूरी नहीं कि हमारी पिछली तारीख़ में भी कोई ऐसा नमूना मौजूद हो। इसलिए ज़रूरी है कि हम इस ख़ास नमूने के इंसान की सही तस्वीर क़िस्से के अंदाज़ में खींचें। फिर दूसरे लेखक जब इसी नमूने के लोगों का ज़िक्र करें तो इस क़िस्से के नमूने को तल्मीह बनाकर उससे काम लें। सभ्य और विकसित क़ौमों के लेखकों ने इसी ज़रूरत से ख़ास-ख़ास तरीक़ा-ए-ज़िंदगी और ख़ास-ख़ास अख़लाक़ के इंसानों की तस्वीरें क़िस्से के अंदाज़ में खींची हैं और अपनी कल्पना शक्ति से काम लेकर ख़ास-ख़ास अख़लाक़ और ख़ास-ख़ास ख़ूबियों और हालात के मुकम्मल नमूने तैयार कर दिए हैं, फिर बाद के लेखकों ने इन नमूनों से तल्मीहात का काम लिया है।

    अमेरिका का मशहूर लेखक ऑस्बोर्न लिखता है, तल्मीहात क्या हैं? हमारी क़ौम के क़दमों के निशान हैं जिन पर पीछे हट कर हम अपने बाप-दादा के ख़यालात, मान्यताओं, वहमों, रस्म-ओ-रिवाज़ और वाक़यात व हालात का पता लगा सकते हैं। फ़्रांस का नामवर निबंधकार शुई करान लिखता है कि जब मैं किसी प्रभावशाली वक्ता की ज़बान से फ़्रांस की क्रांति (इंक़लाब-ए-फ़्रांस) का लफ़्ज़ सुनता हूँ तो मेरा दिल उन खौफ़नाक और डरावने हालात से भर जाता है, जिनके कारण सीन नदी की घाटियाँ ख़ून से लबरेज़ हो चुकी हैं, मगर इसके बाद फ़ौरन मेरे ख़याल का रुख़ उस शानदार जम्हूरियत (लोकतंत्र) की तरफ़ फिर जाता है जिसकी बुनियाद इन ख़ून से भरी घाटियों में रखी गई है।

    एक गुट जो तल्मीहात को नापसंद करता है

    ग़रज़ कि तल्मीहात सभ्य क़ौमों के साहित्य की जान हैं। इन अर्थपूर्ण इशारों से वे अपनी शायरी और अदब में बलाग़त (प्रभावशीलता) की रूह फूँकती हैं, मगर दुनिया में ऐसे लोग भी मौजूद हैं जो ख़ुद को तल्मीहात की उलझन में डालना पसंद नहीं करते और इतने फ़ायदों के बावजूद इनसे बचते हैं। अंग्रेज़ी ज़बान का एक शब्दकोशकार, जिसने तल्मीहात की एक विस्तृत डिक्शनरी लिखी है, ऐसे लोगों के ख़यालात का इन अल्फ़ाज़ में ज़िक्र करता है:

    जिन वाक़यात पर चौबीस घंटे से ज़्यादा का वक़्त गुज़र चुका है, उनका इल्म हासिल करने से आजकल के कुछ नौजवान बचते हैं। वे पुराने हालात को बीता हुआ कल समझ कर नज़रअंदाज़ कर देते हैं। वे बस उन्हीं बातों को सुनना चाहते हैं जो आजकल उनके आस-पास सुनाई देती हैं। तल्मीहात, जो हमारी क़ौम के पिछले हालात और ख़यालात के इशारे हैं, जब उनकी नज़र से गुज़रती हैं, तो वे नाक-भौं सिकोड़ते हैं। क्योंकि उनकी याददाश्त में वे हालात और ख़यालात मौजूद नहीं हैं। इस मक़सद से कि उनकी याददाश्त पर बोझ न पड़े, तल्मीहात की डिक्शनरियाँ तैयार की गई हैं।

    जब यूरोप और अमेरिका में तल्मीहात से नाक-भौं सिकोड़ने वाले मौजूद हैं, तो ताज्जुब नहीं कि हमारे मुल्क में भी इस ख़याल के बुज़ुर्गवार मौजूद हों। इस्तलाहात (पारिभाषिक शब्दों) के बारे में तो ऐसा ख़याल रखने वाले हज़रात हमारी नज़र के सामने हैं, जिनसे ख़ुद हमें मिलने का मौक़ा मिला है। ये हज़रात इस बात पर ज़ोर देते हैं कि कोई इस्तलाह न बनाई जाए। हर इस्तलाह का मतलब जुमलों में अदा किया जाए। इनको इस बात की बिल्कुल परवाह नहीं कि इस्तलाह का मतलब जुमलों में अदा करने से काग़ज़ और वक़्त का किस क़दर ख़र्च होता है और एक लंबे मतलब को बार-बार दोहराना पढ़ने वालों को किस क़दर नागवार गुज़रता है।

    बेशक कोई राय ऐसी नहीं है, जिसका एक न एक मानने वाला दुनिया में मौजूद न हो और कोई ख़याल ऐसा नहीं, जो किसी न किसी इंसान के दिल में न गुज़रता हो। यही हाल तल्मीह और इस्तलाह से नफ़रत रखने का है, मगर जो ख़याल तल्मीहात और इस्तलाहात को नापसंद करने वालों का है, अगर वह आम तौर से सबके दिलों में मौजूद होता तो आज दुनिया की सभ्य और विकसित ज़बानों में साहित्य के बेहतरीन ज़ख़ीरे और इल्मी मालूमात के विशाल ख़ज़ाने मौजूद न होते। हर ज़बान का अदब बार-बार दोहराई हुई ख़ुश्क और बेमज़ा बातों का एक लंबा ढेर होता। किसी क़ौम को अपने इल्म और अपने अदब पर फ़ख़्र और नाज़ करने का मौक़ा न मिलता।

    तल्मीहात के स्रोत (माख़ज़)

    तल्मीहें कहाँ से ली जाती हैं। अगर आप इस पर ग़ौर करें तो नीचे दिए गए स्रोत मालूम होंगे:

    (1) माइथोलॉजी (देवमाला) यानी देवताओं के क़िस्से-कहानियाँ।

    (2) मज़हबी क़िस्से। मज़हबी अक़ीदों (मान्यताओं) की किताबें।

    (3) तारीखी (ऐतिहासिक) वाक़यात।

    (4) आम फ़र्ज़ी क़िस्से और अफ़साने।

    (5) शायरों की नज़्में, ख़ासकर वे नज़्में जिनमें क़िस्से बयान किए गए हैं।

    (6) ड्रामा या नाटक की किताबें।

    चुनाँचे अंग्रेज़ी ज़बान और अंग्रेज़ी अदब में जो तल्मीहात इस्तेमाल होती हैं, उनके स्रोतों पर ग़ौर करने से मालूम होता है कि वे नीचे दिए गए ज़ख़ीरों से हासिल की गई हैं: पवित्र पुस्तक (तौरेत और इंजील वग़ैरह का संग्रह), यहूदियों की मज़हबी किताब तल्मूड। रोम और यूनान के देवताओं के क़िस्से। शेक्सपियर के क़िस्से। मिल्टन की पैराडाइज़ लॉस्ट (खोई हुई जन्नत)। गुलिवर का सफ़रनामा। मार्को पोलो का सफ़रनामा। डॉन क्विक्ज़ोट, बनियन की पिलग्रिम्स प्रोग्रेस वग़ैरह। शेरिडन, डिकेंस, ड्राइडन, मोलियर, सर वाल्टर स्कॉट, कूपर वग़ैरह के अफ़साने। कोलरिज, वर्जिल, होमर, मिल्टन, पोप, वर्ड्सवर्थ, गोल्डस्मिथ वग़ैरह की नज़्में। इंग्लैंड का इतिहास। यूरोप का इतिहास।

    इसके अलावा कुछ मशहूर नज़्मों या मज़ामीन (लेखों) की सुर्ख़ियाँ भी तल्मीह के तौर पर इस्तेमाल होती हैं। मसलन किताबों की जंग। मेंढकों और चूहों की जंग। शायरों की जंग। अलग-अलग बादशाहों, शायरों, हकीमों और अलग-अलग जगहों के वर्णनात्मक नाम (उपाधियाँ) भी तल्मीह के तौर पर लाए जाते हैं, जो शायरों और लेखकों ने गढ़े हैं। मसलन उत्तर का सिकंदर (स्वीडन के बादशाह चार्ल्स द्वितीय का लक़ब है), एथेंस की मधुमक्खी (अफ़लातून), अमेरिका का एथेंस (बोस्टन), सिक ऑफ़ द ईस्ट यानी पूरब का मरीज़ (इससे मुराद टर्की है)। कुछ फ़्रांसीसी और लातीनी (लैटिन) जुमले भी तल्मीह के तौर पर इस्तेमाल होते हैं। इन सबके अलावा 'अलिफ़ लैला', जो पूरब में लिखी गई, यूरोप की ज़बानों की तल्मीहात का एक बड़ा स्रोत है। यूरोप की कोई ज़बान ऐसी नहीं है जिसमें इस अजीब और दिलकश किताब का तर्जुमा न किया गया हो। यह किताब इस क़दर मशहूर और इस क़दर मक़बूल और हरदिल अज़ीज़ हुई है कि कोई पढ़ा-लिखा शख़्स इसके मुताले (अध्ययन) से महरूम नहीं रहा। यही वजह है कि इस किताब के क़िस्सों से सैकड़ों तल्मीहात ली गईं और वे यूरोप के साहित्य में दाख़िल हुई हैं और बेतकल्लुफ़ बोली और लिखी जाती हैं और आम तौर पर समझी जाती हैं।

    उर्दू ज़बान की तल्मीहात

    अंग्रेज़ी ज़बान की तल्मीहात का ज़िक्र मिसाल के तौर पर किया गया है, मगर हमारा असली मक़सद उर्दू ज़बान की तल्मीहात पर बहस करना है। इन तल्मीहों को हम दो हिस्सों में बाँटते हैं। (पहला) अदबी तल्मीहात यानी वे तल्मीहें जो उर्दू नस्र और नज़्म (गद्य और पद्य) में इस्तेमाल होती हैं। (दूसरा) आम तल्मीहात यानी वे तल्मीहें जो आम तौर से बोलचाल में दाख़िल हैं।

    उर्दू ज़बान की अदबी तल्मीहात कहाँ से आईं, इसका पता लगाने के लिए इस बात पर ग़ौर करना चाहिए कि जब इस्लाम ने अरब से निकल कर आस-पास के मुल्कों को फ़तह किया था, तो उन्हीं में से एक मुल्क ईरान भी था। जब विजेताओं के हमलों से ईरान को सिर उठाने और होश सँभालने का मौक़ा मिला तो ईरानियों ने अपने मिटे हुए अदब को ज़िंदा करना चाहा। पूरा ईरान इस्लाम मज़हब क़बूल कर चुका था। अग्नि पूजा ख़त्म हो चुकी थी। इसलिए ईरान के नए अदब में अरबी की मज़हबी रूह दौड़ने लगी। ईरान के भूगोल और इतिहास और अरब की मज़हबियत ने मिलकर एक नया अदब पैदा किया, जिसको न हम ख़ालिस ईरानी अदब कह सकते हैं न अरबी अदब। अरबी अदब के चमकते रेगिस्तान, खजूरों के झुंड, ऊँट, रेगिस्तान में रहने वालों के खेमे (तंबू), मार-धाड़ और लूट-मार के तौर-तरीक़े, बहादुराना इश्क़ के कारनामे सब काफ़ूर (ग़ायब) हो गए, मगर पैग़ंबरों के क़िस्से, फ़रिश्तों के तज़किरे, जन्नत और दोज़ख़ और क़यामत के नज़ारे और अरब की कुछ मशहूर हस्तियों के हालात ईरानी अदब पर छा गए।

    अरब के पहाड़ों में से सिर्फ़ कोह-ए-तूर का ज़िक्र बाक़ी रहा। अलवंद, क़ाफ़, बस्तियों और अल्बुर्ज़ ईरान ही के रहे। पेड़ और फूल भी उन्हीं की ज़मीन से लिए गए, यानी सर्व, शमशाद, सनोबर, बेद, चिनार वग़ैरह। फूल वही जिनसे ईरान की ज़मीन गुलज़ार है यानी सौसन, सुंबुल, नारवन, लाला, नाज़बू, शबू, बनफ़्शा, रेहान, नरगिस वग़ैरह। हुस्न और इश्क़ की दास्तानों में से सलमा, लैला, क़ैस उज़रा, वामिक़, यूसुफ़, ज़ुलैख़ा के नाम लिए गए और फ़रहाद और शीरीं को शामिल किया गया। नदियों में मिस्र से नील और इराक़-ए-अरब से दजला और फ़ुरात लिए गए। इनमें जीहूँ और सीहूँ को भी जोड़ा गया। अरब के पश्चिमी समंदर क़ुल्ज़ुम और पूर्वी समंदर ओमान का ज़िक्र भी ज़रूरी समझा गया मगर फ़ारस की खाड़ी का नाम नहीं लिया गया। मोती अदन से और लाल यमन से लिए गए और उनमें बदख़्शां के लाल को भी शामिल किया गया। परिंदे ईरान ही के रहे यानी बुलबुल, तूती, क़ुमरी, कब्क-ए-दरी, तदरव, उक़ाब, सीमुर्ग़, शहबाज़, वग़ैरह।

    बादशाह और पहलवान भी ईरानियों ने अपने वतन के इतिहास ही से लिए। यही नया ईरानी साहित्य जो न अरबी साहित्य है न ईरानी साहित्य, बल्कि एक नए नाम 'अरबीरानी' कहलाने का हक़दार है, हिंदुस्तान के पश्चिमी हमलावरों के ज़रिए से हिंदुस्तान पहुँचा। ग़ज़नवी, ग़ौरी, तुग़लक़, ख़िलजी, सादात, लोधी, सूरी और मुग़ल ख़ानदान जिन्होंने अपने-अपने ज़माने में हिंदुस्तान पर हुकूमत की, उनकी ज़बान फ़ारसी थी। इन ज़बानों में भी यही अरबीरानी साहित्य जारी था। हिंदी भाषा पर फ़ारसी ज़बान का असर पड़ने से धीरे-धीरे उर्दू ज़बान पैदा हुई। जब फ़ारसी शायरी को छोड़कर यहाँ के शायरों ने उर्दू ज़बान में रचना शुरू की, तो स्वाभाविक रूप से इसी अरबीरानी साहित्य का ख़ाका उतारा गया। ये शायर हाकिम और विजेता क़ौम के थे। हारी हुई और विजित क़ौम की ज़बान यानी हिंदी और संस्कृत की तरफ़ उनका ध्यान नहीं गया। हिंदू राग माला, हिंदू इतिहास, हिंदू शायरी, हिंदू मज़हब को वो दिलचस्पी की नज़र से नहीं देखते थे। इसलिए ज़रूरी था कि जो तल्मीहें (ऐतिहासिक या पौराणिक संदर्भ) उर्दू साहित्य में आएँ, वो हिंदू स्रोतों से न ली जाएँ। बल्कि अरब और ईरान के इसी मिले-जुले साहित्य से ली जाएँ जिसको विजेता अपने साथ लाए थे।

    इस मौक़े पर यह सवाल पैदा होता है कि उर्दू शायरों को अगर हिंदू साहित्य से लगाव न था, तो उन्होंने ख़ुद हिंदुस्तान का नज़ारा क्यों न किया? क्या हिंदुस्तान के शानदार पहाड़ हिमालय, विंध्याचल वग़ैरह और यहाँ की महान नदियाँ गंगा, जमुना, सिंध, ब्रह्मपुत्र वग़ैरह उनके दिलों पर कोई असर नहीं डाल सकते थे? क्या यहाँ के ख़ूबसूरत और सुरीले परिंदे कोयल, पपीहा, अगन, चंडोल वग़ैरह उनकी भावनाओं को अपनी तरफ़ नहीं खींच सकते थे? क्या यहाँ के दिलकश फूल और हसीन पौधे, हरे-भरे चरागाह, उपजाऊ मैदान, झिलमिलाते झरने, उछलते-कूदते जानवर उनके शरीरों में ज़िंदगी और ख़ुशी की रूह फूँकने के लिए काफ़ी नहीं थे? इसका जवाब यह है कि आर्य जब अपना असली वतन छोड़कर यहाँ आए, तो उन्होंने इसी मुल्क को अपना वतन बना लिया। यहाँ की तमाम चीज़ों को उन्होंने दिलचस्पी की नज़र से देखा बल्कि अक्सर चीज़ों को धार्मिक पवित्रता का जामा पहना दिया। इसके विपरीत मुसलमान विजेता बनकर आए। उन्होंने इस मुल्क को अपना वतन नहीं बनाया। वो हमेशा जीहूँ और सीहूँ और फ़ुरात और दजला के ख़्वाब देखते रहे। यहाँ की ज़मीन और यहाँ के आसमान को वो हमेशा अजनबीपन की नज़र से देखा किए। वो अपना ठिकाना और शरणगाह हमेशा उन्हीं मुल्कों को समझते रहे, जिनसे निकलकर यहाँ आए थे। जिन मुसलमान बादशाहों ने राजनीति को राष्ट्रीयता के अधीन करने की कोशिश की, उन पर धर्म के ठेकेदारों की तरफ़ से हमले किए गए। इसका जो नतीजा हुआ वो आँखों के सामने है। अब से कुछ दिनों पहले तक यही ख़यालात आम और ख़ास, सबके दिलों पर छाए हुए थे।

    मौलाना हाली ने अपनी मशहूर नज़्म 'शिकवा-ए-हिंद' की बुनियाद इन्हीं ख़यालात पर रखी है। जब मौलाना से इसका ज़िक्र आया, तो उन्होंने अपनी ग़लती को स्वीकार किया। मगर असली और सच्ची बात यह है कि शायर अपने ज़माने का प्रतिनिधि होता है। उसका दर्जा सुधारक का नहीं है। वो किसी मान्यता या ख़याल को बदलना نہیں चाहता, बल्कि उन ख़यालात और वाक़यात का नक़्शा खींचता है, जो उसके आस-पास फैले हुए हैं। मौलाना हाली की शायरी में सियासत की झलक भी जगह-जगह दिखाई देती है। मगर यह उसी हद तक है, जहाँ तक कि उनके ज़माने में मुसलमानों के सियासी ख़यालात पहुँच चुके थे। वर्तमान समय का यह सियासी नज़रिया उनके ज़माने में पैदा नहीं हुआ था कि मुसलमान मज़हब और राष्ट्रीयता पर एक साथ अमल कर सकते हैं और इन दोनों में कोई टकराव नहीं हो सकता। इस आधार पर मौलाना हाली मजबूर थे और इस ख़याल का इज़हार नहीं कर सकते थे।

    ग़रज़कि यही वजह थी कि उर्दू साहित्य में जो तल्मीहात आईं वो अरबीरानी साहित्य से आईं। हिंदुस्तान के प्राचीन इतिहास, प्राचीन साहित्य, यहाँ के मज़हब, यहाँ के रस्म-ओ-रिवाज़ और यहाँ के प्राकृतिक दृश्यों से उनको कोई वास्ता नहीं है। अब हम ईरानी तल्मीहात का ज़िक्र करते हैं। इन तल्मीहात की दो क़िस्में हैं: (पहली) वो तल्मीहात जो अरबी असर से दाख़िल हुईं। (दूसरी) वो तल्मीहात जिनमें ख़ालिस ईरानी असर है।

    उर्दू अदबी तल्मीहात (पहली क़िस्म)

    अदबी तल्मीहात की पहली क़िस्म में सबसे पहले पैग़ंबरों से संबंधित तल्मीहात हैं, जिसको इस्लाम को मानने वाले सभी लोग सम्मान की निगाह से देखते हैं और वो निम्नलिखित हैं:

    आदम की पैदाइश

    फ़रिश्तों को हुक्म दिया गया कि आदम को सज्दा करें। शैतान ने इंकार किया और शापित हुआ। ख़ुदा ने आदम की पैदाइश से पहले फ़रिश्तों से फ़रमाया था कि मैं ज़मीन पर अपना एक नायब और ख़लीफ़ा (प्रतिनिधि) भेजना चाहता हूँ, फ़रिश्तों ने कहा कि आदम की औलाद ज़मीन पर ख़ून बहाएगी। वो ख़लीफ़ा बनाने के क़ाबिल नहीं। यह हक़ हमको है क्योंकि हम तेरी इबादत करते और तेरी प्रशंसा में मग्न रहते हैं। ख़ुदा ने फ़रमाया तुम मेरी मंशा से वाक़िफ़ नहीं। आदम पैदा हुए। फ़रिश्तों के साथ उनका इम्तिहान लिया गया। जिन बातों का जवाब आदम से बन पड़ा, फ़रिश्ते उनका जवाब न दे सके। आदम की जो औलाद क़यामत तक होने वाली है, उन सबकी रूहें हाज़िर की गईं। ख़ुदा ने उनसे पूछा 'अलस्तु बिरब्बुकुम' यानी क्या मैं तुम्हारा रब नहीं हूँ? 'क़ालू बला' यानी उन्होंने कहा हाँ बेशक तू हमारा रब है। इस क़िस्से की तल्मीहात में बला, क़ालू बला, अलस्त, रोज़-ए-अलस्त, अहद-ए-अलस्त, मस्त-ए-अलस्त वग़ैरह शब्द आते हैं।

    हज़रत आदम को बहिश्त (स्वर्ग) में रहने का हुक्म हुआ। तन्हाई से उनकी तबीयत घबराई। हव्वा उनकी पसली से पैदा की गईं। बहिश्त में गेहूं का दरख़्त था। हुक्म हुआ, इस दरख़्त के पास न जाना। आदम को शैतान ने बहकाया। गेहूं का दाना उन्होंने ख़ुद भी खाया और आदम को भी खिलाया। नाफ़रमानी की सज़ा में दोनों बहिश्त से निकाले गए और ज़मीन पर डाले गए। इस क़िस्से की तल्मीह में शैतान के मददगारों सांप और मोर का भी ज़िक्र आता है। शैतान की तल्मीह में बयान किया जाता है कि वह पहले फ़रिश्तों का उस्ताद था। जिसकी तल्मीह में 'मुअल्लिम-उल-मलाकूत' का लफ़्ज़ आता है। वह आग से पैदा किया गया था और आदम ख़ाक (मिट्टी) से। जब शैतान ने आदम को सजदा करने से इनकार किया तो दलील यही पेश की थी कि मैं आग से पैदा हुआ हूं और आदम ख़ाक से। इस बिना पर मैं इसके आगे सजदा नहीं कर सकता। बग़ावत के कारण शैतान के गले में लानत का तौक़ डाला गया। उसने आदम की औलाद को बहकाने की इजाज़त मांगी। इजाज़त दी गई। मगर ख़ुदा ने फ़रमाया कि मेरे नेक बंदों पर तेरा क़ाबू नहीं चलेगा। आदम के बेटों में से क़ाबील ने हाबील को मार डाला। इसका ज़िक्र भी बतौर तल्मीह के आता है।

    हज़रत लूत का ज़िक्र भी तल्मीह के तौर पर आता है, जिनकी बीवी काफ़िर थी। उनकी क़ौम पर आग और पत्थर अज़ाब (प्रकोप) के तौर पर बरसाए गए। चूंकि आदम से इंसानी नस्ल चली, इसलिए उनको 'अबुल-बशर' कहते हैं।

    हज़रत नूह ने लंबी उम्र पाई। इसकी तल्मीह में 'उम्र-ए-नूह' का लफ़्ज़ आता है। वह एक लंबे अरसे तक अपनी क़ौम को समझाते रहे मगर 80 आदमियों के सिवा कोई उन पर ईमान नहीं लाया। उन्होंने अपनी क़ौम के लिए बद्दुआ की। ख़ुदा ने पानी का तूफ़ान भेजा। हज़रत नूह को पहले से ख़बर दी गई। ख़ुदा की हिदायत के मुताबिक़ उन्होंने एक कश्ती तैयार की। उसमें हर जानवर का एक जोड़ा रखा, ताकि तूफ़ान के बाद इन जानवरों की नस्ल चले। 108 मुरीदों को भी इसी कश्ती में जगह दी। तूफ़ान शुरू होते वक़्त आसमान से मूसलाधार पानी बरसने लगा और एक बुढ़िया के तंदूर से भी बड़ी तेज़ी से पानी उबलने लगा। कश्ती पानी पर तैरने लगी। दरख़्तों और टीलों पर पानी फिर गया। हज़रत नूह का बेटा कनान उनसे बाग़ी रहा। उसने बार-बार बुलाने के बावजूद कश्ती में पनाह नहीं ली। एक तेज़ लहर आई और उसे बहा ले गई। हज़रत नूह की कश्ती जूदी पहाड़ पर ठहरी। कबूतर जो कश्ती में से छोड़ा गया था, ज़ैतून की हरी टहनी चोंच में लाया। और उसने तूफ़ान थमने की ख़बर दी। इस क़िस्से की तरफ़ जब इशारा किया जाता है तो नीचे लिखे लफ़्ज़ आते हैं: कश्ती-ए-नूह, तूफ़ान-ए-नूह। कनान की तल्मीह में, जो हज़रत नूह का नालायक़ बेटा था, 'फ़रज़ंद-ए-नूह' और 'पिसर-ए-नूह' के लफ़्ज़ आते हैं। आदम के बाद हज़रत नूह से दोबारा इंसानी नस्ल चली। इसलिए उनको 'आदम-ए-सानी' भी कहते हैं।

    आद अरब की एक क़ौम थी, जो ख़ुद को आद बिन साम बिन नूह की नस्ल बताती है। हज़रत हूद उनकी हिदायत के लिए भेजे गए थे मगर उन्होंने नाफ़रमानी की और आंधी का अज़ाब उन पर भेजा गया और सब हलाक हो गए। इस क़िस्से की तल्मीह में 'तूफ़ान-ए-आद' या 'सरसर-ए-आद' का लफ़्ज़ आता है।

    समूद अरब की एक क़ौम थी जो चार कड़ियों से ख़ुद को हज़रत नूह की औलाद बताती थी। उनकी हिदायत के लिए हज़रत सालेह भेजे गए थे। उन्होंने भी बग़ावत की और हज़रत सालेह की ऊंटनी के पैर की नसें काट दीं। नाफ़रमानी के कारण ये भी हलाक कर दिए गए। इस क़िस्से की तल्मीह में 'नाक़ा-ए-सालेह' का लफ़्ज़ इस्तेमाल होता है। हज़रत ज़करिया पैग़ंबर आरे से चीरे गए। इसका ज़िक्र भी शायरों ने बतौर तल्मीह के बार-बार किया है। हज़रत यूनुस को एक मछली निगल गई थी। वह मछली के पेट के अंदर भी ख़ुदा की तारीफ़ में लगे रहे। आख़िर मछली ने उनको दरिया के किनारे पर उगल दिया। यूनुस के लफ़्ज़ से इसी क़िस्से की तरफ़ इशारा किया जाता है। हज़रत अय्यूब पर इम्तिहान के तौर पर ख़ुदा की तरफ़ से तरह-तरह की तकलीफ़ें नाज़िल हुईं मगर उन्होंने उफ़ नहीं की और हर हाल में ख़ुदा का शुक्र अदा करते रहे। 'सब्र-ए-अय्यूब' की तल्मीह इसी क़िस्से की तरफ़ इशारा करती है।

    हज़रत दाऊद की आवाज़ बहुत सुरीली थी। वह जब ख़ुदा की तारीफ़ के राग गाते, तो परिंदे उनके इर्द-गिर्द जमा हो जाते थे। 'मज़ामीर-ए-दाऊद', 'नग़्मा-ए-दाऊद', 'लह्न-ए-दाऊदी' के अल्फ़ाज़ से यही मुराद है। उन पर ज़बूर नाज़िल हुई। मोजज़ा (चमत्कार) यह था कि लोहा हाथ में आते ही मोम बन जाता था। वह लोहे की ज़िरह आसानी से बना लेते थे। इस मोजज़े का ज़िक्र भी शायरों ने बार-बार किया है।

    हज़रत सुलैमान हज़रत दाऊद ही के बेटे थे। उनको ख़ुदा ने अज़ीम-उश-शान (विशाल) सल्तनत अता की। इंसान, देव, परी, चरंद-परिंद सब उनके ताबेदार थे। उन्होंने बैत-उल-मुक़द्दस की अज़ीम-उश-शान इमारत तामीर कराई। हवा उनके तख़्त को जहां वह चाहते उड़ा ले जाती थी। उनके पास एक अंगूठी थी, जिस पर इस्म-ए-आज़म खुदा हुआ था। इसी की बरकत थी कि तमाम मख़्लूक़ पर उनको हुक्मरानी हासिल थी। एक देव इस अंगूठी को चुरा ले गया। सल्तनत हज़रत सुलैमान के हाथ से निकल गई। इस हालत में वह एक मछुआरे के पास मुलाज़िम हो गए। अंगूठी चुराकर देव आसमान पर उड़ गया मगर अंगूठी उसके हाथ से समंदर में गिर पड़ी। समंदर की एक मछली ने इस अंगूठी को निगल लिया। जब ख़ुदा को मंज़ूर हुआ कि हज़रत सुलैमान की सल्तनत फिर बहाल हो, तो एक दिन वही मछली मछुआरे के जाल में आ गई। मछली का पेट चीरा तो अंगूठी निकल आई। हज़रत सुलैमान ने उसको फिर पहन लिया और तख़्त-ए-सल्तनत पर फिर पहले की तरह विराजमान हो गए। 'तख़्त-ए-सुलैमानी', 'ख़ातम-ए-सुलैमानी', 'अंगुश्तरी-ए-सुलैमानी' इन्हीं बातों को याद दिलाते हैं।

    हज़रत सुलैमान के ज़माने में मुल्क-ए-सबा पर हुक्मरान बिल्क़ीस थी। हुदहुद हज़रत सुलैमान का पैग़ाम बिल्क़ीस के पास ले गया। उसने अधीनता क़ुबूल की और दरबार में हाज़िर हुई। यहां उसके आने से पहले उसका तख़्त जो जवाहरात से जड़ा हुआ था, मंगवाकर दरबार में सजा दिया गया था। सुलैमान के महल के आंगन में शीशे का फ़र्श था। उसके नीचे पानी का हौज़ था। इसी फ़र्श से गुज़र कर दरबार में सब लोग जा सकते थे। बिल्क़ीस को शक हुआ कि महल के आंगन में पानी भरा है। उसने पानी में उतरने के लिए अपने पायंचे चढ़ा लिए। बिल्क़ीस दरबार में अपने तख़्त को रखा देखकर हैरान रह गई और हज़रत सुलैमान की महानता और ताक़त की क़ायल हुई। बिल्क़ीस, सबा, हुदहुद और हज़रत सुलैमान के शीश-महल का ज़िक्र बार-बार शायरों ने किया है। हुदहुद को 'मुर्ग़-ए-सुलैमान' भी कहते हैं। सुलैमान के साथ 'मोर' यानी चींटी का ज़िक्र भी ज़रूर आता है। कहां चींटी जो एक मामूली मख़्लूक़ है और कहां सुलैमान जो दुनिया के तमाम बादशाहों से ज़्यादा महान और ताक़तवर थे। चींटी और सुलैमान के मुताल्लिक़ एक छोटा सा क़िस्सा भी है। हज़रत सुलैमान परिंदों की बोलियां समझते थे। इसकी तरफ़ लफ़्ज़ 'मंतिक़-उत-तैर' से इशारा किया जाता है।

    हज़रत यूसुफ़ और हज़रत याक़ूब दोनों का ज़िक्र अक्सर एक साथ आता है। हज़रत यूसुफ़ हज़रत याक़ूब के बेटे थे। एक माँ से हज़रत यूसुफ़ और यामीन और दूसरी माँ से दस बेटे और थे। हज़रत याक़ूब हज़रत यूसुफ़ को बहुत अज़ीज़ रखते थे (बहुत चाहते थे)। भाइयों को यह बात सख़्त नागवार गुज़रती थी। एक बार हज़रत यूसुफ़ ने ख़्वाब देखा कि चाँद, सूरज और ग्यारह सितारे उन्हें सजदा कर रहे हैं। इस ख़्वाब को सुनकर हज़रत याक़ूब ने मना किया कि इसका ज़िक्र भाइयों से न करना। एक दिन शिकार और सैर-सपाटे के बहाने से बहुत ज़िद करके हज़रत यूसुफ़ को उनके भाई जंगल ले गए और एक अंधे कुएँ में उन्हें गिरा दिया। उनका कुर्ता फाड़ डाला और ख़ून से लथपथ करके बाप के सामने लाए और कहा कि यूसुफ़ को एक भेड़िए ने फाड़ खाया है। यह कुर्ता उनके हाथ लगा है। हज़रत याक़ूब निहायत ग़मगीन हुए।

    मिस्र को एक व्यापारिक क़ाफ़िला जा रहा था। इस क़ाफ़िले का एक ग़ुलाम कुएँ पर पानी लेने के लिए पहुँचा। उसने देखा कि कोई आदमी कुएँ में है। फ़ौरन डोल डालकर उन्हें खींच लिया। हज़रत यूसुफ़ हुस्न-ओ-जमाल (रूप और सौंदर्य) में बेमिसाल थे। अज़ीज़-ए-मिस्र की बीवी ज़ुलैख़ा उन पर आशिक़ हो गई। मिस्र की औरतें ज़ुलैख़ा को ताना देती थीं कि वह अपने ग़ुलाम पर फ़िदा है। ज़ुलैख़ा ने एक बार मिस्र की औरतों को इकट्ठा किया। हज़रत यूसुफ़ को पर्दे के पीछे छिपा दिया। एक-एक छुरी और एक-एक नींबू हर औरत को दिया गया। और उनसे कहा गया कि जब यूसुफ़ पर्दे के पीछे से बाहर आएँ, तो हर औरत अपना नींबू छुरी से काटे। जब हज़रत यूसुफ़ बाहर आए तो मिस्र की औरतों के होश-ओ-हवास उड़ गए और उन्होंने नींबू के बजाय अपने हाथ काट लिए। ज़ुलैख़ा ने उनसे कहा, तुम मुझे इस कनानी ग़ुलाम के हुस्न पर फ़िदा होने का ताना देती थीं। अब तुम्हारे होश-ओ-हवास क्यों उड़ गए?

    हज़रत यूसुफ़ को ज़ुलैख़ा ने बार-बार अपनी तरफ़ आकर्षित करना चाहा। एक दफ़ा तन्हाई में मकान के दरवाज़े बंद करके उनसे मिन्नतें कीं, मगर हज़रत यूसुफ़ पर कोई असर न हुआ। वह उसके पास से भागे। दरवाज़ों के ताले ख़ुद-ब-ख़ुद खुलते गए। ज़ुलैख़ा उनके पीछे दौड़ती चली आई। आख़िरी दरवाज़े पर पीछे से उनका दामन पकड़ कर फाड़ डाला। इतने में अज़ीज़-ए-मिस्र भी आ गया। अपनी बीवी पर नाराज़ हुआ। बीवी ने कहा, यह तुम्हारा ग़ुलाम मेरी इज़्ज़त पर हमला करना चाहता था। मैंने मुश्किल से पीछा छुड़ाया। ख़ुदा ने एक दूध पीते बच्चे को, जो उस वक़्त वहाँ मौजूद था, बोलने की ताक़त दी। उसने ऊँची आवाज़ में कहा, अगर यूसुफ़ का दामन आगे से फटा है, तो वह क़ुसूरवार हैं और अगर पीछे से फटा है तो ज़ुलैख़ा की ख़ता है। देखा तो दामन पीछे से फटा था। अज़ीज़ ने यह देखकर अपनी बीवी को सख़्त फटकार लगाई, मगर इश्क़ का भूत जो सिर पर सवार था, कब मानता था। ज़ुलैख़ा हमेशा हज़रत यूसुफ़ के पीछे पड़ी रही, मगर जब देखा कि कोई मंतर काम नहीं कर रहा, तो इल्ज़ाम लगाकर उन्हें क़ैदख़ाने में भिजवा दिया।

    हज़रत यूसुफ़ क़ैदख़ाने में सख़्त तकलीफ़ें उठाते थे। मगर सब्र और शुक्र करने वाले थे। उन्हें ख़्वाबों की ताबीर (सपनों का अर्थ) बताने में ख़ास महारत थी। दो क़ैदियों के ख़्वाब की ताबीर उन्होंने बताई और वैसा ही सच साबित हुआ। एक क़ैदी ने, जिसके ख़्वाब की ताबीर बताई गई थी और जो मिस्र के बादशाह के दरबार में साक़ी-गरी (शराब पिलाने) की ख़िदमत पर मुक़र्रर हो गया था, एक मौक़े पर जब बादशाह ने आने वाले अकाल के बारे में एक ख़ौफ़नाक ख़्वाब देखा था, हज़रत यूसुफ़ का ज़िक्र किया। हज़रत यूसुफ़ ने उसके ख़्वाब की सही ताबीर बताई और कहा कि सात बरस तक मुल्क में ख़ुशहाली रहेगी, फिर सात बरस का अकाल पड़ेगा। बादशाह ने हज़रत यूसुफ़ को अपना नायब-ए-सल्तनत बनाकर अकाल का इंतज़ाम उनके सुपुर्द किया। हज़रत यूसुफ़ ने उस वक़्त जब ख़ुशहाली थी, ख़ूब अनाज जमा किया और अकाल के ज़माने में लोगों को बाँटा।

    हज़रत यूसुफ़ के भाई भी अकाल से तंग आकर मिस्र में अनाज ख़रीदने के लिए आए। हज़रत यूसुफ़ ने उन्हें पहचान लिया। बहुत सा अनाज दिया। सुना कि उनके ग़म में हज़रत याक़ूब की आँखें रोते-रोते सफ़ेद हो गई हैं (रोशनी चली गई है), उन्होंने अपनी ख़बर भेजी और उन्हें मिस्र में बुलाया। जब हज़रत यूसुफ़ के भाई कनान में बाप के पास पहुँचे, तो उन्होंने हज़रत यूसुफ़ का पैराहन (कुरता) पेश किया। उन्होंने पैराहन को छुआ और अचानक आँखों की रोशनी लौट आई। हज़रत याक़ूब को पैराहन से हज़रत यूसुफ़ की ख़ुशबू महसूस हुई। यह क़िस्सा निहायत दिलचस्प है। क़ुरआन मजीद में पूरी एक सूरह इसी क़िस्से पर है। बहुत सी किताबें नस्र और नज़्म (गद्य और कविता) में हैं, जिनमें यह क़िस्सा बयान किया गया है। शायरों ने इस क़िस्से की तल्मीहात (हवाले) कसरत से बयान की हैं, जो नीचे दिए गए अल्फ़ाज़ से इस क़िस्से के मुख़्तलिफ़ हिस्सों की याद दिलाती हैं: माह-ए-कनाँ (हज़रत यूसुफ़), चाह-ए-कनाँ, चाह-ए-यूसुफ़, हुस्न-ए-यूसुफ़, ज़िंदान-ए-यूसुफ़, बैत-उल-हुज़्न (हज़रत याक़ूब का ग़म-ख़ाना, जिसमें वह बैठे रोया करते थे), ख़्वाब-ए-यूसुफ़, बिरादरान-ए-यूसुफ़, अज़ीज़-ए-मिस्र, ज़ुलैख़ा, पीर-ए-कनाँ (हज़रत याक़ूब)।

    हज़रत इदरीस के बारे में मशहूर है कि वह जीते-जी जन्नत में पहुँचा दिए गए। शायरी में उनका ज़िक्र बहुत कम आता है। इसी तरह हज़रत यह्या का भी। हज़रत इल्यास के बारे में मशहूर है कि समंदर की ख़िदमत उनके सुपुर्द है और हज़रत ख़िज़्र ज़मीन की ख़िदमत पर मुक़र्रर हैं, मगर आम तौर से उर्दू और फ़ारसी अदब में जल और थल दोनों में रहनुमाई (मार्गदर्शन) और मुश्किल-कुशाई (मुश्किलें हल करने) का काम हज़रत ख़िज़्र ही के हवाले किया गया है। जहाज़ों और कश्तियों की रहनुमाई, तूफ़ान के वक़्त मुसीबत के मारों की मदद करना, जंगलों और बियाबानों (वीरानों) में रास्ता भूलने वालों को सही रास्ते पर लगाना उन्हीं का काम समझा जाता है। सिकंदर और ख़िज़्र एक साथ आब-ए-हयात (अमृत) के चश्मे की तरफ़ जाते हैं और ज़ुल्मात (अँधेरे) को पार करते हैं, मगर हज़रत कामयाब होते हैं और आब-ए-हयात पीकर हमेशा के लिए अमर हो जाते हैं। सिकंदर ज़ुल्मात में भटक कर वापस आता है और अपनी क़िस्मत की महरूमी पर अफ़सोस करता है। आब-ए-हयात, आब-ए-बक़ा, चश्मा-ए-हैवाँ, आब-ए-ख़िज़्र, चश्मा-ए-ख़िज़्र, आब-ए-हैवाँ, चश्मा-ए-ज़िंदगी, ज़ुल्मात, राह-ए-ज़ुल्मात, इसी क़िस्से की तल्मीहात हैं। हज़रत ख़िज़्र को शायर 'मुबारक क़दम' और 'ख़ुजस्ता-पय' (शुभ क़दमों वाले) के लक़ब से याद करते हैं। लुक़मान को कुछ लोगों ने हकीमों (ज्ञानियों) के गिरोह में और कुछ ने पैग़ंबरों की सफ़ में शामिल समझा, मगर उनकी हिकमत (बुद्धिमानी) के सिवा कोई चीज़ मशहूर नहीं।

    हज़रत इब्राहीम का लक़ब ख़लीलुल्लाह है। उनकी मेहमान-नवाज़ी मशहूर है। 'ख़्वान-ए-ख़लील' की तल्मीह इसी की तरफ़ इशारा करती है। हज़रत इब्राहीम के नाम के साथ उनके बाप आज़र का नाम भी बुत-तराश (मूर्ति बनाने वाले) की हैसियत से पेश किया जाता है। हज़रत इब्राहीम जब होश सँभालते हैं तो उन्हें बुतों (मूर्तियों) से नफ़रत होती है। वह बुत-ख़ाना-ए-आज़र के बुतों को तोड़ डालते हैं। उस वक़्त का बादशाह नमरूद उनका ज़िक्र सुनकर बिगड़ जाता है और उन्हें आग में डालने का हुक्म देता है, मगर आग गुलज़ार (बाग़) हो जाती है। आतिश-ए-नमरूद, गुलज़ार-ए-ख़लील, गुलज़ार-ए-इब्राहीम।

    नमरूद एक सरकश (उद्दंड) और घमंडी बादशाह था। एक मच्छर उसकी नाक में घुसकर उसका काम तमाम कर देता है। और पश्शा (मच्छर) और नमरूद की जंग भी हमारी शायरी का एक ख़ास विषय है। हज़रत इब्राहीम का इम्तिहान लिया जाता है। वह अपने प्यारे बेटे इस्माईल को ख़ुदा के रास्ते में क़ुर्बान करने पर तैयार हो जाते हैं, मगर एक मेंढा प्रकट होता है और हुक्म होता है कि इस्माईल के बदले इसकी क़ुर्बानी करो। ईदे क़ुर्बां (बक़रीद) इसी वाक़ये की यादगार है। हज़रत इस्माईल को इसी क़िस्से की वजह से 'ज़बीहुल्लाह' का लक़ब (उपाधि) दिया गया है। 'ज़िबहे अज़ीम' का लफ़्ज़ भी इसी वाक़ये की तरफ़ इशारा करता है। हज़रत इब्राहीम अपने बेटे इस्माईल को उनकी वालिदा (माँ) के साथ मक्का में छोड़ आते हैं। यहाँ पानी का नामोनिशान नहीं। हज़रत इस्माईल के लिए पानी की तलाश में उनकी वालिदा हज़रत हाजरा इस बियाबान में हर तरफ़ दौड़ती हैं, मगर पानी का निशान नहीं मिलता। हज़रत इस्माईल प्यास की शिद्दत से रोते और एड़ियाँ रगड़ते हैं। अचानक उनके क़दमों के नीचे चश्मा-ए-ज़मज़म (ज़मज़म का सोता) फूट पड़ता है, जो आज तक पवित्र माना जाता है। हज़रत इब्राहीम काबा की बुनियाद रखते हैं। संगे अस्वद जिसे हज़रे अस्वद भी कहते हैं, उसी निर्माण के ज़माने की यादगार है, जो अब तक काबा में लगा हुआ है। हर हाजी इसे अदब से चूमता है। शायर काबा को बैतुल्लाह, बैतुल हराम, मस्जिदे हराम, बैतुल अतीक़ के अल्फ़ाज़ से याद करते हैं।

    हज़रत मूसा भी बहुत महान पैग़ंबर थे। उन पर तौरेत नाज़िल हुई (उतरी)। उनका लक़ब 'कलीमुल्लाह' है। उनके ज़माने में जो फ़िरऔन मिस्र पर हुक्मरान था, वह बहुत सरकश और घमंडी था और ख़ुदाई का दावा करता था। काहिनों (पुजारियों) और नजूमियों (ज्योतिषियों) ने भविष्यवाणी की थी कि उसे हलाक करने वाला (मारने वाला) बनी इस्राईल में पैदा होगा। बनी इस्राईल की हालत उस ज़माने में बहुत ख़राब थी। वे मिस्र में ग़ुलामी और मज़दूरी के काम करते थे। फ़िरऔन ने भविष्यवाणी सुनकर बनी इस्राईल के बच्चों को मारना शुरू किया। हज़रत मूसा जब पैदा हुए तो उनकी वालिदा ने उन्हें एक पालने में डालकर दरिया की नज़र कर दिया (बहा दिया)। यह पालना बहते-बहते फ़िरऔन के महल तक पहुँचा। फ़िरऔन की बीवी ने उसे दरिया से निकलवाया। बच्चे की शक्ल देखकर रहम आया। पालने का पक्का इरादा कर लिया। फ़िरऔन को इस बच्चे पर अपने क़ातिल का शक हुआ। चाहा कि मार डाले मगर फ़िरऔन की बीवी आड़े आई।

    फ़िरऔन ने इस बच्चे का इम्तिहान अजीब तरीक़े से लिया। एक थाल लालों (रत्नों) से और एक थाल अंगारों से भरा सामने लाया गया। फ़िरऔन का ख़याल था कि अगर यह बच्चा वही है जो मेरा क़ातिल होगा तो अंगारों पर हाथ नहीं डालेगा। जब बच्चे ने हाथ बढ़ाया, तो क़रीब था कि लालों के थाल पर पड़े मगर फ़रिश्ते ने हाथ खींचकर अंगारों के थाल पर रख दिया। एक अंगारा उठाया और झट से मुँह में रख लिया। हाथ की हथेली और ज़बान दोनों जल गईं। हाथ का सफ़ेद दाग़ बाद में 'यदे बैज़ा' (चमकते हुए हाथ) के मोजिज़े (चमत्कार) में बदल दिया गया। मगर ज़बान में हकलाहट सारी उम्र बाक़ी रही। हज़रत मूसा के लिए दूध पिलाने वाली औरत की तलाश हुई, तो उनकी वालिदा को ही यह मौक़ा मिला और उन्होंने माँ ही के दूध से परवरिश पाई।

    होश सँभालने पर हज़रत मूसा ने शहज़ादों की तरह तालीम पाई। मिस्री काहिनों ने अपने तमाम इल्म उन्हें सिखाए। उन्हें मालूम हो गया था कि वह दरअसल फ़िरऔन के बेटे नहीं हैं और न क़िब्ती हैं, बल्कि इस्राईली नस्ल के हैं। उन्हें अपनी क़ौम से हमदर्दी और क़िब्ती क़ौम से नफ़रत हो गई। एक दिन एक क़िब्ती एक इस्राईली पर ज़ुल्म कर रहा था। यह वाक़या देखकर उन्हें ग़ुस्सा आया और क़िब्ती को जान से मार डाला। फिर मिस्र से निकल खड़े हुए। अरब की सरहद पर पहुँचे, तो मदयन के एक कुएँ पर चंद नौजवान औरतों को उन्होंने पानी भरते देखा। प्यास बहुत तेज़ थी। पानी माँगा। जवाब मिला कि हम अपने मवेशियों को पानी पिला लें तो तुम्हारी ख़बर लें। हज़रत मूसा ने कहा तुम मुझे पानी पिला दो, मैं तुम्हारे मवेशियों को पानी खींचकर पिला दूँगा। उन्होंने इस शर्त को मंज़ूर कर लिया।

    ये नौजवान लड़कियाँ मदयन के पैग़ंबर शुऐब की बेटियाँ थीं। उन्होंने अपने वालिद (पिता) से इस नौजवान का ज़िक्र किया। हज़रत शुऐब ने बुलाकर कहा कि अगर तुम बारह बरस तक हमारे क़बीले की बकरियाँ चराओ तो हम अपनी लड़की से तुम्हारी शादी कर देंगे। हज़रत मूसा ने मंज़ूर कर लिया। बारह बरस की ख़िदमत के बाद शादी हो गई, अपनी बीवी को साथ लेकर चले। रास्ते में वादी-ए-ऐमन मिली, जो कोहे तूर (तूर पहाड़) की तलहटी में है। बीवी हामिला (गर्भवती) थीं। रात वहीं गुज़ारी, उसी वक़्त बच्चा पैदा हुआ। आग की ज़रूरत थी। सामने पहाड़ पर रोशनी दिखाई दी। आग लेने उस तरफ़ बढ़े। देखा एक दरख़्त सिर से पैर तक रोशन है, मगर आग का नाम नहीं। दरख़्त में से आवाज़ आई: मैं तेरा ख़ुदा हूँ। तू पवित्र घाटी में है। अपने जूते उतार दे। मूसा ने कहा 'रब्बि अरिनी' यानी ऐ ख़ुदा तू अपना दीदार मुझे करा। जवाब मिला: 'लन तरानी', यानी तू मुझे हरगिज़ न देख सकेगा। फिर जब ख़ुदा के नूर (तजल्ली-ए-रब्बानी) का ज़हूर हुआ, तो मूसा बेहोश होकर गिर पड़े, पहाड़ काँप गया, बल्कि जलकर सुरमा (राख) हो गया।

    इस वाक़ये की तरफ़ नीचे दी गई तल्मीहात (साहित्यिक संकेतों) में इशारा किया गया है: तजल्ली-ए-तूर, शोला-ए-तूर, नख़्ल-ए-तूर, शम्अ-ए-तूर, शजर-ए-तूर, नख़्ल-ए-मूसा, जल्वा-ए-तूर, नख़्ल-ए-ऐमन, शम्अ-ए-ऐमन, वादी-ए-ऐमन, नूर-ए-सीना, वादी-ए-सीना, शोला-ए-सीना, तूर-ए-सीना, सुरमा-ए-तूर, रब्बि अरिनी, लन तरानी, ख़र्र मूसा (यानी मूसा बेहोश होकर गिर पड़े)। होश में आए तो हज़रत मूसा को हुक्म हुआ, तुम और तुम्हारे भाई हारून दोनों मिलकर फ़िरऔन को मेरा पैग़ाम पहुँचाओ। उसी वक़्त हज़रत मूसा को दो मोजिज़े (चमत्कार) अता हुए। एक यह कि जब वह अपने असा (लाठी) को ज़मीन पर डाल देते थे तो वह अजगर बन जाता था। दूसरा यह कि जब वह अपना हाथ गिरेबान में से निकाल लेते थे, तो सूरज की तरह चमकने लगता था। पहले मोजिज़े की तरफ़ असा-ए-मूसा और असा-ए-कलीम के अल्फ़ाज़ से और दूसरे मोजिज़े की तरफ़ दस्त-ए-कलीम, दस्त-ए-मूसा और यदे बैज़ा के अल्फ़ाज़ से इशारा किया जाता है।

    कोहे तूर से चलकर हज़रत मूसा हज़रत हारून के साथ मिस्र में आए। फ़िरऔन ने अपने जादूगरों को मुक़ाबले के लिए पेश किया, मगर हज़रत मूसा अपने असा और यदे बैज़ा की मदद से उन पर हावी रहे। बड़ी दिक़्क़तों और मुक़ाबलों के बाद उन्होंने बनी इस्राईल को फ़िरऔन की ग़ुलामी से आज़ाद कराया और उन्हें साथ लेकर दरिया के किनारे पहुँचे। असा की एक हरकत से दरिया फट गया और पायआब (पार करने लायक़) हो गया। हज़रत मूसा अपनी क़ौम के साथ पार उतर गए। फ़िरऔन अपने लश्कर के साथ उनका पीछा करते हुए ठीक उस वक़्त पहुँचा जब दरिया पायआब था और बनी इस्राईल पार हो चुके थे। वह भी अपने लश्कर को साथ लेकर दरिया में उतर गया मगर जब बीच में पहुँचा तो जो पानी सिमट गया था, फिर फैल गया और फ़िरऔन अपने लश्कर समेत डूब गया। शायरों ने इस दरिया का नाम नील बताया है, हालाँकि इतिहासकारों के नज़दीक वह बहरे क़ुल्ज़ुम (लाल सागर) था।

    दरिया पार करने के बाद हज़रत मूसा बनी इसराईल को साथ लेकर उस जंगल में पहुँचे जिसे तीह बनी इसराईल कहते हैं। यहाँ वे चालीस साल तक रहे। उन्होंने बनी इसराईल को बहुत उकसाया कि फ़िलिस्तीन पर हमला करो और फ़िरऔन के गवर्नरों को निकालकर ख़ुद अपने वतन पर क़ब्ज़ा कर लो, मगर लंबे समय तक ग़ुलामी की ज़िंदगी गुज़ारने के कारण उनकी हिम्मत और साहस ने जवाब दे दिया था। उस जंगल में बनी इसराईल की गुज़र-बसर जिस चीज़ पर थी, उसका नाम मन्न-ओ-सलवा बताया गया है। आम ख़याल है कि यही जन्नत की नेमतों का थाल था, जो हर रोज़ फ़रिश्तों के ज़रिए भेजा जाता था और इसी आम ख़याल पर शायरी का आधार है। हज़रत मूसा अक्सर कोह-ए-तूर (तूर पर्वत) पर जाते और ख़ुदा से बात किया करते थे। इसी पवित्र पहाड़ पर उन्हें तौरेत के सहीफ़े (ग्रंथ) अता हुए। एक दफ़ा जब वे कोह-ए-तूर पर गए थे, एक शख़्स ने जिसका नाम सामरी था, सोने का एक बछड़ा बनाया, जिसमें से आवाज़ निकलती थी। हज़रत मूसा की क़ौम ने उसको पूजना शुरू कर दिया। हज़रत मूसा जब वापस आए तो बहुत क्रोधित हुए और उस बछड़े को, जिसे कवियों की ज़बान में 'गोसाला-ए-सामरी' के नाम से याद किया जाता है, जलाकर ख़ाक कर डाला।

    हज़रत ईसा बिना बाप के पैदा हुए। हज़रत मरियम उनकी आदरणीय माता का नाम है। प्रसव की पीड़ा में जिस पेड़ का सहारा उन्होंने लिया, वह 'नख़्ल-ए-मरियम' के नाम से मशहूर है। हज़रत मरियम बड़ी इबादतगुज़ार और तपस्विनी थीं। रात को नीयत करके दिन भर किसी से बात नहीं करती थीं और ख़ुदा की याद में लीन रहती थीं। इसी को सौम-ए-मरियम और रोज़ा-ए-मरियम कहते हैं। हज़रत ईसा इब्न-ए-मरियम और रूह-उल्लाह की उपाधि से याद किए जाते हैं। गधा जो उनकी सवारी में रहता था, उसका ज़िक्र 'ख़र-ए-ईसा' के नाम से होता है। मसीह और मसीहा भी हज़रत ईसा ही के नाम हैं। वे क़ुम-बिइज़्नी (यानी खड़ा हो मेरे हुक्म से) कहकर मुर्दों को ज़िंदा कर देते थे। इस चमत्कार का ज़िक्र एजाज़-ए-ईसवी, दम-ए-ईसा, एजाज़-ए-मसीहा, क़ुम और क़ुम-बिइज़्नी के शब्दों से किया जाता है।

    हज़रत ईसा मिट्टी के जानवर बनाकर उनमें रूह फूँकते और उनको उड़ा दिया करते थे। चमगादड़ इसी चमत्कार की यादगार है, जिसे मुर्ग़-ए-ईसा और मुर्ग़-ए-मसीहा कहते हैं। बीमारों को अच्छा करना भी हज़रत ईसा का एक चमत्कार था। इसका ज़िक्र भी बार-बार शायरी में आता है। ईसाई उन्हें इब्न-उल्लाह कहते हैं। उन पर इंजील उतरी। यहूदियों ने उन्हें सूली पर चढ़ाया, मगर ख़ुदा ने उन्हें ज़िंदा उठा लिया और वे चौथे आसमान पर जा पहुँचे। क़यामत के क़रीब वे दोबारा ज़मीन पर तशरीफ़ लाएँगे और एक काफ़िर का मुक़ाबला करेंगे जिसका नाम दज्जाल होगा और जो गधे पर सवार होगा। ख़र-ए-दज्जाल से इसी आने वाले वाक़िए की तल्मीह समझी जाती है। कहते हैं आसमानों पर चढ़ते वक़्त एक सुई हज़रत ईसा के कपड़ों में अटकी रह गई। चूँकि यह दुनियावी चीज़ थी, इसलिए वे चौथे आसमान से आगे न बढ़ सके। सोज़न-ए-ईसा इसी ख़याल की तल्मीह है।

    पैग़ंबरों के ज़माने से संबंधित कुछ तल्मीहें और भी आती हैं, जो पैग़ंबरों के विषय के अंतर्गत बयान नहीं की गईं। उनमें से एक हारूत और मारूत है। यह दो फ़रिश्तों का नाम है, जिन्होंने दावा किया था कि इंसान जिस तरह सांसारिक इच्छाओं में फँस जाते हैं, उसी तरह हम अगर दुनिया में जाएँ तो कभी नहीं फँस सकते। ख़ुदा ने उन्हें दुनिया में इम्तिहान के तौर पर भेजा। वे पहले उपदेश और इबादत में लीन रहे, फिर एक वेश्या पर, जिसका नाम ज़ोहरा था, आशिक़ हो गए। कहते हैं यह औरत निहायत हसीन और जादूगरनी थी। उसने उन फ़रिश्तों से आसमान पर जाने का इल्म सीखा और उनको जादू का इल्म सिखाया। ख़ुदा ने उन फ़रिश्तों को सज़ा के तौर पर बाबिल के एक कुएँ में लटकने की सज़ा दी। कहते हैं, सारी दुनिया का धुआँ वहीं जाता है और उनके नथुनों में दाख़िल होकर उन्हें तकलीफ़ देता है। अगर कोई उनसे जादू सीखना चाहे तो वे सिखा देते हैं। वह औरत इस वाक़िए के बाद आसमान पर चली गई और ज़ोहरा तारा बन गई। ज़ोहरा और चाह-ए-बाबिल (बाबिल का कुआँ) के साथ यह तल्मीह जुड़ी है।

    एक क़िस्सा ज़ुलक़रनैन का है, जिसको आम लोगों ने सिकंदर समझा है। कहते हैं कि दो पहाड़ों के पीछे एक क़ौम याजूज-माजूज आबाद है। इन दोनों पहाड़ों के बीच एक घाटी है जिससे यह क़ौम बाहर निकल कर लोगों को सताती थी। इस क़ौम की शक्ल-ओ-सूरत और कद-काठी के बारे में अजीब-अजीब रिवायतें हैं। मशहूर है कि सिकंदर ज़ुलक़रनैन ने लोहे और ताँबे को गलाकर एक दीवार इन पहाड़ों के बीच बना दी, जिससे यह लोग बाहर न निकल सकें। कहते हैं कि हर रोज़ यह लोग इस दीवार को चाट कर पतला कर देते हैं। शाम को जितनी बाक़ी रह जाती है, छोड़ देते हैं। रात भर में यह दीवार जितनी पतली होती है, उतनी ही मोटी फिर हो जाती है। क़यामत के क़रीब यह लोग इस दीवार से निकल आएँगे। यह दीवार 'सद्द-ए-सिकंदरी' के नाम से मशहूर है।

    एक क़िस्सा असहाब-ए-कहफ़ का है। इसके मायने हैं गुफ़ा वाले आदमी। जब ईसाई मज़हब का प्रसार शुरू-शुरू में हुआ, तो जिन सात आदमियों ने मूर्तिपूजक रूमी बादशाह दक़ियानूस के ज़माने में इस मज़हब को क़ुबूल किया, उन्हीं को असहाब-ए-कहफ़ कहते हैं। ये उस बादशाह के ज़ुल्म से भागकर एक पहाड़ की गुफ़ा में जा छिपे और तीन सौ साल तक सोते रहे। फिर जागे और जाग कर फिर सो गए। एक कुत्ता उनके साथ गुफ़ा के मुँह तक गया और वह भी वहीं सो रहा। इस कुत्ते का नाम क़ितमीर बताया जाता है। कहा जाता है कि अब वे क़यामत के दिन जागेंगे। कुत्ता आदमी बनकर उठेगा और वह भी उनके साथ जन्नत में दाख़िल होगा।

    एक क़िस्सा अनक़ा का है। कहते हैं कि यह एक लंबी गर्दन वाला विशाल जानवर था, जिसका चेहरा आदमी जैसा, पाँव चार थे और पंख कई रंग के थे। बच्चों को उठा ले जाता था। जिस ज़माने में यह प्रकट हुआ, हैतला उस ज़माने के पैग़ंबर थे। लोगों ने उनसे शिकायत की। उनकी दुआ से यह जानवर एक द्वीप पर भेज दिया गया और आम नज़रों से ओझल हो गया। अब वह उस द्वीप पर हाथी और अजगर का शिकार करके अपना गुज़ारा करता है।

    एक क़िस्सा बाग़-ए-इरम का है, जिसको एक काफ़िर बादशाह शद्दाद ने बनवाया था। इस बादशाह ने ख़ुदाई का दावा किया था। उस ज़माने के पैग़ंबर ने नसीहत की और कहा कि अगर तू सच्चाई के रास्ते पर आ जाए, तो तुझे जन्नत मिलेगी। फिर जन्नत की विशेषताएँ बयान कीं। उसने कहा कि ऐसी जन्नत तो मैं ख़ुद बनवा सकता हूँ। इसलिए उसने मुक़ाम-ए-इरम में एक बाग़ बनवाया, जवाहरात से जड़े हुए महल तैयार कराए, उसमें हसीन औरतें हूरों की जगह और हसीन सेवक ग़िल्मान की जगह रखे। बाग़ तैयार हो चुका तो घोड़े पर सवार होकर बाग़ के दरवाज़े पर पहुँचा। रिकाब से पाँव ज़मीन पर रखने की इजाज़त नहीं मिली। मलक-उल-मौत ने उसकी जान निकाल ली। कहते हैं कि उसके मरने के बाद यह बाग़ ज़मीन से उठा लिया गया और जन्नत और जहन्नुम के बीच रख दिया गया। अब इसी को एराफ़ कहते हैं। बाग़-ए-इरम, गुलज़ार-ए-इरम, बहिश्त-ए-इरम, बहिश्त-ए-शद्दाद, जन्नत-ए-शद्दाद, बाग़-ए-शद्दाद और इरम इसी क़िस्से की तल्मीहें हैं।

    एक क़िस्सा ऊज बिन उनुक़ का है जो हज़रत आदम के ज़माने में पैदा हुआ और हज़रत मूसा के ज़माने तक ज़िंदा रहा। यह शख़्स बहुत ही लंबे क़द का था। तूफ़ान-ए-नूह इसकी कमर तक आया था। हज़रत मूसा के ज़माने में इसने बनी इस्राईल के लश्कर पर हमला करना चाहा और इस मक़सद के लिए एक-दो मील लंबा पहाड़ सिर पर उठा लिया और चाहा कि उसको उस लश्कर पर दे मारे। मगर ख़ुदा के हुक्म से एक हुदहुद ने उस पहाड़ में सुराख़ कर दिया और वह पहाड़ ऊज के गले में उतर गया। फिर हज़रत मूसा ने इसके टखने की हड्डी पर असा (लाठी) मारा जिससे वह हलाक हो गया। कहते हैं कि इसकी पिंडली की हड्डी से दरिया-ए-नील का पुल बांधा गया था।

    एक क़िस्सा क़ारून का है। कहते हैं कि क़ारून हज़रत मूसा का चचेरा भाई था। उसको कीमिया (सोना बनाने की विद्या) आती थी। वह सोना-चांदी बनाता और ख़ज़ाने पर ख़ज़ाना जमा करता जाता था। धीरे-धीरे उसके पास इतने ख़ज़ाने जमा हो गए कि चालीस खच्चरों पर उसके ख़ज़ानों की चाबियां लादी जाती थीं। हज़रत मूसा ने उससे कहा कि हज़ार दीनार पर एक दीनार ज़कात (दान) दिया करो। उसने इनकार किया और हज़रत मूसा को तकलीफ़ पहुंचानी चाही। ख़ुदा ने उसको यह सज़ा दी कि अब तमाम ख़ज़ाने उसके सिर पर हैं और वह ज़मीन में लगातार धंसता चला जाता है। क़ारून की कंजूसी मशहूर है। क़ारून का ख़ज़ाना, गंज-ए-क़ारून, गंजीना-ए-क़ारून, ख़ज़ाना-ए-क़ारून, दौलत-ए-क़ारून इस क़िस्से की तल्मीहें हैं।

    एक क़िस्सा असहाब-ए-फ़ील का है, जो रसूल-ए-ख़ुदा की मुबारक पैदाइश से पहले पेश आया। हबश के बादशाह की तरफ़ से एक शख़्स अबरहा नाम का यमन का गवर्नर था। वह काबा की तरफ़ लोगों का ध्यान देखकर जलन से जल गया। यमन में एक आलीशान इबादतगाह तैयार कराई और लोगों को उसकी तरफ़ हज के मक़सद से आने की हिदायत की, मगर समंदर की तरफ़ से अबाबीलों (एक प्रकार के पक्षी) का एक लश्कर आकर आसमान पर मंडराने लगा। हर अबाबील की चोंच में एक कंकड़ था। जब ये कंकड़ अबाबीलों ने उस लश्कर पर छोड़े तो हाथियों पर बैठने वालों के जिस्मों के पार निकल गए और वे सब हलाक हो गए। असहाब-ए-फ़ील और तैरन अबाबील के अल्फ़ाज़ इस क़िस्से की तरफ़ इशारा करते हैं।

    आनहज़रत (पैग़ंबर मुहम्मद) सबसे आख़िरी पैग़ंबर हैं। आपके बेशुमार सिफ़ाती (गुणवाचक) नाम तल्मीह के तौर पर आते हैं। मसलन ख़ातम-उल-अंबिया, ख़ातम-उन-नबीयीन, ख़त्म-ए-रुसुल, शाफ़े-ए-महशर, शफ़ी-ए-रोज़-ए-क़यामत, शाह-ए-उमम, रसूल-ए-मक़बूल, शाफ़े-ए-उमम, रहमतुल-लिल-आलमीन, शफ़ी-उल-मुज़निबीन, सरवर-ए-कायनात, माह-ए-यसरब, ख़ैर-उल-वरा, मदीनत-उल-इल्म, मुस्तफ़ा, मुज्तबा, वग़ैरह। 'लौलाक' एक हदीस-ए-क़ुदसी का टुकड़ा है, जिसके मायने यह हैं कि अगर तू न होता, तो मैं आसमानों को पैदा न करता। 'शरह-ए-सद्र' भी एक तल्मीह है। क़िस्सा यह है कि लड़कपन के ज़माने में एक दफ़ा फ़रिश्तों ने आपका सीना चीर कर आपके दिल को धोया और साफ़ किया और मारिफ़त (ईश्वरीय ज्ञान) के नूर से भरकर फिर आपके सीने के अंदर रख दिया। 'मोहर-ए-नबुव्वत' एक और तल्मीह है। यह एक ख़ास निशान हुज़ूर-ए-अनवर के जिस्म-ए-मुबारक पर था। इस जगह पर बालों का घेरा इस शक्ल का बन गया था कि उसमें कलमे के हर्फ़ पढ़े जाते थे।

    'क़ाब क़ौसैन' के मायने हैं, दो कमानों का फ़ासला। यह तल्मीह मेराज के मुताल्लिक़ (बारे में) है। मतलब यह है कि हुज़ूर-ए-अनवर मेराज में ख़ुदा के इस क़दर क़रीब हुए कि दो कमानों का फ़ासला या उससे भी कम फ़ासला रह गया। 'मेराज' ख़ुद एक तल्मीह है, जिसका मतलब यह है कि एक रात, जब आप सो रहे थे, जिब्रील आए और उन्होंने आपको जगाकर बुर्राक़ पर सवार कर दिया। यह एक जन्नती चौपाया था, जो खच्चर से छोटा और गधे से बड़ा था। इस पर सवार होकर आप पहले बैत-उल-मुक़द्दस में पहुंचे, जहां तमाम अंबिया (पैग़ंबरों) की रूहें आपके इस्तक़बाल के लिए जमा थीं। यहां से आपने आसमान की तरफ़ चढ़ना शुरू किया। जब आसमान पर बैत-उल-मामूर में पहुंचे तो रूहों ने आपका इस्तक़बाल किया। बैत-उल-मामूर आसमान पर फ़रिश्तों के लिए वैसा ही मक़ाम है जैसा कि ज़मीन पर इंसानों के लिए काबा।

    'सिदरत-उल-मुंतहा' जिसको 'सिदरा' भी कहते हैं, हज़रत जिब्रील के रहने का मक़ाम है। यहां पहुंचकर उन्होंने कहा कि मैं इस मक़ाम से आगे नहीं बढ़ सकता। अगर आगे क़दम बढ़ाऊंगा तो मेरे पर ख़ुदा के नूर (तजल्ली-ए-इलाही) से जल जाएंगे। बुर्राक़ ने भी यहां साथ छोड़ दिया। यहां एक और दूसरी सवारी मिली, जिसको 'रफ़रफ़' कहते हैं। आप इस पर सवार होकर आगे बढ़े। ख़ुदा से ख़ास क़ुर्ब (नज़दीकी) हासिल किया। हुज़ूर-ए-अनवर उस रात को जिस मक़ाम तक पहुंचे, उसका नाम 'मक़ाम-ए-महमूद' है। जब वापस तशरीफ़ लाए तो आपके हुजरा-ए-मुबारक (कमरे) की ज़ंजीर अभी हिल रही थी और आपका बिस्तर अभी गर्म था। गोया आपने पलक झपकते ही अफ़लाक (आसमानों), अर्श, कुर्सी, जन्नत, दोज़ख़ वग़ैरह मक़ामात की सैर कर ली। इस वाक़ये का ज़िक्र मेराज, असरा, शब-ए-मेराज, लैलत-उल-असरा वग़ैरह अल्फ़ाज़ से किया जाता है।

    'ग़ार-ए-हिरा' एक और तल्मीह है। यह एक पहाड़ी ग़ार (गुफ़ा) मक्का के क़रीब है। यहां आप इबादत के लिए अक्सर जाया करते थे। एक तल्मीह 'मस्जिद-ए-ज़िरार' है। जब मक्का से हिजरत करके आप मदीना में पहुंचे तो आपने वहां एक मस्जिद की बुनियाद डाली। इसमें तमाम मुसलमान इबादत का फ़र्ज़ अदा करते थे। मस्जिद-ए-नबवी से दूर एक और मस्जिद मुनाफ़िक़ों (कपटियों) ने बनाई। मक़सद यह था कि वहां इस्लाम और आनहज़रत के ख़िलाफ़ साज़िश के मशवरे करें। उन्होंने आनहज़रत से दरख़्वास्त की कि एक दफ़ा आप इस मस्जिद में नमाज़ पढ़ें और जो मुसलमान कमज़ोर हैं और दूरी के सबब मस्जिद-ए-नबवी में नहीं आ सकते, उनको इस नई मस्जिद में नमाज़ पढ़ने की इजाज़त दें। वही (ईश्वरीय संदेश) के ज़रिए से आपको उनका इरादा मालूम हो गया। आप वहां नमाज़ के लिए तशरीफ़ नहीं ले गए। फिर आपके हुक्म से वह मस्जिद जला दी गई। इसी को मस्जिद-ए-ज़िरार कहते हैं।

    'ख़ुम-ए-ग़दीर' जो असल में 'ग़दीर-ए-ख़ुम' है, एक झील का नाम है, जहां आख़िरी हज से वापसी के बाद आपने आख़िरी तक़रीर फ़रमाई। 'अहल-ए-बैत' आपके कुनबे (परिवार) वालों को कहते हैं। 'ख़ातून-ए-जन्नत' आपकी पाकीज़ा बेटी हज़रत फ़ातिमा ज़हरा का लक़ब (उपाधि) है। 'यार-ए-ग़ार' की तल्मीह से हज़रत अबू बक्र सिद्दीक़ मुराद हैं, जो हिजरत के वक़्त एक पहाड़ के ग़ार में हुज़ूर-ए-अनवर के रफ़ीक़ (साथी) थे। 'फ़ारूक़' या 'फ़ारूक़-ए-आज़म' हज़रत उमर का और 'ज़ुन-नूरैन' और 'जामे-उल-क़ुरआन' हज़रत उस्मान का लक़ब है, जो जलील-उल-क़द्र (महान) सहाबी थे। हज़रत अली आपके दामाद थे। उनके सिफ़ाती नाम कसरत से (बहुत ज़्यादा) हैं। मसलन फ़ातेह-ए-ख़ैबर, ख़ैबर-शिकन, हैदर-ए-कर्रार, हैदर-ए-सफ़दर, अबू तुराब, मुर्तज़ा, मुश्किल-कुशा, साक़ी-ए-कौसर, शेर-ए-ख़ुदा, दुलदुल-सवार, शाह-ए-मर्दां, असद-उल्लाह वग़ैरह। उनकी तलवार 'ज़ुल्फ़िक़ार' के नाम से मशहूर है और घोड़ा 'दुलदुल' के नाम से।

    ख़ालिद बिन वलीद भी एक सहाबी थे। उनका लक़ब 'सैफ़-उल्लाह' है। एक सहाबी 'अबू हुरैरा' की कुन्नियत (उपनाम) से मुमताज़ (मशहूर) हैं। उन्होंने एक बिल्ली पाल रखी थी। 'गुर्बा-ए-अबू हुरैरा' की तल्मीह से वही बिल्ली मुराद है। आपके मुख़ालिफ़ों (विरोधियों) में से एक की कुन्नियत अबू जहल और एक की अबू लहब है। 'बाग़-ए-फ़दक' खजूरों का एक बाग़ था, जो यहूदियों से सुलह होने पर लिया गया था। इसी की आमदनी पर आनहज़रत की गुज़र-बसर थी।

    जिन फ़रिश्तों का ज़िक्र तल्मीह (काव्य-संदर्भ) में आता है, उनमें से एक जिब्रील हैं। उनके बहुत से वस्फ़ी (गुणवाचक) नाम हैं। मसलन मुर्ग़-ए-सिदरा, बुलबुल-ए-सिदरा, तायर-ए-सिदरा, सिदरा-नशीन, जिब्रील-ए-अमीन, जौहर-ए-अव्वल, अक़्ल-ए-कुल, रूह-ए-क़ुदुस, तायर-ए-क़ुदुस, रूह-ए-अमीं, नामूस-ए-अकबर, नामूस-ए-आज़म, फ़रिश्ता-ए-वही वग़ैरह। ये पैग़ंबर के पास ख़ुदा का पैग़ाम लाते थे। उनका मक़ाम सिदरत-उल-मुंतहा है, जैसा कि मेराज के ज़िक्र में भी बयान हो चुका है। एक फ़रिश्ते का नाम मीकाईल है। रोज़ी बाँटना उनका काम है। एक फ़रिश्ता इज़राईल है, जिसकी ज़िम्मेदारी रूहों को क़ब्ज़ करना (निकालना) है, जिसे मलकुल-मौत या क़ाबिज़-ए-रूह या मौत का फ़रिश्ता भी कहते हैं। एक का नाम इसराफ़ील है, जो क़यामत के दिन सूर (नरसिंघा) फूँकेंगे। सूर-ए-इसराफ़ील की तल्मीह उन्हीं के नाम से जुड़ी है। दूसरे किरामन कातिबीन के नाम से जाने जाते हैं, उनको कातिब-ए-आमाल भी कहते हैं। दोनों इंसानों के दाएँ-बाएँ रहते हैं और हर एक इंसान की नेकी-बदी लिखते रहते हैं। वह रजिस्टर जिसमें नेकी-बदी लिखी जाती है और जो क़यामत के दिन ख़ुदा के सामने पेश होगा, सहीफ़ा-ए-आमाल, दफ़्तर-ए-आमाल, नामा-ए-आमाल, आमाल-नामा कहलाता है।

    दो फ़रिश्ते हैं जो क़ब्र में आते हैं और मुर्दे से सवाल-जवाब करते हैं। उनको मुनकिर-नकीर या नकीरैन कहते हैं। एक फ़रिश्ता रआ के नाम से जाना जाता है, जो बादलों को हाँकता और बारिश बरसाता है। एक फ़रिश्ता जन्नत का दारोग़ा है, उसका नाम रिज़वान है और एक फ़रिश्ता है, जो दोज़ख़ का निगहबान (रखवाला) है। उसको मालिक कहते हैं। मरने के बाद क़यामत तक जो ज़माना गुज़रेगा, उसे बरज़ख़ या आलम-ए-बरज़ख़ कहते हैं। जन्नत वह मक़ाम है जहाँ नेक आदमियों की रूहें रखी जाएँगी। इसके बहुत से नाम हैं। मसलन बहिश्त, ख़ुल्द, जिनान, दारुस्सलाम, बाग़-ए-जिनान, बाग़-ए-रिज़वाँ, फ़िरदौस, फ़िरदौस-ए-बरीं, बाग़-ए-अदन, दारुल-क़रार, इल्लीय्यीन, बाग़-ए-नईम वग़ैरह। दोज़ख़ वह मक़ाम है, जहाँ गुनहगार रखे जाएँगे और आग के अज़ाब (कष्ट) में डाले जाएँगे। इसके भी बहुत से नाम हैं। मसलन नार, जहन्नुम, जहीम, सईर, हाविया, सक़र वग़ैरह।

    जन्नत में एक दरख़्त का नाम तूबा है, जिसकी शाख़ें हर जन्नती के घर में पहुँची हैं। कई नहरें भी हैं, जिनमें से एक का नाम कौसर है। इसे चश्मा-ए-कौसर और हौज़-ए-कौसर भी कहते हैं। बाक़ी नहरों के नाम इस तरह हैं: तसनीम, नहरैन, सलसबील, ज़ंजबील, काफ़ूर। दोज़ख़ और जन्नत के दरमियान जो मक़ाम है उसका नाम आराफ़ है, जहाँ ऐसे लोग रखे जाएँगे जिनकी नेकियाँ और बदियाँ बराबर हैं। दोज़ख़ की पीठ पर एक पुल है जिसको पुल-सिरात कहते हैं। यह तलवार से ज़्यादा तेज़ और बाल से ज़्यादा बारीक है। नेक आदमी इस पर से बिजली की तरह गुज़र जाएँगे और बुरे आदमी कट-कट कर दोनों तरफ़ दोज़ख़ में गिरेंगे। नेकियों और बदीयों का अंदाज़ा करने के लिए क़यामत के दिन एक तराज़ू खड़ी की जाएगी, जिसको मीज़ान या मीज़ान-ए-आमाल कहते हैं।

    बहिश्त में ख़ूबसूरत औरतें बहिश्तियों की ख़िदमत में होंगी, वे हूरें कहलाती हैं और जो हसीन सेवक उनकी ख़िदमत करेंगे वे ग़िल्मान के नाम से जाने जाते हैं। बहिश्तियों को जो शराब पिलाई जाएगी, उसका नाम शराब-ए-तहुर है। दोज़ख़ में दोज़ख़ियों को एक काँटेदार फल खाने को दिया जाएगा जो ज़क़्क़ूम कहलाता है। दोज़ख़ में बहुत से गुनहगार झोंके जाएँगे, मगर उसका पेट नहीं भरेगा। वह बार-बार यह आवाज़ बुलंद करेगी, हल मिन मज़ीद। क्या मेरे लिए कुछ और भी ख़ुराक है? यह आयत भी तल्मीह के तौर पर बार-बार आती है। इसके अलावा हातिम की दरियादिली और लैला व क़ैस की इश्क़बाज़ी के क़िस्से भी अरब से ईरान में आए और ईरानी अदब (साहित्य) में घुल-मिल गए।

    अदबी तल्मीहात (साहित्यिक तल्मीहों) की पहली क़िस्म में जो तल्मीहें दर्ज की गई हैं, वे मिसाल के तौर पर हैं। तमाम तल्मीहात को पूरी तरह से शामिल नहीं किया गया है। यह काम उस लेखक का है जो तल्मीहात का शब्दकोश (फ़रहंग) तैयार करे। हम अब उन तल्मीहात पर तवज्जो की नज़र डालते हैं जो दूसरी क़िस्म में दाख़िल हैं और ये वे तल्मीहात हैं जिनमें ईरानी असर पाया जाता है।

    उर्दू अदबी तल्मीहात क़िस्म दोम

    जमशेद ईरान का एक मशहूर बादशाह था, जिसका ऐश-ओ-इशरत और शान-ओ-शौकत के लिहाज़ से बार-बार ज़िक्र हुआ है। उसको जम भी कहते हैं। मगर जम के लफ़्ज़ से शायर कभी हज़रत सुलैमान मुराद लेते हैं, कभी सिकंदर और कभी ईरान के इस नामवर बादशाह की तरफ़ इशारा करते हैं। ख़ातम-ए-जम, नगीन-ए-जम, अंगुश्तर-ए-जम, तख़्त-ए-जम की तल्मीहों में इस लफ़्ज़ से हज़रत सुलैमान की तरफ़ इशारा किया गया है। आईना-ए-जम से सिकंदर मुराद है। बज़्म-ए-जम, जाम-ए-जम, जश्न-ए-जम, साग़र-ए-जम में ईरान के बादशाह जमशेद की तरफ़ इशारा है। इन तल्मीहात में जम की जगह जमशेद का लफ़्ज़ भी लाया जाता है। कहते हैं कि इस बादशाह के पास शराब का एक प्याला था। इसके चारों ओर सात लकीरें (ख़त) खिंची हुई थीं। सबसे पहली लकीर यानी ऊपरी लकीर तक शराब भरी जाती तो जमशेद के सिवा किसी की मजाल न थी कि इस प्याले को पी सके। पहली लकीर यानी किनारे की लकीर का नाम ख़त-ए-जौर है। बाक़ी छह लकीरों के नाम क्रमशः इस तरह हैं: ख़त-ए-बग़दाद। ख़त-ए-बसरा। ख़त-ए-अज़रक़ जिसको ख़त-ए-सियाह, ख़त-ए-शब और ख़त-ए-सब्ज़ भी कहते हैं। ख़त-ए-शुक्रिया। ख़त-ए-अश्क। ख़त-ए-कासागर। ख़त-ए-फ़रोदीना। तख़्त-ए-जमशेद जो ईरान की प्राचीन धरोहरों में से एक आलीशान इमारत है, इसी बादशाह की यादगार है।

    एक और बादशाह जिसने ईरान पर हुकूमत की, ज़ुहाक था। यह अपने ज़ुल्म-ओ-सितम और ख़ूँरेज़ी के कारण बदनाम है। कहते हैं कि इसके दोनों कंधों पर दो साँप पैदा हो गए थे। उनकी ख़ुराक के लिए इंसान का गोश्त ज़रूरी था। ज़ुहाक हर रोज़ इंसानों को मारता और साँपों के लिए ख़ुराक मुहैया करता था। मार-ए-ज़ुहाक (ज़ुहाक के साँप) से इसी वाक़ये की तरफ़ इशारा किया गया है। यह बादशाह फ़रीदूँ के हाथ से मारा गया।

    फ़रीदूँ अपनी महानता और दबदबे के कारण मशहूर है। जब शायर किसी बादशाह की तारीफ़ करते हैं तो उसको फ़रीदूँ-फ़र कहा करते हैं। ज़ुहाक के शासनकाल में एक लुहार था जिसका नाम कावा था। यह लुहार इस्फहान का बाशिंदा था। इसके चार बच्चे ज़ुहाक ने मरवा डाले थे। जनता ज़ुहाक के ज़ुल्म-ओ-सितम से तंग आ गई थी। कावा के दिल में इन वाक़यात को देखकर जोश पैदा हुआ। उसने दुकान बंद कर दी। जिस चमड़े को वह निहाई (अहरन) के नीचे बिछाया करता था, उसको एक लकड़ी पर लटकाकर फरेरा (झंडा) बनाया और ढोल बजाता ज़ुहाक के ज़ुल्म के राग गाता निकल खड़ा हुआ। दराफ़्श-ए-कावियानी, अलम-ए-कावियानी, परचम-ए-कावियानी, अख़्तर-ए-कावियानी के अल्फ़ाज़ से भी यही झंडा मुराद है।

    ईरान के बाशिंदे जो ज़ुहाक के ज़ुल्म-ओ-सितम से तंग आ गए थे, इस झंडे के नीचे जमा हो गए। कावा इस लश्कर को अपने साथ लेकर बढ़ा। ज़ुहाक की फ़ौजों से उसकी टक्कर हुई। इन फ़ौजों ने हार खाई, यहाँ तक कि तमाम ईरान को कावा ने फ़तह कर लिया। उसने ख़ुद हुकूमत करने से इनकार किया। फ़रीदूँ जो जमशेद का बेटा था और जिसका बाप ज़ुहाक के हाथ से क़त्ल हुआ था, तख़्त-ए-ईरान पर बिठाया गया। तमाम लड़ाइयों में दराफ़्श-ए-कावियानी फ़ौज के आगे-आगे रहता था। लगातार जीतों ने यह बात दिमाग़ में बिठा दी कि यह झंडा बहुत मुबारक है। कावा के मरने के बाद फ़रीदूँ ने और फ़रीदूँ के बाद ईरान के अन्य बादशाहों ने इस झंडे को जवाहरात से जड़ा। यज़्दगर्द के ज़माने तक यह झंडा हर लड़ाई में फ़ौज के आगे-आगे चलता था। हज़रत उमर के ज़माने में यह झंडा मुसलमानों के हाथ आया। इसके जवाहरात बाँट दिए गए और चमड़ा जलाकर राख कर दिया गया।

    कैख़ुसरो ईरान का एक और मशहूर शासक था। कहते हैं कि उसने एक प्याला बनाया था। उस पर ज्यामितीय रेखाएं खिंची हुई थीं। जिस तरह उस्तुरलाब की रेखाओं से सितारों की ऊंचाई वगैरह मालूम होती है, उसी तरह इस जाम की रेखाओं से सितारों की गर्दिश (चाल) दिखाई देती थी, और ज़माने की आने वाली घटनाएं इससे मालूम की जाती थीं। इस जाम की तरफ़ जो इशारे हमारे शाइरों ने किए हैं, उनके लिए नीचे दिए गए शब्द गढ़े गए हैं: जाम-ए-कैख़ुसरो, जाम-ए-जहां-नुमा, जाम-ए-जहां-बीं।

    कियानियों की हुकूमत के दौर में ईरान और तूरान के बीच हमेशा लड़ाइयां होती रहती थीं। ईरानियों के पक्ष में सीस्तान या ज़ाबुलिस्तान के एक पहलवान ने अपने शानदार कारनामों से बड़ी शोहरत हासिल की। इस पहलवान का नाम रुस्तम था। रुस्तम को पीलतन और तहमतन भी कहते हैं। यह ज़ाल का बेटा था इसलिए पूर-ए-ज़ाल के शब्द से भी इसी पहलवान की मुराद ली जाती है। फ़िरदौसी के शाहनामा का हीरो यही रुस्तम है। रुस्तम के हाथ में गुर्ज़ (गदा) रहता था, जो गुर्ज़-ए-रुस्तम के नाम से मशहूर है। चूंकि यह गुर्ज़ बैल के सिर से मिलता-जुलता था, इसलिए इसे गुर्ज़-ए-गाओ-सर भी कहते हैं। इसके घोड़े का नाम रख़्श है। सोहराब इसी के बेटे का नाम था। इत्तेफ़ाक़ से दोनों आपस में लड़ने लगे और एक को दूसरे की ख़बर न थी। जब रुस्तम के हाथ से सोहराब ज़ख़्मी हो चुका, तब उसे इस राज़ का पता चला, मगर तब तक बात हाथ से निकल चुकी थी।

    अफ़रासियाब जो तूरान का बादशाह था, उसके लश्कर से बार-बार रुस्तम के मुक़ाबले हुए। कैकाऊस जो ईरान का बहुत मशहूर बादशाह था, उसे एक बार देवों (राक्षसों) ने गिरफ़्तार करके माज़ंदां के क़िले में क़ैद कर दिया था। रुस्तम इस बादशाह को क़ैद से छुड़ाने के लिए गया। रास्ता बहुत कठिन था। हर मंज़िल में एक नई भयानक मुसीबत और तकलीफ़ का सामना करना पड़ा। ये सात मंज़िलें शाहनामा की ज़बान में 'हफ़्त ख़्वां' के नाम से मशहूर हैं। हफ़्त ख़्वान-ए-रुस्तम के अलावा एक और हफ़्त ख़्वां भी है, जो हफ़्त ख़्वान-ए-इस्फंदियार के नाम से जाना जाता है। अरजास्प बादशाह इस्फंदियार की दो बहनों को पकड़ ले गया था और उन्हें रुईं वझमीं, जो एक क़िले का नाम है, में क़ैद कर दिया। जब इस्फंदियार अपनी बहनों को छुड़ाने के लिए इस क़िले की तरफ़ रवाना हुआ तो रास्ते में उसे भी सात मुसीबत भरी और भयानक घटनाओं का सामना करना पड़ा। इस्फंदियार की भी सातों मंज़िलें, जिनको पार करने के बाद वह अपनी बहनों को छुड़ा कर लाया, हफ़्त ख़्वान-ए-इस्फंदियार के नाम से मशहूर हैं।

    अभी बताया जा चुका है कि रुस्तम के बाप का नाम ज़ाल था। ज़ाल को दास्तां भी कहते हैं। इस लिहाज़ से रुस्तम को रुस्तम-ए-दास्तां का लक़ब भी दिया गया है। ज़ाल की परवरिश पहाड़ की एक गुफ़ा में सीमुर्ग़ (एक पौराणिक पक्षी) ने की थी। जवान होने पर सीमुर्ग़ ने अपना एक पंख उसे दे दिया था कि जब मुझे बुलाने की ज़रूरत हो, इस पंख को आग पर रखना, मैं इसकी महक पर आ पहुंचूंगा। रुस्तम को जब कभी कोई मुश्किल पेश आई, इसी पंख की मदद से सीमुर्ग़ बुलाया गया और उससे मशवरा किया गया। साम रुस्तम के दादा का नाम था और नरीमान परदादा का। शग़ाद रुस्तम का एक भाई था, जो उसके लिए दिल में जलन रखता था। उसने थोड़ी-थोड़ी दूरी पर सात कुएं तैयार कराए और उनको हथियारों से भर दिया और घास-फूस से ढक दिया। फिर रुस्तम को सैर और शिकार के बहाने से उस जगह ले गया, जहां वे घास-फूस से ढके कुएं थे।

    रुस्तम जो घोड़े पर सवार था, पहले कुएं में गिर गया मगर घोड़े ने छलांग लगाई, तो उसमें से निकल आया। फिर दूसरे कुएं में जा गिरा। जब छह कुओं से छलांग लगा-लगा कर निकल चुका और सातवें कुएं में गिरा तो रुस्तम और उसका घोड़ा दोनों बहुत ज़ख़्मी हो गए थे। आख़िर रुस्तम ने इसी कुएं में जान दी। शाइर इस घटना की तरफ़ 'चाह-ए-रुस्तम' (रुस्तम का कुआं) के शब्द से इशारा करते हैं। चाह-ए-रुस्तम की तरह एक तल्मीह 'चाह-ए-बेज़न' भी है। बेज़न गेव का बेटा और रुस्तम का भांजा था। वह अफ़रासियाब की बेटी मनीज़ा पर आशिक़ हो गया था। इसकी सज़ा में वह एक अंधेरे कुएं के अंदर क़ैद कर दिया गया। यही कुआं चाह-ए-बेज़न कहलाता है। रुस्तम उसको आख़िरकार क़ैद से छुड़ा लाया।

    सियावश कैकाऊस का बेटा था। अपनी सौतेली मां के तानों से तंग आकर अपने बाप के दुश्मन अफ़रासियाब के पास चला गया, जो तूरान का बादशाह था। वह पहले तो उसके आने से बहुत ख़ुश हुआ और अपनी लड़की से उसकी शादी कर दी। मगर फिर अपने एक और दामाद के बहकाने-सिखाने से उसे नाहक़ क़त्ल कर डाला। 'ख़ून-ए-सियावश' इसी घटना की तल्मीह है। इस शब्द से नाहक़ ख़ून (बेगुनाह का ख़ून) मुराद लेते हैं। बहराम गोर भी ईरान का एक मशहूर बादशाह था, जो घुड़सवारी और नेज़ाबाज़ी (भाला चलाने) में शोहरत रखता था। यह शिकार का बेहद शौक़ीन था और अक्सर गोरख़र (जंगली गधे) का शिकार करता था। इसी लिहाज़ से उसे बहराम गोर का लक़ब दिया गया है। हमारे शाइर इस बादशाह का ज़िक्र बार-बार करते हैं।

    नौशेरवां, ईरान का न्यायप्रिय (आदिल) बादशाह मशहूर है। उसका महल ऐवान-ए-किसरा के नाम से जाना जाता है, जो बहुत आलीशान था। इसी को ताक़-ए-किसरा भी कहते हैं। इन तल्मीहात में किसरा को नौशेरवां का पर्यायवाची (समानार्थी) समझिए। जब यह महल बनने लगा, तो महल के एक किनारे पर एक बुढ़िया की झोपड़ी थी। चाहा गया कि इस झोपड़ी की जगह ख़रीद ली जाए, ताकि महल इस कोने की तरफ़ टेढ़ा न रह जाए, मगर बुढ़िया ने जगह देने से इनकार किया। शाही अफ़सरों ने बुढ़िया पर ज़ोर-ज़बरदस्ती करनी चाही, मगर नौशेरवां ने उन्हें ऐसा करने से रोक दिया और कहा कि मैं ज़ुल्म से प्रजा की ज़मीन पर क़ब्ज़ा करना नहीं चाहता। अगर मेरा महल टेढ़ा रहे तो कोई परवाह नहीं। 'अद्ल-ए-नौशेरवानी' (नौशेरवां के न्याय) का ज़िक्र जब हमारे शाइर करते हैं, तो इस बुढ़िया का ज़िक्र ज़रूर आता है। नौशेरवां का बेटा हुरमुज़ था। हुरमुज़ का बेटा परवेज़, जिसको ख़ुसरो परवेज़ भी कहते हैं। इस बादशाह का ज़िक्र हमारे शाइरों ने बार-बार किया है। यह ईरान के दूसरे बादशाहों के मुक़ाबले ज़्यादा मालदार था। इसके पास आठ ख़ज़ाने थे, जिनके नाम नीचे दिए गए हैं: गंज-ए-अरूस, गंज-ए-बाद-आवर या गंज-ए-शायगां, गंज-ए-दीबा-ए-ख़ुसरवी, गंज-ए-अफ़रासियाब, गंज-ए-सोख़्ता, गंज-ए-ख़ज़रा, गंज-ए-शाद-आवर, गंज-ए-बार।

    इस बादशाह के घोड़े का नाम शबवेज़ था, जो एक आला दर्जे का मुश्की (काले रंग का) घोड़ा था। कुछ दिनों तो इस बादशाह ने अक़्लमंदी और समझदारी के तरीक़े से हुकूमत की, मगर आख़िर में वह ऐश-पसंद हो गया। उसने अपने महल में हसीन औरतें बड़ी तादाद में जमा कर लीं। इसी ऐश के ज़माने में उसने शीरीं के हुस्न का चर्चा सुना। यह अरमन की मलिका महीन बानो की भतीजी थी। ख़ुसरो ने अपने एक दरबारी शापूर नाम के शख़्स से इस मामले में मदद चाही। शापूर को चित्रकारी (मुसव्विरी) में कमाल हासिल था। उसने ख़ुसरो की कई तस्वीरें अलग-अलग लिबास और अलग-अलग अंदाज़ की बनाईं। फिर उन तस्वीरों को बग़ल में दबाकर अरमन पहुंचा। एक बाग़ में, जिसमें शीरीं सैर-सपाटे के लिए आया करती थी, उसने वे तस्वीरें पेड़ों से लटका दीं। शीरीं की नज़र उन पर पड़ी तो वह फ़िदा हो गई। उसने शापूर को भी देखा और उससे उन तस्वीरों का हाल पूछा। उसने ख़ुसरो के हुस्न और जमाल का ज़िक्र इस तरह नमक-मिर्च लगाकर किया कि वह ख़ुसरो के पास जाने और उससे शादी करने पर राज़ी हो गई। आख़िरकार शीरीं ख़ुसरो के महल में दाख़िल हुई।

    ख़ुसरो महल की तमाम हसीन औरतों से ज़्यादा उसी से मुहब्बत करता था। कहते हैं कि शीरीं को ताज़ा दूध का बहुत शौक़ था। शहर के किनारे कोह-ए-बेसतून नाम का एक पहाड़ खड़ा था। उसके पीछे बकरियों के झुंड चरते थे। उन्हीं का दूध शीरीं के महल में लाया जाता था, मगर इतनी दूर से लाने में परेशानी थी। एक मशहूर संगतराश (पत्थर काटने वाले) फ़रहाद से कहा गया कि वह उस पहाड़ से एक नहर काटकर शीरीं के महल तक पहुँचा दे ताकि चरागाह से बकरियों का दूध दुहकर नहर में डाला जाए और वह बहकर शीरीं के महल में पहुँचे। इत्तेफ़ाक़ से वह फ़रहाद भी शीरीं पर फ़िदा था। उसके इश्क़ के चर्चे फैल चुके थे। ख़ुसरो ने इस ख़याल से कि उससे पीछा छुड़ाए, यह काम उसे सौंपा और वादा किया कि अगर वह इस काम को पूरा कर सका तो शीरीं उसे सौंप दी जाएगी।

    ख़ुसरो को यक़ीन था कि फ़रहाद इस मुश्किल काम को अंजाम तक न पहुँचा सकेगा, मगर इश्क़ और महबूब से मिलने की उम्मीद ने फ़रहाद में हज़ारों संगतराशों की ताक़त पैदा कर दी। वह कमर बाँधकर इस काम में लग गया। बेसतून के पत्थर काटने के वक़्त फ़रहाद इश्क़ की धुन में जगह-जगह शीरीं की मूरतें तराशता जाता था। कई साल के बाद जब यह काम ख़त्म होने के क़रीब पहुँचा और वादा पूरा करने का वक़्त आया, तो ख़ुसरो ने एक मक्कार बुढ़िया को फ़रहाद के पास भेजा जो सिर के बाल बिखेरे हुए रोती-पीटती उसके पास पहुँची और उसने यह झूठी ख़बर सुनाई कि शीरीं का इंतिक़ाल हो गया। फ़रहाद को जो सदमा इस ख़बर से हुआ, वह अल्फ़ाज़ में बयान नहीं हो सकता। उसके हाथ में तेशा (पत्थर काटने का औज़ार) था, वही तेशा उसने अपने सिर पर दे मारा और हलाक हो गया।

    शीरीं और फ़रहाद का अफ़साना ईरान में बच्चे-बच्चे की ज़बान पर है। इस क़िस्से पर मसनवियाँ लिखी गईं। शायरों ने लैला और मजनूँ की तरह इन दो आशिक़ और माशूक़ के ज़िक्र को भी अपने अशआर में आशिक़ाना शायरी का मरकज़ बना लिया है। फ़रहाद का लक़ब कोहकन (पहाड़ काटने वाला) है। जू-ए-शीर वह नहर है जो फ़रहाद ने बेसतून से काटकर क़स्र-ए-शीरीं (शीरीं के महल) तक पहुँचाई। क़स्र-ए-शीरीं की जगह क़स्र-ए-ख़ुसरो का लफ़्ज़ भी लाया जाता है। बारबद इस बादशाह का ख़ास दरबारी बरबत-नवाज़ (बरबत बजाने वाला) था, जो मौसीक़ी (संगीत) के फ़न में कमाल रखता था। उसने तीस रागनियां ईजाद कीं, जो उसी लहन (धुन) के नाम से मशहूर हैं। तराना-ए-बारबद या तराना-ए-बारबदी से उसी बरबत-नवाज़ की तरफ़ इशारा किया जाता है। ख़ुसरो परवेज़ के तख़्त का नाम ताक़दीस था। यह तख़्त फ़रीदूँ से उसे विरासत में आया था। इसकी लंबाई 170 गज़ और चौड़ाई 120 गज़ थी। सिर से पाँव तक जवाहरात जड़े गए थे। इसकी छतरी में बारह राशियों और सात सितारों का नक़्शा इस तरह खींचा गया था कि आसमानी और ज्योतिषीय हालात उससे मालूम होते रहते थे।

    मानी और बहज़ाद दो नक़्क़ाशों (चित्रकारों) के नाम बार-बार शायरी में लाए जाते हैं। इनमें से पहला एक रूमी नक़्क़ाश था। उसने पैग़ंबरी का दावा किया था। मानवी फ़िरक़ा (संप्रदाय) उसी के नाम से जुड़ा है। उसने तस्वीरों का जो संग्रह तैयार किया था, उसको अरतंग या अरझंग कहते हैं। कुछ लोग कहते हैं कि अरझंग एक दूसरे चित्रकार का नाम था। बहज़ाद शाह इस्माईल सफ़वी के ज़माने का नक़्क़ाश है। मुरक़्क़ा-ए-मानी, नक़्श-ए-बहज़ाद के अल्फ़ाज़ इन्हीं दोनों नक़्क़ाशों की तरफ़ इशारा करते हैं।

    आग की पूजा करने वालों यानी ज़रदुश्तियों (पारसियों) के मज़हब से जो तल्मीहें ली गई हैं, वे नीचे दी गई हैं: अहरिमन और यज़दाँ दो ताक़तों का नाम है, जो दुनिया पर हुकूमत करती हैं। कभी यह ताक़त हावी होती है और कभी वह। इनमें से पहली ताक़त बुराई की है दूसरी ताक़त भलाई की। सदेह आग को कहते हैं। जमशेद ने सबसे पहले पत्थर से आग निकलती देखी तो इस ख़ुशी में एक जश्न की बुनियाद डाली। यह जश्न जश्न-ए-सदेह के नाम से मशहूर है। ज़रदुश्ती मज़हब वाले आग की पूजा करते हैं। आतिश-कदों (अग्नि-मंदिरों) में आग हर वक़्त रौशन रहती है, कभी बुझने नहीं पाती। आतिश-ए-फ़ारसी, इसी आग की तरफ़ इशारा है। आतिश-कदे की सेवा के लिए जो ख़ूबसूरत नौजवान तैनात किए गए थे वे मुग़ कहलाते थे और उनका अफ़सर पीर-ए-मुग़ाँ कहलाता था। यही नौजवान महफ़िलों में साक़ी का काम भी करते थे। कहते हैं कि आतिश-कदों में एक जानवर छिपकली की शक्ल का पैदा हो जाता है, जिसकी ज़िंदगी का दारोमदार आग खाने पर है। उसको सलमंदर कहते हैं। सलमंदर का ज़िक्र भी हमारी शायरी में बार-बार आता है। जब सूरज मेष राशि के पहले बिंदु पर पहुँचता है और फ़रवरदीन महीने का पहला दिन होता है, पारसी ख़ुशियाँ मनाते हैं। इस दिन को नौरोज़ कहते हैं।

    नख़्शब तुर्किस्तान का एक शहर है, जो समरक़ंद से तीन दिन के रास्ते पर है। यहाँ एक हकीम इब्न-ए-अता नामी ने जिसे इब्न-ए-मुक़न्ना भी कहते हैं, किसी अजीब तरीक़े से एक बनावटी चाँद बनाया था, जो नख़्शब के एक कुएँ से हर रोज़ शाम के वक़्त निकलता था और इतना ऊँचा जाता था कि उसकी रौशनी चारों तरफ़ बारह मील तक पहुँचती थी। दो महीने तक यह चाँद बराबर निकलता रहा। इस चाँद को माह-ए-नख़्शब और माह-ए-मुक़न्ना कहते हैं और उस कुएँ को जिसमें से वह चाँद निकलता था, चाह-ए-नख़्शब कहते हैं। एक और तल्मीह संग-ए-यदा है। तुर्किस्तान में एक पवित्र पत्थर था। जब बारिश रुक जाती थी, तुर्किस्तान के लोग जंगल में निकल जाते और इस पत्थर को हाथ पर रखकर बारिश की दुआ माँगते थे। इसकी बरकत से बारिश होने लगती थी। इस पत्थर को संग-ए-यदा कहते हैं।

    कमान-ए-रुस्तम जब हमारी शायरी में आता है, तो उससे मुराद इंद्रधनुष ली जाती है। लिसान-उल-ग़ैब हाफ़िज़ शीराज़ी का, बुलबुल-ए-आमुल तालिब आमुली का, बुलबुल-ए-शीराज़ सादी शीराज़ी का, हस्सान-ए-अजम और अख़लाक़-उल-मआफ़ी ख़ाक़ानी शिरवानी का और अंदलीब-ए-नेशापुरी नज़ीरी का लक़ब (उपाधि) है। शाख़-ए-नबात हाफ़िज़ शीराज़ी की महबूबा का नाम है। अयाज़ सुल्तान महमूद ग़ज़नवी का एक प्यारा ग़ुलाम था। हुस्न और इश्क़ के ज़िक्र में यह दोनों नाम भी लिए जाते हैं। सिकंदर ने ईरान को जीता था। शायरों ने उसकी जीतों को बड़ी शानो-शौकत से बयान किया। उसके अजीब-ओ-ग़रीब कारनामे लिखे गए। उसकी तारीफ़ के गीत यहाँ तक गाए गए कि लोगों ने उसको पैग़ंबर भी समझ लिया। आब-ए-हयात (अमृत) के चश्मे की तरफ़ उसके जाने का ज़िक्र ख़िज़्र की तल्मीह में किया गया है। सद्द-ए-सिकंदरी (सिकंदर की दीवार) का ज़िक्र ज़ुलक़रनैन की तल्मीह में किया गया है। एक और तल्मीह सिकंदर के बारे में यह है कि उसने हकीम बलीनास की हिदायत से इस्कंदरिया में एक विशाल मीनार बनवाया था, जो तीन सौ गज़ ऊँचा था। उस पर एक आईना लगाया था, जिसकी गोलाई इक्कीस गज़ की और व्यास सात गज़ का था। यह आईना दूरबीन का काम देता था। जब उसमें से देखते थे तो क़ुस्तुंतुनिया का सारा शहर आँखों के सामने नज़र आता था। आईना-ए-सिकंदर से इसी बात की तरफ़ इशारा किया जाता है।

    अदबी तल्मीहात (साहित्यिक तल्मीहों) के बाद अब हम नीचे आम तल्मीहात पर नज़र डालते हैं,

    आम तल्मीहात

    आम बोलचाल में जो तल्मीहात इस्तेमाल होती हैं, उनमें से कुछ इतिहास से ली गई हैं। कुछ हिंदुओं और मुसलमानों की आम मज़हबी मान्यताओं और अंधविश्वासों से ली गई हैं। कुछ इन दोनों क़ौमों की ख़ास-ख़ास रस्मों की तरफ़ इशारा करती हैं और कुछ की बुनियाद उन फ़र्ज़ी क़िस्सों पर है, जो आम तौर से मशहूर हैं। इनमें से कुछ तल्मीहें मुहावरों की शक्ल में हैं और कुछ कहावतों के रूप में। ऐसे मुहावरों को हम तल्मीही मुहावरे और ऐसी कहावतों को हम तल्मीही कहावतें कहते हैं। स्रोतों के लिहाज़ से ये तल्मीहें मिली-जुली हैं। हिंदू-मुसलमान इनमें बराबर के शरीक हैं। ऊपर दी गई चारों क़िस्म की तल्मीहात की मिसालें हम पेश करना चाहते हैं, जो नीचे दी गई हैं,

    (प्रथम) वो तल्मीहें जो इतिहास से ली गई हैं

    'ढाई दिन की बादशाहत' या 'अढ़ाई दिन की बादशाहत' से थोड़े दिनों की हुकूमत या अस्थायी हुकूमत मुराद है। हिंदुस्तान के इतिहास का अध्ययन करने वाले इस घटना से वाक़िफ़ हैं कि जब हुमायूँ शेरशाह से हारकर नदी में कूद पड़ा, तो निज़ाम सक्का ने उसको डूबते-डूबते बचाया था और इसके इनाम में उसने हुमायूँ बादशाह से ढाई दिन की हुकूमत माँगी थी। निज़ाम ने हुकूमत के इस छोटे से दौर में चमड़े का गोल रुपया सोने की कील जड़ कर चलाया था। इस घटना से एक दूसरी तल्मीह पैदा हुई है: 'चाम के दाम चलाना'। इस मुहावरे से जूते के ज़ोर से हुकूमत करना और ज़बरदस्ती काम लेना मुराद है। 'औरंगज़ेबी' चिकित्सा से जुड़ी एक तल्मीह है। यह एक सौदावी माद्दे (काले पित्त) का फोड़ा है, जो अक्सर कई साल तक हरा (ताज़ा) रहता है और ठीक होने में नहीं आता। जब औरंगज़ेब आलमगीर ने गोलकुंडा की घेराबंदी की और घेराबंदी लंबी खिंच गई, तो आब-ओ-हवा की ख़राबी से अक्सर लश्कर वालों के फोड़े निकल आए और इलाज के बावजूद वो मुद्दत तक हरे रहे, इसी फोड़े को 'औरंगज़ेबी' कहते हैं।

    मुग़ल सल्तनत के ज़माने में बादशाहों के जुलूस के साथ बाईस ज़िलों की फ़ौज रहती थी। यह फ़ौज 'बाईसी' कहलाती थी। 'बाईसी टूटना' मुहावरा इसी से निकाला गया है, जिससे मुराद है सारी फ़ौज से हमला करना या पूरी ताक़त लगा देना। 'टोपी वाले' वो क़िज़िलबाश सिपाही कहलाते हैं जो पहले नादिरशाह के साथ, फिर अहमद शाह अब्दाली के साथ आए थे। तुर्की ज़बान में 'क़िज़िल' के मानी लाल और 'बाश' के मानी हैं सिर। ये सिपाही सिरों पर लाल-लाल टोपियाँ रखते थे, इसी वजह से क़िज़िलबाश कहलाते थे। दिल्ली वालों ने इनका नाम 'टोपी वाले' रखा। एक ज़माने में दिल्ली में अफ़ग़ान बादशाहों की हुकूमत थी। उस ज़माने की यादगार पठानों की वो छोटी-छोटी मस्जिदें हैं, जो पास-पास बनाई गई हैं। पठान अपने तेज़ मिज़ाज के कारण किसी का एहसान अपने सिर लेना और किसी ग़ैर की बनाई हुई मस्जिद में नमाज़ पढ़ना गवारा नहीं करते थे। 'डेढ़ ईंट की मस्जिद बनाना' एक तल्मीही मुहावरा है, जो इस घटना की याद दिलाता है।

    'राधा को याद करो' एक मुहावरा है, जिसके मानी हैं जाओ अपना काम करो। श्री कृष्ण की एक प्रेमिका का नाम राधा और एक का नाम कुब्जा था। कुब्जा बेतकल्लुफ़ी और शोख़ी से यह बात ज़बान पर लाया करती थी। काले-कलूटे आदमियों को मुहावरे में 'रावण की सेना' कहते हैं। रावण जो लंका का राजा था और जो रामचंद्र जी के साथ युद्ध में उतरा, उसकी फ़ौज के लोग काले रंग के थे, उनकी वर्दियाँ काले रंग की थीं। इसी वजह से रामलीला में, जो इस घटना की नक़ल है, रावण की फ़ौज के सिपाहियों को काला लिबास पहनाया जाता है। 'रुस्तम' मुहावरे में बहादुर के अर्थ में बोला जाता है, जैसे 'बस एक तुम ही तो रुस्तम हो'। 'यहाँ तुम्हारी रुस्तमी क्यों न चली', 'रुस्तम का बच्चा ख़ाँ' और 'रुस्तम का साला' वग़ैरह अल्फ़ाज़ भी बोले जाते हैं। 'छुपा रुस्तम' एक और मुहावरा है, जिसके दो मानी लिए जाते हैं। एक तो वो शरारती आदमी जो ज़ाहिर में सीधा-सादा नज़र आता हो। दूसरे वो शख़्स जो अपने फ़न में माहिर हो और वक़्त पड़ने पर उसका हुनर ज़ाहिर हो।

    अफ़लातून (प्लेटो) जो यूनान का मशहूर विद्वान है, कुश्ती के फ़न में माहिर था। इस बिना पर जहाँ ताक़तवर और ज़बरदस्त के अर्थ में 'रुस्तम' का लफ़्ज़ बोला जाता है, वहीं 'अफ़लातून' और 'अफ़लातून का बच्चा' वग़ैरह अल्फ़ाज़ भी प्रचलित हैं। 'सिक्खा शाही' के लफ़्ज़ से बेइंसाफ़ी और अराजकता का ज़माना मुराद लेते हैं। यह तल्मीह सिखों के हुकूमत के दौर की याद दिलाती है। इसी तरह 'नादिरशाही' या 'नादिर गर्दी' से बदइंतज़ामी और अफ़रा-तफ़री का ज़माना मुराद लेते हैं। ये अल्फ़ाज़ नादिरशाह के ज़माने में इस मुल्क की हालत का पता देते हैं। 'ताना शाही मिज़ाज' का लफ़्ज़ उस नाज़ुक मिज़ाजी की तरफ़ इशारा करता है जो गोलकुंडा के शासक अबुल हसन ताना शाह में थी। 'तख़्त-ए-ताऊस' शाहजहाँ के तख़्त की तल्मीह है, जिस पर छह करोड़ रुपया ख़र्च हुआ था और जो जवाहरात से जड़ा हुआ था और जिसके ऊपर एक मोर पंख फैलाए खड़ा था।

    अख़फ़श एक मशहूर व्याकरण का विद्वान था। उसने एक बकरी पाल रखी थी। अरबी क्रियाओं की गर्दानें (रूप) उस बकरी के सामने दोहराया करता था। अगर वो बकरी सिर हिला देती, तो समझता था कि सबक़ याद हो गया, वरना फिर उस सबक़ को रटना शुरू कर देता था। जिस वक़्त उस बकरी को काटा गया, तो मालूम हुआ कि उसके सिर में भेजा ही नहीं है। इसी वजह से ऐसे आदमी को जो बिना समझे गर्दन हिला दे, 'बुज़-ए-अख़फ़श' (अख़फ़श की बकरी) कहते हैं। 'लख बख़्श' या 'लख दाता' उस शख़्स को कहते हैं, जो बहुत बड़े दर्जे का दानी हो। यह असल में क़ुतुबुद्दीन ऐबक का लक़ब (उपाधि) है, जो शहाबुद्दीन का ग़ुलाम था और उसके मरने पर ख़ुद बादशाह हो गया था। उसकी दानशीलता की दास्तानें आज तक लोगों की ज़बान पर हैं। हिंदू आज तक उसे पूजते हैं। उनमें से अक्सर जगह-जगह थान बनाकर उसकी पूजा कराते हैं।

    'हलाकू' ज़ालिम और क्रूर आदमी को कहते हैं। यह तल्मीह हलाकू ख़ाँ की तरफ़ इशारा करती है, जो चंगेज़ ख़ाँ का पोता था और उसी ने बग़दाद को तहस-नहस किया था। 'तूरह वाली' घमंडी औरत को कहते हैं। 'तूरह जताना' शेखी बघारना है। 'शरअ-ओ-तूरह' भी मुहावरा है, जिससे दीनदारी का इज़हार और बात-बात में मज़हबी रोक-टोक मुराद है। 'तूरह' असल में चंगेज़ ख़ाँ के क़ानूनों के संग्रह का नाम था, जिसमें हर क़ानून के उल्लंघन पर सख़्त सज़ाएँ मुक़र्रर की गई थीं। ये सब मुहावरे इसी लफ़्ज़ 'तूरह' से लिए गए हैं।

    'घर का भेदी लंका ढाए', यह एक तल्मीही कहावत है। रावण के भाई विभीषण ने राजा रामचंद्र से मिलकर उनको लंका के क़िले के बहुत से भेद बताए थे और उसे फ़तह करने में मदद दी थी। अब इस कहावत का मतलब यह है कि राज़दार की दुश्मनी बड़ा नुक़सान पहुँचाती है।

    (दूसरा) वो तल्मीहें जो आम अक़ीदों और वहमों से ली गई हैं

    जब कोई शख़्स सफ़र पर निकलता है तो मुसाफ़िर के बाज़ू पर रुपया वग़ैरह बाँध दिया जाता है, जब वह ख़ैर-ओ-आफ़ियत से अपनी मंज़िल पर पहुँच जाता है तो वह रक़म सैयदों को बाँट दी जाती है। इसको 'इमाम ज़ामिन का रुपया' कहते हैं। यहाँ इमाम से आठवें इमाम हज़रत अली रज़ा मुराद हैं। आम लोगों का अक़ीदा (मान्यता) है कि अगर आपके नाम का रुपया मुसाफ़िर के बाज़ू पर बाँध दिया जाए तो आप उसकी सलामती के ज़ामिन (रक्षक) हो जाते हैं। 'इंदर का अखाड़ा' उस जगह को कहते हैं, जहाँ नाचने-गाने वाली हसीन औरतें जमा हों। हिंदू राजा इंदर को स्वर्गपति यानी स्वर्ग का मालिक मानते हैं, जिसके सामने हूरें (अप्सराएँ) गाती और नाचती रहती हैं। यह मुहावरा इसी ख़याल पर आधारित है। 'बिजली की तलवार' उस तलवार को कहते हैं जो बहुत काट करने वाली हो। अवाम का ख़याल है कि कुछ जगहों पर बिजली अक्सर गिरा करती है। वहाँ के लोहार बहुत सा लोहा जमा करके मैदान में रख देते हैं ताकि उस पर बिजली गिरे, और वह आबदार (तेज़ धार वाला) हो जाए। कहते हैं कि जो तलवार इस लोहे से बनाई जाती है, उसका मुक़ाबला आबदारी (चमक और धार) और काट में कोई तलवार नहीं कर सकती।

    आम लोगों का ख़याल है कि जिस रास्ते से बिल्ली निकले, अगर कोई इंसान बिल्ली के निकल जाने के बाद उस रास्ते से गुज़रे, तो उसका लड़ाई-झगड़ा ज़रूर होता है। इसी वजह से 'बिल्ली उलांघना' एक मुहावरा हो गया है, जिसके मानी हैं लड़ने-झगड़ने को आना। जो इंसान आते ही टेढ़ी-तिरछी बातें करने लगे, उसके बारे में कहते हैं कि तुम बिल्ली उलांघ कर तो नहीं आए। भैरों हिंदुओं के नज़दीक शिवजी का एक नाम है और यह उस वक़्त के लिए है, जब वह ग़ुस्से में हों। हिंदुओं का अक़ीदा (मान्यता) है कि उनकी नाराज़गी से तबाही और बर्बादी आती है। इसी अक़ीदे से 'भैरों नाचना' एक मुहावरा बनाया गया है, जिसके मानी हैं वीरानी छा जाना।

    अनपढ़ मुसलमान औरतें बहुत से पीरों, वलियों और परियों के नाम लेती हैं और उनको मानती हैं। मसलन: लाल परी, सब्ज़ परी, ज़र्द परी, सियाह परी, आसमान परी, दरिया परी, नूर परी, ज़ैन ख़ान, सद्र जहान, नन्हे मियां, शाह दरिया, शाह सिकंदर, शेख़ सद्दू, मामूं अल्लाह बख़्श, सैयद बरहना, पीर हटीले, शाह मदार, पीर ग़ैब, चालीस तन या चहिल अब्दाल जिनके दम-क़दम से यह दुनिया क़ायम है। औरतें इन परियों या इन बुज़ुर्गों की रूहों में से किसी रूह को अपने सर पर बुलाती हैं। जो औरत यह काम करती है, वह जुमेरात (गुरुवार) के दिन ख़ुशबू, ज़ेवर और उम्दा कपड़ों से सजकर बैठ जाती है और गाना सुनती है। जब कोई परी या रूह उसके सर पर आती है, तो वह अपना सर हिलाने लगती है। दूसरी औरतें अपनी-अपनी ज़रूरतें उसके सामने पेश करती हैं और वह हर एक के सवाल का जवाब देती जाती है। इस तरीक़े से रूहों को बुलाने को 'बैठक देना' या 'हाज़िरात करना' कहते हैं। इस तल्मीह (हवाले) में औरतों के इस ख़ास अक़ीदे की तरफ़ इशारा है जिसका ज़िक्र किया गया है।

    निचले दर्जे के हिंदू भी इसी तरह किसी देवी-देवता, या बीर को अपने सर पर बुलाते हैं। उनमें जो मर्द इस काम को अंजाम देता है, उसको भगत कहते हैं और औरत को भगतानी। बीर उस जिन्न या बुरी रूह को कहते हैं जिसको जादूगर किसी को नुक़सान पहुंचाने के लिए उस पर हावी करते हैं। मुसलमान इस रूह को मुवक्किल कहते हैं। इससे 'बीर बिठाना' और 'बीर दौड़ाना' मुहावरे पैदा हुए हैं। उड़न खटोला और विमान (बवान या बमान) के लफ़्ज़ हिंदुओं के इस अक़ीदे की तरफ़ इशारा करते हैं कि देवता एक उड़ते हुए तख़्त (तख़्त-ए-रवां) पर सवार होकर एक जगह से दूसरी जगह पहुंचते थे। इस तख़्त को हवा उड़ाकर ले जाया करती थी। पाताल हिंदी में ज़मीन के सबसे निचले हिस्से को कहते हैं। हिंदुओं ने पाताल के सात तबक़े (लोक) माने हैं। हर तबक़े में एक ज़िंदा मख़लूक़ (प्राणी) आबाद है। 'पाताल तक की ख़बर लाना' इसी तल्मीह से एक मुहावरा बनाया गया है। पारस एक ख़याली पत्थर का नाम है, जिसके बारे में आम लोगों में यह ख़याल फैला हुआ है कि अगर यह पत्थर लोहे से छुआ जाए तो उसे सोना बना देता है।

    'पिछलपाई' का लफ़्ज़, जिससे भूतनी या चुड़ैल मुराद है, अवाम के इस ख़याल को याद दिलाता है कि चुड़ैलों या भूतनियों के पैरों में पंजा पीछे की तरफ़ और एड़ी आगे की तरफ़ होती है। परी एक ख़याली हसीन मख़लूक़ है जिसका सारा जिस्म औरतों जैसा होता है मगर बाज़ुओं पर पर (पंख) होते हैं। परिस्तान उस जगह का नाम रखा गया है जहां परियां आबाद हैं। परी मादा और देव या परीज़ाद नर होते हैं। 'परिस्तान' या 'परियों का अखाड़ा' मुहावरे में उस महफ़िल को कहते हैं, जहां बहुत से ख़ूबसूरत लोग जमा हों। बीर की तरह 'पवन' भी उन बुरी रूहों को कहते हैं जिन्हें जादूगर किसी इंसान को नुक़सान पहुंचाने के लिए भेजते हैं। 'पवन बिठाना' और 'पवन दौड़ाना' या 'चलाना' वे मुहावरे हैं, जो इस लफ़्ज़ से बनाए गए हैं। भूत वे रूहें हैं जो जिस्मों से जुदा होकर दुनिया में भटकती फिरती हैं। मर्द की रूह भूत और औरत की भूतनी कहलाती है। भूत लोगों के सरों पर आते हैं, यह आम ख़याल है। 'भूत चढ़ना' के साथ 'भूत उतारना' भी मुहावरे में आ गया है, क्योंकि आम ख़याल यह भी है कि मंतर के ज़ोर से भूत किसी के सर से उतारा भी जा सकता है।

    मुसलमानों के नज़दीक सात समंदर से मुराद बहीरा-ए-शाम, बहीरा-ए-क़ुल्ज़ुम, बहीरा-ए-अरब, बहीरा-ए-ओमान, बहीरा-ए-फ़ारस, और बहीरा-ए-अस्वद हैं। मगर हिंदुओं के सात समंदरों में से एक समंदर नमक का है, दूसरा दूध का, तीसरा घी का, चौथा दही का, पांचवां शराब का, छठा गन्ने के रस का, सातवां शहद का है। सिफ़ली अमल (काला जादू) जादू की वह क़िस्म है, जो शैतानों और जिन्नों की मदद से किया जाता है। इसके बरख़िलाफ़ उलवी अमल वह है, जिसमें सितारों और फ़रिश्तों से मदद मांगी जाती है। जादू के बारे में आम लोगों का जो अक़ीदा है, उसको ये दोनों लफ़्ज़ ज़ाहिर करते हैं। ख़ुदा के नाम (अस्मा) दो क़िस्म के माने जाते हैं। एक जलाली, जिनसे ग़ुस्सा और जलाल (तेज़) ज़ाहिर होता है। दूसरे जमाली, जिनसे रहम और करम ज़ाहिर होता है। जब ख़ुदा का कोई जलाली नाम नंगी तलवार की पीठ पर पढ़कर फूंकते हैं तो उसका मक़सद यह होता है कि दुश्मन हलाक हो (मारा जाए)। इस अमल को सिफ़ली कहते हैं। अगर इस नाम के पढ़ने में लापरवाही हो तो कहते हैं कि यह अमल उल्टा करने वाले (आमिल) के लिए तबाही का सबब बन जाता है। इस हालत को 'सिफ़ली का उलट जाना' कहते हैं।

    'सांप की मणि' अवाम के इस ख़याल को ज़ाहिर करती है कि जब सांप ख़ुश होता है तो वह एक चमकता हुआ पत्थर (जवाहर) मुंह से बाहर निकालकर जंगल में रख देता है। इसकी रौशनी चौदहवीं रात के चांद की तरह होती है। सांप इस रौशनी में कोसों सैर करता फिरता है। कहते हैं कि जिस किसी के पास सांप की मणि हो, वह तमाम आफ़तों से महफ़ूज़ रहता है। न आग उसे जला सकती है, न पानी उसे डुबो सकता है। 'शब-चराग़' भी एक ऐसा ही लफ़्ज़ है। कहते हैं कि यह एक जवाहर (रत्न) है। दरियाई गाय रात के वक़्त चरने निकलती है, तो इस जवाहर को मुंह से निकाल कर रख देती है और इसकी रौशनी में चरती फिरती है। चर चुकने के बाद उसको अपने मुंह में रखकर दरिया में ग़ोता लगा जाती है। शब-ए-बरात में लफ़्ज़ 'बरात' के मानी रोज़ी के हैं। इस लफ़्ज़ से यह ख़याल ज़ाहिर होता है कि इस रात को यानी शाबान की चौदहवीं या पंद्रहवीं रात को फ़रिश्ते इंसानों की रोज़ी और उम्र का हिसाब आइंदा (भविष्य) के लिए लगाते हैं और रोज़ी बांटते हैं।

    सतयुग हिंदुओं के नज़दीक दुनिया का पहला दौर है, जिसमें सच और सच्चाई के सिवा दूसरी बात का नाम न था। इस दौर की मुद्दत सत्रह लाख अट्ठाईस हज़ार बरस मानी गई है। इसके मुक़ाबले एक दौर कलियुग कहलाता है। यह दौर चार लाख बत्तीस हज़ार बरस का ठहराया गया है। इस ज़माने में पाप और झूठ के सिवा कुछ नहीं होगा। त्रेता युग और द्वापर युग भी हैं, मगर आम लोगों में मशहूर यही युग हैं। लक्ष्मी हिंदुओं के अक़ीदे में दौलत की देवी है। 'लक्ष्मी घर में आना' एक मुहावरा है, जिसके मानी हैं ख़ुशक़िस्मत होना। 'लंका में जो छोटा सो बावन ही गज़ का', या 'लंका से जो निकला सो बावन गज़ का', यह एक तल्मीही कहावत है, जो इस मौक़े पर बोली जाती है जहां छोटे-बड़े सब शरारती और फ़ित्ना फैलाने वाले हों। हिंदुओं का अक़ीदा है कि लंका द्वीप में देव (राक्षस) रहते थे, जो बहुत बड़े-बड़े क़द के होते थे, यहां तक कि उनके बच्चे भी बावन गज़ से कम क़द के नहीं होते थे और उनका मिज़ाज बहुत सरकश और शरारती होता था।

    'मीर भिजड़ी की कढ़ाई', एक तल्मीह है, जो हिजड़ों से ली गई है। मीर भिजड़ी जिसे मीर भोजी भी कहते हैं, हिजड़ों के सिलसिले का बानी (संस्थापक) था। हिजड़े उसकी नियाज़ (मन्नत) दिलवाते हैं। उनका यक़ीन है कि अगर कोई इस नियाज़ की कढ़ाई का हलवा खा ले तो वह नाचने-थिरकने और हिजड़ों जैसी हरकतें करने लगता है और जब तक हिजड़ा न बन जाए उसे चैन नहीं पड़ता।

    योहा या योही आम लोगों के ख़्याल में एक क़िस्म का साँप है। कहते हैं कि एक हज़ार बरस गुज़रने पर वह एक आवाज़ निकालता है और ख़ामोश हो जाता है। फिर हज़ार बरस के बाद एक दफ़ा चिल्लाता है और चुप हो जाता है। तीसरी दफ़ा यानी तीन हज़ार बरस के बाद उसे यह ताक़त हासिल हो जाती है कि जिस शक्ल और जिसका रूप चाहे, बन जाए यानी इंसान या जानवर बनने की ताक़त उसे हासिल हो जाती है। आम लोगों का मानना है कि हर इंसान के साथ एक जिन्न पैदा होता है जो हमेशा उसके साथ रहता है। इसको हमज़ाद कहते हैं। अगर हम चाहें तो ख़ास तरीक़े के ज़रिए से उसको क़ाबू में ला सकते हैं और अपनी मर्ज़ी के मुताबिक़ उससे काम ले सकते हैं।

    हिंदुओं के ख़्याल में एक फ़र्ज़ी वजूद है जो दिखाई नहीं देता और दुनिया के चारों तरफ़ घूमता रहता है। कभी किसी तरफ़ होता है कभी किसी तरफ़। मसलन शनिवार के दिन वह पूरब में होता है, गुरुवार के दिन दक्खिन में, मंगल के दिन उत्तर में, इतवार के दिन पश्चिम में... और इसी तरह आगे भी। इस फ़र्ज़ी वजूद का नाम हिंदुओं ने दिशाशूल रखा है। वे कहते हैं कि जिस रोज़ वह जिस दिशा में हो, उस रोज़ उस दिशा में सफ़र करना नुक़सान और तकलीफ़ का कारण होता है। सफ़र करने वाले पर ज़रूरी है कि दिशाशूल को बाईं तरफ़ या अपनी पीठ की तरफ़ रखे। इसका सामने पड़ना या दाएँ हाथ पर होना, बेहद मनहूस ख़्याल किया जाता है।

    अलोप अंजन एक क़िस्म का सुरमा है, जिसके लगाने से आदमी ख़ुद तो सबको देखता है मगर उसे कोई नहीं देख सकता। इसे सुरमा-ए-सुलेमान भी कहते हैं। गंगा पारा की एक जादुई गोली है, जिसे जोगी तैयार करते हैं। कहते हैं कि इस गोली को मुँह में रखने से उड़ने की ताक़त आ जाती है और इसकी मदद से जोगी जहाँ चाहते हैं, उड़ कर चले जाते हैं।

    तीसरी, वे तल्मीहें जो ख़ास रस्मों की तरफ़ इशारा करती हैं

    मुसलमान औरतों में रिवाज़ है कि निकाह के बाद वे दूल्हा-दुल्हन को आमने-सामने सिर से सिर मिलाकर और एक लाल दुपट्टा ओढ़ाकर बिठा देती हैं और उन दोनों के बीच में एक आईना और क़ुरआन शरीफ़ में से सूरह इख़्लास निकालकर रख देती हैं। इस रस्म को आरसी मुसहफ़ कहते हैं। आरसी से मुराद आईना है। आईना रखने से मतलब यह है कि दूल्हा-दुल्हन एक-दूसरे का चेहरा देख लें। सूरह इख़्लास से मक़सद यह है कि मियाँ-बीवी में हमेशा प्यार और मेल-जोल बना रहे। देव उठान हिंदुओं की एक रस्म है, जो कातिक सुदी, एकादशी को मनाई जाती है। हिंदुओं की मान्यता के अनुसार विष्णु चार महीने से इस तारीख़ तक सोते रहते हैं। हिंदू इस तारीख़ को एक तय जगह लीप-पोत कर खड़िया और गेरू से उस पर बेल-बूटे बनाते हैं और वहाँ पूजा की चीज़ें रखकर उनको एक थाली से ढक देते हैं। घर की कोई औरत या कोई ब्राह्मणी हाथों से उस थाली को बजाती जाती है और यह कहकर, 'देव उठो', विष्णु की तारीफ़ के गीत गाती जाती है।

    स्वयंवर हिंदुओं की एक पुरानी रस्म का नाम है। जब राजाओं या ऊँचे घराने के लोगों में किसी लड़की के लिए वर चाहिए होता था, तो तमाम राजाओं या अमीरों को पहले ख़बर दी जाती थी। तय तारीख़ पर सब जमा हो जाते थे। लड़की भरे जलसे में आकर शहज़ादों और अमीरज़ादों के करतब देखती थी और उनमें से जिसको अपना शौहर बनाना पसंद करती थी, उसके गले में अपने हाथ से फूलों का हार डाल देती थी। मूँछों का कूँडा मुसलमान औरतों की एक रस्म की तल्मीह है। जब किसी लड़के की मसें भीगती हैं (मूँछें आती हैं) तो इस ख़ुशी में उसकी माँ हज़रत ख़ातून-ए-जन्नत की नियाज़ दिलवाती है और इसमें रिश्तेदार जमा किए जाते हैं।

    आमीन एक रस्म है, जो क़ुरआन शरीफ़ के ख़त्म होने या उसका कोई हिस्सा पूरा होने पर अदा की जाती है। लड़का जिस मदरसे में क़ुरआन की तालीम पाता है, उसके तमाम शागिर्द और उस्ताद उस लड़के के मकान पर पहुँच कर एक ख़ास नज़्म ज़ोर से पढ़ते हैं। एक लड़का पढ़ता है, बाक़ी सब लड़के हर शेर पर पुकार कर आमीन कहते जाते हैं। नज़्म पढ़ने के बाद दुआ माँगी जाती है। मिठाई बाँटी जाती है और उस्ताद को लड़के के माँ-बाप अपनी हैसियत के मुताबिक़ भेंट देते हैं। रतजगा एक और रस्म है जो ब्याह, सालगिरह, बिस्मिल्लाह या किसी और समारोह पर मनाई जाती है। इस मौक़े पर औरतें जमा होती हैं और रात भर जागती हैं। रात को कड़ाही होकर, दिन को गुलगुलों और रहम पर अव्वल अल्लाह मियाँ की सलामती पढ़ी जाती है, फिर ज़र्दे या उबले हुए चावलों पर हज़रत फ़ातिमा की नियाज़ दिलवाई जाती है। मुसलमान औरतों में शादी के वक़्त की एक ख़ास रस्म है, जिसे नौबातें हैवाना कहते हैं। नौबात नबात से बिगड़ा है जिसके मानी हैं मिस्री की नौ डलियाँ दुल्हन के दोनों कंधों, कोहनियों, घुटनों, पीठ और हाथों पर रखी जाती हैं। दूल्हे से कहा जाता है कि इन डलियों को एक-एक करके मुँह से उठाओ और हाथ न लगाओ। यह हक़ीक़त में एक टोटका है, जिससे मक़सद यह है कि दूल्हा हमेशा दुल्हन का आज्ञाकारी रहे। तारे दिखाना एक और रस्म है जो प्रसव के दिनों में अदा की जाती है। जच्चा को रात के वक़्त छठी के रोज़ दालान से बाहर लाकर तारे दिखाती हैं। दो औरतों के हाथ में तलवारें होती हैं और वे उसके साथ रक्षक बनकर आती हैं। जच्चा बच्चे को गोद में और क़ुरआन शरीफ़ को सिर पर रखकर आसमान की तरफ़ देखती है और सात तारे गिनती है। औरतों का ख़्याल है कि ऐसा करने से जच्चा को जिन्न व परी का डर नहीं रहता।

    बीवी की सहनक एक और रस्म है। अक्सर शादी या किसी मुराद के पूरी होने पर औरतें हज़रत फ़ातिमा की नियाज़ दिलवाती हैं। इसमें बड़ी एहतियात की जाती है। सुहागन और नेक औरतें शामिल होती हैं। अगर कोई औरत दो शौहर कर चुकी हो तो उसको शामिल नहीं करतीं बल्कि सैदानियों को इस नियाज़ का खिलाना बेहतर समझती हैं। जहाँगीर के ज़माने से यह रस्म जारी हुई है। फूल होना एक और रस्म है, जो मरने के तीसरे दिन अदा की जाती है। हिंदुओं में दस्तूर है कि मरने के तीसरे दिन मुर्दे की हड्डियाँ, जिन्हें वे फूल कहते हैं, चुनी जाती हैं और गंगा नदी में बहाई जाती हैं। मुसलमानों में भी तीसरे दिन मुर्दे की फ़ातिहा होती है। चनों के दानों पर कलमा पढ़ा जाता है ताकि मुर्दे की रूह को सवाब पहुँचाया जाए। फ़ातिहा के वक़्त कुछ अरगजा (ख़ुशबूदार लेप) और कुछ फूल लाए जाते हैं। सूरह फ़ातिहा पढ़कर मजलिस में मौजूद हर शख़्स अरगजे के प्याले में फूल डालता है और ये फूल और ख़ुशबू मुर्दे की क़ब्र पर भेजी जाती है। इनके अलावा और भी रस्में हैं। मसलन बिस्मिल्लाह, छठी, चौथी, मँगनी, सतवाँसा, महँदी, बरी या साचक, चालीसवाँ वग़ैरह।

    चौथी, वे तल्मीहें जिनकी बुनियाद फ़र्ज़ी क़िस्सों पर है

    ग़तरबूद करना एक मुहावरा है, जिसे आम आदमी बोलते हैं। इसके मानी हैं मतलब बिगाड़ देना। इसका क़िस्सा इस तरह बयान करते हैं कि एक बेवक़ूफ़ आदमी बोस्ताँ पढ़ता था। जब सादी के इस शेर पर पहुँचा,

    कि सादी कि गोए बलाग़त रुबूद

    दर अय्याम-ए-बू बक्र बिन साद बूद

    तो उसने उस्ताद से पूछा कि 'ग़तरबूद' के क्या मायने हैं। 'बलाग़त' में से उसने 'बला' को जुदा करके दूसरे लफ़्ज़ 'रबूद' से मिला दिया और 'ग़तरबूद' को एक लफ़्ज़ समझा। 'टेढ़ी खीर' के मायने हैं मुश्किल काम। कहते हैं कि एक अंधे से किसी शख़्स ने पूछा, हाफ़िज़ जी खीर खाओगे? उसने कहा खीर कैसी होती है। उसने कहा सफ़ेद, पूछा सफ़ेद कैसी, कहा जैसे बगुला। उसने पूछा, बगुला कैसा होता है। उसने हाथ टेढ़ा करके दिखाया कि ऐसा। अंधे ने उसके हाथ को अपने हाथ से टटोल कर कहा, यह तो बड़ी टेढ़ी खीर है। हमसे नहीं खाई जाएगी। 'चोर की दाढ़ी में तिनका', यह एक तल्मीही कहावत है। कहते हैं कि एक शख़्स ने किसी ज़मींदार के यहाँ भैंस की चोरी की थी। क़ाज़ी ने शक के घेरे में आने वाले तमाम आदमियों को, जिनमें चोर भी था, सामने खड़ा कर दिया, फिर अपने एक सिपाही से कहा, मैं जिसकी तरफ़ इशारा करूँ, तुम उसे गिरफ़्तार कर लेना। फिर उसने कहा देख चोर की दाढ़ी में तिनका है। चोर के दिल में डर तो था ही, उसने फ़ौरन अपनी दाढ़ी पर हाथ डाला और इस हरकत से वह पहचाना गया और पकड़ा गया।

    'नींबू निचोड़', बिन बुलाए मेहमान को कहते हैं। एक सराय में एक मुफ़्तख़ोर ठहरा हुआ था। उसका यह दस्तूर (नियम) था कि जब कोई मुसाफ़िर खाना खाने बैठता, तो एक नींबू लेकर दस्तरख़्वान पर पहुँच जाता। मुसाफ़िर के आगे सालन देखकर कहता कि हज़रत नींबू इसका बनाव है। इसको निचोड़ कर मज़ा देखिए। वह बेचारा लिहाज़ में आकर उसको भी खाने में शरीक कर लेता। 'तुफ़ैली' का लफ़्ज़ भी इसी तरह पैदा हुआ है। तुफ़ैल कूफ़ा का एक शायर था। उसकी आदत थी कि जब लोगों को किसी दावत में जाते देखता तो यह भी उनके साथ हो लेता था और बिना किसी संकोच के दावत में शरीक हो जाता था। 'नाव में ख़ाक उड़ाना' एक मुहावरा है, जिसके मायने हैं झूठा इल्ज़ाम लगाना। कहते हैं कि एक शेर और बकरी दोनों कश्ती में सवार थे। शेर ने उसको खाने की नीयत से कहा कि तू कश्ती में क्यों ख़ाक (धूल) उड़ाती है। उसने कहा जनाब यहाँ ख़ाक कहाँ है जिसे मैं उड़ा दूँ। शेर ने ग़ुस्से में आकर कहा तू हमारी बात को झुठलाती है। देख तो मैं तेरी गुस्ताख़ी का क्या मज़ा चखाता हूँ। यह कहकर हमला किया, और फाड़-चीर कर उसे खा गया।

    'नेकी कर और दरिया में डाल'। इस कहावत का मतलब यह है कि खुलकर नेकी कर। इस बात की परवाह न कर कि इसका इनाम भी कुछ मिलेगा, या नहीं। हातिम ताई के क़िस्से में लिखा है कि एक शख़्स दरिया में हर रोज़ रोटियाँ डाला करता था। ख़ुदा ने उसकी मेहनत भी ज़ाया नहीं की। इसका तफ़्सीली क़िस्सा हातिम ताई के क़िस्से में देखना चाहिए। 'ऊदबिलाव की ढेरी' उस झगड़े को कहते हैं, जिसका कभी फ़ैसला न हो। कहते हैं कि जब कई ऊदबिलाव मिलकर मछलियाँ मारते फिरते हैं, तो दरिया के किनारे ढेर लगाते जाते हैं। फिर हर एक का हिस्सा अलग-अलग लगाते हैं। मगर कोई न कोई ऊदबिलाव अपने हिस्से को कम समझ कर सारे हिस्सों को गडमड कर देता है। फिर नए सिरे से हिस्से लगाए जाते हैं और इस बँटवारे का अंजाम भी यही होता है। ग़रज़ कि उनमें बराबर झगड़ा होता रहता है और किसी तरह फ़ैसला होने में नहीं आता।

    'नमाज़ी का टका' उस बुरी बात को कहते हैं, जिसका बदला कहीं न कहीं ज़रूर मिलकर रहे। कहते हैं कि एक शरारती लड़का नमाज़ पढ़ने में लोगों की टाँगें घसीट लिया करता था। एक दफ़ा जब सज्दा करते वक़्त उसने किसी नमाज़ी की टाँग घसीटी, तो उसने डाँटने के बजाय सलाम फेर कर चुपके से एक टका उसके हवाले किया, ताकि इसे चस्का पड़ जाए, तो वह कहीं न कहीं इसकी सज़ा पाए। उसे तो टके की चाट लग ही गई थी, इत्तेफ़ाक़ से एक जल्लाद पठान के साथ भी उसने यही हरकत की। उसने सलाम फेरते ही तलवार म्यान से निकाली और उस शरारती लड़के की गर्दन उड़ा दी।

    'आँखों की सुइयाँ रह गई हैं'। इस फ़िक़रे का मतलब यह है कि बहुत सा काम हो चुका है, थोड़ा सा बाक़ी रह गया है। कहते हैं एक सौदागर के बेटे की दोस्ती किसी जादूगरनी से थी। वह उसकी बीवी के नाम से जला करती थी। एक रोज़ उसने जादू की एक पुड़िया बजाय इसके कि उसकी नेक बीवी को कुछ नुक़सान पहुँचाए, ख़ुद सौदागर के बेटे के बदन पर जा पड़ी। उसका पड़ना था कि उसके सारे तन-बदन में सुइयाँ ही सुइयाँ चुभ गईं। सौदागर का बेटा इस तकलीफ़ के मारे बेहोश हो गया। बीवी ने सुबह की नमाज़ पढ़ कर मियाँ की यह हालत देखी तो वह फ़ौरन सुइयाँ निकालने में लग गई। हाथ से सुइयाँ निकालने में तकलीफ़ होने लगी तो उसने होंठों से निकालनी शुरू कीं। थोड़ी सी सुइयाँ निकालनी बाक़ी थीं कि ज़ोहर (दोपहर की नमाज़) का वक़्त आ गया। उसने बांदी (दासी) से कहा कि मैं ज़ोहर की नमाज़ पढ़ती हूँ, थोड़ा सा काम बाक़ी रह गया है। अब मेरी जगह तू काम कर। बांदी सुइयाँ निकालने लगी, बीवी ज़ोहर की नमाज़ से फ़ारिग़ नहीं हुई थी कि सुइयाँ सब निकाल ली गईं। सौदागर के बेटे को होश आ गया। उसने आँख खोल कर देखा तो बीवी उसके पास न थी। बांदी उसकी ख़िदमत कर रही थी। यह देखकर उसको बीवी से नफ़रत हो गई, उसने बांदी को बीवी बना लिया और बीवी को बांदी की ख़िदमत पर लगा दिया।

    'भीगी बिल्ली बताना' एक तल्मीही मुहावरा है जिसके मायने हैं बेजा (झूठा) बहाना करना। कहते हैं कि एक शख़्स अपने मकान के दालान में रात के वक़्त पर्दे डाले सो रहा था। उसी दालान में उसका नौकर भी एक तरफ़ पड़ा था। नौकर को उसके मालिक ने कई दफ़ा काम के लिए दालान से बाहर भेजना चाहा। हर दफ़ा नौकर नया बहाना गढ़ कर बयान कर देता था, ताकि उसे बाहर न जाना पड़े। आख़िर में मालिक ने कहा बाहर आँगन में बारिश हो रही थी, ज़रा बाहर जाकर तो देख, अब बारिश थम गई है, या हो रही है। नौकर ने जवाब दिया, कि अभी बारिश हो रही है। मालिक ने पूछा तूने किस तरह मालूम किया। उसने कहा बाहर से बिल्ली अंदर आई थी, मैंने उस पर हाथ फेर कर देखा तो वह भीगी हुई थी।

    'जौनपुर का क़ाज़ी' मुहावरे में बेवक़ूफ़ आदमी को कहते हैं। कहते हैं कि एक शहर के किसी मकतब (मदरसे) में उस्ताद अपने एक शागिर्द पर ख़फ़ा हो रहा था। ग़ुस्से के दौरान उसने कहा नालायक़ तू मेरा एहसान नहीं मानता कि मैंने तुझे गधे से आदमी बनाया। एक कुम्हार ने जो उस मकतब के क़रीब से गुज़र रहा था, यह बात सुनी। फ़ौरन मकतब में आया और उसने उस्ताद से कहा कि मेरे पास भी एक गधा है। अगर आप उसे आदमी बना दें, तो बड़ा एहसान हो। उस्ताद उसकी बेवक़ूफ़ी को ताड़ गया। उसने हँसी के तौर पर कहा अगर तुम सौ रुपया दो और अपना गधा मेरे पास छोड़ जाओ तो साल भर के बाद मैं उसको आदमी बना दूँगा। कुम्हार इस शर्त पर राज़ी हो गया। गधा उस्ताद साहब के पास छोड़ गया और सौ रुपया भी दे गया।

    साल भर के बाद आया, तो उस्ताद उस गधे को बेचकर अपने पैसे खरे कर चुके थे। उसने कहा मेरा गधा जिसे आपने आदमी बनाया होगा, वापस कीजिए। उस्ताद साहब ने कहा, मैंने उसको आदमी ही नहीं बनाया, पढ़ा-लिखा कर आलिम (विद्वान) भी बना दिया है। अब वह जौनपुर में क़ाज़ी के पद पर नियुक्त है। यह सुनकर कुम्हार खुशी से फूला न समाया। फ़ौरन छटी-पलाना साथ लेकर जौनपुर को रवाना हुआ। क़ाज़ी साहब अदालत कर रहे थे। कोई मुक़दमा उनके सामने पेश हो रहा था। कुम्हार उनके सामने ज़रा दूर खड़ा हो गया और क़ाज़ी साहब को छटी-पलाना दिखाने लगा, ताकि वह अपने मालिक को पहचान लें और उसके पास चले आएं। क़ाज़ी साहब ने यह अजीब हरकत देखी, तो आदमी भेजकर इस हरकत का कारण पूछा। कुम्हार ने सारा माजरा शुरू से आख़िर तक कह सुनाया। जब क़ाज़ी साहब को मालूम हुआ तो इस ख़याल से कि लोगों में उनकी हंसी न उड़े, उसको एक अच्छी रक़म देकर टाला और उससे ख़ुदा-ख़ुदा करके पीछा छुड़ाया।

    शेख़ चिल्ली ऐसे व्यक्ति को कहते हैं जो ख्याली मंसूबे बांधे। यह एक फ़र्ज़ी व्यक्ति लोगों ने गढ़ लिया है और इस क़िस्म की तमाम बातें जो ख्याली मंसूबों और योजनाओं से ताल्लुक़ रखती हैं, उसके नाम के साथ चिपका दी हैं। मसलन कहते हैं कि शेख़ जी को एक व्यक्ति ने मज़दूरी पर लगाया। एक टोकरी में शीशे का सामान भरकर उनको दिया कि फलां जगह इस टोकरे को पहुंचा दो। शेख़ जी ने रास्ते में एक जगह टोकरे को अलग रखकर सोचना शुरू किया कि आज जो मज़दूरी मुझे मिलेगी, उससे एक मुर्गा और एक मुर्गी ख़रीदूंगा। मुर्गी को अंडों पर बिठाऊंगा, उससे बहुत से बच्चे पैदा होंगे। जब बहुत सी मुर्गियां हो जाएंगी तो उनको बेचकर एक बकरी और एक बकरा ख़रीदूंगा और उनकी नस्ल बढ़ाऊंगा।

    बकरियों का रेवड़ जब बढ़ जाएगा तो उसको बेचकर गाय लूंगा। गाय की नस्ल इसी तरह बढ़ेगी। गायों का रेवड़ बेचकर भैंसें लूंगा। जब बहुत सी भैंसें हो जाएंगी तो उनके व्यापार से मैं बहुत अमीर हो जाऊंगा। एक बड़े घराने में शादी करूंगा। बीवी ऐसी तलाश करूंगा जो हसीन हो। मैं उसको हमेशा अपने क़ाबू में रखूंगा। अगर वह नाफ़रमानी करेगी तो मैं उसकी कमर पर ज़ोर से एक लात जड़ूंगा। शेख़ जी उस वक़्त ग़ुस्से में थे। ख्याली बीवी की जगह आपकी लात टोकरे पर पड़ी और तमाम शीशे चूर-चूर हो गए।

    लाल बुझक्कड़ उस व्यक्ति को कहते हैं जो हर बात का जवाब देने और हर मामले में राय देने के लिए तैयार रहता हो। असल में तो मूर्ख हो मगर अपने आपको सबसे ज़्यादा अक़्लमंद समझता हो। शेख़ चिल्ली की तरह लाल बुझक्कड़ भी लोगों ने एक फ़र्ज़ी व्यक्ति गढ़ लिया है और इस क़िस्म की तमाम रायें जो मूर्खता पर आधारित हों, उसकी तरफ़ मंसूब कर दी हैं (उसके नाम कर दी हैं)। मसलन कहते हैं कि जिस गांव में लाल बुझक्कड़ रहता था, उसके रहने वालों ने हाथी कभी नहीं देखा था। एक दफ़ा एक हाथी उस गांव से गुज़रा। उसके पैरों के निशान ज़मीन पर पड़े। गांव वालों ने हाथी कभी नहीं देखा था, उसके पैरों के निशान ज़रूर देखे। समझ में नहीं आया कि यह निशान ज़मीन पर कैसे बन गए। लाल बुझक्कड़ को वह निशान लाकर दिखाए और उनकी हक़ीक़त पूछी। उन्होंने फ़रमाया कि अरे बेवक़ूफ़ो! मेरे सिवा कोई इस पहेली को नहीं समझ सकता। हिरन चक्की के पाट चारों पैरों से बांधकर कूदा है। और उससे यह निशान ज़मीन पर बने हैं।

    इसी तरह एक दफ़ा एक लड़का घर के एक खंभे को हाथों के घेरे में लिए खड़ा था। इसी बीच उसका बाप बाहर से चने चबाता आया। लड़के ने उसी हालत में उससे चने मांगे। बाप ने उसकी मुट्ठी में चने दे दिए। मगर अब मुश्किल यह पेश आई कि खंभे से हाथ कैसे निकाले। अगर हाथ अलग करे तो चने ज़मीन पर गिरेंगे और यह उसे मंज़ूर न था। लड़का रोने लगा। बाप की समझ में कोई तरकीब न आई। वह दौड़ा लाल बुझक्कड़ के पास पहुंचा और उसको सारा माजरा कह सुनाया। उसने मूंछों को ताव देकर कहा भला मेरे सिवा कौन इस तरकीब को बता सकता है। जाओ घर की छत को उधेड़ डालो। जब खंभे से छत हट जाएगी तो लड़के को आसानी से तुम छत पर खींच लोगे। मुट्ठी से चने भी गिरने न पाएंगे और लड़का भी सही-सलामत खंभे से निकल आएगा।

    'यक न शुद दो शुद' एक तल्मीही कहावत है। यह उस मौक़े पर बोली जाती है जब एक अजीब बात के बाद दूसरी अजीब बात हो जाए। कहते हैं कि एक व्यक्ति को एक ऐसा मंत्र मालूम था कि उसके ज़रिए से वह मुर्दे को जगा सकता और उससे बातें कर सकता था। दूसरा एक और मंत्र भी मालूम था जिसके ज़रिए से वह मुर्दे को बातें करने के बाद फिर क़ब्र में सुला देता था। अगर किसी मुर्दे के घरवालों को राज़ की कुछ बातें मुर्दे से पूछनी होतीं तो उस आमिल (मंत्र जानने वाले) से जाकर गुज़ारिश करते थे। वह अपने अमल से मुर्दे को जगाकर सब कुछ पूछ देता, फिर उसको दोबारा सुला देता था। मरते वक़्त उसने शागिर्द को वह दोनों मंत्र बताए। शागिर्द ने आज़माइश के तौर पर एक क़ब्र पर पहला मंत्र पढ़ा। मुर्दा जाग उठा और उससे बातें करने लगा और उसने हर सवाल का जवाब दिया। मगर दूसरा मंत्र इत्तेफ़ाक़ से याद नहीं रहा। इसका नतीजा यह हुआ कि मुर्दा उसके पीछे हो लिया। उसने घबराकर उस्ताद को क़ब्र से उठाया ताकि वह पहले मंत्र का उतार दोबारा बताए मगर उस आलम में वह भी कुछ न बता सका। पहले मुर्दे की तरह यह नया मुर्दा भी अब उसके साथ चल पड़ा। इस मौक़े पर बेसाख़्ता (अनायास) उसकी ज़बान से यह वाक्य निकला।

    इस कहावत की तरह एक और फ़ारसी तल्मीही कहावत उर्दू में इस्तेमाल होती है: 'गुर्बा कुश्तन रोज़-ए-अज़ल'। इस कहावत का मतलब यह है कि रोब पहले ही दिन जमाना चाहिए। कहते हैं दो दोस्तों ने एक साथ शादी की। दोनों की बीवियां बदमिज़ाज निकलीं। एक की बीवी पति पर हावी हो गई और दूसरे की बहुत फ़रमांबरदार (आज्ञाकारी) साबित हुई। पहले दोस्त ने दूसरे से पूछा कि तुमने अपनी बदमिज़ाज बीवी को किस तरह क़ाबू किया। उसने कहा पहले ही दिन जब हम मियां-बीवी खाने पर बैठे तो एक बिल्ली भी दस्तरख़्वान पर आ बैठी। मैंने कहा चली जा। वह न गई। तब मैंने फ़ौरन उठकर उसे मार डाला। इस वाक़ये से मेरी बीवी पर मेरा रोब छा गया। वह डरने लगी कि जिसने ज़रा सी बात न मानने पर बिल्ली को मार डाला, वह ख़ुदा जाने मेरा क्या हाल करेगा। यह सुनकर दोस्त ने भी इस पर अमल किया मगर चूंकि उसकी बीवी उसकी आदत से वाक़िफ़ हो चुकी थी और उसके मिज़ाज पर हावी हो चुकी थी, इसलिए उसकी एक न चली। उसका हाल मालूम करके दोस्त ने कहा, भाई 'गुर्बा कुश्तन रोज़-ए-अव्वल', बाद का रोब जमाना काम नहीं देता।

    'कहां राजा भोज और कहां गंगू तेली'। यह भी एक तल्मीही कहावत है। मतलब यह है कि अमीर-ग़रीब की कोई तुलना नहीं, मगर तक़दीर के नज़दीक कोई अजीब बात नहीं। कहते हैं कि जब राजा भोज पर मुसीबत पड़ी और राज-पाट छिन गया तो वह मारा-मारा फिरता था। एक दफ़ा मांगता-खाता एक रानी के पास जा निकला। अभी वह महल में ही था कि एक काठ की मूर्ति रानी का खूंटी पर लटका हुआ हार निगल गई। रानी ने भोज को चोर समझकर राजा के पास भेज दिया। उसने चोरी की सज़ा में उसके हाथ-पैर कटवा दिए। वह इसी बेचारगी की हालत में था कि गंगू तेली उधर आ निकला। घर में औलाद न थी। इस लुंड-मुंड (बिना हाथ-पैर वाले) को ही ग़नीमत समझकर अपने घर ले गया। इलाज किया तो अच्छा हो गया। कोल्हू चलाने की ज़िम्मेदारी सौंप दी गई।

    एक दिन रात को कोल्हू चला रहा था और दीपक राग गा रहा था। राजा की बेटी ने उस वक़्त महल का चराग़ बुझाने का हुक्म दिया मगर चराग़ जब बुझाए जाते तो राग के सुरों के असर से जल उठते थे। मालूम हुआ कि इसका कारण यह है कि गंगू तेली के घर में कोई शख़्स दीपक राग गा रहा है। सुबह को उसने राजा के पीछे पड़कर शादी का पैग़ाम गंगू तेली के घर भिजवाया। इस तरह शादी हो गई। शादी के बाद तक़दीर से हाथ-पाँव भी निकल आए। काठ की मूर्ति ने हार उगल दिया। राज-पाट भी दोबारा नसीब हुआ। राज मिलने के बाद राजा भोज ने गंगू तेली को हमेशा अपना बाप समझा और उसको मालामाल कर दिया।

    तल्मीहात का दायरा बढ़ाने की ज़रूरत

    उर्दू ज़बान की अदबी (साहित्यिक) और ग़ैर-अदबी तल्मीहात पर हम काफ़ी बहस कर चुके हैं और हर क़िस्म की तल्मीहात की मिसालें भी हमने लिख दी हैं। हमने इस मज़मून (लेख) में तमाम तल्मीहात को समेटने की कोशिश नहीं की, फिर भी अगर वो तमाम तल्मीहें जो हमारी ज़बान में नज़्म और नस्र (गद्य और पद्य) में इस्तेमाल होती हैं या आम बोलचाल में रायज हैं, एक जगह जमा कर दी जाएँ तो उन पर एक नज़र डालकर हर शख़्स इस नतीजे पर पहुँच जाएगा कि उनकी तादाद बहुत कम है। हज़ारों ख़यालात हैं जिन्हें अदा करने के लिए हमारे पास मुनासिब साँचे नहीं हैं। यूरोप की तरक़्क़ी-याफ़्ता (विकसित) ज़बानों में तल्मीहात की इतनी कसरत (अधिकता) है कि उनके लिए बाक़ायदा शब्दकोश तैयार किए जाते हैं, जिनमें कोशकार इन तल्मीहों को वर्णमाला की तरतीब से जमा करते हैं और हर तल्मीह की तशरीह (व्याख्या) करते हैं।

    हालाँकि तल्मीहात की अधिकता के कारण यूरोप के निवासी हर क़िस्म के ख़यालात को मुनासिब साँचों में ढाल सकते हैं, फिर भी उनकी प्यास नहीं बुझी। वे दुनिया की मुख़्तलिफ़ क़ौमों के देवताओं के क़िस्से मालूम करते हैं। उनकी मज़हबी मान्यताओं और अंधविश्वासों का पता लगाते हैं। उनके इतिहास का अपनी ज़बानों में तर्जुमा करते हैं। उनके मज़हबी और ग़ैर-मज़हबी अफ़सानों को अपनी ज़बानों के साँचे में ढालते हैं। उनके शाइराना ख़यालात पर महारत हासिल करते हैं। उनके नाटकों का तर्जुमा करते हैं और इस तमाम ज़ख़ीरे से साहित्य के लिए तल्मीहें निकालते हैं ताकि उनको हर क़िस्म के ख़यालात और अफ़कार अदा करने का सामान पहले से ज़्यादा मयस्सर (उपलब्ध) हो, इसके बरख़िलाफ़ हमारी ज़बान बोलने वाले क़दामत-परस्त (रूढ़िवादी) हैं।

    अगर दूसरी ज़बान के किसी लफ़्ज़ में फ़ारस वालों ने फेरबदल किया है या अरबों ने कोई तब्दीली की है तो उसको जायज़ समझते हैं। अगर ईरानियों ने दूसरी ज़बान के किसी लफ़्ज़ के साथ अपना प्रत्यय या उपसर्ग (लाहिक़ा या साबिक़ा) लगाकर कोई लफ़्ज़ बना लिया है तो उसको भी रवादारी (सहिष्णुता) की नज़र से देखते हैं। अगर अरबों ने दूसरी ज़बान के किसी लफ़्ज़ से कोई मस्दर (क्रिया-मूल) बना लिया है तो उस पर भी नाक-भौं नहीं चढ़ाते। अगर ईरान या अरब वालों में से किसी ने कोई नई तल्मीह किसी तारीख़ या अफ़साने की बुनियाद पर गढ़ ली है तो उस पर भी रज़ामंद रहते हैं।

    लेकिन अगर हमारे मुल्क का कोई आदमी दूसरी ज़बान के किसी लफ़्ज़ में बदलाव करे या अरबी-फ़ारसी के किसी लफ़्ज़ के साथ हिंदी ज़बान का कोई उपसर्ग या प्रत्यय लगाए या किसी लफ़्ज़ पर मस्दर की अलामत लगाकर कोई नया मस्दर बनाए या कोई नई तल्मीह इस्तेमाल करे, तो उस पर एतराज़ों की बौछार होती है और क़यामत टूट पड़ती है। ये हज़रात मौजूदा ज़बान में से बहुत से अल्फ़ाज़ को छोड़ते जाते हैं और इस पर फ़ख़्र जताते हैं मगर ऐसी कोई तदबीर (उपाय) नहीं करते, जिससे हमारी ज़बान वसीअ (विस्तृत) हो, हमारे साहित्य का दामन वसीअ हो, हमारे शब्दकोशों में अल्फ़ाज़ की तादाद ज़्यादा हो, हमारे ख़यालात अदा करने की क़ुव्वत में तरक़्क़ी हो।

    इसमें ज़रा भी शक नहीं है कि ज़बान से लापरवाही करना एक ऐसा गुनाह है जो किसी तरह माफ़ी के क़ाबिल नहीं है। अख़बार-नवीस (पत्रकार), रिसालों के संपादक, शाइर, इंशा-परदाज़ (गद्यकार) और मुसन्निफ़ (लेखक) जिन्होंने अब तक ज़बान की तरफ़ से लापरवाही दिखाई है, अगर चाहें तो नए अल्फ़ाज़, नए मुहावरे, नए इस्तेआरे (रूपक), नई इस्तेलाहात (पारिभाषिक शब्दावली) और नई तल्मीहात से हमारी ज़बान को मालामाल कर सकते हैं। मैं आम ज़बान के विस्तार पर यहाँ ख़यालात ज़ाहिर नहीं करता, सिर्फ़ तल्मीहात पर बहस करना चाहता हूँ। मौजूदा तल्मीहात का ज़्यादातर हिस्सा अरब और ईरान से लाया गया है। हिंदुस्तानी तल्मीहात आम बोलचाल में कुछ हद तक हैं, मगर वो गिनने लायक़ नहीं हैं। हिंदुस्तान की ज़बानों और उनके साहित्य से नफ़रत और परहेज़ करने के बाद हमें कोई हक़ नहीं है कि हम उर्दू ज़बान को हिंदुस्तान की साझा ज़बान का ख़िताब दें।

    अगर आप जर्मन, फ्रांसीसी या अंग्रेज़ी ज़बान के शब्दकोश खोलकर देखें, तो आपको मालूम होगा कि उन्होंने तमाम दुनिया की ज़बानों और साहित्य से फ़ायदा उठाया है। कोई मज़हब, कोई ज़बान, कोई मुल्क और कोई क़ौम ऐसी नहीं मिलेगी जिसकी मान्यताओं, रस्मों, अंधविश्वासों, इतिहास और अदब से मुताल्लिक़ ज़रूरी अल्फ़ाज़ इन विकसित ज़बानों में मौजूद न हों। मानो उन्होंने अपनी ज़बानों के अदब को एक आलमगीर (वैश्विक) अदब बना दिया है। क्या हमारे लिए यह बात शर्म की नहीं है कि हमने अपनी ज़बान को अब तक हिंदुस्तानी ज़बान कहलाने का हक़दार भी साबित नहीं किया। अगर हम बड़े दिल वाले होते, अगर हममें तअस्सुब (पक्षपात) की झलक न होती, अगर हमको अपनी ज़बान से मुहब्बत होती, अगर हम अपनी ज़बान के साथ अपने वतन की इज़्ज़त भी करना चाहते तो फिर हमारा फ़र्ज़ था कि जितनी क़ौमें हिंदुस्तान में आबाद हैं, उनकी मान्यताओं और अंधविश्वासों, उनके रस्म-ओ-रिवाज और उनके इतिहास और अदब के तमाम ज़रूरी अल्फ़ाज़ अपनी ज़बान में दाख़िल कर लेते और इसका दायरा इस क़दर वसीअ करते कि हिंदुस्तान की कोई मौजूदा ज़बान इसका मुक़ाबला न कर सकती।

    अगर आम बोलचाल में फेरबदल करने का इख़्तियार हम नहीं रखते, तो यह बात तो हमारे वश में है कि हम अपने साहित्य का दायरा वसीअ कर दें और इसको हिंदुस्तान के तमाम तालीम-याफ़्ता बाशिंदों के लिए पढ़ने और लगाव के लायक़ बना दें। उर्दू ज़बान के बनाने में हिंदू-मुसलमान दोनों शरीक हैं, फिर क्या वजह है कि इसके अदब में सिर्फ़ इस्लामी साहित्य के आसार मौजूद हैं। हिंदू क़ौम के साहित्य का कोई निशान न हमारी नस्र (गद्य) में है न नज़्म (पद्य) में।

    शायद कोई एतराज़ करने वाला इस मौक़े पर यह एतराज़ उठाए कि हिंदुओं की मज़हबी मान्यताएँ, उनके देवताओं के क़िस्से, उनके शगुन और अंधविश्वास, उनके इतिहास की ग़ैर-मोतबर (अविश्वसनीय) कहानियाँ इस क़ाबिल नहीं हैं कि मुसलमान उनको तस्लीम करें (मानें)। हालाँकि वे तौहीद (एकेश्वरवाद) के मानने वाले हैं और तर्कपसंद हैं। इसका जवाब यह है कि अब भी हमारे अदब में ऐसी सैकड़ों बातें दाख़िल हैं, जो न मज़हब के लिहाज़ से मानने लायक़ हैं न अक़्ल के लिहाज़ से। अगर हम मज़हब या अक़्ल का ख़याल करते हैं, तो लाज़िम है कि हम ऐसी तमाम बातों को अपने साहित्य से निकाल दें। यह तो एक इल्ज़ामी जवाब है। असली और हक़ीक़ी जवाब यह है कि शाइरी और इंशा-परदाज़ी (गद्य-लेखन) में ऐसी तमाम बातें इसलिए दाख़िल नहीं की गईं कि वे मज़हब या अक़्ल के लिहाज़ से मानने लायक़ हैं, बल्कि इसलिए दाख़िल की गई हैं कि वे ख़यालात अदा करने के साँचे हैं। मसलन अगर कहा जाए कि एक देव हिमालय पहाड़ की तरह सीना ताने खड़ा है और हिंदुस्तान को अपनी आग़ोश में लेने के लिए तैयार है, तो इस वाक्य से यह तर्क नहीं निकाला जा सकता कि इसे कहने वाला देव के वजूद को मानता है। मतलब सिर्फ़ यह है कि हिमालय की ऊँची पर्वतमाला ने हिंदुस्तान को एक तरफ़ से घेर रखा है।

    इसी तरह अगर कोई कहे कि रोज़गार अनक़ा हो गया है। तो इसका मतलब यह समझा जाए कि रोज़गार नहीं मिलता, न कि इस वाक्य का बोलने वाला अनक़ा (एक काल्पनिक पक्षी) के लुप्त होने का इज़हार कर रहा है। हर शख़्स जो किसी नॉवेल या नाटक को पढ़ता है, उसे अच्छी तरह मालूम है कि मैं एक काल्पनिक क़िस्सा पढ़ रहा हूँ, फिर भी जब कोई हँसी की बात उसमें आती है तो हँस पड़ता है और अगर कोई दर्दनाक वाक़या पढ़ता है तो उसकी आँखों से टप-टप आँसू गिरने लगते हैं। इंसानी फ़ितरत के इस गुर से हर शायर, हर लेखक, हर कहानीकार और हर उपदेशक अच्छी तरह वाक़िफ़ होता है, इसलिए वह हक़ीक़तों को उन फ़र्ज़ी और ख़याली बातों के अंदाज़ में पेश करता है, जिनसे उसके मुख़ातिब (श्रोता या पाठक) परिचित हों। उसको बिल्कुल इस बात की परवाह नहीं होती कि वह लिफ़ाफ़ा जिसमें लपेट कर वह अपने ख़यालात नज़र के सामने लाता है, असली है या नक़्ली। मौलाना रूम ने इसी नुक्ते को बयान किया है, जहाँ फ़रमाया है कि

    ख़ुशतर आँ बाशद कि सिर्र-ए-दिलबरां

    गुफ़्ता आयद दर हदीस-ए-दीगरां

    इसलिए हमारा मक़सद यह है कि हम अपनी ज़बान में ख़यालात ज़ाहिर करने के साँचों की तादाद बढ़ाएँ और इस मक़सद से हिंदू मज़हब, हिंदू देवमाला (पौराणिक कथाओं), हिंदू तारीख़ और हिंदू अदब (साहित्य) की तल्मीहात (ऐतिहासिक या पौराणिक संदर्भों) का इज़ाफ़ा करें, तो इससे हमारे मज़हब और अक़्ल पर कोई असर नहीं पड़ सकता। न कोई चीज़ हमें मजबूर करती है कि इन चीज़ों के वजूद पर हम यक़ीन करें, बल्कि इस इज़ाफ़े से हमें निम्नलिखित फ़ायदे हासिल होंगे:

    (1) अलग-अलग ख़यालात को ज़ाहिर करने में हम पहले से ज़्यादा सक्षम हो जाएँगे।

    (2) यह इल्ज़ाम हम पर से दूर होगा कि हम महज़ मज़हबी पक्षपात की बिना पर हिंदू साहित्य से बचते रहे।

    (3) हिंदू हमारे साहित्य से पहले की तुलना में ज़्यादा परिचित हो जाएँगे।

    (4) हमारी ज़बान सही मायनों में हिंदुस्तानी ज़बान और हमारा साहित्य सही मायनों में हिंदुस्तानी कहलाने का हक़दार होगा।

    (5) हिंदू-मुसलमानों की एकता की बुनियाद मज़बूत होगी और देशभक्ति के मैदान में आसानी से दोनों क़ौमें एक साथ दौड़ेंगी।

    इस नुक्ते पर पहुँचने के बाद हम पर लाज़िम है कि हिंदुओं के निम्नलिखित भंडार पर नज़र डालें اور ان سے नई तल्मीहात हासिल करें:

    (1) रामायण

    (2) महाभारत

    (3) हिंदू शासनकाल की तारीख़

    (4) हिंदू अफ़साने, मसलन शकुंतला, नल-दमन, विक्रमोर्वशी वग़ैरह।

    (5) हिंदू देवमाला

    (6) हिंदू रीति-रिवाज़

    (7) हिंदू संप्रदायों के हालात और ख़यालात।

    इसके अलावा इस्लामी भंडार से पहले की तुलना में ज़्यादा काम लेना चाहिए और इसके लिए नीचे दिए गए भंडार पर नज़र डालनी और उससे तल्मीहें हासिल करनी चाहिए:

    (1) क़ुरआन मजीद

    (2) हदीसें

    (3) इस्लाम की आम तारीख़

    (4) भारत में इस्लामी शासनकाल की तारीख़

    (5) मसनवी मौलाना रूम

    (6) अलिफ़ लैला

    (7) शाहनामा-ए-फ़िरदौसी

    (8) उर्दू ज़बान के मशहूर क़िस्से (मसलन मौलाना नज़ीर अहमद के लिखे हुए क़िस्से) बोस्तान-ए-ख़याल, दास्तान-ए-अमीर हमज़ा, चहार दरवेश, आराइश-ए-महफ़िल यानी क़िस्सा हातिम ताई, फ़साना-ए-अजाइब, बद्र-ए-मुनीर वग़ैरह

    (9) इस्लामी तसव्वुफ़ (सूफ़ीवाद) की किताबें

    हिंदू और इस्लामी भंडार के अलावा नीचे दी गई सामग्री से भी तल्मीहें मिल सकती हैं:

    (1) ईसाइयों की मज़हबी मान्यताएँ और रीति-रिवाज़

    (2) अंग्रेज़ों की आम तारीख़

    (3) अंग्रेज़ों के भारतीय शासनकाल की तारीख़

    (4) सिखों की मज़हबी मान्यताएँ और रीति-रिवाज़

    (5) पारसियों की मज़हबी मान्यताएँ और रीति-रिवाज़

    (6) बौद्ध मत की मज़हबी मान्यताएँ और रीति-रिवाज़

    (7) राजपूतों की तारीख़

    (8) मराठों की तारीख़

    नई तल्मीहात की मिसालें

    यहाँ हम मिसाल के तौर पर चंद ही तल्मीहात का ज़िक्र करते हैं, मसलन नीचे दी गई तल्मीहात पर ग़ौर करो:

    काल कोठरी या ब्लैक होल (अंग्रेज़ी भारतीय शासनकाल की तारीख़ से), बादशाह गर (इस्लामी भारतीय शासनकाल की तारीख़ से), अलादीन का चराग़, तस्मा पा (अलिफ़ लैला से), काली मौत (यूरोप की आम तारीख़ से), चालीस ठग (अलिफ़ लैला से), खुल सिम सिम! बंद हो सिम सिम! (अलिफ़ लैला से), हम्माम बादगर्द (क़िस्सा हातिम ताई से), ख़ोजी (फ़साना-ए-आज़ाद से), ज़ाहिरदार बेग (तौबत-उन-नसूह से), फ़ितरत (तौबत-उन-नसूह से), कलीम (तौबत-उन-नसूह से), बोद लामा (इस्लामी तारीख़ से), रुस्तम यक-दस्त (शाहनामा-ए-फ़िरदौसी से), रश्क-ए-हिमार (ख़ुदाई फ़ौजदार से), ख़्वाजा सग-परस्त (चहार दरवेश से), देव-ए-सफ़ेद (शाहनामा-ए-फ़िरदौसी से), गुलाबो (ख़ुदाई फ़ौजदार से), दीवानी पार्लियामेंट (अंग्रेज़ों की आम तारीख़ से), पगोडा (बौद्ध मत वालों के मज़हब से), जमील फ़ता (राजपूतों की तारीख़ से), इशा-ए-रब्बानी (ईसाइयों के मज़हब से), नौशाबा (सिकंदर नामा से), जान-ए-आलम का तोता (फ़साना-ए-अजाइब से), कल का घोड़ा (बद्र-ए-मुनीर से), निर्वाण (बौद्ध मत वालों के मज़हब से), दख़्मा (पारसियों के मज़हब से), अमृत (सिखों के मज़हब से), कृपाण (सिखों के मज़हब से), ज़िंद-ए-बार (पारसियों के मज़हब से), मह-आबाद (पारसियों की तारीख़ से), बहनाम (पारसियों के मज़हब से), ख़ोजी की क़रौली (फ़साना-ए-आज़ाद से)।

    रुस्तम और इस्फंदियार की सरज़मीन से ईरान मुराद (तात्पर्य) है। उगते सूरज की सरज़मीन से जापान मुराद है। आसमानी सल्तनत से चीन की सल्तनत मुराद और फ़िरऔनों की सरज़मीन से मिस्र का मुल्क मुराद है। देवताओं की सरज़मीन से हिंदुस्तान समझो। आध्यात्मिकता की सरज़मीन एशिया, भौतिकवाद का पालना यूरोप, करोड़पतियों का मुल्क अमेरिका, अंधकार युग (यूरोप की तारीख़ से), सुधार युग (यूरोप की तारीख़ से), अंध महाद्वीप से अफ़्रीका मुराद है।

    हिंदू साहित्य की तल्मीहें

    नई तल्मीहात की जो मिसालें हमने दी हैं, वह बहुत ही कम हैं। अगर हम आम भंडार को सामने रखकर तलाश करें, तो निस्संदेह बहुत सी नई तल्मीहात मिलेंगी, मगर हम इस मौक़े पर विशेष रूप से उन तल्मीहात का ज़िक्र करना चाहते हैं जो हिंदू साहित्य से ली जा सकती हैं और जिनसे हमारे साहित्य के ढाँचे में नई रूह पैदा हो सकती है और जिनके इज़ाफ़े के बाद हम अपनी ज़बान और साहित्य को दोनों क़ौमों की साझा पूँजी कह सकते हैं। नीचे दी गई तल्मीहात पर ग़ौर की नज़र डालो और देखो कि शायरी और लेखन में इनसे क्या काम लिया जा सकता है और कौन से ख़यालात इन साँचों में ढाले जा सकते हैं।

    सावित्री राजा अश्वपति की लड़की थी। वह अपने शौहर सत्यवान पर दिल से फ़िदा थी। शादी के बाद उसे मालूम हुआ कि वह एक साल से ज़्यादा ज़िंदा न रहेगा। मौत के वक़्त उसने मृत्यु के देवता यम से इस क़दर विनतियाँ कीं और इस क़दर ज़िद की कि वह सत्यवान की रूह क़ब्ज़ करने (प्राण लेने) से रुक गया। यम मुर्दों की रूहों का देवता है। उसका रंग हरा है। पोशाक लाल है। एक हाथ में भाला, दूसरे हाथ में फाँसी की रस्सी है। एक भैंसे पर सवार रहता है। यमपुरी वह मक़ाम है, जहाँ वह रहता है। कालीची उसके महल का नाम है। उसके मुलाज़िम यमदूत कहलाते हैं। जब कोई मरता है तो, यमदूत उसकी रूह को ला हाज़िर करते हैं। उसकी नेकियों और बुराइयों का खाता खोला जाता है। फिर आख़िरी हुक्म उसके बारे में सुनाया जाता है कि वह पत्थरों में दाख़िल हो या नरक में जाए, या दुनिया में किसी और सूरत में फिर जन्म ले। दो ख़ौफ़नाक कुत्ते उसके रास्ते की हिफ़ाज़त करते हैं। उनकी चार आँखें हैं। नथुने चौड़े हैं। वह यम की तरफ़ से मौत का पैग़ाम पहुँचाते हैं।

    शतरूपा सबसे पहली औरत है, जो दुनिया में पैदा हुई, जिसे मुसलमानों के नज़दीक हव्वा कहते हैं। ब्रह्मा जी ने अपने जिस्म के दो हिस्से किए। एक हिस्से से एक मर्द बनाया जिसका नाम विराज है। दूसरे हिस्से से औरत और वह यही शतरूपा है।

    सोम चाँद को कहते हैं। यह भी देवता है। पेड़-पौधों की परवरिश करने वाला और इबादत करने वालों (भक्तों) का रक्षक कहलाता है। उसने वक्ष की सत्ताईस लड़कियों से ब्याह किया। यही लड़कियाँ हैं जिन्हें नछत्तर यानी चाँद की मंज़िलें कहते हैं। चंद्रबंसियों का सिलसिला सोम ही से चला है। जिस रथ पर वह सवार होता है, उसके तीन पहिए हैं। सफ़ेद रंग के दस घोड़े इस रथ को खींचते हैं। इसके बहुत से सिफ़ाती (विशेषण वाले) नाम हैं। मसलन ठंडी किरणों वाला, सफ़ेद किरणों वाला, सितारों का मालिक, रात को रोशन करने वाला वग़ैरह।

    काम जिसे कामदेव भी कहते हैं, इश्क़ का देवता है। जब ख़ुदा ने चाहा कि दुनिया को पैदा करे, उस वक़्त काम ख़ुद उसके दिल में पैदा हो गया। यह स्वर्ग की हूरों और आसमानी परियों का मालिक है। तीर-कमान इसके साथ हैं। हूरों और परियों के जमघट हैं। हाथ में लाल रंग का एक झंडा है, जिसके फरेरे पर मछली का निशान है। इसके बहुत से सिफ़ाती नाम हैं। मसलन हसीन, आग भड़काने वाला, शादमाँ (प्रसन्न), शोख़-ओ-शंग (चंचल और सुंदर), सरापा आनंद, लोगों को लुभाने वाली बहार की शमा, चटकता अंगारा, क़हर का डंडा, हुस्न का हथियार, शांति भंग करने वाला, अय्याश, दुनिया का उस्ताद, मोहब्बत की खान, फूलों से लैस।

    लछमी या लक्ष्मी दौलत की देवी है, देवताओं और असुरों ने समंदर को मथा था, तो और रत्नों के साथ लछमी भी समंदर से कँवल का फूल हाथ में लिए निकली थी। जब श्री रामचंद्र जी ने अवतार लिया तो यह सीता जी की शक्ल में ज़ाहिर हुई, श्री कृष्ण जी के ज़माने में इसने रुक्मिणी का रूप इख़्तियार किया। दौलत और ऐश्वर्य की देवी होने के कारण हर जगह इसकी पूजा की जाती है। इसको हीरा, इंदर और चंचला भी कहते हैं। अग्नि पुराने ज़माने का देवता है, इसकी तीन शक्लें हैं। आसमान पर सूरज, हवा पर बिजली, ज़मीन पर आग। इसकी सात जीभें हैं, हवन के वक़्त आग में जो घी डाला जाता है, यह इन जीभों से उस घी को चाटता है। इसकी पोशाक काले रंग की है। सर पर धुएँ का ताज है। एक रोशन हथियार इसके हाथ में है। सात हवाएँ इसके रथ के पहिए हैं। लाल रंग की घोड़ी इसके रथ में जोती जाती है। एक मेंढा इसके साथ रहता है। कभी-कभी यह देवता इस पर सवार होता है।

    इंदर आसमान, हवा, बादल, स्वर्ग और हूरों का मालिक है। इसका दर्जा सब देवताओं से बड़ा है। अग्नि की तरह वेदों की बहुत सी ऋचाएँ इसके नाम भी मंसूब हैं। इसका रंग लाल कुंदन जैसा है। बाज़ू लंबे-लंबे हैं। वह अपनी मर्ज़ी से जो शक्ल चाहे इख़्तियार कर लेता है। इसकी सवारी का रथ चमकीला है। दो लाल रंग के घोड़े इसमें जोते जाते हैं। इसका ख़ास हथियार वज्र है। कमान और जाल भी साथ रखता है। चूँकि वह हवाओं का मालिक है, इसलिए मौसमों का इंतज़ाम और बारिश का प्रबंध इसी के अधिकार में है। वह बिजली और गरज को मुनासिब मौक़ों पर तैनात करता है। बारिश बरसाता है। बिजली चमकाता है। ज़मीनों को हरा-भरा करता है। बिजली और तूफ़ान पर हुक्मरानी करता है। इसके बदन पर हज़ार आँखों के निशान हैं।

    रावण वाली लंका का बेटा मेघनाद इसको गिरफ़्तार करके निकाल ले गया था। इसी कारण से मेघनाद को इंद्रजीत कहते हैं। लव देवता इसे लंका से छुड़ा कर लाए। वह ऋषियों की इबादत में ख़लल डालने के लिए उनको इंदर की पूजा से मना किया करता था। इंदर ने नाराज़ होकर उनकी सज़ा के लिए बारिश का तूफ़ान भेजा। श्री कृष्ण जी गोवर्धन पहाड़ को अपनी एक उँगली पर लेकर खड़े हो गए। तमाम बृजबासी इस पहाड़ के नीचे आ गए और उनको तूफ़ान से कोई नुक़सान नहीं पहुँचा। वह एक सफ़ेद हाथी पर सवार होता है, जिसका नाम ऐरावत है। इसके कई सिफ़ाती नाम हैं। मसलन वज्र वाला, देवताओं का सरदार, हवा का मालिक, स्वर्ग का मालिक। इसकी राजधानी का नाम अमरावती, और इसके रथ का नाम विमान है।

    महादेवी या पारबती, शिव जी की बीवी को कहते हैं। अलग-अलग गुणों और कामों के लिहाज़ से इसके अलग-अलग नाम हैं। मेहरबानी की हालत में वह नीचे दिए गए नामों से पुकारी जाती थी: दुनिया की माँ, पीले रंग वाली और चमकदार, हर पल प्रसन्न, मतवाली आँखों वाली। मगर जब क्रोधित होती है तो इन नामों से पुकारी जाती है: दुर्गा, काली, ख़ौफ़नाक, ग़ज़बनाक, लाल दामनों वाली। इसके दस हाथ हैं। हर हाथ में एक हथियार है। इसका रंग पीला है। हुस्न और जमाल इसमें कूट-कूट कर भरा है। यह आम हालत है। मगर ग़ुस्से की हालत में इसका रंग काला होता है। हाथों और दाँतों से ख़ून टपकता है। साँप इसके जिस्म को घेरे होते हैं। गले में सरों और खोपड़ियों की माला होती है। इसकी पूजा इसी हालत में की जाती है। इसकी मूरत के सामने ख़ून कभी सूखने नहीं पाता।

    अहिरावण पाताल का राजा था। लंका की लड़ाई में जब मेघनाद और कुंभकर्ण मारे जा चुके, तो रावण ने इससे मदद माँगी। वह भभीषण के लिबास में श्री रामचंद्र जी के लश्कर में दाख़िल हो गया। किसी ने उसको नहीं पहचाना। श्री रामचंद्र जी और लछमन जी दोनों उस वक़्त सो रहे थे। वह दोनों को ग़फ़लत की हालत में उठा ले गया। पाताल पहुँच कर उसने चाहा कि अपने देवता के सामने दोनों को ज़ब्ह करे। हनुमान जी को जब इस वाक़िए की ख़बर हुई तो फ़ौरन पाताल गए। वहाँ यज्ञ होने को था। तमाम सामान इकट्ठा कर लिया गया था। हनुमान जी यज्ञ का सारा सामान खा गए। अहिरावण को क़त्ल किया। दोनों भाइयों को वापस लश्कर में ले आए।

    ब्रह्मा, सृष्टि को पैदा करने वाला देवता है। रंग लाल है। चार सर और चार मुँह हैं। चार हाथ और आठ कान हैं। एक हाथ में तलवार और एक हाथ में कमान, एक में माला और एक में वेद हैं। ब्रह्मा जी की सवारी हंस है। यह विष्णु जी की नाभि से पैदा हुए हैं। इनका एक दिन दो अरब सोलह करोड़ साल के बराबर है।

    बलराम, श्री कृष्ण जी के बड़े भाई हैं। इनका रंग गोरा था और श्री कृष्ण जी का साँवला। दोनों विष्णु जी के अवतार हैं जिन्होंने सफ़ेद और काले रंग में अवतार लिया है। मरते वक़्त इनके मुँह से एक साँप निकला था। इसलिए इनको शेषनाग का अवतार भी कहते हैं। बलराम जी शराब पिया करते थे। श्री कृष्ण परहेज़गार थे। बलराम जी बहुत तेज़ मिज़ाज के थे। मगर श्री कृष्ण जी नर्म तबीयत रखते थे। बलराम जी के हथियार हल और मूसल हैं।

    राम यानी श्री रामचंद्र जी, राजा दसरथ के सबसे बड़े बेटे थे। राजा जनक की बेटी सीता से इनकी शादी हुई। राजा जनक ने जब स्वयंवर का जलसा आयोजित किया, तो शर्त यह रखी कि जो बहादुर आदमी मेरी कमान को झुका देगा, सीता की शादी उसी से कर दी जाएगी। यह कमान उक्त राजा को विष्णु ने अता की थी। श्री रामचंद्र जी ने इस कमान के तीन टुकड़े कर डाले। स्वयंवर की शर्त को पूरा कर दिया। शादी के बाद राजा दसरथ ने श्री रामचंद्र जी को तख़्त पर बिठाना चाहा। मगर भरत की माँ रानी कैकेयी ने एक बाँदी के बहकाने से राजा को इस बात पर मजबूर किया कि वह भरत को तख़्त पर बिठाए और रामचंद्र जी चौदह बरस तक वनवास में रहें। श्री रामचंद्र जी ने बाप का कहना मंज़ूर किया। लछमन जी और सीता को साथ लेकर जंगल को रवाना हुए। इनकी रवानगी के बाद राजा दसरथ का इंतिक़ाल हो गया। भरत ने चित्रकूट पहुँच कर श्री रामचंद्र जी को वापस चलने और तख़्त पर बैठने की सलाह दी मगर उन्होंने यह बात मंज़ूर नहीं की। मजबूरन भरत इनकी खड़ाऊँ ले गया और उनको तख़्त पर रख कर ख़ुद सल्तनत के नायब (प्रतिनिधि) के तौर पर राज करने लगा।

    गोदावरी नदी के किनारे पंचवटी में लंका वाले रावण की बहन श्री रामचंद्र जी पर आशिक हो गई। बहुत चाहा कि उनको अपनी तरफ़ आकर्षित करे मगर कुछ असर नहीं हुआ। लक्ष्मण जी ने इस गुस्ताख़ी पर उसके कान और नाक काट डाले। वह रोती-पीटती अपने भाई के पास पहुँची। साथ ही उसने सीता जी के रूप और सौंदर्य की इतनी तारीफ़ की कि रावण उन्हें भगा ले जाने के लिए तैयार हो गया। इसलिए ठीक उस वक़्त जब श्री रामचंद्र जी और लक्ष्मण जी शिकार पर गए हुए थे, रावण आया। सीता जी को ज़बरदस्ती अपने साथ ले गया। दोनों भाई जब शिकार से वापस आए तो यह वाक़या मालूम हुआ। राजा सुखदेव जो इन इलाक़ों में शासक था, उसके जनरल हनुमान ने लंका पर चढ़ाई करने में मदद दी। हनुमान समंदर फाँद कर लंका पहुँचा और सीता जी की ख़बर लाया। फिर समंदर पर पुल बाँधा गया। बंदरों और रीछों की फ़ौज हनुमान के नेतृत्व में लंका पहुँची। रावण के साथ जंग की गई। रावण के बेटे, उसका भाई और ख़ुद रावण इस लड़ाई में मारे गए। लंका फ़तह हुई और सीता जी ने क़ैद से रिहाई पाई।

    लंका का रावण बहुत दुष्ट, ज़ालिम और बुराई का पुतला था। उसके दस सिर थे, बीस हाथ थे। आँखें लाल थीं। सूरत ख़ौफ़नाक थी। उसमें इतनी ताक़त थी कि वह पहाड़ को अपनी जगह से हिला सकता था। समंदर में हलचल पैदा कर सकता था। देवता उसकी सेवा करते थे। अग्नि देवता बावर्ची का काम करता था। वरुण देवता पानी पहुँचाता था। कुबेर देवता दौलत मुहैया करता था। वायु देवता उसके महलों में झाड़ू लगाता था। लंका जहाँ वह हुकूमत करता था, उसके तमाम मकान सोने से मढ़े हुए थे और जगमग-जगमग कर रहे थे।

    कुबेर ख़ज़ानों का देवता है। हिमालय पर्वत पर एक शहर अलका है, जहाँ उसका निवास है। सोना, चाँदी और जवाहरात सब उसके क़ब्ज़े में हैं। उसका रंग सफ़ेद है। उसके तीन पाँव हैं। आठ दाँत हैं। सारा जिस्म गहनों से ढका है। उसको धनपति यानी दौलत का मालिक और रतनपति यानी जवाहरात का मालिक कहते हैं। वायु हवाओं का देवता है। इंद्र देवता का साथी है। अक्सर उसके साथ एक ही रथ पर सवार होता है। ख़ुद उसका रथ सोने का है, जिसमें हज़ार घोड़े जोते जाते हैं। ख़ुशबुओं को साथ रखने वाला और हमेशा बहने वाला उसके गुणवाचक नाम हैं। वरुण, समंदरों और नदियों का देवता है। उसका गुणवाचक नाम जलपति है। उसकी सवारी का जानवर मगरमच्छ है। सरस्वती ज्ञान, अक़्ल और शायरी की देवी है। रंग सफ़ेद है, हाथ में किताब है। सफ़ेद कमल के फूल पर विराजमान है, ब्रह्मा जी उसके पति हैं।

    कूर्म अवतार, इस अवतार की शक्ल कछुए जैसी है। एक बार देवताओं के मुक़ाबले में दैत्य हावी हो गए। इंद्र की हुकूमत में भी ख़लल आ गया। ब्रह्मा जी और नारायण जी की हिदायत पर देवताओं ने मशवरा किया कि समंदर को मथकर उसमें से अमृत यानी आब-ए-हयात निकालें और उसे पीकर दैत्यों का मुक़ाबला करें और उन्हें मार कर आराम की ज़िंदगी बसर करें। इसलिए समंदर को मथने के लिए विंध्याचल पर्वत की मथानी बनाई गई। शेषनाग की रस्सी बनाकर उसके चारों ओर लपेटी और समंदर को सब देवताओं ने मथना शुरू किया, मगर विंध्याचल पर्वत अपने वज़न के कारण समंदर में डूबा जा रहा था और एक जगह पर टिका नहीं रहता था। कूर्म अवतार ने कछुए के रूप में अवतार लिया। वह समंदर में उतर गए और विंध्याचल पर्वत को अपनी पीठ पर टिका लिया। समंदर मथने से निम्नलिखित चौदह रत्न निकले,

    (1) अमृत यानी आब-ए-हयात। इसे देवताओं ने पी लिया।

    (2) धन्वंतरि वैद्य। यह एक हाथ में जोंक और एक हाथ में हरड़ लिए प्रकट हुए।

    (3) लक्ष्मी देवी। यह विष्णु जी के हिस्से में आईं।

    (4) शराब। इसे दैत्यों ने पिया।

    (5) चाँद। यह शिव जी के हिस्से में आया।

    (6) रंभा। यह एक हसीन स्वर्गीय अप्सरा थी।

    (7) अच्छी श्रव। यह एक बेहतरीन घोड़े का नाम है। इसे सूर्य ने लिया।

    (8) कोसुंब मणि। इसे विष्णु जी ने लिया।

    (9) पारिजात जिसे कल्पवृक्ष भी कहते हैं। यह एक स्वर्गीय पेड़ था।

    (10) सुरभि। यह एक बेहतरीन गाय थी, जो ऋषियों को दी गई।

    (11) ऐरावत। यह एक नायाब हाथी था, जो इंद्र के हिस्से में आया।

    (12) शंख। जिसको फूँकने से बादल की गरज पैदा होती थी। यह विष्णु जी ने लिया।

    (13) कमान, यह एक अजीब कमान थी।

    (14) विष।

    मत्स्य

    इसके मायने हैं मछली, यह एक अवतार का नाम है। राजा मनु जिसने दो लाख बरस तपस्या की थी, एक बार कृतमाला नदी में स्नान कर रहा था। अचानक एक ख़ूबसूरत मछली उसके हाथ आई। राजा उसे एक रात-दिन हाथ में लिए रहा और उसकी ख़ूबसूरती को देखता रहा, फिर उसे एक घड़े में डाला, मगर वह घड़े में न समाई, राजा ने उसे एक कुएँ में डाल दिया मगर कुएँ में भी न समा सकी। कुएँ से निकाल कर उसे एक तालाब में पहुँचाया। जब तालाब में भी उसके लिए जगह न बची तो गंगा नदी में डाली गई। यहाँ भी उसने हाथ-पाँव फैलाए, और पूरी नदी में न समा सकी। मजबूरन उसे समंदर में पहुँचाया। यहाँ पहुँच कर वह इतना फैली कि पूरे समंदर पर छा गई। अब राजा समझा कि यह ईश्वरीय रहस्य है। मछली ने राजा से कहा कि एक हफ़्ते के बाद जल-प्रलय उमड़ेगा। तूफ़ान के कारण सारी दुनिया पानी में डूब जाएगी। तुम फ़लाँ कश्ती पर देवताओं के साथ बैठ जाना और कश्ती को मेरे इस सींग से जो माथे से निकला हुआ है, बाँध देना। इसलिए तूफ़ान आया और सत्रह लाख अट्ठाईस हज़ार बरस तक रहा। पूरी दुनिया तबाह हो गई। सिर्फ़ मनु और उसके साथी महफ़ूज़ रहे। फिर मनु की नस्ल से दुनिया दोबारा आबाद हुई। कहते हैं कि एक बार एक सरकश दैत्य जिसका नाम शंखासुर था, वेदों को चुराकर समंदर में छुप गया था। ब्रह्मा जी के फ़रियाद करने पर यह अवतार समंदर की तह में पहुँचा और उस दैत्य को मारकर वेदों को वापस लाया।

    वामन अवतार जिसको बावन अवतार भी कहते हैं। इस अवतार के प्रकट होने का वाक़या ब्राह्मणों ने इस तरह बयान किया है। दैत्यों का एक राजा था जिसे राजा बलि कहते हैं। उसने तीनों लोक अपने क़ब्ज़े में कर लिए थे। देवताओं को हराकर उनका मुल्क छीन लिया था। देवताओं की मदद के लिए यह अवतार प्रकट हुआ। ठीक उसी समय जब राजा बलि यज्ञ कर रहा था, यह अवतार उसके पास पहुँचा और उससे तीन क़दम ज़मीन माँगी। राजा ने इस माँग को तुच्छ समझ कर कहा कि माँग मेरे दर्जे के मुताबिक़ होनी चाहिए। वामन अपनी माँग पर अड़े रहे। राजा ने इजाज़त दी कि तीन क़दम नाप कर ज़मीन ले ले। वामन ने एक क़दम ऊपर के लोक पर रखा। दूसरे क़दम से बीच के लोक को नापा। तीसरे क़दम के लिए कहा कि सारी ज़मीन मेरे एक क़दम के बराबर है। राजा अपने वचन पर अडिग रहा और ख़ुद को उनके क़दमों में डाल दिया। वामन जी ने ख़ुश होकर पाताल का मुल्क उसे बख़्श दिया और दैत्यों की प्रवृत्तियाँ उससे दूर कर दीं।

    वराह अवतार इस अवतार के प्रकट होने का कारण यह है कि एक निहायत सरकश और ताक़तवर दैत्य हरनाकश नामी ज़मीन को चुराकर समंदर में पाताल तक खींच ले गया था। ब्रह्मा जी की प्रार्थना पर इस अवतार ने प्रकट होकर हाथी की शक्ल इख़्तियार की। समंदर में कूद कर अपने बड़े दाँत पर ज़मीन को रख लिया और समंदर से खींच लाया। फिर हरनाकश से जंग हुई जो एक हज़ार साल तक रही। आख़िर हरनाकश मारा गया।

    **नरसिंघ अवतार** हरनाकश का जुड़वां भाई। हरनाकाशपु भी निहायत ज़ालिम और मगरूर था। शिवजी की पूजा करने से उसे यह वरदान मिला कि न कोई इंसान उसे मार सकेगा न कोई जानवर। उसकी मौत न दिन के वक़्त होगी न रात को, वह न आसमान पर मारा जाएगा न ज़मीन पर। अपनी मौत की तरफ़ से बेफ़िक्र होकर उसने बग़ावत कर दी। देवताओं से लड़ कर उनका सारा मुल्क छीन लिया। उसने सारे मुल्क में मुनादी कर दी कि मेरी हुकूमत में कोई शख़्स नारायण का नाम न ले। उसका बेटा प्रह्लाद भगवान का भक्त था। उसको बहुत समझाया कि वह भगवान की भक्ति छोड़ दे मगर उस पर कोई असर नहीं हुआ। एक दफ़ा प्रह्लाद के क़त्ल का इरादा करके उसने तलवार उठाई और उससे कहा कि अब देखूं तुझे मेरे हाथ से कौन बचाता है। यह कहकर उसने तलवार चमकाई ही थी कि अचानक उसके क़रीब एक खंभे से नरसिंघ अवतार प्रकट हुए। उनका ऊपर का जिस्म शेर और नीचे का जिस्म इंसान का था। उन्होंने हरनाकाशपु को पकड़ कर अपनी जांघ पर बिठा लिया और पंजे और नाखूनों से उसका पेट चीर डाला। उस वक़्त शाम का वक़्त था। न दिन था न रात, उसकी मौत न आसमान पर हुई न ज़मीन पर और न वह किसी इंसान के हाथ से मारा गया न जानवर के हाथ से, ग़रज़ कि शिवजी का कहना हर तरह पूरा हुआ।

    **परसराम** यह विष्णुजी के छठे अवतार हैं। श्री रामचंद्र जी सातवें अवतार थे। यह छत्रियों का दुश्मन और ब्राह्मणों का दोस्त था। उसने इक्कीस दफ़ा छत्रियों से जंग की और उनको क़त्ल किया। वजह यह थी कि एक छत्री राजा जिसका नाम कार्तवीर्य था और जिसके हज़ार हाथ थे, एक दफ़ा उसके मकान पर आया और उसकी ग़ैर-मौजूदगी में उसकी एक बेहतरीन गाय जिसका नाम कामधेनु था, चुराकर ले गया। परसराम को जब इस वाक़ये की ख़बर हुई, तो उसने राजा का पीछा किया और उससे लड़ कर उसके हज़ार हाथ काट डाले और उसे क़त्ल कर दिया। फिर ग़ुस्से की हालत में बार-बार छत्रियों से जंग की और पांच झीलें उनके ख़ून से भर दीं। परसराम के हाथ में हथियार की जगह हमेशा एक कुल्हाड़ी रहती थी।

    **कृष्ण** यह मशहूर अवतार हैं। मां का नाम देवकी, पिता का नाम वासुदेव था। उस ज़माने में मथुरा का शासक राजा कंस था, जो निहायत ज़ालिम था। ज्योतिषियों ने ख़बर दी थी कि देवकी का लड़का तुझे क़त्ल करेगा। यह सुनकर उसने वासुदेव और देवकी को क़ैद कर लिया। नतीजतन देवकी के कई बच्चों को उसने मार डाला। आख़िरी गर्भ से श्री कृष्ण जी पैदा हुए। भगवान को मंज़ूर था कि वह उसके हाथ से महफ़ूज़ रहें। चुनांचे वह अजीब तरीक़े से महफ़ूज़ रहे। जवान होने पर भी कंस ने बहुत तरकीबें कीं कि उनको क़त्ल कर डाले मगर उसका बस नहीं चला और आख़िरकार वह ख़ुद श्री कृष्ण जी के हाथ से क़त्ल हुआ। उनके अजीब-अजीब कारनामे मशहूर हैं। महाभारत की जंग में वह पांडवों की तरफ़ थे और उनकी फ़ौज कौरवों की तरफ़ से लड़ रही थी, आठ रानियां थीं, मगर उनकी सबसे चहेती महबूबा का नाम राधा था।

    **विष्णु** हर बार दुनिया के वजूद में आने से पहले विष्णुजी, शेषनाग के बिस्तर पर लेटे पानी पर तैरते रहते हैं। इस हालत में उनका नाम नारायण है यानी पानी पर तैरने वाला। उनकी नाभि कमल के फूल जैसी है। ब्रह्मा जी उन्हीं की नाभि से पैदा हुए। शिवजी उनके माथे से प्रकट हुए। शिवजी मुख़्तलिफ़ सूरतों में प्रकट हुए हैं। इन सूरतों को अवतार कहते हैं। नौ अवतार ज़ाहिर हो चुके हैं यानी मत्स्य, कूर्म, वराह, नरसिंघ, वामन, परसराम, राम, कृष्ण, बुद्ध। नौवें अवतार का आना बाक़ी है। इस आख़िरी अवतार को हिंदू कल्कि अवतार कहते हैं। गंगा विष्णु जी के पैरों से निकली है, वह दुनिया की हिफ़ाज़त और परवरिश करते हैं। उनके हज़ार नाम हैं। उनकी बीवी का नाम लक्ष्मी है। रंगत सांवली है, शक्ल हसीन है। चार हाथ हैं। पांच हथियारों से लैस रहते हैं। उनकी कमान (धनुष) का नाम शारंग और तलवार का नाम नंदक है। एक हथियार का नाम सुदर्शन और एक का नाम गऊ मुखी है, कुछ सिफ़ाती (विशेषता बताने वाले) नाम नीचे दिए गए हैं: अमर, अनंत, सांप के बिस्तर वाले, चार हाथ वाले, गायों के रक्षक, तत्वों के मालिक, पानी पर सोने वाले, लक्ष्मी के पति, पांच हथियारों से लैस, कमल जैसी नाभि वाले, पीले कपड़े पहनने वाले, स्वर्ग के मालिक वग़ैरह।

    **शिव** इनको महादेव भी कहते हैं, यह विष्णु जी के माथे से प्रकट हुए। अलग-अलग ख़ूबियों की वजह से अलग-अलग नाम हैं। तबाह और बर्बाद करने वाली ताक़त की वजह से उनके नाम हैं: महाकाल, सरापा ग़ज़ब (पूरी तरह क्रोधित), लाल जटाओं वाले। इस हालत में उनकी सवारी कुत्ता है। जिस्म पर सांप लिपटे रहते हैं, शराब पी कर मस्त नज़र आते हैं। उनका एक नाम भूतेश्वर है यानी भूतों के मालिक। इस ख़ूबी की वजह से वह क़ब्रिस्तानों और श्मशानों में घूमते नज़र आते हैं। सर पर सांपों की जटा, गले में खोपड़ियों की माला होती है। भूतों की फ़ौज साथ रहती है, भूत उनके चारों ओर मस्त होकर तेज़ी के साथ नाचते हैं और वह ख़ुद भी नाचते हैं। उनके पांच मुंह हैं। तीन आंखें हैं। तीसरी आंख माथे के बीच में है, जिससे ग़ुस्सा और जलाल टपकता है। माथे के चारों ओर चांद घेरा बनाए हुए है। ज़हर पीने की वजह से गला नीला नज़र आता है। हाथ में त्रिशूल है। पोशाक हिरन, शेर या हाथी की खाल होती है। नंदी बैल उनके साथ रहता है, कुछ सिफ़ाती नाम नीचे दिए गए हैं: तीन आंखों वाला, नीले गले वाला, चांद जैसे ताज वाला, जटाओं वाला वग़ैरह।

    **हनुमान** राजा सुग्रीव का जनरल, जिसने श्री रामचंद्र जी की लंका की जंग में मदद दी। उसकी शक्ल बंदर जैसी है। उसकी सेवाएं देवताओं से किसी तरह कम नहीं हैं। वह हिंदुस्तान के दक्षिणी किनारे से फांद कर लंका पहुंचता है, सीताजी को श्री रामचंद्र जी का पैग़ाम पहुंचाता है, रावण के बाग़ को वीरान करता है, जब राक्षसों ने उसकी पूंछ पर रुई लपेट कर आग लगा दी, तो वह अपनी पूंछ की आग से पूरी लंका को फूंक देता है। उसका रंग पीला और लाल दहकते सोने की तरह चमकदार है। चेहरा लाल-ए-रुमानी (अनार जैसे लाल रत्न) की तरह बहुत लाल है। क़द ऊंची मीनार या पहाड़ के जैसा है। वह बड़े-बड़े पेड़ों को जड़ से उखाड़ कर फेंक देता है। पहाड़ को सर पर उठा लेता है, हवा पर उड़ता है। बादलों को हाथ से पकड़ लेता है। सूरज को अपने मुंह में छुपा लेता है। जंग के दौरान वह हिमालय पहाड़ से दवाएं लाता है, जिससे ज़ख़्मी बंदर तंदुरुस्त होते हैं। जब लक्ष्मण जी पर बेहोशी तारी होती है, तो वह जीवन बूटी लाता है और उनकी बेहोशी दूर करता है। उसका सिफ़ाती नाम मारुत पुत्र यानी हवा का बेटा है। हिंदुस्तान में हर जगह उसकी पूजा की जाती है।

    **भीष्म** हस्तिनापुर के शासक राजा शांतनु का बड़ा लड़का था। उसकी मां का नाम गंगा था। गंगा एक वादा-ख़िलाफ़ी की वजह से राजा से नाराज़ होकर चली गई थी। राजा ने एक जवान और हसीन औरत सत्यवती से शादी करनी चाही। उसके मां-बाप ने कहा कि तुम्हारे बाद सत्यवती की औलाद तख़्त की वारिस नहीं होगी, बल्कि यह हक़ तुम्हारे बड़े बेटे भीष्म का है। अगर तुम इक़रार करो कि सत्यवती की औलाद को तख़्त दिया जाएगा तो हम उसकी शादी करने पर राज़ी हैं। भीष्म को जब यह बात मालूम हुई तो बाप की आरज़ू पूरी करने के लिए उसने यह इक़रार किया कि न मैं ख़ुद शादी करूंगा न तख़्त लूंगा। इस इक़रार पर सत्यवती से राजा की शादी हो गई। इस शादी से राजा के यहां दो लड़के पैदा हुए। राजा के मरने के बाद भीष्म ने बड़े लड़के को तख़्त पर बिठाया मगर वह एक जंग में मारा गया। उसने उसके भाई को तख़्त पर बिठा दिया मगर वह भी जवानी में ही बिना औलाद के मर गया।

    भीष्म ने सत्यवती से कहा कि तुम व्यास जी को बुलाकर अपने आख़िरी बेटे की विधवाओं से औलाद पैदा कराओ। उसने ऐसा ही किया। इस तरह दो लड़के पैदा हुए। एक का नाम पांडु और एक का नाम धृतराष्ट्र रखा गया। इन दोनों की औलाद कौरव-पांडव के नाम से मशहूर हुई। जब दोनों में फूट पैदा हुई, तो वह सुलह का मशवरा देता रहा, मगर कुछ असर न हुआ। जंग शुरू हुई। यह भीष्म कौरवों का तरफ़दार था, इसका मुक़ाबला अर्जुन से हुआ। उसके तीरों से इसका सारा जिस्म छिद गया। दो उंगल जगह भी ज़ख्मों से खाली न रही। जब वह रथ से नीचे गिरा, तो तीरों को खड़ा करके उस पर सुलाया गया। ज़ख्म जानलेवा थे। मगर इस हालत में भी वह (58) दिन तक ज़िंदा रहा और अपने साथियों को नसीहत करता रहा। तीरों का बिस्तर इसी वाक़ये की तरफ़ इशारा करता है।

    भीम पांडु का दूसरा शहज़ादा था। यह निहायत ताक़तवर, तेज़ मिज़ाज, बेरहम और लंबे क़द का था। दरख़्तों को जड़ से उखाड़ फेंकता था। तमाचा मारकर हाथी का मुँह फेर देता था। गदा की लड़ाई और कुश्ती में बेमिसाल था। इसकी ख़ुराक बहुत थी। जितना खाना इसके चार भाई और इसकी वालिदा खाती थीं, उतना यह अकेला खा जाता था। दुर्योधन ने इससे जलकर इसे ज़हर खिलाया था। यह बच निकला। महाभारत की जंग में इसने बड़े-बड़े कारनामे दिखाए मगर दुर्योधन के साथ जंग के क़ायदों के ख़िलाफ़ धोखे की चाल चला। इसका सिफ़ाती (विशेषण) नाम दराज़-बाज़ू (लंबे हाथों वाला) है।

    जटायु गिद्धों का बादशाह था। जब रावण सीता जी को लंका ले जा रहा था, तो इसने रास्ते में रोका। मगर रावण के हाथ से ज़ख़्मी हुआ। श्री रामचंद्र जी जब शिकार से वापस आए और सीता जी को तलाश करने लगे, तो इसने पता बताया और सारा हाल कह सुनाया। रुद्र तूफ़ान और हवाओं का देवता है। जो लोग जानवरों और इंसानों को तक़लीफ़ पहुँचाते हैं, उनके लिए यह देवता जानलेवा है और उनके सिवा औरों पर मेहरबान है। कहते हैं कि यह देवता ब्रह्मा जी के माथे से पैदा हुआ। इसका आधा जिस्म औरतों जैसा और आधा जिस्म मर्दों जैसा है। जब ब्रह्मा जी ने इसे हुक्म दिया कि वह मख़लूक़ (सृष्टि) को पैदा करे तो इसने भूत और राक्षस पैदा किए। यह देखकर ब्रह्मा जी नाराज़ हुए और उन्होंने कहा कि इस बेहूदा मख़लूक़ को ख़त्म करके अच्छी मख़लूक़ पैदा करो। इसने कहा मैं ऐसी मख़लूक़ पैदा करना नहीं चाहता, जो ज़िंदगी और मौत के पंजे में क़ैद हो। ऐसी मख़लूक़ आप ख़ुद पैदा करें।

    कुंभकर्ण रावण का भाई था। इसकी ताक़त और भूख का अंदाज़ा लगाना मुश्किल है। छह महीने सोता और एक दिन जागता था। रावण ने इसको जगाना चाहा ताकि लड़ाई में मदद दे। बड़ी मुसीबत से जागा। शराब के हज़ार घड़े भाई से लेने तय किए और इस इक़रार पर जंग के लिए तैयार हुआ। हज़ारों बंदर इसने खा डाले। बंदरों के सरदार सुगदेव को गिरफ़्तार करके लंका में ले गया। आख़िरकार क़त्ल हुआ।

    शेषनाग साँपों का राजा है। पाताल के सातवें दर्जे में रहता है। जब दुनिया फ़ना होती है तो विष्णु जी इसको अपना बिस्तर बनाकर पानी पर तैरते हैं और यह अपने हज़ार सिरों से उन पर साया करता है। ज़मीन इसी पर टिकी हुई है। जब वह जम्हाई लेता है, ज़लज़ला (भूकंप) आता है। जब दुनिया के ख़ात्मे का वक़्त आता है तो अपनी फुंकार से आग निकालता है और दुनिया को नेस्त-ओ-नाबूद कर देता है। इसकी पोशाक अरग़वानी (गहरे लाल-बैंगनी) रंग की है। गले में सफ़ेद माला है। एक हाथ में हल और एक हाथ में मूसल है। बलराम जी इसी के अवतार थे। इसके महल का नाम मणि मंडप है। गणेश अक़्ल का देवता है। मुसीबतों को दूर करने वाला है। इसीलिए हर किताब इसके नाम से शुरू की जाती है। इसका जिस्म छोटा और मोटा है। रंग ज़र्द (पीला) है। पेट बड़ा है। चार हाथ हैं। सिर हाथी का है। मगर दाँत सिर्फ़ एक है। एक हाथ में शंख, दूसरे हाथ में चक्र, तीसरे हाथ में गदा और चौथे हाथ में कमल का फूल है। इसकी सवारी का जानवर चूहा है। कुछ सिफ़ाती नाम इस तरह हैं: एक दाँत वाला, फ़ील-चेहरा (हाथी के चेहरे वाला), दराज़-गोश (लंबे कानों वाला), कलाँ-शिकम (बड़े पेट वाला) वग़ैरह।

    शनि सूर्य का लड़का है और सितारों में शुमार किया जाता है। रंग स्याह (काला), पोशाक भी स्याह रंग की है। अगर शनि ऊपर की तरफ़ निगाह करे तो तमाम दुनिया नेस्त-ओ-नाबूद हो जाए, इसी ख़याल से वह हमेशा सिर झुकाए रहता है। ताकि उसकी निगाह किसी पर न पड़े। अमृत हवा के तूफ़ानों के देवता हैं। इनकी तादाद उनचास है। गरज और बिजली इनके हथियार हैं। आँधी इनकी सवारी है।

    दक्ष ब्रह्मा जी का लड़का है। ब्रह्मा जी ने इसे प्रजापतियों का सरदार बनाया। इस ख़ुशी में इसने एक यज्ञ का इंतज़ाम किया, जिसमें देवता और ऋषि बुलाए गए, मगर शिव जी नहीं बुलाए गए। शिव जी की बीवी उमा यज्ञ में पहुँचीं, मगर अपनी और अपने शौहर की बेइज़्ज़ती देखकर ग़ैरत से आग में जल गईं। दक्ष को शिव जी से दुश्मनी थी, इसीलिए उनको दावत नहीं दी गई। शिव जी इस वाक़ये को सुनकर ग़ुस्से में आ गए। वह अपने होंठों को दाँतों से चबाने लगे। सिर से बालों की एक लट उखाड़कर फेंकी, जिससे एक ख़ौफ़नाक आवाज़ निकली, साथ ही एक डरावनी सूरत ज़ाहिर हुई, जिसका नाम वीरभद्र मशहूर है। इसके हज़ार सिर थे। हज़ार आँखें थीं। हज़ार पाँव थे। हज़ार हथियार इसके हाथों में थे। इसकी शक्ल ख़ूँख़्वार और ख़ौफ़नाक और दहकती आग की तरह रोशन थी। सिर पर एक हिलाल (चाँद) नुमायाँ था। शेर की खाल जो ख़ून से सनी थी, इसके बदन पर थी। शिव जी ने इसको हुक्म दिया कि वह दक्ष के यज्ञ को ख़राब कर डाले। जब वीरभद्र अपनी अनगिनत फ़ौज लेकर चला, तो ज़मीन काँपने लगी, पहाड़ आपस में टकरा गए। हवा शोर-ओ-गुल से भर गई, समंदर में हलचल पैदा हुई।

    इसने यज्ञ को ख़राब किया। देवताओं में से जो इस यज्ञ में आए थे, इंद्र को ज़मीन पर गिरा दिया, यम को मारा-पीटा, सरस्वती और मात्री की नाक काट ली, मित्र की आँखें निकाल लीं, यूषन के दाँत हलक़ में उतार दिए, अग्नि के हाथ काट डाले, भार्गव की दाढ़ी मूँड दी, चाँद के मुँह पर एक तमाचा मारा, ब्राह्मणों पर पत्थर फेंके, दक्ष का सिर काटकर आग में झोंक दिया। यह हालत देखकर देवताओं ने माफ़ी माँगी और इल्तिजाएँ कीं। आख़िरकार उनकी ख़ता माफ़ की गई और उनके अंग फिर दुरुस्त किए गए। मनु वह हैं जिनसे इंसान की नस्ल चलती है। यह तादाद में चौदह हैं, पहला मनु स्वायंभु था। ब्रह्मा जी ने अपने जिस्म के दो हिस्से किए। उनसे एक मर्द और एक औरत पैदा हुई, मर्द विराज था और औरत शतरूपा। फिर इन दोनों से स्वायंभु पैदा हुआ (देखो लफ़्ज़ ब्रह्मा) इसी मनु की तरफ़ मनुस्मृति मंसूब है। मौजूदा ज़माने की नस्ल सातवें मनु से चली है। इस मनु का नाम ई दसवत है। मत्स्य देवता ने इसी को तूफ़ान की ख़बर दी थी। (देखो लफ़्ज़ मत्स्य) छह मनु इससे पहले गुज़र चुके हैं। हर मनु की उम्र 43 लाख 20 हज़ार साल की होती है।

    शिवि एक तपस्वी और दानी राजा था। एक दफ़ा अग्नि देवता ने कबूतर की सूरत इख़्तियार की, इंद्र देवता ने बाज़ बनकर उसका पीछा किया, कबूतर ने इस राजा की गोद में पनाह ली, बाज़ ने राजा से कबूतर की माँग की। इसने अपने जिस्म से गोश्त काटकर चाहा कि इस कबूतर के बराबर तौल कर दे मगर कबूतर का वज़न ज़्यादा निकला। इसने जिस्म से फिर गोश्त काटा मगर वह भी वज़न में पूरा न उतरा, मजबूरन अपना सारा जिस्म कबूतर के मुक़ाबले तराज़ू में रख दिया! अब दोनों पलड़े बराबर हो गए और बाज़ उड़ गया।

    विराध एक भयानक आदमखोर राक्षस था। दंडक वन में उसने श्री रामचंद्र जी का मुक़ाबला किया। उसके शरीर पर कोई वार कारगर नहीं होता था। पहाड़ जैसा क़द था। आँखें खोखली थीं। मुँह हद से ज़्यादा चौड़ा था। पेट उभरा हुआ था। शरीर लंबा और शक्ल डरावनी थी। शेर की ख़ून से सनी खाल उसकी पोशाक थी। आवाज़ में गरज थी। भाला हाथ में था। शेर, चीते, भेड़िये और हाथी के सिर लटकाए हुए था। श्री रामचंद्र जी ने तीर मारा तो कोई असर नहीं हुआ। उसने श्री रामचंद्र जी और लक्ष्मण जी को अपने कंधों पर उठा लिया। उन्होंने उसके बाज़ू तोड़ डाले। घूँसों से पीटा, मगर उसे मार नहीं सके। मजबूर होकर एक गड्ढा खोदकर उसे ज़िंदा दफ़न कर दिया।

    लोपामुद्रा ऋषि अगस्त्य की बहुत सुंदर पत्नी थी। जब इन ऋषि ने चाहा कि अपनी मर्ज़ी के मुताबिक़ किसी औरत से शादी करें, तो उन्होंने अलग-अलग जानवरों के ख़ूबसूरत अंगों को मिलाकर एक बहुत सुंदर लड़की बनाई और छुपकर एक राजा के महल में रखवा दी। वहाँ वह राजा की बेटी समझी गई और राजकुमारियों की तरह उसकी परवरिश की गई। जब वह जवान हुई, तो ऋषि अगस्त्य ने राजा से शादी की दरख़्वास्त की। राजा का दिल नहीं चाहता था मगर ऋषि की बात टालना पाप था। इसलिए उस ऋषि से लोपामुद्रा की शादी कर दी।

    नल-दमन। नल आशिक़ और दमन उसकी माशूक़ा थी। दोनों का क़िस्सा मशहूर है। फ़ैज़ी ने फ़ारसी में इस क़िस्से को एक मसनवी में बहुत ख़ूबसूरती से बयान किया है। दमन बरार के राजा भीम की बेटी थी, नल दूसरी रियासत का राजा था। दोनों एक-दूसरे का ज़िक्र सुनकर आपस में इश्क़ करने लगे। दमन बहुत सुंदर थी। नल बहादुर, सुंदर, नेक मिज़ाज, घुड़सवारी और सिपहगिरी (युद्ध कला) का माहिर था। साथ ही जुए की लत भी थी। राजा भीम ने दमन की शादी के लिए स्वयंवर की तैयारी की। उम्मीदवारों में नल भी था। नल के अलावा चार देवता यानी अग्नि, इंद्र, वरुण और यम भी उम्मीदवार थे। हालाँकि देवताओं ने नल जैसी ही शक्ल बना ली थी, मगर दमन ने अपने चाहने वाले को पहचान लिया और उसी को चुना। दोनों की शादी हो गई।

    राजा नल का एक भाई पुष्कर था, जो उससे दिल में जलन रखता था। उसने नल के साथ जुआ खेलने की शुरुआत की। पुष्कर खेल में धोखा देकर उस पर हावी हो गया। नल को इस बाज़ी में सब कुछ हारना पड़ा। अब सारा देश पुष्कर के हाथ में आ गया। उसने तख़्त पर बैठते ही ऐलान कर दिया कि मेरी प्रजा में से कोई नल और दमन को किसी क़िस्म की मदद न दे। एक अरसे तक दोनों मुसीबत के मारे जंगलों में भटकते रहे। आख़िरकार नल ने इस ख़याल से कि दमन तकलीफ़ न उठाए और अपने घर चली जाए, एक दिन उसे सोते हुए छोड़कर आगे की तरफ़ कूच कर दिया। दमन अपने घर नहीं गई, बल्कि चेदि के राजकुमार के यहाँ पनाह ली, मगर उसे दमन का हाल मालूम हो गया। उसने उसे उसके पिता के घर भिजवा दिया। नल को एक साँप ने काटा। मौत तो नहीं आई मगर सूरत बिल्कुल बदल गई। वह बहुत बदसूरत और छोटे क़द का हो गया। होते-होते वह अयोध्या के राजा ऋतुपर्ण के यहाँ नौकर हो गया। दमन के पिता ने नल की बहुत तलाश कराई मगर कामयाबी नहीं मिली।

    एक ब्राह्मण ने ख़बर दी कि नल ज़िंदा है और किसी जगह मौजूद है। उसने (दमन ने) ब्राह्मण का झूठ-सच मालूम करने के लिए दूसरी बार स्वयंवर की तैयारी की। राजा ऋतुपर्ण स्वयंवर में शामिल हुआ। नल उसका रथबान (सारथी) था। दमन ने उसे कुछ-कुछ पहचाना मगर यक़ीन नहीं हुआ। जब उसके हाथ का पका हुआ खाना दमन ने खाया तो फ़ौरन अपने पति को पहचान लिया, दोनों आपस में मिले। देवताओं की मदद से नल अपनी असली सूरत में आया, फिर उसने अपने भाई पुष्कर से चौसर खेलने की तैयारी की। इस बार वह बाज़ी जीत गया। अपनी सल्तनत वापस हासिल की, बल्कि पुष्कर की पत्नी भी जीत ली, मगर नल ने उसे माफ़ कर दिया और कोई तकलीफ़ नहीं पहुँचाई।

    लेख का अंत

    हिंदू साहित्य से मिसाल के तौर पर जो तल्मीहात (ऐतिहासिक या पौराणिक हवाले) हमने ली हैं, उनका इतना बयान शायद काफ़ी होगा, मगर जिस हिंदू ख़ज़ाने की तरफ़ हम इशारा कर चुके हैं, अगर उसको हमारे शायर और हमारे लेखक ग़ौर से पढ़ेंगे, तो उनको इस ख़ज़ाने से बहुत सी दिलचस्प तल्मीहात मिल सकेंगी। इसी तरह जिस इस्लामी और ग़ैर-इस्लामी ख़ज़ाने की तरफ़ हमने इशारा किया है, अगर उनसे भी काम लिया गया, तो ख़यालात को ज़ाहिर करने के बहुत से नए साँचे हाथ आएँगे। आख़िर में हम दो बातों की तरफ़ पढ़ने वालों का ध्यान ख़ास तौर पर दिलाना चाहते हैं।

    (पहली बात) तो वही है जिसे हम लेख की शुरुआत में बयान कर चुके हैं, यानी इंसानी ज़िंदगी, इंसानी अख़लाक़ और इंसानी समाज के इतने पहलू हैं कि उन्हें गिना नहीं जा सकता। हर पहलू के लिए एक नमूना हमारी आँखों के सामने मौजूद है। हम जानते हैं कि फ़लाँ इंसान इस क़िस्म की ज़िंदगी गुज़ारता है, फ़लाँ आदमी में इस क़िस्म के अख़लाक़ मौजूद हैं, मगर यह ज़रूरी नहीं कि हमारे पिछले इतिहास में भी कोई ऐसा नमूना मौजूद हो। इसलिए ज़रूरी है कि या तो हम एक ख़ास नमूने के इंसान की सही तस्वीर किसी क़िस्से के रूप में खींचें। फिर दूसरे लेखक जब इस नमूने के व्यक्ति का ज़िक्र करें, तो इस क़िस्से के नमूने को तल्मीह बनाकर उससे काम लें। या (2) अगर हमारी ज़बान के मशहूर क़िस्सों में किसी ख़ास नमूने के इंसान का ज़िक्र किया गया ہے, तो उस नमूने को तल्मीह का लिबास पहना दें, या (3) अगर उन क़ौमों के इतिहास, देवमाला (पौराणिक कथाओं) और साहित्य में (जो हमारे आस-पास आबाद हैं) और जिनसे रात-दिन हमारा वास्ता पड़ता है (हिंदू, सिख, पारसी, ईसाई वग़ैरह), ख़ास-ख़ास नमूनों के लोगों की तस्वीरें देखने में आएँ, तो उन नमूनों को बेझिझक तल्मीह बना लें।

    (दूसरी बात) यह है कि तल्मीह की बुनियाद अक्सर मशहूर बातों पर होती है, न कि हक़ीक़तों पर। इसलिए जिन बातों से तल्मीह ली जाती है, उन पर यह एतराज़ करना सरासर बेवक़ूफ़ी है कि इन बातों का सुबूत अक़्ल या नक़्ल (तर्क या परंपरा) से नहीं मिलता। जब हर तल्मीह किसी ख़याल को ज़ाहिर करने का एक साँचा है और यह साँचा इसलिए काम में लाया जाता है कि उस ख़याल की तस्वीर सुनने वालों की नज़र के सामने आ जाए, तो ज़रूरी है कि तल्मीह की बुनियाद जिस बात पर रखी जाए, वह लोगों में मशहूर हो। इस बात की हमें बिल्कुल परवाह नहीं करनी चाहिए कि असली और वाक़ई बात क्या है। क्योंकि जो बात असली और वाक़ई है और जो आम लोगों में मशहूर नहीं है और जो सिर्फ़ तहक़ीक़ करने वालों के दिमाग़ में है, अगर हम अपने ख़याल के चेहरे पर उसका नक़ाब डालेंगे, तो उस नक़ाब से उसका हुस्न दोगुना नहीं होगा बल्कि फीका पड़ जाएगा, और तल्मीह का जो मक़सद है, वह बिल्कुल ख़त्म हो जाएगा।

    मिसाल के तौर पर, सूर्य यानी सूरज को आम हिंदू एक देवता मानते हैं, उनके साहित्य में यह बात बयान की जाती है। इस देवता के रथ के आगे सात घोड़े जोते जाते हैं। बस इसी ख़याल पर तल्मीह की बुनियाद रखनी चाहिए। एक समझदार और पढ़े-लिखे हिंदू कह सकते हैं कि सूरज के रथ में सात घोड़ों का जोता जाना महज़ ढकोसला है। असली बात यह है कि सूरज की किरण सात रंगों से मिलकर बनी है। इससे साबित होता है कि यूरोप ने साइंस की इस क़दर तरक़्क़ी के बाद जिस हक़ीक़त का पता लगाया है, हमारे बुज़ुर्गों की नज़र उस पर हज़ारों साल पहले पड़ चुकी है। मुमकिन है कि इस पढ़े-लिखे हिंदू का यह ख़याल दुरुस्त हो, मगर जो शायर और लेखक इस तल्मीह से काम लेना चाहता है, उसको इतनी बारीकी में जाने की बिल्कुल ज़रूरत नहीं है। वह इसी आम और मशहूर ख़याल को तल्मीह का लिबास पहनाना पसंद करेगा। उम्मीद है कि हमारे शायरों और लेखकों के लिए यह इशारा काफ़ी होगा। फ़क़त।

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