शारिब रुदौलवी के लेख
उर्दू मर्सिया: तलाश-ए-हैअत का सफ़र
उर्दू मर्सिया: हैयत (रूप) की तलाश का सफ़र 1 / 5 उर्दू की तमाम काव्य विधाओं में सिर्फ़ मर्सिया एक ऐसी विधा (सिन्फ़) है जिसने हैयत (रूप/शिल्प) के प्रयोगों का सबसे लंबा सफ़र तय किया है, या यूँ कहिए कि हैयत के क्रमिक विकास का जो सफ़र मर्सिए ने
अनीस के मर्सियों का समाजियाती मुताला
शारिब रदौलवी शायरी को कोई "नवा-ए-सरोश" (फ़रिश्ते की आवाज़) कहता है, कोई इसे जागने और नींद के बीच वजूद में आने वाली प्रेरणा मानता है, कोई इसे अवचेतन की पैदावार कहता है, किसी की नज़र में यह "ला-शरीक और नामौजूद" (अद्वितीय और अदृश्य) से उभरने वाली एक
वली की ज़बान
ज़बानें हमेशा बदलती रहती हैं। वक़्त के साथ बहुत से अल्फ़ाज़ (शब्द) चलन से बाहर हो जाते हैं और बहुत से नए अल्फ़ाज़ का इज़ाफ़ा हो जाता है (जुड़ जाते हैं)। यही बदलाव या टूट-फूट ही ज़बान की ज़िंदगी की निशानी है। ज़बान में ये तब्दीलियां इतनी तेज़ी से आती
मरासी-ए-अनीस में जमालियाती अनासिर
शायरी में जब कलाकारी या उसके उच्च स्तर का ज़िक्र आता है तो सबसे पहले ज़ेहन सौंदर्यपरक मूल्यों (जमालियाती क़दरों) की तरफ़ जाता है। यानी अगर कोई कलाकृति सौंदर्य के लिहाज़ से कमज़ोर है तो उसे उच्च दर्जे की रचना नहीं माना जा सकता। सौंदर्यशास्त्र (जमालियात)
मरासी-ए-दबीर में मज़मून-आफ़रीनी का अमल
मिर्ज़ा दबीर उर्दू मर्सिए की अज़मत (महानता) के बुनियादी स्तंभों में हैं, लेकिन इसके बावजूद उनकी शायरी हमेशा सवालिया निशानों की ज़द पर रही। मेरे ख़्याल में इसका बुनियादी सबब यह है कि दबीर को दबीर की शक्ल में नहीं देखा गया। उनकी आलोचना और विश्लेषण पर हमेशा
मीर अनीस के मर्सियों में तस्वीर-कशी का फ़न
मर्सिया उर्दू शायरी की एक ऐसी सिन्फ़ (विधा) है जिसकी कोई मिसाल किसी दूसरी ज़बान में नहीं मिलती। दूसरी ज़बानों में कुछ व्यक्तिगत मर्सिये ज़रूर मिल जाएंगे लेकिन उनमें वह फैलाव और व्यापकता नहीं जो उर्दू मर्सिये में है। उर्दू मर्सियों में ऐसी सौंदर्यपरक