कुलदीप कुमार के शेर
दरख़्त करते नहीं इस लिए उमीद-ए-वफ़ा
वो जानते हैं परिंदों के पर निकलते हैं
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मौसम-ए-याद यूँ उजलत में न वारे जाएँ
हम वो लम्हे हैं जो फ़ुर्सत से गुज़ारे जाएँ
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टैग : याद
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मैं हार जाता हूँ उन दो उदास आँखों से
मुझे सफ़र का इरादा बदलना पड़ता है
तुम्हारा क्या गया गर थोड़ा सा क़रार गया
ये दुख तो मेरा है ऐ दिल मिरा तो यार गया
मैं उस के 'इश्क़ नहीं हौसले का क़ाइल हूँ
सियाह शब था मैं फिर भी मुझे गुज़ार गया
तमाम नेकियाँ मिल कर मुझे बचा न सकीं
बस इक गुनाह अकेला ही मुझ को मार गया
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टैग : गुनाह
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हमीं बुझाते हैं लौ पहले सब चराग़ों की
फिर इन चराग़ों के हिस्से का जलना पड़ता है