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तन्क़ीद क्या है?

कलीमुद्दीन अहमद


अनुवाद : Rekhta Editor

कलीमुद्दीन अहमद

तन्क़ीद क्या है?

कलीमुद्दीन अहमद

MORE BYकलीमुद्दीन अहमद

    (1) भूमिका

    यूँ कहने को तो आलोचना का भंडार बहुत कुछ है, लेकिन यह भंडार कुछ यूँ ही सा है, अंदर से खोखला। आपने सेंट्सबरी की भारी-भरकम किताब आलोचना का इतिहास देखी होगी और आलोचकों की लंबी-चौड़ी सूची देखकर प्रभावित भी हुए होंगे। ऐसे बुज़ुर्ग, नामी, मशहूर आलोचक जो पिछली सदियों में आलोचना के बारे में सोच-विचार करते रहे हैं। इस लंबी-चौड़ी सूची का एक लंबा-चौड़ा परिशिष्ट भी मुमकिन है लेकिन कहना पड़ता है कि काम की बातें, वज़न और महत्व रखने वाली बातें बहुत कम मिलती हैं।

    रिचर्ड्स का कहना है, कुछ अटकलें, बहुत सारी चेतावनियाँ, कई अलग-अलग वाक्य, कुछ रौशन अंदाज़े, बहुत कुछ बयानबाज़ी और शायरी, बेइंतहा अफ़रा-तफ़री, काफ़ी आदेश, पूर्वाग्रह, सनक और मन की मौज, इन्हीं चीज़ों पर मौजूदा आलोचना की बुनियाद है। (1) कुछ अतिशयोक्ति ही सही, लेकिन बातें सही हैं और मुझे कहने दीजिए कि रिचर्ड्स की कोशिशों के बावजूद भी आलोचनात्मक शून्य बाक़ी है। रिचर्ड्स ने यह केंद्रीय सवाल पेश किया है, कलाओं का महत्व क्या है, वह कौन सी चीज़ है जो उन्हें बेहतरीन दिमाग़ों के सबसे संवेदनशील घंटों की साधना का हक़दार बनाती है और मानवीय प्रयासों की व्यवस्था में उनकी क्या जगह है? (2)

    यह सवाल अहम है, बहुत अहम है लेकिन संबंधित सवालों की सूची में इसका पहला नंबर नहीं। आलोचक को शुरुआत से शुरू करना है। आलोचना की शक्ति क्या है? इसकी क्या अहमियत है? इसका मक़सद, इसका कार्यक्षेत्र क्या है? मानवीय सभ्यता और संस्कृति की तरक़्क़ी में इसने क्या हिस्सा लिया है? व्यक्तिगत और सामाजिक दिमाग़ और ज़िंदगी को सुधारने में आलोचना का क्या मूल्य है? इन मसलों को पहले हल करना है। ये मसले कुछ नए नहीं, देखने में ये मामूली और घिसे-पिटे हैं, लेकिन इनकी अहमियत से इंकार मुमकिन नहीं और अभी तक ये सवालिया निशान बने हुए हैं। मौजूदा आलोचनात्मक साहित्य इन पर काफ़ी रौशनी नहीं डालता। कुछ अर्थपूर्ण इशारे और भविष्यसूचक बयान अलबत्ता मिलते हैं। बानगी के तौर पर चंद उपयोगी बातें यहाँ प्रस्तुत की जाती हैं। यह देखना है कि ये किस हद तक उपयोगी हैं। शायद आपको इस बात का एहसास होगा कि ये कथन ज़्यादा उपयोगी हैं,

    (1) मेरे ख़याल में विभिन्न अनुभवों की पहचान और उनके महत्व का अंदाज़ा लगाने का नाम आलोचना है।

    (2) आलोचना पहले और हमेशा संवेदनशीलता से जुड़ी है, शब्दों की सही पहचान और उनसे तेज़ी और ठीक-ठीक प्रभावित होने को आलोचना कहते हैं।

    (3) आलोचना का हमेशा कुछ मक़सद होता है और मोटा-मोटी यूँ समझिए कि यह मक़सद कलात्मक कृतियों की व्याख्या और साहित्यिक रुचि का सुधार है।

    (4) सही मायनों में आलोचना पूरे कलात्मक आंदोलन का हिस्सा है। यह आर्ट की अपने ऊपर हुकूमत की प्रक्रिया है। जैसे आर्ट ज़िंदगी की चेतना है, आलोचना आर्ट की चेतना है।

    (5) आलोचना और कुछ नहीं, यह साहित्यिक रुचि की तार्किक प्रक्रिया है, साहित्य की जाँच-परख के बाद यह देखना कि वह कौन सी चीज़ है जो साहित्य को ख़ुशगवार और इसी वजह से अच्छा बनाती है।

    ये इशारे उपयोगी ज़रूर हैं लेकिन बिल्कुल नाकाफ़ी हैं। इनकी बुनियाद पर आलोचना की इमारत खड़ी नहीं हो सकती। मैं कह चुका हूँ कि आलोचनात्मक साहित्य तो बहुत काफ़ी है लेकिन इसमें बुनियादी चीज़ों से संबंधित काम की बातें कम हैं। आलोचकों ने ज़रूरी बातों की तरफ़ कम ध्यान दिया है। अपनी सामग्री की तरफ़ पूरा ध्यान लगाया है। लेकिन उस औज़ार का ज़िक्र भी नहीं करते जिससे वे काम लेते हैं। आर्ट, साहित्य, शायरी, ड्रामा, इन चीज़ों की परिभाषा, सीमा-निर्धारण, इनकी व्याख्या और महत्व के बारे में तो आलोचक बहुत बढ़-चढ़कर बोलते हैं, लेकिन इस बड़ी देन का वे बिल्कुल ज़िक्र नहीं करते जिसके बिना वे आलोचक बन नहीं सकते हैं और इस बड़ी देन की उपेक्षा की बुनियाद अरस्तू ने डाली। वह कहता है, मैं शायरी के मूल स्वभाव पर चर्चा करूँगा। इसकी विभिन्न क़िस्मों और इनकी विशेषताओं को बयान करूँगा। प्रकृति के नियमों के अनुकरण में हमें प्राथमिक सिद्धांतों से शुरुआत करनी है।

    ज़ाहिर है अरस्तू का विषय शायरी है, वह शक्ति नहीं जो उसे शायरी के मूल और इसकी क़िस्मों को समझने के क़ाबिल बनाती है। प्रकृति के नियमों के अनुकरण में उसे आलोचना के मूल पर लिखना चाहिए था, लेकिन इस तरफ़ अरस्तू का ध्यान नहीं गया और उसके अनुयायियों ने भी इस तरफ़ ध्यान नहीं दिया। अरस्तू का असर कुछ ऐसा ज़बरदस्त था कि सदियों तक आने वाले आलोचक सिर्फ़ अरस्तू के ख़यालात को समझने में लगे रहे। इन विचारों की व्याख्या, इनका स्पष्टीकरण, इनकी गहराई बस यही उनका लक्ष्य बन गया। नतीजा वही हुआ जो होना था। यानी एक लंबे समय तक किसी नए रास्ते का ख़याल भी दिल से मिट गया। अरस्तू के नज़रियों का असर यह हुआ कि नए, ताज़ा विचार एक मुद्दत के लिए ग़ायब हो गए। इससे ज़्यादा भ्रामक असर यह हुआ कि सारे आलोचक, वे अरस्तू के अनुयायी हों या न हों, शायरी की प्रकृति खोजने में मग्न हो गए लेकिन कभी भूले से भी उन्होंने आलोचना की प्रकृति खोजने की हल्की सी कोशिश भी न की।

    कहा जाता है कि आलोचना अपनी ज़ात से नहीं किसी दूसरी चीज़ से जुड़ी है। इस दूसरी चीज़ पर ज़रूरत से ज़्यादा ज़ोर दिया गया है। आलोचना किसी दूसरी चीज़ से जुड़ी ज़रूर है, लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि आलोचना अपने आप में भी कोई चीज़ है। यह है तो महज़ मामूली सी बात लेकिन इससे सरासर लापरवाही बरती गई है। कुछ बिखरे हुए इशारे कहीं-कहीं मिल जाते हैं लेकिन इनके अलावा सन्नाटा है। इस ग़लती की वजह से आलोचना झगड़ने वाले और झगड़ालू वक्ताओं का मैदान बन गई है। वे यह भी नहीं जानते कि झगड़ा किस बात का है। व्यक्तिगत पूर्वाग्रहों और भ्रमों की वजह से हम असल काम को भूल जाते हैं। इसी ग़लती का नतीजा है कि आलोचक ग़लत रास्ते पर चल पड़े और मंज़िल बराबर दूर होती गई।

    आलोचना किसी दूसरी चीज़ से जुड़ी है। यह हक़ीक़त का अधूरा ज्ञान है। इसी अधूरे ज्ञान का नतीजा है कि आलोचक को परजीवी समझा गया है और आलोचना को महज़ एक परजीवी प्रक्रिया। कहा जाता है कि आर्ट गोया बड़ा दरख़्त और आलोचना परजीवी पौधा है। जो अपनी ख़ुराक इस दरख़्त से पाता है। इसी सोच का नतीजा है कि किसी ने कहा, जानते हो आलोचक हैं कौन? बस वही जो साहित्य और कला के मैदान में नाकामयाब रहे हैं। इस क़िस्म की ग़लतफ़हमी पर वक़्त बर्बाद करने की ज़रूरत न होती लेकिन अफ़सोस की बात तो यह है कि यह ग़लतफ़हमी आम है। इससे मालूम होता है कि आलोचना को कितना तुच्छ समझा जाता है। एक दूसरे साहब फ़रमाते हैं, आलोचना ऐसा आर्ट है जिसे ज़िंदगी से कोई लगाव नहीं, इसे दूसरी कलाओं से अलबत्ता लगाव है। यह परजीवी है लेकिन ख़ुशगवार।

    और एलियट का कहना है कि दूसरे दर्जे का दिमाग़ आलोचना के काम में कामयाब हो सकता है। वह यह भी कहता है, एक वक़्त मैं इस हद तक अतिवादी था कि मैं समझता था कि सिर्फ़ वही आलोचक पढ़ने के क़ाबिल हैं जो ख़ुद उस कला में व्यावहारिक पकड़ और अच्छी पकड़ रखते हैं जिसके बारे में वे लिखते हैं। ख़ैर अब यह अतिवाद एलियट ने छोड़ दिया है।

    आमतौर पर यह समझा जाता है कि आर्टिस्ट एक महान व्यक्तित्व है जिसे अलौकिक शक्ति हासिल है। उसके सिर के चारों ओर मानो एक रोशन घेरा है जो उसके देवत्व की निशानी है। उसकी आत्मा सितारे की तरह रोशन है और वह अलग, ज़मीन से दूर और ऊंचे मुक़ाम पर रहती है। इस क़िस्म का ख़याल पुराने ज़माने की यादगार है, जब आर्टिस्ट को जादूगर माना जाता था और जब आर्टिस्ट और जादू में चोली-दामन का साथ था। आर्टिस्ट को अपनी महानता का एहसास है। शेली ने कहा है, कवि समझ में न आने वाले अंतर्ज्ञान (intuition) के मालिक हैं। वे एक आईना हैं जिसमें भविष्य अपना महान अक्स वर्तमान पर डालता है। वे ऐसे शब्द हैं जो ऐसी हक़ीक़त को ज़ाहिर करते हैं जो उनकी समझ से बाहर है। वे फ़ौजी संगीत की तरह जंग के लिए उभारते हैं लेकिन उस जोश और उत्साह को महसूस नहीं करते जो उनकी देन है। वे लोगों को प्रभावित करते हैं लेकिन ख़ुद प्रभावित नहीं होते। वे दुनिया के ऐसे शासक हैं जिन्हें दुनिया स्वीकार नहीं करती।

    आर्टिस्ट की तारीफ़ में जो कुछ कहा गया ہے वह एक हद तक सही है, लेकिन बेचारे आलोचक के साथ नाइंसाफ़ी बरती गई है। उसके सिर के चारों ओर कोई चमकता हुआ घेरा नहीं। कहा जाता है कि वह आर्टिस्ट से बहुत पीछे, हांफता, कांपता चलता है इस उम्मीद में कि उसे आर्टिस्ट की क़रीबी नसीब हो और वह आर्टिस्ट की रंगीन सुनहरी बातों को सुने, समझे और उनकी क़द्र-ओ-क़ीमत का जायज़ा ले और दूसरों को इस क़द्र-ओ-क़ीमत से आगाह करे। यानी आलोचक कुछ यूं ही सा है, कुछ बेकार क़िस्म का। अगर वह चमकता है तो मांगी हुई रोशनी में। अगर आलोचक को कम दर्जे का, इस क़दर कम दर्जे का समझा जाता है तो इसमें कुछ उसका अपना भी क़ुसूर है। उसने हमेशा आर्टिस्ट को जानने की कोशिश की लेकिन अपनी हस्ती को कभी न पहचाना। फिर क्या गिला कि दूसरों ने उसे न पहचाना, उसकी कोई अहमियत न समझी और उसकी क़द्र न की?

    आर्टिस्ट ने हमेशा आलोचक को पीछे ढकेल दिया है और रचना को हमेशा आलोचना से अलग समझा गया है। यह कोई ऊंची और महान चीज़ है। अंतर्ज्ञान है जिसे आलोचना से कोई वास्ता नहीं। आर्टिस्ट मानो एक ऐसा साज़ (Aeolian harp) है जो अंतर्ज्ञान की हवा से बजता है। वह कमल के फूल की तरह मेहनत की मुश्किलों और जी-तोड़ कोशिशों से वाक़िफ़ नहीं। सोचने का यह अंदाज़ रूमानी (रोमांटिक) क़िस्म का है जिसे हक़ीक़त से कोई सरोकार नहीं। सच्चाई यह है कि हर रचनात्मक प्रक्रिया में आलोचना का होना ज़रूरी है, अब हम लोग यह समझने लगे हैं कि कोई ऐसा आर्टिस्ट नहीं जो हर मुक़ाम पर पहले अच्छा आलोचक न हो। कलात्मक कारनामा आलोचनात्मक चेतना के माहौल में फलता-फूलता है।

    एलियट ने इस बात को स्पष्ट रूप से बयान किया है, शायद किसी लेखक की रचना में जो मेहनत लगती है, उस मेहनत का बड़ा हिस्सा आलोचनात्मक मेहनत है। छान-बीन करना, तरतीब देना, निर्माण करना, कुछ बदलना और निकालना, कमियों को दूर करना और फिर जांचना। यह मेहनत, यह कोशिश सिर्फ़ रचनात्मक नहीं, आलोचनात्मक भी है। मैं समझता हूं कि जिस क़िस्म की आलोचना एक माहिर और लिखने वाला अपने काम में इस्तेमाल करता है वह सबसे ज़्यादा और सबसे ऊंचे दर्जे की आलोचना है और (जैसा कि मैंने कहा है) कुछ कलाकार दूसरे कलाकारों से बेहतर होते हैं तो सिर्फ़ इसीलिए कि उनकी आलोचना की शक्ति ज़्यादा अच्छी होती है। हमें यह भी मालूम है कि जो आलोचनात्मक समझ हम लोगों को इतनी मुश्किल से हासिल होती है, वह दूसरे ख़ुशक़िस्मत लोगों के लिए रचना की गर्मी में चमक जाती है। हम लोग यह समझते हैं कि आलोचनात्मक मेहनत का ज़ाहिर न होना इस बात का सुबूत है कि आलोचनात्मक मेहनत काम में नहीं लाई गई है। हमें मालूम नहीं कि कितनी आलोचनात्मक मेहनत ने रचना का रास्ता खोला है या आलोचनात्मक रूप में क्या-क्या कोशिशें रचनात्मक कारनामे के दौरान आर्टिस्ट के दिमाग़ में होती रहती हैं।

    जिसने कोई नज़्म लिखी है, कोई तस्वीर बनाई है, वह जानता है कि यह काम पहाड़ खोदने से कम नहीं और यह पहाड़ खोदना आलोचनात्मक है। रचना और आलोचना में जो गहरा संबंध है, अब उसका एहसास होने लगा है और यह बहुत अच्छी बात है। ज़ाहिर है कि आलोचना के बिना रचना में कामयाबी मुमकिन नहीं। यह सब सही, लेकिन अभी तक आलोचना को तुलनात्मक रूप से कम अहमियत दी जाती है। एलियट कहता है, क्या आलोचनात्मक लेखन का बहुत बड़ा हिस्सा रचनात्मक नहीं होता? आलोचनात्मक प्रक्रिया अपना सबसे ऊंचा, अपना असली रूप रचना से मिलाप में पाती है।

    इससे ज़ाहिर होता है कि सब कुछ कहने के बाद भी एलियट आलोचना की सही अहमियत से वाक़िफ़ नहीं हैं। इस हक़ीक़त का एहसास कहीं नहीं मिलता कि आलोचना की अपनी अलग हस्ती है और उसका अपना भी कोई काम है, और आज इस बात का एहसास ज़रूरी हो गया है। आलोचना को बहुत बड़ा फ़र्ज़ अंजाम देना है। ख़ासकर इस ज़माने में जब तरह-तरह के भयानक आध्यात्मिक, मानसिक और भावनात्मक ख़तरे हमारी राह में हैं।

    (1) प्रिंसिपल्स ऑफ़ लिटरेरी क्रिटिसिज़्म।

    (2) प्रिंसिपल्स ऑफ़ लिटरेरी क्रिटिसिज़्म।

    (2) आलोचना क्या है?

    आलोचना सांस की तरह ज़रूरी है। यह प्रकृति की बहुमूल्य देन है। देखने और बोलने की शक्ति की तरह इसकी क़ीमत का भी अंदाज़ा लगाना मुमकिन नहीं। शायद इन दोनों से आलोचना की क़द्र-ओ-क़ीमत कुछ ज़्यादा है। हम आस-पास की चीज़ों को देखते हैं, हम एक-दूसरे से बोल-चाल करते हैं लेकिन इस देखने, इस बोल-चाल को हम मामूली बात समझते हैं और इसकी अहमियत, इसकी क़द्र-ओ-क़ीमत का हम सही अंदाज़ा नहीं लगा सकते हैं। यह तो कहने की शायद ज़रूरत नहीं कि ये चीज़ें कितनी ज़रूरी हैं। अगर हम देखने और बोलने से लाचार हो जाएं तो फिर ज़िंदगी में क्या रखा है? लेकिन हम इस हक़ीक़त पर कभी ग़ौर नहीं करते। बच्चा स्वाभाविक रूप से अपनी आंखों से काम लेना सीख लेता है। इसी स्वाभाविक तरीक़े से, लेकिन ज़रा ज़्यादा मुश्किल से, वह बोलना भी सीख लेता है और यह सीखना कुछ ऐसा आहिस्ता और धीरे-धीरे होता है कि ज़ाहिर तौर पर कुछ नज़र नहीं आता। जब बच्चा दो खिलौनों में फ़र्क़ करने लगता है, उस वक़्त आलोचना की झलक नज़र आती है। यह आलोचना का ही करिश्मा है कि वह एक खिलौना पसंद करता है और दूसरा नापसंद।

    यह समझ तो बच्चे को होती है लेकिन इस समझ में चेतना और सूझ-बूझ का कोई अंश नहीं होता। वह तो एक ऐसे एहसास से मजबूर होकर काम करता है जिसकी वजह उसको समझ में नहीं आती। वह कोई एक खिलौना तो पसंद कर लेता है, लेकिन अपनी पसंद की वजह हमें नहीं बता सकता। इसलिए कि यह वजह उसे मालूम नहीं। वह कोई काम तो करता है, लेकिन उसे इतनी समझ नहीं होती कि वह इस काम की वजह पता कर सके। मुमकिन है कि उसके ज़ेहन में इस वजह का धुंधला सा ख़ाका मौजूद हो, लेकिन वह इस ख़ाके में रंग भरकर उसे उजागर नहीं कर सकता। यानी बच्चे में आलोचना की शक्ति तो होती है लेकिन कुछ गूंगी सी। अभी उसे बोलना नहीं आता। वह चीज़ों की तुलना करता है, उनमें जो फ़र्क़ है उसकी समझ रखता है। किसी एक चीज़ को पसंद भी करता है और उसकी क़द्र-ओ-क़ीमत भी जानता है, लेकिन यह पसंद व्यक्तिगत और कुछ आवारा क़िस्म की होती है। वह इसकी कोई माक़ूल (तर्कसंगत) वजह नहीं बता सकता।

    बच्चा तो ख़ैर बच्चा है। बड़ों का भी यही हाल है। वे भी अपनी पसंद और नापसंद की कोई ठोस वजह नहीं बता सकते। वे भी किसी चीज़ को पसंद करते हैं तो किसी को नापसंद। वे भी अनुभवों में फ़र्क करते हैं और उनकी अहमियत समझने की कोशिश करते हैं, लेकिन अपनी पसंद की वजह सिर्फ़ यही बता सकते हैं, मुझे यह पसंद है। यों कहने को तो वे ज़्यादा शब्दों का इस्तेमाल करते हैं और उनकी लिखावट या बातचीत भारी-भरकम होती है लेकिन इस लिखावट या बातचीत में सार कुछ ज़्यादा नहीं होता। जिसे हम आलोचना (तनक़ीद) कहते हैं उसमें भी यही कमी होती है। हमारे आलोचक बातें तो बहुत बनाते हैं, उसूलों और नज़रिए का हवाला भी देते हैं और कुछ ऐसे शब्दों और वाक्यों को काम में लाते हैं कि पढ़ने वाले प्रभावित हो जाते हैं लेकिन ग़ौर करने से इन शब्दों और वाक्यों की पोल खुल जाती है और ये बातें बिल्कुल खोखली मालूम होती हैं,

    डॉक्टर ख़ालिद का विषय सिर्फ़ हुस्न और इश्क़ नहीं। वे दुनिया के विचारों और घटनाओं से भी असर लेते हैं। चुनांचे मौजूदा जंग में हिंदुस्तान के एक ख़ास तबक़े की ज़िंदगी पर उन्होंने किस तरह आँसू बहाए हैं, इसका अंदाज़ा उनकी नज़्म 'एक कुतबा' देखने से हो सकता है,

    शेर दिल ख़ाँ!

    मैंने देखे तीस साल

    एक के बाद एक फ़ाक़े

    लगातार ज़िल्लतें

    सो रहा हूँ इस गड्ढे की गोद में

    मिस्र के सूरज के साए तले

    मैं कुँवारा ही रहा

    काश मेरा बाप भी

    उफ़ कुँवारा!

    क्या कहूँ

    यह ज़ख़्मी हिंदुस्तान के हश्र की तस्वीर है। आज लाखों हिंदुस्तानी नौजवान जंग के खूँखार जबड़ों का शिकार हो चुके हैं और यह विषय आज घर-घर चर्चा में है। डॉक्टर ख़ालिद ने इसी को पेश करके हज़ारों दिलों की तर्जुमानी कर दी है।

    विषय का घर-घर चर्चा में होना, दुनिया के विचारों और घटनाओं से असर लेना, हज़ारों दिलों की तर्जुमानी करना ऐसे वाक्य हैं जिनसे पढ़ने वाले को प्रभावित किया जाता है और जिनसे आलोचनात्मक नज़र की कमी पर पर्दा डाला जाता है। इबादत बरेलवी को यह मामूली सी नज़्म पसंद है और वे अपनी नाजायज़ पसंद को जायज़ साबित करने के लिए इस तरह के वाक्यों का इस्तेमाल करते हैं। उन्हें मालूम नहीं कि अगर ये बातें सही भी हों तो भी इनसे इस नज़्म का शायराना हुस्न साबित नहीं होता। कलात्मकता तो सिरे से मौजूद ही नहीं है। और ये सारी बातें खोखली हैं। उन्हें यह भी नहीं मालूम कि इस नज़्म का केंद्रीय विचार हाउसमेन (Housman) की नज़्म से लिया गया है।

    मैं कुँवारा ही रहा काश मेरा बाप भी उफ़ कुँवारा! क्या कहूँ?

    For so the game is ended. That should not have begun. My Father and my my mother. They had a likely son. And I have non.

    ज़ाहिर है कि एक कुतबा में हाउसमेन के विचारों का विकृत रूप है। विचारों का भी और शैली का भी। उफ़ कुँवारा! क्या कहूँ? पर सिर्फ़ हँसी आ सकती है और बस। हाँ, तो यहाँ आलोचना नहीं, भारी-भरकम लेकिन खोखली बातें हैं, यह ज़ख़्मी हिंदुस्तान के नौजवान के हश्र की तस्वीर है। आज लाखों हिंदुस्तानी नौजवान जंग के खूँखार जबड़ों का शिकार हो चुके हैं।

    देख लिया आपने? हमारे आलोचक भी सिर्फ़ निजी पसंद या नापसंद का इज़हार करते हैं। वे उसूलों के बारे में बातें तो करते हैं लेकिन उसूलों की जानकारी नहीं रखते। वे किसी चीज़ की अच्छाई या बुराई का फ़ैसला तो करते हैं लेकिन अपने फ़ैसले को समझ नहीं सकते। उनके फ़ैसले की बुनियाद भी निजी पसंद-नापसंद पर होती है। वे कोई बारीक समझ नहीं रखते जो उनका सही मार्गदर्शन कर सके। बहुत मुमकिन है कोई आलोचक जग बीती को बहुत अच्छी नज़्म समझे या ज़ौक़ को मोमिन पर तरजीह दे और अपनी इस हरकत के लिए ठोस वजहें भी पेश करे, लेकिन ग़ौर से देखने पर यह बात ज़ाहिर होगी कि वह सिर्फ़ अपनी पसंद का इज़हार कर रहा है।

    आलोचना है तो साँस की तरह एक स्वाभाविक चीज़, लेकिन ज़िंदगी या साहित्य में इसका विकास ऐसा नहीं कि हम इसे संतोषजनक कह सकें। ताज्जुब है कि इंसान ने इस ओर इतनी लापरवाही बरती है। ज़िंदगी आलोचना के बिना मुमकिन नहीं, जैसे हम साँस न लें तो ज़िंदा नहीं रह सकते। आलोचना और ज़िंदगी में अलगाव मुमकिन नहीं। आलोचना हमारी मददगार, मार्गदर्शक और सहारा है। ज़िंदगी के हर क्षेत्र में इसका असर स्पष्ट है और इससे मदद ली जाती है। अपनी साँस लेती ज़िंदगी के हर पल में हम आलोचनात्मक फ़ैसले करते रहते हैं। मोटर कार की ख़रीदारी या अपने लिए किसी पेशे का चुनाव, दोनों में आलोचना की ज़रूरत है। लोकतंत्र को फ़ासिज़्म पर तरजीह देने में आलोचना की ज़रूरत है। फ़्लोरेंस नाइटिंगेल की तारीफ़ और लुक्रेट्सिया बोर्जिया की निंदा में भी आलोचना की ज़रूरत है। रूहानी सुकून को शारीरिक आराम से अच्छा समझने में आलोचना की ज़रूरत है, और मीर को चिरकीन से बेहतर समझने में भी आलोचना की ज़रूरत है। वह जज हो या चोर, फ़रेबी हो या बड़ा व्यापारी, वैज्ञानिक हो या बाज़ीगर, ग़रज़ वकील, डॉक्टर, जनरल, दार्शनिक, बाज़ारी औरत, सभी को आलोचना की ज़रूरत है। सब आलोचना से काम लेते हैं और उनकी कामयाबी का राज़ यह आलोचना है।

    कह सकते हैं कि मैं आलोचना को बहुत व्यापक अर्थ में इस्तेमाल कर रहा हूँ, लेकिन ज़रा ग़ौर तो कीजिए, मैं इस शब्द के साथ कोई अनुचित व्यवहार नहीं कर रहा हूँ और न मैं इसके अर्थ को तोड़-मरोड़ कर पेश कर रहा हूँ। बात यह है कि अभी तक यह शब्द एक ख़ास सीमित अर्थ में इस्तेमाल होता रहा है। आम बोलचाल में आलोचना का अर्थ है साहित्यिक आलोचना। लेकिन ज़ाहिर है कि 'साहित्यिक आलोचना' आलोचना का एक रूप है और मुमकिन है कि यह रूप सबसे अच्छा और क़ीमती हो, लेकिन आलोचना के सैकड़ों रूप हैं। हम लगातार आलोचना को इसी सीमित अर्थ में इस्तेमाल करते रहे हैं और यही वजह है कि आलोचना की क़द्र और क़ीमत को हम अभी तक समझ नहीं सके हैं।

    हक़ीक़त तो यह है कि साहित्यिक आलोचना भी बहुत क़ीमती चीज़ है जिसे उपहास और हिक़ारत की नज़र से नहीं देख सकते। रही आलोचना की शक्ति, तो उसकी क़द्र और क़ीमत स्पष्ट है। यह तो कहा जा चुका है कि यह साँस की तरह ज़रूरी है और हमारी ज़िंदगी का आधार है। तुलना, विश्लेषण, पहचान, फ़ैसला, इन्हीं चीज़ों से आलोचना की गाड़ी चलती है और किसी को भी इस बात से इनकार नहीं हो सकता कि हम हर पल चेतन या अवचेतन रूप से इन चीज़ों से काम लेते रहते हैं। अगर हम चाहें भी तो इन चीज़ों से अलग नहीं हो सकते और किसी समझदार व्यक्ति को इनसे अलग होने का ख़याल भी न होगा क्योंकि इन चीज़ों से अलग होना आत्महत्या के बराबर है।

    आलोचना को पहचानना, उसकी क़द्र करना, उसका सही उपयोग करना, यही रास्ता हमारी भलाई का है। लेकिन यह रास्ता आसान नहीं। आलोचना अजब बहरूपिया है। यह नित नए रूप भरती है इसलिए इसकी असली शक्ल मुश्किल से नज़र आती है, लेकिन इसकी असली शक्ल की जानकारी ज़रूरी है। इसकी तलाश हमारी ज़िंदगी का मक़सद है। यही हमारा मुक्ति का मार्ग है। आलोचना कुदरत की अनमोल नेमत है और यह हमारा फ़र्ज़ है कि हम इसकी सही तरबियत करें। इसकी संभावनाओं से पूरा-पूरा फ़ायदा उठाएँ और इसे तरक़्क़ी की सबसे ऊँची सीढ़ियों पर पहुँचाएँ। जिस तरह हम अपने शरीर की परवरिश करते हैं और शारीरिक ताक़त को बढ़ाते हैं, उसी तरह इस दिमागी ताक़त की तरबियत और विकास ज़रूरी है, लेकिन हम हैं कि इससे बिल्कुल बेख़बर हैं जैसे यह कोई चीज़ ही नहीं।

    यही चीज़ इंसान को इंसान बनाती है और उसे जानवरों से अलग करती है। जानवरों में आलोचना की शक्ति के बजाय पशु-बुद्धि होती है जो उन्हें दोस्त और दुश्मन में फर्क करना सिखाती है। बहुत बड़ी हद तक उनकी सलामती और उनका अस्तित्व, इसी स्वाभाविक एहसास से जुड़ा है। प्राचीन इंसान में भी इसी तरह का स्वाभाविक एहसास था और यह एहसास बच्चों में अभी तक पाया जाता है, लेकिन दिमागी ताकतों का विकास इस एहसास को पीछे छोड़ देता है और धीरे-धीरे इसकी ज़रूरत बाकी नहीं रहती। यह स्वाभाविक एहसास मानो टटोल-टटोल कर काम करता है या फिर मशीन की तरह। लेकिन मशीन को अपने कल-पुर्ज़ों की जानकारी नहीं होती। दिमाग अंधेरे में नहीं, रोशनी में काम करता है। उसे अपने कल-पुर्ज़ों की जानकारी है। कम से कम वह अपने कल-पुर्ज़ों से वाकिफ़ है। कम से कम वह अपने कल-पुर्ज़ों को जानना और जांचना चाहता है और यही चेतना उसकी बड़ाई की ज़िम्मेदार है, लेकिन इसकी तरबियत (प्रशिक्षण) ज़रूरी है। उछल-कूद करना तो हर व्यक्ति के बस की बात है, लेकिन नृत्य की दुनिया में अपनी शारीरिक हरकतों से एक सुंदर शाहकार (कलाकृति) बनाना मुश्किल है। इसी तरह अपनी दिमागी ताकतों से, बिना रियाज़ के, अच्छा, महान और सुंदर काम लेना भी मुश्किल है।

    जानवरों को अपने बचाव की तो फिक्र होती है, लेकिन वे किसी ऊंचे दृष्टिकोण से वाकिफ़ नहीं होते। इंसान अपने बचाव के साथ कुछ और भी चाहता है। सिर्फ जीते रहना उसकी ज़िंदगी का मक़सद नहीं है। वह अपनी ज़िंदगी को किसी काबिल बनाना चाहता है। इस मक़सद में आलोचना की मदद के बिना कामयाबी मुमकिन नहीं। इंसान जानवरों की तरह संतुष्ट नहीं है। वह चीज़ों की देखभाल करता है। उन्हें परखता है, किसी चीज़ को पसंद करता है तो किसी चीज़ को नापसंद करता है। वह चीज़ों को बदलना, उन्हें बेहतर बनाना चाहता है। वह ज़िंदगी की धारा पर बहते जाना पसंद नहीं करता। ज़िंदगी मानो एक बहती हुई नदी है जिसके बहाव पर ठहराव का शक होता है और यह अपने बहाव में हर जानदार चीज़ को बहा ले जाती है। हर जानदार इस बहती नदी के साथ बहता है। बस एक इंसान ही अपने आस-पास का जायज़ा लेता है, धारा को पलट देना चाहता है, कम से कम इसके भेद, इसकी कद्र-ओ-कीमत की तलाश करता है।

    अब तो यह बात साफ़ हो गई होगी कि आलोचना ज़िंदगी की तरह कीमती है और आलोचना से किनारा करना एक तरह की खुदकुशी है। वह आम प्रशिक्षित दिमागी ताक़त के रूप में हो या किसी खास भेष में, आलोचना का महत्व स्पष्ट है। उपदेशक, दार्शनिक, डॉक्टर, वकील, वैज्ञानिक सब ही आलोचना के किसी खास रूप का सहारा लेते हैं। वह हमारी भौतिक दुनिया हो या विचार और आत्मा की कभी न खत्म होने वाली विशालता, हम किसी भी जगह बिना आलोचना के मार्गदर्शन के चल नहीं सकते। अगर यह मार्गदर्शक न हो तो हमारी सारी छानबीन, हमारी सारी कोशिशें बेकार जाएंगी। अपने-अपने तौर पर सब ही आलोचना के किसी खास रूप से काम लेते हैं और अपनी खोज और तलाश में कामयाब होते हैं। कभी-कभी यही आलोचना बाहरी और भौतिक रूप ले लेती है। मिसाल के तौर पर यह कानून का पूरा विभाग, जज, वकील, अदालत, जेलखाना, कांस्टेबल, मुजरिम, कुल मिलाकर इस पेचीदा विभाग का मक़सद है छानबीन, जांच-पड़ताल, विश्लेषण, फैसला यानी वही आलोचना। आलोचना के ऐसे भौतिक रूप और भी हैं।

    ये खास रूप अपने-अपने मैदान में उपयोगी भी हैं, लेकिन अपने मैदान से बाहर बिल्कुल बेकार और निष्क्रिय हैं। मिसाल के तौर पर कानून का सारा विभाग हमें यह नहीं बताता कि बीमार बुख़ार से मरा या कौलंज (पेट के दर्द) का शिकार हुआ। इसके अलावा इन खास रूपों में एक कमी और भी है। कानूनी मशीन हमें सिर्फ इतना ही बताती है कि 'अम्र' (किसी व्यक्ति) ने कोई खास जुर्म किया या नहीं, लेकिन जो बिल्कुल मासूम हैं, उनका इस मशीन से कोई वास्ता नहीं पड़ता और उनकी खूबियों पर यह मशीन कोई रोशनी नहीं डालती और न डाल सकती है। इसलिए आलोचना को उसके खास रूपों तक सीमित कर देना सही नहीं। इस तरह आलोचना के फायदों की दुनिया तंग हो जाती है। फिर ज़िंदगी को अलग-अलग हिस्सों में बांटना समझदारी से दूर है। ज़िंदगी की व्यवस्था पेचीदा है और इसके क्षेत्रों को एक-दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता। इसी तरह ज्ञान के विभिन्न क्षेत्रों में भी संबंध है। एक वकील अगर सिर्फ कानून जानता है तो वह अच्छा वकील नहीं हो सकता। डॉक्टर को मनोविज्ञान का ज्ञान ज़्यादा अच्छा डॉक्टर बनाता है और शायर अगर आलोचक भी हो तो ज़्यादा अच्छा शायर हो जाता है।

    मैं कह चुका हूं कि आम बोलचाल में आलोचना का अर्थ साहित्यिक आलोचना है। इसी वजह से इसकी सही कद्र-ओ-कीमत की जानकारी नहीं है। आलोचना साहित्य से जुड़ी है, इसलिए इसे कमतर नज़र से देखा जाता है, इसे तस्मा पा (गले पड़ा बोझ) समझा जाता है और कहा जाता है कि जो शेर कहने की काबिलीयत नहीं रखते, वे नुक्ताचीनी पर उतर आते हैं। आलोचना की दुनिया साहित्य तक सीमित नहीं है। आलोचना सिर्फ साहित्य से जुड़ी नहीं है। इसका फैलाव ज़िंदगी के फैलाव से कम नहीं। ज़िंदगी आलोचना की शक्ति को पैदा करती है और फिर अपने अस्तित्व और विकास के लिए आलोचना का सहारा ढूंढती है।

    (3) आलोचना और शिक्षा

    शिक्षा का मक़सद मार्गदर्शक आलोचनात्मक समझ की तरबियत और विकास है। यही वजह है कि आलोचक को शिक्षा में दिलचस्पी होती है। हर समाज को उसी तरह की शिक्षा मिलती है जिसका वह हक़दार है।

    समाज की बनावट और शिक्षा की बनावट में जो करीबी रिश्ता है, उसके महत्व पर जितना भी ज़ोर दिया जाए, कम है। स्कूल और कॉलेज सामाजिक व्यवस्था से अलग नहीं हैं और न ही अलग रखते हैं। हकीकत तो यह है कि हमारे कॉलेज और स्कूल वे व्यवस्थाएं हैं जो युवाओं को समाज में हिस्सा लेना सिखाते हैं और एक समाज वही उम्मीदें और मूल्य, वही ज्ञान और विश्वास सिखा सकता है जो उसकी अपनी पैदावार हैं।

    आमतौर पर हम इसी करीबी संबंध से वाकिफ़ नहीं होते, लेकिन आलोचक को यह जानकारी होती है, इसी वजह से वह शिक्षा में दिलचस्पी लेता है। यह शिक्षा पालने और मां की गोद में शुरू होती है। बच्चे बहुत संवेदनशील होते हैं। बुरी आदतें बहुत जल्द पकड़ लेते हैं। ये बुरी आदतें आगे चलकर बहुत सी मुश्किलें और गुत्थियां पैदा कर देती हैं। बच्चों को इन मुश्किलों, गुत्थियों और उलझनों से बचाना है। लेकिन आमतौर पर माता-पिता इन चीज़ों से बेखबर होते हैं या इन चीज़ों की परवाह नहीं करते या इतने व्यस्त होते हैं कि बच्चों की देखभाल ठीक से नहीं कर सकते। हार्डिंग का कहना है कि ये मुश्किलें ऐसी हैं कि इनका इलाज मुश्किल है। अलबत्ता, इसका इंतज़ाम किया जा सकता है कि बच्चे बड़े होकर इन मुश्किलों को सही नज़रिए से देखें और अपनी ज़िंदगी को तबाही से बचा लें।

    आलोचक को देखना होगा कि घर बेहतर है या 'नर्सरी'। फिर इसी तरह स्कूल से पहले का समय, स्कूल, कॉलेज और यूनिवर्सिटी में कैसी शिक्षा दी जाती है, आलोचक को यह सब देखना होगा। जो लोग बच्चों की शिक्षा के ज़िम्मेदार हैं, उन्हें मनोविज्ञान की जानकारी होना ज़रूरी है। इससे बहुत मदद मिलेगी, लेकिन उनकी नज़र में कल्चर से मुख्य दिलचस्पी होनी चाहिए। उन्हें जानना चाहिए कि शिक्षा का मक़सद है सभ्य बच्चा और फिर 'सभ्य' युवा बनाना। यह उसी वक़्त मुमकिन है जब सही कल्चर का ज्ञान हो।

    पहले शिक्षा कुछ लोगों की जागीर थी। जिन्हें फुर्सत थी और जिनके पास पैसे थे। जनता का बड़ा वर्ग अपने काम में मगन रहता और वह परंपराओं और कुछ पढ़े-लिखे लोगों से मार्गदर्शन की उम्मीद करता था। ये कुछ पढ़े-लिखे लोग समाज के रहबर थे और जो शिक्षा दी जाती थी उसे अंग्रेज़ी में लिबरल कहते हैं। इस शिक्षा में क्लासिकी साहित्य का बड़ा हिस्सा था और इस तरह की शिक्षा का मक़सद यह था कि बेहतरीन और सबसे क़ीमती विचारों की समझ और अच्छाई बताई जाए। सोच-विचार की आदत डाली जाए और दिमागी संतुलन की बेशक़ीमती नेमत दी जाए और साथ-साथ एक ऊंचे और ज़्यादा अच्छी ज़िंदगी की दिल में तमन्ना जगाई जाए। यह छोटा सा वर्ग समाज का फूल था, यह सुंदर और बेहतरीन कल्चर का खज़ाना था।

    अब पुरानी व्यवस्था बदल चुकी है और नई व्यवस्था इंतज़ार में है। ज़िंदगी बहुत पेचीदा हो गई है। पुरानी तहज़ीब की जड़ें उखड़ गई हैं, परंपरा का रिश्ता टूट गया है और कल्चर ऐसा लफ़्ज़ हो गया है जिसके बहुत से मायने हैं और सब अस्पष्ट हैं। अब शिक्षा सबकी जागीर है। बहुत से संस्थान क़ायम हुए हैं और शिक्षा की अच्छाई पर धब्बा लग गया है। 'लिबरल' क़िस्म की शिक्षा को अब कोई नहीं पूछता। लोग औद्योगिक और इस तरह की शिक्षा चाहते हैं जिससे वे ख़ास-ख़ास काम करने के लायक़ हो जाएं। तरह-तरह के काम, क़िस्म-क़िस्म के पेशे हैं और इस तरह की शिक्षा की मांग है जो उनके नए कामों, इन नए धंधों में उनकी मददगार हो। यह कोई नहीं पूछता कि ये काम, ये धंधे करने के क़ाबिल हैं भी या नहीं। अब आदमी और मशीन में फ़र्क़ बाक़ी नहीं रहा है। लोगों को जो धंधा सिखाया जाता है उसे वे मशीन की तरह करते हैं।

    आलोचक बताता है कि आदमी मशीन नहीं। उसको यह जानना चाहिए कि वह कौन सा काम करने के क़ाबिल है। उसको तमीज़ और ज़िम्मेदारी सीखनी चाहिए। सोच-विचार की आदत डालनी चाहिए और उसे यह भी मालूम होना चाहिए कि ज़िंदगी किसी ख़ास काम को मशीन की तरह करने का नाम नहीं। यानी 'लिबरल' क़िस्म की शिक्षा की ज़रूरत है। मुमकिन है उसे जहाज़ चलाना या टाइपराइटर से काम लेना न आए, मुमकिन है कि बैंक को चलाना या बैंक में डाका डालना न आए, लेकिन उसमें एक संवेदनशील तमीज़ आ जाती है जिससे वह बहुत बड़े-बड़े काम ले सकता है।

    अब सामाजिक और कल्चरल व्यवस्था बिखर गई है और इस बिखराव की वजह वह ज़बरदस्त मशीनी कारख़ाना है जिसने इसी दौर में जन्म लिया है। क़ाबू और नियंत्रण का वक़्त गुज़र गया है और बुरे इरादे वाले लोगों के हाथ एक ख़ौफ़नाक और भयानक प्रोपेगैंडा का साधन लग गया है। इसको रोकने का एक ही उपाय है और वह यह कि लोगों को नैतिक ज़िम्मेदारी और तेज़ और बारीक समझ की शिक्षा दी जाए, वरना सामाजिक और कल्चरल व्यवस्था टूट-फूट जाएगी।

    मैंने कहा है कि मौजूदा तहज़ीब बहुत पेचीदा हो गई है और दुनिया इस क़दर छोटी हो गई है कि एक जगह आंदोलन होता है तो उसका असर हर जगह महसूस होता है। पहले कुछ लोग कल्चर के योग्य थे और वे अपने ज़माने की तहज़ीब के बेहतरीन तत्वों से सुसज्जित थे। उनकी हदें थीं लेकिन वे ज़िंदा थे और आस-पास की दुनिया का उन्हें तेज़ एहसास था। वे चमकीला केंद्र थे जहां से कल्चर की किरणें चारों तरफ़ फैलती थीं। अब इस क़िस्म का कोई केंद्र नहीं जहां 'इंसानियत' महफ़ूज़ रह सके और जहां से इंसानियत-दोस्त कल्चर की किरणें फैल सकें। नतीजा है दिमागी बिखराव। ज़रूरत है ऐसे केंद्र की जहां मिल-जुलकर दिमागी खज़ाना फिर जमा किया जाए और कल्चर की बिखरी हुई कड़ियों को नए सिरे से संगठित किया जाए।

    अब जानकारी का दायरा इस क़दर व्यापक हो गया है कि कोई एक शख़्स इस जानकारी पर हावी नहीं हो सकता है। यही वजह है अब कोई भी जानकारी की दुनिया को अपना लक्ष्य नहीं बनाता। इस व्यापक दायरे का एक छोटा सा हिस्सा, बस यही व्यक्तिगत ध्यान का मैदान है और इसी तरह बहुत से छोटे-छोटे हिस्सों में इस दायरे को बांट दिया गया है। हम अपने छोटे हिस्सों को जानते हैं लेकिन दूसरे हिस्सों की ख़बर नहीं रखते, लेकिन इन हिस्सों को अलग-अलग जानना फ़ायदेमंद नहीं। हमें पूरे दायरे से वाक़फ़ियत चाहिए लेकिन यह वाक़फ़ियत विभिन्न विद्याओं का नाकाफ़ी, अपूर्ण, अधूरा या टूटा-फूटा ज्ञान न हो बल्कि सच्चा बोध हो। आजकल दूसरी चीज़ों की तरह शिक्षा में बिखराव, बीमार तेज़ी और बंटे हुए लक्ष्य का नज़ारा दिखाई देता है। सार्वभौमिक कोशिश ही दिमागी बिखराव को व्यवस्था और तालमेल बख़्श सकती है और विनाश को निर्माण की शक्ल में पेश कर सकती है।

    पुरानी शिक्षा से यह काम नहीं हो सकता है। अब एक नई कल्चरल शिक्षा ही हमें मुक्ति का रास्ता दिखा सकती है। जो बदहाली है और जो ख़ास ज़रूरतें हैं, इन दोनों का ज्ञान मुश्किलों को दूर करने में मदद करेगा। आलोचक दुनिया के विभिन्न हिस्सों में, जो विद्याओं की विभिन्न शाखाएं हैं, उनमें रिश्ता जोड़ेगा और उनमें जो मायने और मक़सद हैं उन पर से पर्दा उठाएगा और उन्हें एक व्यवस्था और एक दायरे में खींच लाएगा। यह काम विश्वविद्यालयों में हो सकता है जो विभिन्न विद्याओं का केंद्र हैं और जो विभिन्न विद्याओं पर एक ख़ास मुहर लगाकर उनकी सार्थकता को ज़ाहिर करेंगे। मैंने कहा है कि स्कूलों का मक़सद यह है कि सभ्य बच्चे और फिर सभ्य जवान बनाएं। विश्वविद्यालयों का मक़सद यह है कि वे सुसंस्कृत आदमी बनाएं। ऐसा आदमी नीचता और अहंकार से आज़ाद होगा, और तंग नज़रिए और दिलचस्पियों की कमी से भी आज़ाद होगा। यह तंग-नज़री दिमाग़ को अपाहिज बना देती है। ऐसा आदमी समझ के सबसे ऊंचे मुक़ाम पर होगा और अपनी तेज़ और संवेदनशील समझ से वह सामाजिक और निजी मसलों का जायज़ा लेगा और उन्हें हल करेगा।

    उसकी समझ एक जगह जमी हुई, एक ख़ास रास्ते पर चलने वाली न होगी बल्कि लचकदार होगी जो विभिन्न क़िस्म के पड़ावों से आसानी से गुज़र जाएगी। उसे वर्तमान से भी पूरी जानकारी होगी, उसकी हदों और उसकी ख़ास ज़रूरतों से जानकारी होगी, उसे अतीत से भी पूरी जानकारी होगी और उसे यह भी मालूम होगा कि अतीत में कौन-कौन सी अच्छी चीज़ें हैं जो आज हमारे काम आ सकती हैं। मूल्यों का पुख़्ता एहसास उसे बताएगा कि कौन सी अच्छी और संबंधित चीज़ों को वह पसंद करे और वह अतीत की बेहतरीन चीज़ों को वर्तमान और भविष्य की सेवा में इस्तेमाल करेगा और इसी तरह उसे एहसास होगा कि अतीत, वर्तमान और भविष्य एक रिश्ते में जुड़े हुए हैं। यह एहसास कि दुनिया एक है, इंसानियत एक है, मानवीय विद्याएं एक रिश्ते में जकड़ी हुई हैं, विभिन्न भाषाओं के साहित्य अनेकता में एकता का जलवा दिखाते हैं। यह एहसास एक विश्वव्यापी दृष्टिकोण, एक सार्वभौमिक संवेदनशीलता और सार्वभौमिक मूल्य प्रदान करेगा, और इस रोशनी में सारे मतभेद मिट जाएंगे और एक एकमात्र लौ नज़र आएगी।

    इन बड़ी बातों को छोड़ दें, तो आलोचक बारीकियों की तरफ़ भी ध्यान दे सकता है और अपनी ख़ास ख़ूबियों की वजह से वह इस मैदान में भी फ़ायदेमंद साबित हो सकता है। वह किसी ख़ास शिक्षा प्रणाली का जायज़ा ले सकता है और यह बता सकता है कि दोनों में से कौन सी शिक्षा प्रणाली ज़्यादा फ़ायदेमंद और कारगर है। इसी तरह वह किसी ख़ास क़िस्म के स्कूल की तरफ़ ध्यान दे सकता है और छान-बीन करके यह बता सकता है कि यह स्कूल किस हद तक अपने मक़सद में कामयाब है। वह किसी यूनिवर्सिटी की भी देख-रेख कर सकता है और यह देख सकता है कि यह मानसिक और बौद्धिक कोशिशों को मुख्य रूप से एक जगह इकट्ठा करती है या नहीं, और दूसरी यूनिवर्सिटियों के मुक़ाबले में यह कामयाब है या नाकाम, और अगर कामयाब है तो इसकी कामयाबी की सीमाएँ क्या हैं। वह परीक्षा प्रणाली की भी जाँच-पड़ताल कर सकता है और उन्हें ज़्यादा फ़ायदेमंद बनाने के लिए काम की बातें बता सकता है और वह यह भी देख सकता है कि पाठ्यक्रम में कौन-कौन सी किताबें हैं और उनसे किसी ख़ास विषय को समझने और उससे पूरी जानकारी हासिल करने में ये किताबें काफ़ी हैं या नाकाफ़ी।

    (4) आलोचना और दिमागी सेहत

    आलोचना दिमागी सेहत की ज़िम्मेदार है। एज़रा पाउंड ने कहा है, जिस्म कोई बुरी चीज़ नहीं। जिस्मानी बीमारी और कमज़ोरियाँ अलबत्ता बुरी हैं। यही बात दिमाग़ पर भी लागू होती है। दिमागी बीमारियाँ जिस्मानी बीमारियों से कम घिनौनी नहीं होतीं। सच तो यह है कि अगर किसी के दाँत में दर्द हो तो उससे सिर्फ़ उसको तकलीफ़ होती है, लेकिन एक मूर्ख सारी महफ़िल का मज़ा किरकिरा कर देता है, और अगर महामारी की बात करें तो चंद सरफिरे एक ऐसी महामारी फैला सकते हैं जो विश्वव्यापी प्लेग से कम जानलेवा नहीं।

    जिस्मानी बीमारियों की पहचान आसान है और उनका इलाज भी मुश्किल नहीं। मरीज़ बीमारी के लक्षणों को देखकर डॉक्टर के पास जाता है। इसी तरह किसी महामारी की भयानकता छिपी नहीं रहती। एक तहलका मच जाता है और उसे दूर करने की कोशिश होती है, लेकिन वो बीमारियाँ जो दिमाग़ को जकड़ लेती हैं, इतनी आसानी से पहचानी नहीं जातीं। उनकी भयानकता की किसी को ख़बर भी नहीं होती। और रोना तो इस बात का है कि ऐसे डॉक्टर भी नहीं मिलते जो इन बीमारियों को पहचानें और उनका इलाज कर सकें।

    मैकबेथ ने डॉक्टर से पूछा था,

    क्या तुम बीमार दिमाग़ का इलाज कर सकते हो?

    क्या तुम उस ग़म को जिसने याददाश्त में जड़ पकड़ ली है, उखाड़ सकते हो?

    क्या तुम दिमाग़ पर लिखी हुई मुसीबतों को मिटा सकते हो?

    और किसी मीठी, भुला देने वाली दवा से

    हमारे भरे हुए सीने को उस ख़तरनाक चीज़ से साफ़ कर सकते हो,

    जो मेरे दिल पर भारी पत्थर बनी हुई है?

    ग़नीमत है कि मैकबेथ को यह जानकारी थी कि उसका दिमाग़ बीमार है। वह ग़म जिसने जड़ पकड़ ली है। वह मुसीबतें जो दिमाग़ पर लिखी हुई हैं, वह ख़तरनाक चीज़ जो दिल पर पत्थर की तरह जमी हुई है। इन चीज़ों की आज हमें ख़बर नहीं। हम समझते हैं कि तंदुरुस्त हैं। अगर बीमारी का एहसास न हो तो इलाज भी मुमकिन नहीं। मैकबेथ को मालूम था कि उसकी दिमागी सेहत ख़राब हो गई थी, लेकिन इस जानकारी का उसे कुछ फ़ायदा नहीं हुआ। डॉक्टर ने कहा तो यह कहा:

    ऐसी बीमारी में

    मरीज़ अपनी मदद आप कर सकता है।

    वजह यह है कि डॉक्टर का इस क़िस्म की बीमारी से कभी पाला नहीं पड़ा था और उसकी दवाओं के ख़ज़ाने में इसकी कोई दवा न थी। फिर भी उसका जवाब बिल्कुल बेकार और बेमानी न था। ऐसी सूरत में बीमार बड़ी हद तक अपनी मदद आप कर सकता है। बीमारी का एहसास सेहत की निशानी है। किसी पागल को अपने पागलपन का एहसास नहीं होता। बीमारी की जानकारी अगर सेहत की ख़्वाहिश में बदल जाए तो फिर बहुत कुछ उम्मीद बंधती है।

    बीमार दिमाग़ का इलाज मुश्किल काम है। यह मुश्किल और भी ज़्यादा इसलिए हो जाती है कि हमें इन बीमारियों का बिल्कुल भी इल्म नहीं। ज़ाहिर है कि मैं उन बीमारियों की तरफ़ इशारा नहीं कर रहा हूँ जो मेडिकल की किताबों में मिलती हैं, किसी के बदन का खुला हुआ नासूर बहुत बुरा मालूम होता है, लेकिन इस क़िस्म का घिनौना नासूर दिमाग़ में होता है और किसी को ख़बर भी नहीं होती। शायद यही वजह है कि चिकित्सा विज्ञान की इस क़दर तरक़्क़ी हुई है, लेकिन इसके बराबर कोई दूसरा विज्ञान नहीं जो दिमागी सेहत का ज़िम्मेदार हो। आज-कल एक नए विज्ञान ने तरक़्क़ी की है जिसे साइको-एनालिसिस (मनोविश्लेषण) कहते हैं, लेकिन यह विज्ञान भी कुछ यूँ ही सा है। फिर जिस क़िस्म की बीमारियों की मैं बातें कर रहा हूँ, उनका इलाज इस नए विज्ञान से नहीं हो सकता।

    ये बीमारियाँ ऐसी मामूली हो सकती हैं जैसे ज़ुकाम, या ऐसी ख़ौफ़नाक और भयानक जैसे तपेदिक (टीबी)। कोई कहता था कि फ़ौजी ट्रेनिंग साहित्यिक ट्रेनिंग से ज़्यादा अच्छी है। सिपाही को सख़्त ट्रेनिंग दी जाती है, उसे हमेशा जिस्मानी और दिमागी तौर पर चाक़-ओ-चौबंद रहना होता है, ठीक काम ठीक वक़्त पर करना होता है, क्योंकि उसकी पहली ग़लती आख़िरी ग़लती हो सकती है, लेकिन साहित्यिक ट्रेनिंग इतनी सख़्त नहीं। किसी ने अगर मिल्टन को शेक्सपियर पर तरजीह दी तो यह कोई अहम ग़लती न होगी। अब इसे क्या कहिए? सिपाही की जान जाती है, आलोचक के दिमाग़ का ख़ून होता है। वह सूझ-बूझ वाला इंसान बाक़ी नहीं रहता।

    आम इंसान बहुत मंदबुद्धि पैदा हुआ है। उन जानवरों से ज़्यादा मंदबुद्धि जिन्हें वह हिक़ारत से देखता है। विकास के चरणों से गुज़रने में वह उस पाशविक बुद्धि (जानवरों वाली समझ) को खो बैठा जो उसका मार्गदर्शन करती थी, और उसकी पाँचों इंद्रियों की तेज़ी भी जाती रही। जानवर अपनी मूल प्रवृत्ति से दोस्त-दुश्मन में फ़र्क़ करते हैं। वे ख़तरे को महसूस करते हैं और उससे बचना जानते हैं। उनके मुक़ाबले में इंसान बेबस, बेचारा और नासमझ मालूम होता है, क्योंकि जानवरों वाली समझ तो रही नहीं और उसका दिमाग़ तेज़, चमकीला और दूरदर्शी नहीं।

    दुनिया में बेवक़ूफ़ी का राज है। मिसाल की ज़रूरत नहीं। हमारी निजी ज़िंदगी हो या हमारे सामाजिक ताल्लुक़ात, हमारे पेशे और कारोबार हों या हमारे क़ानूनी, सियासी, तालीमी इदारे, हर जगह बेवक़ूफ़ी की बेशुमार मिसालें नज़र आएँगी। इस बेवक़ूफ़ी से हमारा बहुत बड़ा नुक़सान होता है। हमारी ताक़तें बर्बाद होती हैं। इस भारी नुक़सान से निजात की बस यही सूरत है कि हम अपने दिमाग़ को ज़्यादा चुस्त-ओ-चालाक, तेज़ और संवेदनशील बनाएँ।

    हमारा जिस्म बेशुमार कीटाणुओं का शिकार है जो हमारे चारों तरफ़ भीड़ लगाए हुए हैं और जिन्हें हम देख नहीं सकते। अब हमें इन कीटाणुओं के वजूद का इल्म हो चला है और हमने बहुत सारी तरकीबें उनके जानलेवा असर को दूर करने के लिए सोच निकाली हैं। हमारे जिस्म की तरह हमारा दिमाग़ भी कीटाणुओं से भरा हुआ है। ये कीटाणु बहुत क़िस्म के हैं और बहुत जानलेवा हैं और इनसे बचने का कोई रास्ता नहीं, क्योंकि हमने अभी इन कीटाणुओं को पहचाना तक नहीं है और इनको मारने की कोई दवा ईजाद नहीं की है। बहुत से कीटाणु तो हमें विरासत में मिले हैं। मसलन, प्राचीन इंसान अपने बेशुमार अंधविश्वासों के साथ अभी तक हमारे पीछे लगा हुआ है। उसका रूप ज़रा बदल गया है। वह अपनी नग्नता को तहज़ीब के लिबास में छिपाए हुए है, लेकिन उसका दिल वही है जो था, और यह वहशी (बर्बर) है, उतना ही वहशी है जितना यह हज़ारों बरस पहले था। सभ्यताएँ उभरती हैं, फलती-फूलती हैं फिर मुरझा जाती हैं, लेकिन ये सतही बदलाव हैं जो लगातार होते रहते हैं, लेकिन गहराइयों में कोई बदलाव नहीं होता।

    हाँ तो सभ्यता के घरौंदे बनते और बिगड़ते हैं लेकिन वहशी इंसान हमारे साथ-साथ है, हमारा साया है। वह हमारे दिमाग़ के पुर्ज़ों को मरोड़ता रहता है और हमें ख़बर भी नहीं होती। हम जो कुछ करते हैं, सोचते हैं, महसूस करते हैं, उसमें इस 'अदृश्य हाथ' का हाथ है। जिन लोगों ने अपने अध्ययन के सिलसिले में इस मामले की छानबीन की है, वे जानते हैं कि हमारे पाँव के नीचे कितनी गहराई तक अनदेखी ताक़तों ने ज़मीन में जाल बिछा रखा है। इन पुरानी ताक़तों में से एक अंधविश्वास है। प्राचीन इंसान की हर बात, उसके हर काम में अंधविश्वास का जलवा था। दवा और जादू के अलावा उसके सारे कार्यक्षेत्र में अंधविश्वास का जाल फैला हुआ था और यह जाल आज भी फैला हुआ है। चीज़ें बदल गई हैं, शक्लें बदल गई हैं लेकिन अंधविश्वास नहीं बदला है।

    साइंस की रोशनी में अंधविश्वास जानलेवा ज़हर है, लेकिन इसकी रोशनी से बहुत कम लोगों ने फ़ायदा उठाया है और अफ़सोस यह है कि साइंस भी अंधविश्वास बन जाता है। बहरहाल, ज़्यादातर आदमी प्राचीन अंधविश्वास के आज भी शिकार हैं। दिमागी और भावनात्मक तौर पर वहशी से अलग नहीं। वे अभी तक दुनिया को वहशी आँखों से देखते हैं। रिचर्ड्स का कहना है कि प्रकृति उनकी नज़र में जादू का मैदान है। प्राचीन आदमी अंधविश्वासी था और वह अपने अंधविश्वास से शर्मिंदा न था। जो ख़ुद को सभ्य समझते हैं वे अपने अंधविश्वास को छिपाए हुए हैं। जो सतही और अधूरी शिक्षा उन्हें मिलती है उससे उन्हें सभ्य होने का धोखा होता है। उन्हें यह मालूम नहीं कि यह सभ्यता की चमक सतही है और दिमाग़ अभी तक सभ्य नहीं।

    हमें अपने अक़्लमंद होने पर बहुत नाज़ है, लेकिन हमारी अक़्ल में अंधविश्वास ने हज़ारों छेद कर दिए हैं। बे-अक़्ली हमेशा घात में लगी रहती है मौक़ा मिला और बाहर निकल आई। हमारी कोशिश तो यह होनी चाहिए कि हमारे विचारों, भावनाओं और कर्मों में अक़्ल की झलक हो। लेकिन सिर्फ़ अक़्ल की ही नहीं। लेकिन ऐसा कम होता है। बे-अक़्ली हमें गुमराह कर देती है। हिंदुस्तान में जो कुछ हुआ, दुनिया में जो कुछ हो चुका और हो रहा है इस हक़ीक़त का अटल सुबूत है। हमारी मुक्ति का मार्ग आलोचना है जो सही शिक्षा के रूप में हमें अंधविश्वास से बचा सकती है, जो अंधविश्वास की असलियत, उसकी नित-नई शक्लों और उसकी दरिंदगी को हमारे दिमाग़ की गहराइयों से निकाल कर दिन की रोशनी में ज़ाहिर कर सकती है।

    कुछ बीमारियाँ तो हमें विरासत में मिली हैं और कुछ हमें लग जाती हैं। विस्तार की न ज़रूरत है न गुंजाइश। ये कीटाणु बेशुमार हैं और अलग-अलग क़िस्मों के हैं और देखने में इतने भले मालूम होते हैं कि आँखें हैरत में फँस जाती हैं और यह समझना मुश्किल हो जाता है कि ये कीटाणु वास्तव में घातक हैं। वे फ़ासिज़्म के कीटाणु हों या कम्युनिज़्म के, साम्राज्यवाद के कीटाणु हों या संकीर्ण राष्ट्रवाद के, नस्लीय श्रेष्ठता और नस्लीय नफ़रत के कीटाणु, मशीनरी और व्यावसायिक नैतिकता के कीटाणु, ग़रज़ तरह-तरह के कीटाणु दिमाग़ की दुनिया को तबाह और बर्बाद करते रहते हैं। इनसे छुटकारा आसान नहीं और मुश्किल तो यह है कि इन बीमारियों का किसी को पता भी नहीं। फिर इन कीटाणुओं के समर्थन में बड़ी-बड़ी ताक़तें जमा हैं। निजी या राष्ट्रीय लालच, अहंकार और ताक़त का नशा इन कीटाणुओं की परवरिश करते हैं। इसलिए इन्हें दूर करना और भी मुश्किल हो जाता है।

    लेकिन हमें इन कीटाणुओं को मारना है। एक ज़रिया तो शिक्षा है जिसका ज़िक्र हो चुका और दूसरा तरीक़ा यह है कि जहाँ भी इन बीमारियों के लक्षण नज़र आएँ, उन लक्षणों का 'इलाज' किया जाए और यह आलोचना ही से मुमकिन है। इस 'इलाज' के साथ-साथ स्वस्थ विचारों का प्रसार भी ज़रूरी है और इस उपयोगी और अहम काम में साहित्य बहुमूल्य सेवा अंजाम दे सकता है और हमारे दिमाग़ को सेहतमंद बना सकता है। एज़रा पाउंड ने कहा है, इसका (साहित्य का) संबंध हर विचार और राय की सफ़ाई, ज़ोर और सेहत से है। इसका संबंध 'औज़ार' की सफ़ाई से है, विचार की सामग्री की सेहत से है। सिर्फ़ कभी-कभार साइंस के दुर्लभ और सीमित आविष्कारों में, या गणित में, शब्दों के बिना कोई आदमी न सोच सकता है और न अपने विचारों को दूसरों तक पहुँचा सकता है। हाकिम और क़ानून बनाने वाला शब्दों के बिना क़ानून नहीं बना सकता और इन शब्दों की सेहत और वज़न उन अभागे साहित्यकारों के हाथ में है जिन्हें हिक़ारत की नज़र से देखा जाता है। जब उनका काम सड़ जाता है, मेरा यह मतलब नहीं कि वह अश्लील हो जाता है, जब अभिव्यक्ति का माध्यम, शब्दों और विचारों की उपयुक्तता का गुण सड़ जाता है, यानी शब्दों में गदलापन, अशुद्धता, असंतुलन, सूजन और इस क़िस्म की ख़राबियाँ आ जाती हैं तो सामाजिक और व्यक्तिगत विचारों और व्यवस्था की दुनिया तबाह और बर्बाद हो जाती है।

    आलोचना इन ख़राबियों को जानती है, उनके कारणों का पता चलाती है और उनका इलाज करती है। आलोचना को इन लक्षणों का बोध है और वह हर विशिष्ट लक्षण की मानसिक पृष्ठभूमि से वाक़िफ़ है और साहित्य को सेहतमंद बनाकर सामाजिक और व्यक्तिगत सेहत की नींव डालती है। यह तो मानी हुई बात है कि साहित्य ज़िंदगी का आईना है। मानसिक ज़िंदगी की बीमारी इस आईने में दिखाई देती है। सिर्फ़ साहित्य ही नहीं बल्कि हर क़िस्म की रचनाओं में यह बीमारी झलकने लगती है। उस वक़्त आलोचना की ज़रूरत होती है।

    रिचर्ड्स ने कहा है, यह ख़याल किया जाता है कि ऐसे अव्यावहारिक कामों, जैसे आर्ट या आलोचना में व्यस्त होना मानो ऐसा है कि किसी जहाज़ में जिसमें काम करने वाले आदमियों की कमी हो, महज़ यात्री बने रहना। कुछ लोगों के बारे में यह बात सच है जो ऐसे कामों में ख़ुद को व्यस्त रखते हैं, लेकिन आलोचना को विलासिता का व्यापार समझना ग़लत है। समाज का पिछला हिस्सा शिक्षा नहीं पा सकता जब तक कि अगला हिस्सा आगे न बढ़ जाए। अंतर्दृष्टि और बोध अभी दुर्लभ हैं। आलोचक, हमने कहा है, दिमाग़ की सेहत से उतना ही लगाव रखता है जितना लगाव डॉक्टर को शरीर से होता है। आलोचक होना मूल्यों का जज होना है। क्योंकि आर्ट, आर्टिस्ट की मर्ज़ी की परवाह किए बिना, स्वाभाविक तौर पर ज़िंदगी की तारीफ़ और सराहना है। लीविस का कहना है, साहित्यिक आलोचना को साहित्य के अलावा और किसी चीज़ से भी वास्ता है। साहित्य से गंभीर दिलचस्पी महज़ साहित्यिक नहीं रह सकती। यह दिलचस्पी सामाजिक न्याय और व्यवस्था और कल्चर की सेहत के एहसास और उनमें तल्लीनता से जुड़ी होती है।

    यही वजह है कि साहित्य को सामान्य मानसिक प्रशिक्षण का केंद्र बनाया जा सकता है। साहित्य को सोच-समझ कर पढ़ना, विभिन्न मसलों को संवेदनशील, गंभीर और ईमानदाराना तौर पर देखना। इस तरह से दिमाग़ की अच्छी और पूरी तरबियत हो सकती है। लेकिन यह काफ़ी नहीं और सिर्फ़ साहित्य ही दिमागी सुधार का एकमात्र ज़रिया नहीं। जिस क़िस्म का भी लेखन हो, और बिना लेखन, भाषण और बातचीत के दुनिया का काम नहीं चल सकता। हाँ जहाँ शब्दों का इस्तेमाल होता है वहाँ आलोचना का अधिकार-क्षेत्र है। दिमागी बीमारी शब्दों में झलक जाती है और शब्दों के ज़रिए से इस बीमारी के सारे लक्षण मालूम हो जाते हैं और जब लक्षण मालूम हो गए तो फिर इलाज भी मुश्किल नहीं। ज़ाहिर हो गया कि आलोचना दिमागी सेहत की ज़िम्मेदार है। इसका मैदान तंग नहीं व्यापक है। ज़िंदगी की तरह व्यापक है। विचारों, भावनाओं और कर्मों की दुनिया पर इसका अधिकार है।

    (5) तनक़ीद और नैतिक स्वास्थ्य

    दिमागी स्वास्थ्य और नैतिक स्वास्थ्य (अख़लाक़ी सेहत) में चोली-दामन का साथ है। अगर दिमाग़ बीमार हो तो नैतिकता भी स्वस्थ नहीं हो सकती। उदाहरण के लिए, अगर किसी दिमाग़ में बड़े कारोबार के कीटाणु घुस जाएँ तो उनका असर फ़ौरन हमारे आचरण में ज़ाहिर होगा, यानी हमारा आचरण कारोबारी हो जाएगा और ज़ाहिर है कि स्वस्थ आचरण और कारोबारी आचरण में वही फ़र्क़ होगा जो यूक्लिड (उक़लीदस) की सीधी लकीर और भूल-भुलैया में होता है। तनक़ीद (आलोचना) सीधी लकीर और भूल-भुलैया का फ़र्क़ बताती है। हमें इस फ़र्क़ का कम ज्ञान होता है और अगर हुआ भी तो हमेशा सीधी लकीर को भूल-भुलैया पर तरजीह (प्राथमिकता) नहीं देते। कहने का मतलब यह है कि नैतिकता की बुनियाद उस समझ पर है जो कर्म के मैदान में अलग-अलग चीज़ों में फ़र्क़ करना और एक चीज़ को दूसरी चीज़ पर तरजीह देना सिखाती है।

    नैतिकता शून्य (ख़ला) में साँस नहीं लेती और न ले सकती है। इसके वजूद के लिए सामाजिक व्यवस्था ज़रूरी है। प्राचीन सामाजिक व्यवस्था पर भोजन की तलाश और यौन प्रवृत्तियों (जिंसी मैलानात) ने गहरा असर डाला था। आमतौर पर यह ख़याल किया जाता है कि नैतिकता का संबंध सिर्फ़ यौन संबंधों से है, लेकिन यह ख़याल सही नहीं है। असल बात यह है कि प्राचीन इंसान के कर्म-क्षेत्र में दो चीज़ों का राज था। भौतिक ज़रूरतें और मजबूरियाँ एक तरफ़, तो आध्यात्मिक आज़ादी (रूहानी आज़ादी) दूसरी तरफ़ काम कर रही थी। नैतिकता का मुख्य मसला यह देखना है कि इंसानी तरक़्क़ी में समझ-बूझ और सचेत उद्देश्य (शऊरी मक़सद) का क्या हिस्सा है।

    जंगली (वहशी) इंसान को जीवन की आंतरिकता (बातिनियत) का बोध होता है, लेकिन वह इस बोध को विकसित नहीं करता और न कर सकता है। बात यह है कि उसे सोच-विचार की मोहलत कम मिलती है, यूँ समझिए कि जैसे मिलती ही नहीं। उसकी ज़िंदगी में एकांत (तन्हाई) के मौक़े कम आते हैं। वह किसी एकांत में बैठकर अपनी अंदरूनी ज़िंदगी पर सोच-विचार नहीं करता, अपनी आत्मा से तन्हाइयों में बात (हम-कलाम) नहीं करता। इसी वजह से उसकी अंदरूनी ज़िंदगी अधूरी सी रह जाती है और उसकी नैतिकता की बुनियाद आध्यात्मिक आज़ादी पर नहीं होती। यह आध्यात्मिक आज़ादी सोच-विचार से ही हासिल हो सकती है और सोच-विचार की उसे फ़ुर्सत नहीं मिलती। लाज़िमी तौर पर उसकी नैतिकता का स्रोत बाहरी चीज़ें होती हैं। ये बाहरी चीज़ें रिवाज और धर्म हैं। अगर किसी जंगली इंसान से आप उसके काम की वजह पूछिए तो वह कोई उचित (माक़ूल) वजह नहीं बता सकेगा। वह तो बस जो और लोग करते हैं, उसकी नक़ल करता है। इस तरह नैतिकता आदत का दूसरा नाम हो जाती है। जिस चीज़ का रिवाज है, वह सही है। जंगली इंसान बस इसी उसूल का पालन करता है। कैप्टन कुक ने पता लगाया था कि सरदार अलग क्यों खाते हैं। जवाब मिला, यही रिवाज है और इसलिए सही है।

    नैतिकता, डेवी (Dewey) कहता है,

    रिवाज है, अवामी तौर-तरीक़ा है। पक्की सामूहिक आदतों का नाम है। मानवविज्ञानी (एंथ्रोपोलॉजिस्ट) के लिए यह एक जानी-मानी हक़ीक़त है। हमेशा और हर जगह रिवाज व्यक्तिगत काम का पैमाना हैं। यही वह नक़्शा है जिसमें व्यक्तिगत काम बुने जाते हैं। यह बात आज भी उसी क़दर सही है जैसे यह कभी पहले थी। रिवाज ही नैतिक पैमानों की बुनियाद हैं।

    सभ्य इंसान भी कुछ जंगली जैसा है। वह भी आदत का ग़ुलाम है और जो बात होती है उसे बिना समझे-बूझे क़ुबूल कर लेता है। जंगली इंसान की तरह वह भी जो रिवाज है उसी के मुताबिक़ काम करता है। अगर उससे पूछा जाए कि वह ऐसा क्यों करता है तो शायद उसका भी वही जवाब हो जो ताहिती (Tahiti) के निवासी ने कैप्टन कुक को दिया था, यह रिवाज है और इसलिए सही है। लेकिन यह जवाब संतोषजनक नहीं हो सकता। सभ्य इंसान का तरीक़ा यही है कि वह अपने कामों के कारणों और नतीजों पर सोच-विचार कर सकता है और करता है। सभ्य ज़िंदगी सोच-विचार की फ़ुर्सत, सोच-विचार के मौक़े देती है। समझ-बूझ की आदत उसे अंदरूनी बोध (शऊर) अता करती है और बाहरी प्रभावों के पर्दे में जो अंदरूनी उसूल काम कर रहे हैं, उनका भेद बताती है। यह तनक़ीद का करिश्मा है कि वह सोच-विचार को निखारती है। हमारी सूझ में बूझ का तत्व शामिल करती है और हमारी समझ (तमीज़) की सही तरबियत करती है।

    आमतौर पर यह समझा जाता है कि जंगली इंसान अपनी प्रवृत्तियों और इच्छाओं का ग़ुलाम होता है और वह उनकी रोकथाम नहीं कर सकता। यानी सामाजिक सभ्यता से वह दूर का भी वास्ता नहीं रखता है, यह ख़याल सही नहीं है। जंगली इंसान के चारों तरफ़ रिवाज का बहुत पेचीदा जाल बिछा होता है जो बहुत सी बातों में उसकी रोकथाम करता है। यह ख़याल कि जंगली इंसान बहुत ख़ूँख़्वार और ख़ून बहाने वाला होता है, हक़ीक़त से दूर है,

    जंगली इंसान लड़ाकू नहीं होते। अलबत्ता वह यह दिखाने की कोशिश करते हैं कि वे बहुत ख़ूँख़्वार हैं। वे मुश्किल से लड़ाई-झगड़े के लिए तैयार होते हैं और जब तैयार भी हो जाते हैं तो बहुत से धार्मिक विश्वास और जादू के रीति-रिवाज़ लड़ाई-झगड़े में रुकावट डालते हैं और उसके असर को सीमित कर देते हैं। पूर्वी अफ़्रीका की सबसे ख़ूँख़्वार क़ौमों में बहुत कम ख़ून बहाया जाता है। स्पेक (Speke) ने एक जंग का ज़िक्र किया है जो तीन साल तक जारी रही। इसमें दोनों तरफ़ के तीन आदमी मारे गए। दुनिया के हर हिस्से में बहुत सी क़ौमें हैं जो लड़ती-झगड़ती नहीं, या बहुत कम, और अगर यह ख़याल सही होता कि प्राचीन क़ौमें हमेशा ख़ौफ़नाक क़िस्म की जंग में लगी रहती थीं तो इंसानियत बाक़ी नहीं रहती। प्राचीन इंसान आपस में झगड़े कैसे करता। उसके तो बहुत बड़े दुश्मन थे और उन दुश्मनों से बचने में, आपस में लड़ने के लिए नहीं, उसे मिल-जुलकर काम करना पड़ा।

    ज़ाहिर है कि यह तसव्वुर कि जंगली इंसान अपनी प्रवृत्तियों का ग़ुलाम है, कुछ रूमानी क़िस्म का है, हक़ीक़त से दूर। वह भी सभ्य इंसान की तरह अपनी भावनाओं और इच्छाओं पर क़ाबू रखता है। अपनी प्रवृत्तियों के बहाव को रोकता है और उसका रुख़ दूसरी तरफ़ फेर देता है, लेकिन यह रोकथाम आदत और रिवाज की बुनियाद पर होती है। प्रशिक्षित समझ (तरबियत-याफ़्ता तमीज़) की बुनियाद पर नहीं होती। अच्छी-बुरी बातों की पहचान, अंदरूनी उसूलों की छानबीन, मूल्यों की समझ (क़दरों की तमीज़) यानी तनक़ीद, आज़ाद और ज़िंदा यक़ीन की उसकी ज़हनी दुनिया में हुकूमत नहीं होती। और मुझे कहने दीजिए कि सभ्य इंसान की ज़हनी दुनिया में भी सही, आज़ाद और ज़िंदा तनक़ीद की हुकूमत कम दिखाई देती है। वह भी समझ-बूझ से कम काम लेता है। सुनी-सुनाई बातें, दूसरों के इशारे, जज़्बात की रौ, ज़हनी और जज़्बाती आदतें, ग़रज़ इस क़िस्म की चीज़ें काम करने की प्रेरणा (मुहर्रिक-ए-अमल) होती हैं। वह सोचता-समझता नहीं, नीच और बुरी हरकतों का दोषी (मुर्तकिब) होता है और यह समझता है कि वह कोई बहुत अच्छा और महान काम कर रहा है। पहले विश्व युद्ध के ज़माने में नए-नए सिपाहियों के सामने एक अंग्रेज़ी जनरल ने कुछ इस क़िस्म का भाषण दिया था,

    ज़रा सोचो तो कि ज़ख्मी जर्मन सिपाही से दीन-दुनिया का भला क्या फ़ायदा हो सकता है। वह आज अस्पताल में इलाज के लिए भर्ती होता है, और कल भला-चंगा होकर फिर जंग के मैदान में तुम्हारे मुक़ाबले में आ खड़ा होता है। देखो तो हमें इससे नुक़सान पहुँचता है। हाँ तो जब तुम किसी ज़ख्मी को पड़ा हुआ देखो तो उसे वहीं मार डालो। उस पर भरोसा करना निरी बेवकूफ़ी है। अगर तुमने उसे छोड़ दिया तो याद रखो कि मौक़ा मिलते ही वह तुम्हें या तुम्हारे प्यारे साथी को गोली का निशाना बना देगा। जर्मनों की बुज़दिली का यह हाल है कि वे अपनी संगीनों से बस उसी वक़्त काम लेते हैं जब हमारा कोई ज़ख्मी सिपाही मजबूरी और बेबसी की हालत में धूल और ख़ून में पड़ा हुआ होता है और जब वह अपनी हिफ़ाज़त नहीं कर सकता। ये बुज़दिल अपनी संगीन उसके सीने में भोंक देते हैं। जब तुम जर्मनों को ऐसी हरकत करते देखते हो तो फिर तुम्हें उनसे किसी क़िस्म की हमदर्दी हो सकती है? नहीं, बस इन बेरहमों को मार डालो। एक-एक करके मार डालो। याद रखो कि बस तुम्हारा यही एक फ़र्ज़ है कि तुम उन्हें मार डालो। सलामती का बस यही एक रास्ता है कि तुम इन नापाक हस्तियों को मिटा दो।

    शायद इस भाषण का बहुत गहरा असर हुआ होगा और अंग्रेज़ी सिपाहियों ने इस पर अमल भी किया होगा और बहुत से जर्मनों को जब वे मजबूर और बेबस धूल और ख़ून में पड़े हुए होंगे, अपनी संगीनों से मार डाला होगा। किसी के दिल में यह ख़याल भी न गुज़रा होगा कि ज़रा देखिए तो कि क्या बात कही गई है और नैतिक नज़रिए से इसकी क्या अहमियत है। किसी सोच-विचार की उसे ज़रूरत भी महसूस नहीं हुई होगी, मुझे तो आदत है कि जो कुछ कहो सही कहिए।

    इस भाषण का निचोड़ यह है कि ज़ख्मी जर्मन सिपाहियों को क़त्ल कर दो, किसी को ज़िंदा न छोड़ो। वे मजबूर और लाचार धूल और ख़ून में तड़प रहे हों, अपने बचाव की ताक़त न रखते हों लेकिन रहमदिली से, इंसानियत से काम न लो। दरिंदे बन जाओ, बेरहमी से उन्हें मार डालो। उनके सीनों में अपनी संगीन भोंक दो, भोंक दो। इस क़िस्म की सीख का नैतिकता से, इंसानियत से, अक़्ल से दूर का भी वास्ता नहीं। जो शख़्स ऐसी बातें कर सकता हो, जो लोग ऐसी बातें सुन सकते हों और उन पर अमल भी कर सकते हों, उन्हें कैसे सभ्य माना जा सकता है और जो सभ्यता इस क़िस्म की बातों को जायज़ मानती है, वह कैसी सभ्यता होगी? जिन बर्बर हरकतों का इल्ज़ाम जर्मनों पर रखा जाता है, उन्हीं बर्बर हरकतों का बढ़ावा दिया जाता है और शायद यह एहसास भी नहीं होता कि इस क़िस्म की बेतुकी और हास्यास्पद हरकत हुई है। अगर बोलने वाले को इस हक़ीक़त का एहसास होता और वह सही मायनों में सभ्य होता तो वह ख़ुदकुशी कर लेता और अगर सुनने वाले सभ्य होते और समझते कि उन्हें किस चीज़ के लिए उकसाया जा रहा है तो जर्मनों से पहले वे बोलने वाले को अपनी संगीन का निशाना बना डालते।

    लड़ाई का ज़माना था, ऐसे ज़माने में देशभक्ति का जज़्बा जोश पर होता है। यह तो स्वाभाविक बात है कि हर शख़्स अपने वतन से मुहब्बत करता है। उसे हर क़िस्म के ख़तरे से सुरक्षित रखना चाहता है और अपने वतन की हिफ़ाज़त में अपनी जान भी क़ुर्बान कर देने के लिए तैयार हो जाता है। यह जज़्बा कुछ ऐसा ज़बरदस्त होता है कि तमीज़, समझ-बूझ, सभ्यता, कल्चर, तनक़ीद (आलोचना) सबको कुछ समय के लिए रोक देता है। इस भाषण में इस जज़्बे के अलावा और भी कई भावनाओं को भड़काया गया है। निजी सुरक्षा का एहसास बहुत मज़बूत होता है। उसे भी उकसाया गया है, अगर तुमने उसे छोड़ दिया तो याद रखो कि मौक़ा मिलते ही वह तुम्हें या तुम्हारे प्यारे साथी को गोली का निशाना बना देगा। निजी सुरक्षा के एहसास के साथ-साथ दोस्ती के जज़्बे को भी भड़काया गया है। अगर तुम्हें अपनी सलामती की परवाह नहीं तो न सही, अपने साथियों की सलामती की हिफ़ाज़त तो तुम्हारा फ़र्ज़ है और फिर इन चीज़ों के साथ, बोलने का तरीक़ा ऐसा है जैसे बहुत सुलझी हुई और अक़्लमंदी की बातें कही जा रही हैं और जो उन्हें न माने वह निरा मूर्ख है और ज़ाहिर है कि मूर्ख बनना कोई पसंद नहीं करता। मानो एक घिनौने काम के लिए क्या-क्या जतन किए गए हैं, कैसी-कैसी तरकीबें काम में लाई गई हैं।

    यह भाषण मानवीय नैतिकता के नज़रिए से बहुत बड़ा गुनाह कहा जा सकता है, लेकिन हम आए दिन ऐसे कितने नैतिक गुनाह करते हैं और वह सिर्फ़ इसलिए कि अपने रुझानों और इच्छाओं, अपनी भावनाओं, अपनी मानसिक और भावनात्मक आदतों से मजबूर हो जाते हैं और तनक़ीद की शक्ति से काम नहीं लेते। अक़्ल रहते हुए भी हम अक़्ल से काम नहीं लेते। यानी सभ्यता की मंज़िलों को तय कर लेने के बाद भी हम सभ्य नहीं हो पाते। यही वजह है कि हमारी नैतिकता का टेढ़ापन ठीक नहीं होता और यह टेढ़ापन सिर्फ़ ख़ास-ख़ास वक़्त दिखाई नहीं देता, बल्कि यह टेढ़ापन हमारी हर कथनी और करनी में, हमारी सामाजिक संस्थाओं में, हमारे निजी और सामाजिक रिश्तों में, ज़िंदगी के हर क्षेत्र में दिखाई देता है। यह तनक़ीद की ही देन है कि हम इस नैतिक टेढ़ेपन को पहचान लेते हैं और इसे पहचान कर ठीक करने की कोशिश करते हैं।

    एक दूसरी क़िस्म की मिसाल लीजिए, किसी ने भी देखा नहीं कि क्या हुआ। अभी वह लड़का फ़ुटपाथ पर खेल रहा था और अभी वह ज़मीन पर था। अस्पताल में डॉक्टर की एक नज़र काफ़ी थी। उसने कहा, इस बच्चे को साँप ने डस लिया है। इसे 'एंटी वेनम सीरम' फ़ौरन मिलना चाहिए वरना यह मर जाएगा। एक-एक करके सारे अस्पतालों और दवाख़ानों में पता किया गया। हर जगह से एक ही जवाब मिला, दवा मौजूद नहीं। यहाँ तक कि स्मिथ की पिकाडली वाली दुकान में भी इस दवा की आख़िरी शीशी उसी रोज़ बिक गई थी। लेकिन स्मिथ सिर्फ़ नहीं कहकर कैसे बैठा रहता। वह राष्ट्रीय केमिस्ट था। उसका फ़र्ज़ था कि जैसे भी हो वह यह दवा मँगा दे। अब इसमें जितना भी ख़र्च हो। एक ज़िंदगी का सवाल था। इस जान को बचाना उसका काम था।

    अस्पताल के पास चर्च की घड़ी ने आठ बजाए। मरीज़ बच्चे के पास डॉक्टर खड़ा हुआ उस नन्ही सी जान के उतार-चढ़ाव को देख रहा है। आठ बजकर पाँच मिनट हो गए। क्या वह 'सीरम' कभी नहीं आएगा? अचानक रात के अँधेरे में से एक मोटर की आवाज़ सुनाई दी। फिर हॉर्न बजा। लो! दवा मिल गई। पाँच मिनट के अंदर-अंदर बच्चे को दवा दे दी गई और वह नन्ही सी जान बच गई। कुछ देर के बाद डॉक्टर ने कहा, यह जान बाल-बाल बची है। लेकिन यह कैसा शानदार कारनामा था!

    आप समझते होंगे कि मैंने ये पंक्तियाँ किसी कहानी या नॉवेल से नक़ल की हैं। आपको यह सुनकर शायद हैरानी होगी कि यह इबारत एक विज्ञापन से नक़ल की गई है और इसका मक़सद यह है कि आप स्मिथ की दुकान से दवाएँ खरीदें। इस कारोबारी मक़सद के लिए इतना बड़ा तूफ़ान खड़ा किया गया है। इससे हमारी नैतिकता पर काफ़ी रोशनी पड़ती है कि हम इस क़िस्म की विज्ञापनबाज़ी को जायज़ मानते हैं। इस क़िस्म के विज्ञापन से प्रभावित होते हैं और स्मिथ जैसे लोगों को दौलत जमा करने का मौक़ा देते हैं।

    एक घिनौने काम के लिए क्या-क्या तरकीबें काम में लाई गई हैं। अगर किसी शख्स पर कोई मुसीबत आ जाती है तो हम स्वाभाविक रूप से उससे हमदर्दी करते हैं और अगर उसकी जान खतरे में है तो हमारी हमदर्दी बढ़ जाती है। फिर अगर किसी मासूम बच्चे की जान का सवाल हो तो हमारी हमदर्दी और भी बढ़ जाती है। यहाँ एक बच्चे की जान खतरे में है और फिर यह आफ़त अचानक आती है। अभी वह सेहतमंद था। ज़िंदगी उसकी रगों में दौड़ रही थी। बीमारी या मौत का गुमान भी न था और अभी हम उसे मरने के करीब पाते हैं। हमदर्दी का जज़्बा अपने पूरे जोश-ओ-खरोश के साथ उभरता है। फिर हमें इंतज़ार की जानलेवा हालत में फँसा दिया जाता है। एक-एक करके सारे अस्पतालों और दवाखानों में दवा तलाश की जाती है और नहीं मिलती और हम हैं कि इंतज़ार में हैं। इंतज़ार की शिद्दत बढ़ती जाती है। यहाँ तक कि गिरजे की घंटी आठ बजाती है। फिर पाँच मिनट और गुज़र जाते हैं, रही-सही उम्मीद खत्म हो जाती है। इस मायूसी के आलम में जब कोई आस नहीं रहती, उस वक्त यकायक दवा आ जाती है और उस बच्चे की जान बच जाती है और हमारी मायूसी खुशी में बदल जाती है।

    यह सब कुछ होता है और किस लिए, मक़सद बस यह है कि आप स्मिथ की दुकान से दवाएँ खरीदें। ब्राउन या जोंस की दुकान की तरफ भूल कर भी रुख न करें। यह सब होता है और इस तड़क-भड़क से होता है कि डर होता है कि असल मक़सद कहीं पूरा न हो। इसलिए इसकी तरफ भी तवज्जो ज़रूरी है और पूरी तवज्जो है और यह इस सफाई और चालाकी से होता है कि हमें खबर भी नहीं होती कि क्या हो रहा है। सारे अस्पतालों और दवाखानों में दवाएँ न मिलें तो न मिलें लेकिन स्मिथ की दुकान में ज़रूर रहती हैं। अब इसे क्या कीजिए कि आखिरी शीशी उसी रोज़ बिक चुकी हो। यह तो खैर किस्मत का फेर था लेकिन स्मिथ सिर्फ किस्मत! किस्मत! कहकर चुप कैसे बैठा रहता। वह तो क़ौमी केमिस्ट है। दुकान उसने दौलत कमाने के लिए तो खोली नहीं है। उसका मक़सद तो लोगों की खिदमत है। अब जितना भी खर्च हो यह उसका फ़र्ज़ है कि दवा मँगा दे और वक्त पर मँगा दे। अब इस काम में मोटर कार, रेलगाड़ी, हवाई जहाज़ का जो कुछ भी किराया अदा करना पड़े और जब वह नन्ही सी जान बच जाती है तो मुमकिन है कि इस खुशी में आप स्मिथ को भूल जाएँ लेकिन यह कैसे हो सकता है।

    डॉक्टर कहता है, यह कैसा शानदार कारनामा था! यह शानदार कारनामा स्मिथ का था कि उसने वक्त पर दवा मँगा दी। हज़ारों रुपये खर्च करके दवा मँगा दी और वह नन्ही सी जान बच गई। स्मिथ की दुकान आमदनी का ज़रिया नहीं। यह दुकान कारोबारी उसूलों पर नहीं चलाई जाती। यह तो सिर्फ क़ौम की खिदमत का एक ज़रिया है। दरियादिली की अमली शक्ल है। बच्चों, नौजवानों, बूढ़ों की जानें सलामत रहें। लोगों की तंदुरुस्ती बनी रहे और बस!

    बीसवीं सदी में इश्तेहार पर काफी पैसे खर्च किए जाते हैं। इसलिए नहीं कि व्यापारी और कारोबारी लोग बहुत दरियादिल हैं। यह गोया रोटी को दरिया में डालना है, जो हमें हज़ार गुना बढ़ोतरी के साथ लौट आती है। अगर स्मिथ ने हज़ारों रुपये खर्च करके दवा मँगा दी तो सिर्फ इसलिए कि यह भी बहुत अच्छा इश्तेहार था। अपनी किस्म का सबसे अलग और आला। इसमें न तो क़ौमी खिदमत का सवाल पैदा होता है और न दरियादिली का इसमें कुछ दखल है। स्मिथ की क़ौमी खिदमत, रहमदिली और दरियादिली साबित करने के लिए यह भी ज़रूरी है कि एक बच्चे को साँप काट ले। यह साँप आया कहाँ से? और किसी अस्पताल और दवाखाने में वह दवा मौजूद न हो, और यह भी ज़रूरी है कि खुद स्मिथ की दुकान से उस दवा की आखिरी शीशी उसी रोज़ बिक गई हो। अगर साँप न काटता, अगर किसी अस्पताल या दवाखाने में वह दवा मिल जाती, अगर खुद स्मिथ की दुकान में उस दवा की आखिरी शीशी मौजूद होती तो फिर स्मिथ का इश्तेहार कैसे हो सकता था! सिर्फ एक दुकान के इश्तेहार के लिए हमारे जज़्बात से खेला गया है, हमारी अक्ल पर पर्दा डालने की कोशिश की गई और इस काम के लिए अदबी तरकीबों का नाजायज़ इस्तेमाल किया गया है।

    इस किस्म का इश्तेहार बदतरीन किस्म का अखलाकी जुर्म है, लेकिन इस किस्म के बेशुमार जुर्म होते रहते हैं और हमें खबर भी नहीं होती। ज़िंदगी के हर शोबे में इस किस्म के जुर्मों की बेशुमार मिसालें मिलेंगी। पिछले विश्व युद्ध या किसी युद्ध के ज़माने में, संयुक्त राष्ट्र की मजलिसों और उनकी बकवासों में, हिंदुस्तान और पाकिस्तान के बँटवारे और उनके ताल्लुकात में, हैदराबाद और कश्मीर के झगड़ों में, हिंदी, हिंदुस्तानी और उर्दू की बहसों में, इल्मी इदारों, यूनिवर्सिटियों और कॉलेजों की कार्रवाइयों में, गवर्निंग बॉडी, सीनेट, सिंडिकेट, डिस्ट्रिक्ट बोर्ड और असेंबली के चुनावों में, तालिब-इल्मों (छात्रों) की स्ट्राइकों और कम्युनिस्टों की साज़िशों में, ग़रज़ ज़िंदगी के हर शोबे में अखलाकी कमी नज़र आती है और हम ऐसे मुतमइन हैं कि जैसे खराबी का नाम-ओ-निशान भी नहीं। हमें वह तमीज़ कहाँ कि हम कजी (टेढ़ेपन) को कजी समझें, वह अखलाकी जुर्रत कहाँ कि अखलाक की खामियों को दुरुस्त करें। यह तमीज़, यह जुर्रत हमें तनकीद सिखाती है।

    कहा जाता है कि अखलाक, अखलाकी नज़रियों, अखलाकी कानूनों के लिए कोई साइंटिफिक जवाज़ (आधार) नहीं। साइंस हमारे लिए नित-नए वाकयात, नित-नई मालूमात मुहैया करता है लेकिन अखलाकी कद्रें साइंस के दायरे से बाहर हैं। इसीलिए कहा जाता है कि कद्रों का कोई साइंटिफिक जवाज़ नहीं हो सकता। साइंटिफिक जवाज़ मुमकिन हो या नहीं, यह तो मानी हुई बात है कि हम कुछ चीज़ों की ज़्यादा कद्र करते हैं और कुछ चीज़ों की कम। बाज़ चीज़ों को हासिल करने के लिए हम काफी वक्त खर्च करते हैं और अपनी पूरी ताकत से काम लेते हैं। तरह-तरह की मुश्किलों और ज़हमतों का सामना करते हैं और बाज़ चीज़ों के लिए हम कुछ भी नहीं करते। इससे मालूम होता है कि कद्रें हैं और हमें कद्रों की पहचान है और यह बात हर समाजी निज़ाम में मिलती है, बल्कि सच तो यह है कि जो चीज़ समाजी निज़ाम को कायम रखती है वह यही कद्रें हैं जिनका एहसास हर फर्द को होता है, जब कभी कोई शख्स कहता है, मुझे ऐसा करना है और जब वह अपने क़ौल के मायने पर ग़ौर करता है तो उसे यकीन होता है कि उसके अमल के सामने कोई अच्छाई का मेयार है। अखलाकी एहसास या ज़मीर या सही और गलत का यकीन उसे सही चीज़ को पसंद और गलती को रद्द करने को कहता है। बल्कि मजबूर करता है। यह अखलाकी एहसास, यह यकीन कि कुछ चीज़ अच्छी है और कुछ बुरी। यह कोई मामूली बात नहीं कि इसको पस-ए-पुश्त (नज़रअंदाज़) डाल दिया जाए। वहशियों में इस यकीन की बुनियाद बाहरी चीज़ों यानी रिवाज़ पर होती है। मुहज़्ज़ब इंसान में यह फैसला सच्ची अंदरूनी फैसला करने की कुव्वत का नतीजा है।

    साइंस हमें मालूमात देता है लेकिन इन मालूमात के इल्म का यह मतलब नहीं कि हम उन्हें आँख बंद करके कबूल कर लें। हकीकत कुछ और है। यह जानना कि चीज़ों की हकीकत क्या है, उसको बदलने में पहला कदम है। इस आगाही के साथ ही वे बदलने लगती हैं क्योंकि वे एक दूसरे निज़ाम में दाखिल होती हैं जो अच्छा या बुरा हो लेकिन दूरंदेशी और फैसले का निज़ाम है। अखलाक वाकयात की बसीरत का नाम नहीं। देखना यह है कि बसीरत से क्या काम लिया जाता है। यह इद्राक (समझ) बताता है कि कब हम वाकयात को मान लें और उन्हें जावदानी (अमरता) बख्शें और कब उन्हें हालात और नतीजों को बदलने में काम में लाएँ।

    साइंस और अख़लाक़ (नैतिकता) में यही फ़र्क़ ठहरा कि साइंस हमें नई-नई जानकारियां, नए-नए वाक़ियात (घटनाओं) का एहसास देता है और अख़लाक़ यह बताता है कि हम इन जानकारियों से क्या काम लें और इन वाक़ियात को अच्छा समझें या बुरा, उन्हें फ़ायदेमंद समझें या नुक़सानदेह और जानलेवा। मसलन साइंस की एक देन है एटमी ताक़त। लेकिन साइंस यह नहीं बताता और न बता सकता है कि हम इस ताक़त से क्या काम लें। यह तो अख़लाक़ ही सिखा सकता है कि एटम बम बनाकर इंसान और इंसानियत का ख़ून बहाएं या इस नई ताक़त को इंसानी तरक़्क़ी और इंसानी भलाई का ज़रिया बनाएं। एटम बम से जापानियों को नेस्त-ओ-नाबूद करना। इस भयानक तबाही में मासूम बच्चे, औरतें, बूढ़े सभी मारे गए। और एटम बम गिराते हुए यह दुआ करना कि ख़ुदा इस भयानक तबाही में कामयाबी दे, इस क़िस्म की हरकत हमारे अख़लाक़ पर क्या रोशनी डालती है। यह देखना तो हमें तनक़ीद (आलोचना) बताती है। तक़रीबन निहत्थे मिस्र पर दो बड़ी फ़ौजी ताक़तों का हमलावर होना या हंगरी के आज़ादी के जज़्बे को रशिया का कुचल देना, यह सब भी अख़लाक़ी जरायम (नैतिक अपराध) हैं।

    अख़लाक़ी तत्व के बिना कोई समाजी निज़ाम (सामाजिक व्यवस्था) नहीं हो सकता और समाजी निज़ाम के बिना कोई कल्चर (संस्कृति) नहीं हो सकता। समझ-बूझ कर अपनी आज़ाद ख़्वाहिश से, समाज-दुश्मन रुझानों की रोकथाम करना ही कल्चर की जड़ है, इंसानी कल्चर वजदानी (सहज/जन्मजात) नहीं है। इस पर फ़तह पाने में कभी न ख़त्म होने वाली कोशिश की ज़रूरत है और इसमें फ़ितरी (प्राकृतिक) रुझानों को दबाना पड़ता है और व्यक्तिगत आज़ादी की चाह को समाजी मक़सद के ख़याल से नीचा करना और क़ुर्बान करना पड़ता है। यह लगातार सचेत कोशिश ज़रूरी है। मैंने कहा कि साइंस नए वाक़ियात, नए ख़यालात, नई ताक़तें इकट्ठा करता रहता है, लेकिन यह नहीं बताता कि हम इनसे क्या, कब और कैसे काम लें, यह साइंस के बस की बात नहीं कि वह बताए कि इंसान इन नई जानकारियों, नए ख़यालात, अधिकार के नए साधनों से क्या काम ले, जिन जानकारियों, ख़यालात और साधनों की साइंस बारिश कर रहा है। यह तो इंसान को फ़ैसला करना है, इनसे क्या करे, और यह क्या करना उन क़दरों (मूल्यों) के पैमाने पर निर्भर है जो उसके पास हैं। यहां मज़हब बहुत बड़ा माध्यम हो सकता है क्योंकि मज़हब हमें क़दरों का पैमाना देता है और साथ-साथ वह ऐसी रूहानी (आध्यात्मिक) और जज़्बाती ताक़त भी बख़्शता है जिसकी मदद से हम इन क़दरों को व्यावहारिक रूप से हासिल कर सकते हैं।

    लेकिन मज़हब की आवाज़ मद्धम पड़ गई है। साइंस की आवाज़ ज़्यादा तेज़ है और इस रोशन-ख़याल (प्रगतिशील) ज़माने में ज़्यादा कशिश (आकर्षण) रखती है। इसलिए अख़लाक़ी मुश्किलों को आसान करने और क़दरों की गुत्थी सुलझाने में साइंस से मदद ली जाती है। रिचर्ड्स ने एक साइंटिफ़िक अख़लाक़ी निज़ाम बनाया है, जो अपनी क़दरें बदलते हुए वाक़ियात के साथ बदलता रहेगा। ऐसा अख़लाक़ जो जादुई मुक्ति, तानाशाही और पूर्णतावाद (absolutism) से आज़ाद होगा। वह निज़ाम यह है, अच्छी और क़ीमती चीज़ उत्तेजना (stimulus) का व्यावहारिक प्रकटीकरण और उनके रुझानों की संतुष्टि है। कोई चीज़ अच्छी है। इसके कहने का मतलब यह है कि यह संतोषजनक है और अच्छे तजुर्बे के यह मायने हुए कि इसमें हमारी उत्तेजनाओं की पूर्ति और संतुष्टि हुई। इसके साथ यह शर्त भी ज़रूरी है कि इन रुझानों का व्यावहारिक प्रकटीकरण और उनकी संतुष्टि दूसरे ज़्यादा अहम रुझानों में कोई रुकावट नहीं डालती। अख़लाक़ का मसला, किस तरह हम ज़िंदगी से ज़्यादा से ज़्यादा क़ीमत हासिल कर सकते हैं, व्यवस्था का मसला बन जाता है। व्यक्तिगत ज़िंदगी की व्यवस्था और व्यक्तियों का एक-दूसरे से तालमेल। और इस तरह सारे ग़ैर-मनोवैज्ञानिक ख़यालात से छुटकारा मिल जाता है और परम भलाई और अंधविश्वास से भी छुटकारा मिल जाता है।

    दूसरी जगह रिचर्ड्स कहता है कि सबसे ज़्यादा क़ीमती तजुर्बा वह होगा, जिसमें व्यक्ति की ज़िंदगी के ज़्यादा से ज़्यादा हिस्से की शिरकत हो (जितनी भी उत्तेजनाएं मुमकिन हों) और इसके साथ कम से कम टकराव हो और कार्यों की निचली व्यवस्थाओं (sub-systems) में आपस में रोक-टोक न हो। वह जितना ज़्यादा ज़िंदा रहे, जितनी रुकावटें कम हों, उतना अच्छा है। रिचर्ड्स की क़दरें मात्रात्मक (quantitative) हैं, देखने में यह अजीब बात मालूम हो कि हम ख़यालात को तजुर्बे के हाकिमों और कारणों में नहीं समझते। ऐसा करना ही तो पारंपरिक मनोविज्ञान की सबसे बड़ी ग़लती रही है। ज़ेहन (मस्तिष्क) हमारे रुझानों का जुड़ा हुआ हिस्सा रहा है, यह एक ज़रिया है जिससे मुख़्तलिफ़ रुझान आपस में मिल-जुलकर रहते हैं। इंसान परम-मस्तिष्क (Absolute Mind) नहीं, रुझानों का एक निज़ाम है। समझ इंसान की मदद करती है। उसकी मालिक नहीं है।

    यह है रिचर्ड्स का साइंटिफ़िक अख़लाक़ी निज़ाम, लेकिन इसमें बहुत सी ख़ामियां हैं। अगर इंसान सिर्फ़ बदलते हुए एहसासात और रुझानों का मजमूआ (समूह) है तो फिर इंसानी फ़ितरत में कोई बाक़ी रहने वाला तत्व नहीं हो सकता। कोई ऐसा एहसास नहीं हो सकता जो न बदले। नतीजा यह होगा कि इंसान बदलने वाले माहौल के साथ हमेशा बदलता रहेगा और इसका लाज़िमी नतीजा यह होगा कि कोई बाक़ी रहने वाला मेयार (पैमाना) न बन सकेगा। फिर रिचर्ड्स के अख़लाक़ी निज़ाम की बुनियाद गिनती पर है। अगर कोई रुझान अहम है तो सिर्फ़ इस वजह से कि उसकी संतुष्टि से ज़्यादा से ज़्यादा दूसरे रुझानों की संतुष्टि जुड़ी है। अगर ज़ैद और उमर के मिज़ाज में, उनकी जज़्बाती बनावट में बुनियादी फ़र्क़ है तो फिर हम कोई फ़ैसला नहीं कर सकते हैं। मसलन शेर और गाय को लीजिए। शेर के एहसासात और रुझान ऐसे हैं जिनसे समाज के निज़ाम में दुश्वारी पैदा होती है और इन रुझानों की संतुष्टि का नतीजा यह होगा कि दूसरे व्यक्तियों के रुझान ख़तरे में पड़ जाएंगे। बल्कि उनकी ज़िंदगी ख़तरे में पड़ जाएगी। लेकिन अगर हम शेर से यह कहें कि वह गाय हो जाए तो शायद वह हमारी बेवकूफ़ी पर हंसने लगे और यह कहना कि शेर गाय के मुक़ाबले में कम रुझानों की संतुष्टि हासिल करता है, कुछ यूं ही सा होगा। ज़ाहिर है कि इस अख़लाक़ी निज़ाम से काम नहीं चल सकता है। ऐसा अख़लाक़ मानो अख़लाक़ का निषेध है। इससे हमें कोई पैमाना नहीं मिलता जिससे हम किसी चीज़ की जांच कर सकें।

    यह तो हमें मानना होगा कि इंसानी फ़ितरत की गहराइयों में कोई ज़िंदा हक़ीक़त है, कोई अंदरूनी चीज़ है जिस पर बाहरी माहौल का, वह समाजी, सियासी, इक़्तेसादी (आर्थिक) जो कुछ भी हो, असर होता है लेकिन जो बाहरी हक़ीक़तों पर भी असर डालती है और उन्हें नई-नई शक्लें दे सकती है। फिर यह भी मानना होगा कि ख़याल की ख़ास अहमियत है और रिचर्ड्स के निज़ाम में इसकी कोई जगह नहीं। हम सोचते हैं, अपने अंदरूनी एहसासात और रुझानों पर ग़ौर करते हैं, और यही सलाहियत (क्षमता) हमारे सभ्य होने की दलील है। यह ख़याल है जो बाहरी चीज़ों से हमारी तवज्जो (ध्यान) अंदरूनी उसूल की तरफ़ फेर देता है। इसी के सहारे हम अपने रुझानों का एक संतोषजनक निज़ाम बना सकते हैं और उनसे एक अच्छी ज़िंदगी की तश्कील कर सकते हैं (बना सकते हैं)। मज़हब हमें क़दरों का पैमाना दे सकता है और मौजूदा ज़माने में ऐसे पैमाने की सख़्त ज़रूरत है लेकिन मज़हब में ज़ोर-ज़बरदस्ती नहीं हो सकती है। मज़हबी एहसास, ज़िंदा मज़हबी एहसास फ़ितरी (प्राकृतिक) चीज़ है और यह सिर्फ़ फ़ितरी तौर पर फल-फूल सकती है।

    (5) तनक़ीद और कल्चर

    हमारी तहज़ीब खंजर से अपना ही गला काट रही है, इस वक़्त तनक़ीद (आलोचना) का सबसे अहम काम तहज़ीब को ख़ुदकुशी से बचाना है। मौजूदा ज़माने में मशीन ने एक भयानक राक्षस की शक्ल इख़्तियार कर ली है और अब यह राक्षस हमारे क़ाबू से बाहर हो चला है। इसे हमने अपने काम के लिए बनाया था। इसकी मदद से हम अपनी सुख-सुविधा के नए-नए सामान मुहैया करते थे लेकिन ऐसा मालूम होता है कि अब यह राक्षस बेलगाम हो गया है। हमारी सुख-सुविधा की परवाह नहीं करता और अपनी ताक़त में मस्त इंसानियत को कुचलता हुआ आगे बढ़ रहा है। हमें इस राक्षस को क़ाबू में लाना है और इससे इंसानी भलाई और तरक़्क़ी का काम लेना है। यानी हमारे सामने निहायत मुश्किल मंज़िल है और वह यह कि मशीन टूट-फूट भी न जाए और साथ-साथ उसकी ऐसी जीत भी न हो कि वह हमारी रूह को चूर-चूर कर दे या उसे हमेशा के लिए अपने पंजों में जकड़ ले।

    मशीन तो साइंस की देन है। देखना यह है कि इस मुश्किल वक़्त में, इस मसले को हल करने में साइंस हमारी क्या मदद कर सकता है। कहा जाता है कि साइंस का सिर्फ़ एक मक़सद है और वह हक़ीक़त की खोज है। प्रोफ़ेसर पोल्यानी ने कहा है कि मेरी नज़र में साइंटिफ़िक हक़ीक़त से ज़्यादा पवित्र कोई दूसरी चीज़ नहीं और समाजी ज़रूरतों के बहाने से ख़ास साइंस के काम में बाधा डालना साइंस और इंसानियत दोनों के लिए घातक है। इस क़िस्म के नज़रिए से कोई ख़ास फ़ायदा नहीं। साइंटिस्ट भी समाज का एक हिस्सा है और कुछ समाजी ज़िम्मेदारी उस पर भी आती है। कुछ लोग इस हक़ीक़त से वाक़िफ़ हो चले हैं। प्रोफ़ेसर बर्नाल के ख़याल में साइंस का बस यही मक़सद है कि वह सारी समाजी ज़िंदगी पर संयुक्त, सुव्यवस्थित और सचेत क़ाबू हासिल कर ले और क्रोथर का कहना है कि मानव जाति का अस्तित्व साइंस के बग़ैर मुमकिन नहीं। इसलिए यह साइंटिस्ट का फ़र्ज़ है कि वह बराबर इस बात का ख़याल रखे कि साइंस से हमेशा अच्छा काम लिया जाए और उसे कभी किसी बुरे काम में न लगाया जाए।

    हाँ, यह कह देना ज़रूरी है कि साइंटिस्ट की समाजी ज़िम्मेदारी का वह मतलब नहीं जो आजकल रूस में हो रहा है, यानी रूसी साइंस अलग क़ायम किया जाए, और वह भी नहीं जो जर्मनी में हुआ था कि साइंस के आविष्कार इस ख़ास मक़सद से हों कि एक मुल्क दूसरे मुल्कों पर कब्ज़ा करने में कामयाब हो। साइंस का मुख्य लक्ष्य इंसानियत की ख़िदमत है, न कि किसी ख़ास मुल्क या किसी गिरोह के लालच और हवस को कामयाब बनाना।

    बहरहाल, तहज़ीब की तरक़्क़ी में साइंस ने ग़ैबी मदद (अदृश्य हाथ) का काम किया है, लेकिन डेढ़-दो बरसों में साइंस ने इतनी तेज़ी से तरक़्क़ी की है, इतनी बेशुमार नई-नई चीज़ें बरसाई हैं कि उनके बोझ से तहज़ीब का दम घुटने लगा है। बात यह है कि भौतिक चीज़ें, ज़रूरतें और पेचीदगियाँ बहुत बढ़ गई हैं और नैतिक और दिमागी क्षमताओं में कोई ख़ास इज़ाफ़ा नहीं हुआ है। नतीजा यह है कि इंसान की हालत उस बच्चे जैसी है जिसने लोहार का भारी हथौड़ा उठा लिया हो और फिर उस बोझ को बर्दाश्त न कर सके और इधर-उधर डगमगाता फिरे। अब देखना यह है कि साइंस अपनी लाई हुई मुसीबत से हमें बचा सकता है या नहीं।

    भौतिक नेमतों के अलावा साइंस एक मख़सूस नज़रिया, छानबीन का एक अलग तरीक़ा सिखाता है जिसकी चंद ख़ास विशेषताएँ हैं: यक़ीन को स्थगित रखना, जब तक सुबूत न मिल जाए शक करते रहना, व्यक्तिगत झुकाव और पूर्वाग्रह के बजाय तथ्यों पर भरोसा करना और उन्हें मार्गदर्शक बनाना, ख़यालात को खुला रखना और उन्हें परिकल्पनाओं (hypotheses) की तरह जाँचना, न कि उन पर आस्थाओं की तरह भरोसा करना, और रिसर्च के नए-नए मैदानों और नए-नए मसलों को ख़ुशी से खोजना। यही बातें हैं जो साइंटिस्ट को आम लोगों से विशिष्ट बनाती हैं, लेकिन यह साइंटिफ़िक कार्यप्रणाली अभी तक चंद मख़सूस और भाग्यशाली लोगों की जागीर है। आम तौर से लोग अज्ञानता का शिकार होते हैं और उनकी मान्यताओं की बुनियाद आदत और रिवाज, माहौल, प्रोपेगैंडा, ज़ाती और समाजी पूर्वाग्रह और रुझानों पर होती है। कहा जाता है कि इस अज्ञानता को दूर करने की ज़रूरत है और यह भी ज़रूरी है कि मान्यताओं की बुनियाद स्पष्ट सुबूत पर हो। ऐसा हो तो हमारी सारी मुश्किलें आसान हो जाएँ।

    यह बात अपनी जगह पर दुरुस्त है लेकिन सिर्फ़ साइंटिफ़िक नज़रिया और कार्यप्रणाली काफ़ी नहीं। जिसे कल्चर कहते हैं वह बहुत से तत्वों से मिलकर बना है जो एक दूसरे पर प्रभाव डालते रहते हैं। क़ानून, राजनीति, उद्योग और व्यापार, साइंस, शिल्प, फ़ुनून-ए-लतीफ़ा (ललित कलाएँ), नैतिकता, वे मूल्य जिन्हें हम क़ीमती समझते हैं और जिस तरह हम इन मूल्यों की जाँच-परख करते हैं, और आम ख़यालात की वह व्यवस्था जिसकी रौशनी में हम बुनियादी ख़यालात की तारीफ़ और तनक़ीद करते हैं यानी हमारा समाजी दर्शन—यह सब चीज़ें मिल-जुलकर कल्चर की व्यवस्था बनाती हैं। यह सब हिस्से अहम हैं लेकिन बराबर महत्व नहीं रखते। विशेषकर ललित कलाएँ बहुत अहम हैं लेकिन उनकी अहमियत का सही एहसास कम मिलता है। जो चीज़ें समाजी हालात और व्यक्तिगत आज़ादी पर असर डालती हैं, उनमें ललित कलाओं की गिनती नहीं होती है और यह समझा जाता है कि ये कलाएँ गहनों की तरह कल्चर की ख़ूबसूरती में इज़ाफ़ा करती हैं। लेकिन हक़ीक़त यह है कि ये चीज़ें हवा और पानी की तरह ज़रूरी हैं और हर शख़्स को इनका आनंद लेना चाहिए।

    हम इस बात को भूल जाते हैं कि कलात्मक कृतियाँ अभिव्यक्ति के ज़रियों में बहुत प्रभावशाली हैं और वे जज़्बात को भड़काती हैं और ख़यालात को ख़ास रंग में रंगती हैं। थियेटर, सिनेमा, म्यूज़िक हॉल, आर्ट गैलरी वग़ैरह से प्रोपेगैंडा का ज़बरदस्त काम लिया जा सकता है और लिया जाता है। आम एहसासात और ख़यालात को किसी ख़ास रंग में रंगने या किसी ख़ास साँचे में ढालने के लिए जज़्बात और कल्पना बहुत मुफ़ीद और उपयोगी हथियार हैं। जानकारी और तर्क से बहुत ज़्यादा प्रभावशाली और उपयोगी। किसी का कहना है कि मुझे क़ौम का गीत बनाने दो, फिर जिसका जी चाहे उसके क़ानून बनाए। अगर यह बात ठीक है, और इसमें शक की कोई गुंजाइश नहीं, कि जानकारी और तर्क के मुक़ाबले में जज़्बात और कल्पना ज़्यादा आसानी से अवाम के एहसासात और ख़यालात को किसी ख़ास साँचे में ढाल सकते हैं, तो फिर ललित कलाओं की अहमियत स्पष्ट हो जाती है। ललित कलाएँ मानो एक महान ताक़त की मालिक हैं और उन सारे तत्वों पर असर डाल सकती हैं और डालती हैं जो आपस में मिल-जुलकर कल्चर की व्यवस्था क़ायम करते हैं। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं कि ललित कलाओं से दिलचस्पी कल्चर से दिलचस्पी रखने के बराबर है क्योंकि ये कलाएँ कल्चर में केंद्रीय स्थान रखती हैं और इनसे मुँह मोड़ लेना तो बहुत बड़ी ग़लती ही नहीं, ख़ुदकुशी भी है।

    ज़ाहिर है कि ललित कलाएँ वैज्ञानिक का कार्यक्षेत्र नहीं हैं। इस मैदान में तो आलोचना ही हमारा मार्गदर्शन कर सकती है। ज़रूरत है एक ऐसी संस्कृति की जिसकी बुनियाद वहम और गुमान, बनी-बनाई मान्यताओं, रीति-रिवाजों और आदतों पर न हो और जो साथ-साथ बिल्कुल सादी और बेजान क़िस्म की भी न हो, और जिसमें इंसानियत की आत्मा फल-फूल सके और अपनी पूर्णता हासिल कर सके। यह आत्मा का फैलाव और आध्यात्मिक संभावनाओं की पूर्णता, पूर्ण मानसिक और भावनात्मक सुकून महज़ विज्ञान के ज़रिए हासिल नहीं हो सकता। अगर आलोचना राह की मशाल न हो तो फिर हम इस मंज़िल तक नहीं पहुँच सकते। आलोचना हमें ऐतिहासिक चेतना अता करती है और यह ऐतिहासिक चेतना हमें यह देखना सिखाती है कि अतीत अतीत भी है और वर्तमान भी। यह एहसास हमें सामयिक और शाश्वत चीज़ों को अलग-अलग और फिर एक साथ दिखाता है। पिछली संस्कृति की चेतना, उसके बेहतरीन तत्वों की पहचान, सामयिक और शाश्वत चीज़ों का एहसास, अंदरूनी ज़िंदगी का ज्ञान, यह ख़याल कि इंसानी ज़िंदगी एक लगातार और व्यवस्थित सिलसिला है और इस निरंतरता को बाक़ी रखना ज़रूरी है, यह सारी बातें विज्ञान की नज़र के दायरे से बहुत दूर हैं। हुस्न के ये फूल तो आलोचना की सुंदर दृष्टि के ही कारण खिलते हैं।

    यह तो मानी हुई बात है कि इंसान के विकास का इतिहास हर क़िस्म के झगड़ों, हर तरह की कशमकशों से भरा पड़ा है। ख़यालात का टकराव, विभिन्न प्रकार के दर्शनों, धर्मों और सभ्यताओं का विवाद तो बराबर होता आया है। यह टकराव, यह विवाद ज़िंदगी का सुबूत है, लेकिन इसकी वजह से बहुत बड़ा नुक़सान भी होता है और वह यह कि इंसानियत अगर एक क़दम आगे बढ़ती है तो चार क़दम पीछे भी हट जाती है। अगर कुछ अच्छी बातें होती हैं तो बहुत सी ख़राबियाँ भी पैदा हो जाती हैं। हमारी कोशिश यह होनी चाहिए कि किसी क़िस्म का नुक़सान न हो, बेकार ज़ुल्म और तबाही न हो, बिना ज़रूरत बेरहमी और हैवानियत न हो, लेकिन बराबर ऐसा ही होता है जिससे इस बात का पता चलता है कि सभ्यता और तरक़्क़ी के बावजूद भी बर्बरता हमारा पीछा नहीं छोड़ती।

    आपने ख़याल किया होगा कि जब कोई जंग होती है तो बर्बरता का दरवाज़ा खुल जाता है। अच्छे रुझानों पर बुरे रुझान और जज़्बात छा जाते हैं। बेरहमी, नाइंसाफ़ी, बेईमानी, ख़ूँख़्वारी और हैवानियत का राज आम हो जाता है। वहशी अगर आपस में लड़ते हैं तो उसकी कोई स्वाभाविक वजह होती है। अगर कोई उनकी इच्छाओं में दख़ल देता है या उनके सामाजिक ढाँचे को तबाह करने पर उतारू होता है तो वे लड़ पड़ते हैं। सभ्य होने के बाद भी हम कुछ इसी क़िस्म की चीज़ों के लिए लड़ते हैं लेकिन असली वजह को ज़ाहिर नहीं होने देते हैं। अपने को और दूसरों को धोखा देने की कोशिश करते हैं और कहते हैं कि हम किसी ख़याल या किसी आदर्श के लिए लड़ते हैं। किसी पागल को देश हड़पने की हवस होती है या किसी क़ौम को किसी क़ौम के बड़प्पन या ख़ुशहाली से जलन होती है और लड़ाई का बखेड़ा खड़ा हो जाता है, लेकिन असली वजह को हम छिपाने की कोशिश करते हैं और ज़ाहिर तौर पर लड़ते हैं तो इंसाफ़ के लिए, सच्चाई के लिए, इंसानियत के लिए लड़ते हैं। कभी-कभी ऐसा भी होता है कि वाक़ई ख़यालात में टकराव होता है।

    ख़ैर यह कारण कुछ भी हो। जहाँ जंग होती है तो इंसानियत को एक ज़बरदस्त धक्का लगता है। तरक़्क़ी की राहें बंद हो जाती हैं। अवांछित तत्व उभर आते हैं और बेकार ख़ून-ख़राबा होता है, लेकिन यहाँ सवाल सिर्फ़ जानें जाने का नहीं है। आख़िर महामारी आती है तो बहुत सी जानें जाती हैं। सवाल मानव जाति के अस्तित्व से भी ज़्यादा अहम है। इंसानियत के सामने कोई मक़सद है, कोई दूर, ऊँची मंज़िल है और उसे इस मक़सद को हासिल करना है, इस मंज़िल तक पहुँचना है। अगर यह मक़सद हासिल न हो, अगर हम मंज़िल से दूर थक कर या भटक कर रह जाएँ तो यह इंसानियत की हार होगी और यह हार मानव जाति के ख़त्म हो जाने से ज़्यादा अफ़सोसनाक होगी। अगर किसी दिन अचानक कोई भूला-भटका सितारा दुनिया से टकरा जाए तो दुनिया और इंसानियत दोनों ख़त्म हो जाएँगे, लेकिन यह ख़याल बर्दाश्त किया जा सकता है। जो बात बर्दाश्त नहीं हो सकती वह इंसानियत की ख़ुदकुशी है, लेकिन ऐसा मालूम होता है कि इंसानियत ख़ुदकुशी पर तुली हुई है।

    हर समझदार आदमी चाहता है कि कोई ऐसी सूरत निकल आए जिससे इंसान की तरक़्क़ी आसान हो जाए, जो कशमकशें होती हैं और उनकी वजह से जो नुक़सान होता है वह नुक़सान न हो। इस नुक़सान से बचने की बस एक ही सूरत है और वह यह कि हम दोहरा तालमेल हासिल कर लें। एक तो अंदरूनी तालमेल है और इसको हासिल करने का रास्ता यह है कि हमारी मानसिक, आध्यात्मिक और भावनात्मक ज़रूरतें और रुझान संतुलित हो जाएँ और उनमें किसी तरह का टकराव और खिंचाव बाक़ी न रहे। दूसरा बाहरी तालमेल है। यानी इंसान और उसके माहौल में किसी क़िस्म की कशमकश न हो और इस कशमकश की वजह से किसी क़िस्म की बेचैनी न हो बल्कि मुकम्मल सहमति, एकता और तालमेल हो जाए। यह दोहरा तालमेल विज्ञान के बस की बात नहीं। यह तो आलोचना ही अता कर सकती है।

    इंसानियत की राह में बहुत से ख़तरनाक मुक़ाम आते हैं और उस वक़्त उसे बहुत बड़े ख़तरे का सामना करना पड़ता है, लेकिन हम हैं कि बिल्कुल बेख़बर हैं, ज़रा भी ख़तरे का एहसास नहीं। मामूली आदमी इत्मीनान की मीठी नींद सोता है। उसे ख़याल भी नहीं होता कि उसे कुछ करना है, किसी ख़तरे का मुक़ाबला करना है। वजह यह है कि उसकी आत्मा आज़ाद नहीं और जहाँ आज़ादी नहीं वहाँ सूझ-बूझ भी मुमकिन नहीं। आदत, नियम-क़ानून, जनमत का डर, इस दुनिया में और दूसरी दुनिया में सज़ा का ख़ौफ़, बहुत सारी चीज़ें जो ज़िंदगी के ख़िलाफ़ हैं, जिनमें कोई जोश और ऊर्जा नहीं, यह सब मिलकर उसकी आत्मा पर हुकूमत करती हैं और उसके बदन को इधर से उधर धकेलती रहती हैं। आलोचना हमें मामूलीपन के फंदे से छुड़ाती है और हमारी आत्मा को आज़ाद बनाती है और उसको जोश और ऊर्जा भी अता करती है। इंसान के अंधेपन और इस अंधेपन की वजह से जो ख़तरे पैदा हो गए हैं, उन्हें दिन की रोशनी में ले आती है। वह बताती है कि हमारी नई सभ्यता ज़िंदा दफ़न है और इसका एक ही इलाज है, यानी ज़िंदगी आत्मा का एक लगातार गीत बन जाए।

    कुछ लोगों का ख़याल है कि सभ्यता ने जो यह ख़तरनाक सूरत अख़्तियार कर ली है उसकी वजह सिर्फ़ यह है कि इंसान अपने विकास के दौरान ग़लत रास्ते पर चल पड़ा। उसने अपनी मानसिक ताक़तों को तरक़्क़ी तो दी लेकिन जज़्बात और रुझानों की तरफ़ से कुछ बेपरवाह सा हो गया। इसलिए अब हमें अगर मुक्ति मिल सकती है तो इस तरह कि हम अपने जज़्बात और रुझानों को तरक़्क़ी दें, इसलिए कि गहरे जज़्बात के ज़रिए ही हम ब्रह्मांड के साथ तालमेल महसूस कर सकते हैं, इस क़िस्म की एकता का एहसास कर सकते हैं जो कहते हैं कि सूफ़ी को मयस्सर है। गहरे जज़्बात के ज़रिए ही हम ज़िंदगी की उस लौ से बाख़बर हो सकते हैं जो ब्रह्मांड के सीने में रोशन है। बात यह है कि ऐसा महसूस होता है कि इंसानियत की जड़ें ज़मीन से उखड़ गई हैं और ज़रूरत इस बात की है कि जड़ें फिर मज़बूत हो जाएँ और फिर हमें उसी एकता का ज़िंदा एहसास लौट आए जो पहले मयस्सर था।

    इस मुश्किल में तनक़ीद (आलोचना) ही मुश्किल हल कर सकती है। ज़रूरत इस बात की है कि पहले हम मानसिक प्रांतीयता और कट्टर राष्ट्रवाद से छुटकारा पा लें और हमारी ज़िंदगी का जो ढंग हो बस उसी तक हमारी नज़र सीमित न हो और उसी को हम सबसे अच्छा न समझते रहें। विचारों और कल्चर की दुनिया में सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्ताँ हमारा कहने से काम नहीं चल सकता है। दूसरी तरह की ज़िंदगियों, दूसरे क़िस्म के कल्चरों से वाक़िफ़ होना चाहिए। इसकी जानकारी के बिना हम कोई फ़ैसला नहीं कर सकते। तनक़ीद हमें वतन से बाहर यात्रा करना, बड़े पैमाने पर नए-नए मुल्कों की खोज लगाना सिखाती है। हमें सुनहरे प्रदेशों में ले जाती है। अगर ऐसा न हो तो हमारी निगाहों पर पर्दे पड़े रहेंगे और हम तंग क़िस्म के राष्ट्रवाद और घमंड का शिकार हो जाएँगे।

    यह कहने की शायद ज़रूरत नहीं कि हम एक ख़ास रंग में सोचने और महसूस करने के आदी हो जाते हैं। हमें इसकी ख़बर तो नहीं होती लेकिन हमारा दिमाग़ लकीर का फ़क़ीर हो जाता है और हम सही और आज़ाद तौर पर सोचने और महसूस करने की क़ाबिलियत खो बैठते हैं। अलग-अलग क़ौमों के बीच ज़बरदस्त दीवारें खड़ी हो जाती हैं। नस्ल, धर्म, शिक्षा, नैतिकता, कल्चर, दर्शन, सब अपने-अपने तौर पर अलग-अलग क़िस्म की रुकावटें पैदा करते हैं और हम समझने लगते हैं कि अलग-अलग समुदाय जज़्बात और विचारों की अलग-अलग दुनियाओं में बसते हैं। नक़्क़ाद (आलोचक) को इस क़िस्म की कमज़ोरी से बचना चाहिए, लेकिन अफ़सोस यह है कि अक्सर नक़्क़ाद का दिमाग़ भी लकीर का फ़क़ीर हो जाता है और किसी दूसरी दुनिया में साँस लेने में उसे मुश्किल मालूम होने लगती है। जिस क़िस्म की मुश्किल की तरफ़ मैंने इशारा किया है वह एलियट के इस बयान से साफ़ हो जाती है:

    अगर किसी को चीनी ज़बान का इल्म न हो और उसने बेहतरीन चीनी सोसाइटी में अपनी ज़िंदगी का एक लंबा अरसा न गुज़ारा हो तो वह कन्फ्यूशियस को समझ नहीं सकता। मैं चीनी दिमाग़ और चीनी तहज़ीब को बहुत क़द्र की निगाह से देखता हूँ और मैं यह मानने के लिए भी तैयार हूँ कि बेहतरीन चीनी तहज़ीब में ऐसी बहुत सी ख़ूबियाँ और नज़ाकतें हैं जिनके सामने पश्चिमी तहज़ीब भद्दी और बदनुमा मालूम होती है, लेकिन मैं यह मानने के लिए तैयार नहीं कि मैं कन्फ्यूशियस को इतनी अच्छी तरह समझ सकूँगा कि उसे अपना सकूँ।

    मेरा ख़याल है कि एलियट को मुश्किल का ज़रूरत से ज़्यादा एहसास है। मुश्किल तो ज़रूर है लेकिन उसे ज़रूरत से ज़्यादा अहमियत दी गई है। फिर एलियट के बयान में कुछ विरोधाभास भी है। जिसको वाक़ई यक़ीन हो कि बेहतरीन चीनी तहज़ीब की ख़ूबियों और नज़ाकतों के सामने पश्चिमी तहज़ीब भद्दी और बदनुमा है, तो उसको ज़रूर यह ख़्वाहिश होनी चाहिए कि जिस तरह भी हो, इस मक़सद को हासिल करने में कुछ भी तकलीफ़ क्यों न हो, वह इन ख़ूबियों और नज़ाकतों को हासिल कर ले। कोई व्यावहारिक और भावनात्मक वजह हमें ज़िंदगी को बेहतर बनाने में आड़े नहीं आ सकती और न आनी चाहिए। जो मुश्किलें भी सामने आएँ उन्हें आसान करना चाहिए। एलियट के कहने का निचोड़ बस इतना ही है कि वह भी कुछ लकीर के फ़क़ीर क़िस्म का है और बँधे हुए रास्ते से अलग नहीं होना चाहता और वह पूरी-पूरी कोशिश करने से भागता है। अगर उसकी दिलचस्पी सच्ची होती तो वह इस कोशिश के लिए तैयार हो जाता। फिर एक बात यह भी हो सकती है कि एलियट में कोई ख़ास कमी है जिसकी वजह से वह कन्फ्यूशियस को पूरी तरह समझने में असमर्थ है।

    हाँ, एक दूसरी मुश्किल भी पेश आती है और वह इज़हार के ज़राए (अभिव्यक्ति के माध्यम) से जुड़ी है। रिचर्ड्स ने दिखाया है कि मेन्सियस के मनोवैज्ञानिक विचार को समझना और समझाना बहुत मुश्किल है, यूँ समझिए कि नामुमकिन है। रिचर्ड्स का कहना है कि जिन दिमाग़ों के बारे में मेन्सियस बातचीत करता है, उनकी बनावट और ख़ुद उसके दिमाग़ की बनावट पश्चिमी दिमाग़ों की बनावट से कुछ अलग थी और फिर उसके सोचने और बोलने की आदत और ढंग भी कुछ दूसरा था। यह मानता हूँ कि ये मुश्किलें हैं और किसी मामूली आदमी के लिए ये मुश्किलें ऐसी हैं कि वह इन्हें आसान नहीं कर सकता है, लेकिन तनक़ीद की मदद से ये मुश्किलें दूर हो सकती हैं। तनक़ीद हमारी मानसिक तरबियत (प्रशिक्षण) कर सकती है और हमें ऐसी क़ाबिलियत देती है जिससे हम इस क़िस्म की मुश्किलों का मुक़ाबला कर सकते हैं। तनक़ीद विचारों और ज़िंदगी के नित-नए ढंग का सही एहसास देती है और यह बताती है कि हर समाज का अंदरूनी निज़ाम (व्यवस्था) और एहसासात व जज़्बात का तौर-तरीक़ा अलग-अलग तहज़ीब में अलग होता है और हर कल्चर में जज़्बात का पेचीदा निज़ाम अलग होता है। सूझ-बूझ, संवेदनशील समझ, कल्पना और अलग-अलग कल्चरों से परिचय, फिर सच्ची दिलचस्पी और ज़रूरी कोशिश, अगर ये सब चीज़ें हों तो फिर कोई मुश्किल बाक़ी नहीं रहती।

    हमें एक ऐसी ज़िंदगी, एक ऐसे कल्चर की बुनियाद डालनी है जो वैश्विक (आलमगीर) हो। इस क़िस्म का कल्चर बिना कोशिश के मुमकिन नहीं। हमारी भरसक कोशिश यही होनी चाहिए कि जिन क़द्रों (मूल्यों) को हम क़ीमती समझते हैं वे वैश्विक हो जाएँ और वे तमाम क़ीमती क़द्रें जो हम दूसरे कल्चरों में पाते हैं, हमारी मिल्कियत हो जाएँ। इसी तरह एक वैश्विक कल्चर की बुनियाद पड़ सकती है। यह उसी वक़्त मुमकिन है जब हम वाक़ई वैश्विक कल्चर की ज़रूरत समझें और मुश्किलों से घबराएँ नहीं। ज़िंदगी का वह ढंग जो हमें विरासत में मिला है, उससे वफ़ादारी ज़रूरी है लेकिन यह भी ज़रूरी है कि वफ़ादारी तंग नज़र और ग़ैर-आलोचनात्मक न हो। अगर ऐसा हुआ तो फिर आज़ादी के साथ दूसरे कल्चरों की खोज लगाना मुमकिन न होगा और उनके बेहतरीन हिस्सों को अपनाने में हम कामयाब न होंगे।

    कल्चर शून्य (ख़ला) में साँस नहीं लेता है। अगर किसी एक कल्चर को दूसरे कल्चरों से बिल्कुल अलग करके देखें तो हम उसकी असली सार्थकता और उसकी सही क़द्र-ओ-क़ीमत को नहीं समझ सकते हैं। एक तरफ़ तो हमें चाहिए कि हम उसका अतीत की रोशनी में जायज़ा लें और निरंतरता के एहसास को क़ायम रखने की कोशिश करें। दूसरी ज़्यादा अहम बात यह है कि हम उसका दूसरे कल्चरों से मुक़ाबला और तुलना करें। इस सूरत में उसकी सार्थकता और उसकी क़द्र-ओ-क़ीमत रौशन हो सकती है। ज़ाहिर तौर पर एक कल्चर किसी दूसरे कल्चर से बिल्कुल अलग मालूम होता है। कभी यह भी देखने में आता है कि उनमें बुनियादी टकराव है, लेकिन हमें यह न भूलना चाहिए कि मतभेद और टकराव के बावजूद सबमें इंसानियत की रूह दौड़ती है, जो हर आईने में अपनी सूरत देखना चाहती है और अपने हुस्न का निखार दिखाना चाहती है। यही हक़ीक़त है जो हमें तनक़ीद सिखाती है। अगर हम इसे भूल जाएँ तो फिर हमारी ज़िंदगी संतोषजनक नहीं हो सकती।

    वफ़ादारी ज़रूरी है लेकिन यह वफ़ादारी इंसानियत के साथ हो। वह इंसानियत जो अपना जलवा अलग-अलग रंग में दिखाती है और जो थोड़ी देर के लिए जल्द गुज़र जाने वाले रूपों के ज़रिए अपनी झलक दिखाती है। इंसानियत ने अपने लिए बहुत से आलीशान महल बनाए हैं। तनक़ीद हमें ताकीद (चेतावनी) करती है कि हम किसी एक महल में रहकर उसे सारी दुनिया न समझ लें। यह तनक़ीद की देन है कि हम वतन, नस्ल, माहौल, निजी विशेषताओं और पूर्वाग्रहों की तंग नज़री से छुटकारा पा लेते हैं और अपनी रूह को इंसानियत की रूह में जज़्ब करके सारे महलों की सैर कर सकते हैं। तनक़ीद यह भी सीख देती है कि हम इंसानियत के लिए एक आलीशान महल तामीर करें जिसमें सारे झगड़े फ़ना हो जाएँ और इंसानियत पूरी शांति की साँस ले सके।

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