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आफ़ताब अहमद आफ़ाक़ी का परिचय
प्रोफेसर आफ़ताब अहमद आफ़ाक़ी (जन्म: 10 जनवरी 1965) का पैतृक गाँव कुबरा ख़ुर्द (वर्तमान झारखंड) है। उनका पालन-पोषण ननिहाल और ददिहाल दोनों की विद्वतापूर्ण एवं साहित्यिक वातावरण में हुआ। प्रारंभिक शिक्षा गाँव के उर्दू मिडिल स्कूल से सातवीं तक प्राप्त की। मानसिक और वैचारिक निर्माण में उनके नाना, माता और प्रसिद्ध विद्वान शिक्षक मौलवी शरफ़ुद्दीन साहब का महत्वपूर्ण योगदान रहा, जिन्होंने उन्हें बचपन में ही उर्दू भाषा की महत्ता और उसके सांस्कृतिक, साहित्यिक और धार्मिक खज़ाने से परिचित कराया।
घर में उर्दू का चलन था — बचपन में दास्तान-ए-अमीर हमज़ा पढ़ डाली और राशिद-उल-ख़ैरी की किताबों से भी लगाव रहा। बच्चों का पत्रिका ग़ुंचा और मदीना अख़बार नियमित पढ़ते थे। उन्होंने माध्यमिक शिक्षा रहमानिया हाई स्कूल, तारा पलामू से पूरी की और रांची विश्वविद्यालय से बी.ए., एम.ए. और पी.एच.डी. की उपाधियाँ प्राप्त कीं। वहाँ उन्हें प्रो. वहाब अशरफ़ी, प्रो. एस. अख़्तर, प्रो. अबूज़र उस्मानी, प्रो. अहमद सज्जाद, प्रो. सईमुल हक़ और प्रो. सिद्दीक मुजीबी जैसे विद्वानों کی शिष्यता का अवसर मिला।
1993 में स्टाफ़ सेलेक्शन कमीशन (दिल्ली) की परीक्षा पास करने के बाद दिल्ली म्यूनिसिपल कॉरपोरेशन स्कूल में उर्दू शिक्षक नियुक्त हुए और लगभग बारह वर्ष तक सेवा दी। इस दौरान वे सेमिनारों, गोष्ठियों और साहित्यिक चर्चाओं में सक्रिय रूप से शामिल रहे। उन्हें प्रो. क़मर रईस, ख़लीक़ अंजुम, तनवीर अहमद अलवी, प्रो. अब्दुल हक़, प्रो. अतीक़ुल्लाह, और रशीद हसन ख़ाँ जैसे विद्वानों से निकट संबंध और मार्गदर्शन मिला। वे दिल्ली विश्वविद्यालय में रिसर्च एसोसिएट भी रहे।
2003 में वे बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) के उर्दू विभाग में लेक्चरर नियुक्त हुए, 2018 में प्रोफेसर और बाद में विभागाध्यक्ष बने, और वर्तमान में भी यही पद संभाल रहे हैं। उनकी संपादकीय देखरेख में द्विवार्षिक शोध पत्रिका “दस्तक” के पंद्रह से अधिक विशेषांक प्रकाशित हो चुके हैं। यह पत्रिका अब राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक प्रतिष्ठित संदर्भ पत्रिका के रूप में स्थापित है।
प्रो. आफ़ाक़ी उर्दू के एक गंभीर और प्रतिष्ठित आलोचक-शोधकर्ता हैं। उनके अनेक लेख और शोध-पत्र विभिन्न प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहते हैं। उनकी प्रमुख रचनाएँ हैं —
“मौलूद शरीफ़-ए-हाली: तआरुफ़ व तुह्शिया” (2001), “क्लासिकी नस्र के असालीब” (2003, 2010), “मोहम्मद अली जौहर: शख्स और शायर” (2004), “मअनी शनासी” (2007), “शिकस्त की आवाज़” (2015), “काज़ी अब्दुल वदूद: मोनोग्राफ” (2016), “मज़ामीन-ए-चकबस्त” (2016), “उर्दू-हिंदी मुहावरे” (2018), “सलाम मछलीशहरी: मोनोग्राफ” (साहित्य अकादमी, 2022), “इमदाद इमाम असर: मोनोग्राफ” (उर्दू निदेशालय, पटना, 2023), “फ़नकार से फ़न तक” (2024) आदि।
उनकी आगामी पुस्तकें हैं — “उर्दू नस्र में हाली के कारनामे,” “तारीख़-ए-तहक़ीक़ व तद्वीन,” “उर्दू-हिंदी की साझी विरासत (हिंदी),” और “तज़किरा-ए-शाइरात-ए-उर्दू।”
वे देश की कई विश्वविद्यालयों और अकादमिक संस्थाओं के बोर्ड ऑफ़ स्टडीज़ के सदस्य हैं, और उत्तर प्रदेश उर्दू अकादमी, बिहार उर्दू अकादमी, तथा दिल्ली उर्दू अकादमी सहित अनेक संस्थाओं से सम्मानित हो चुके हैं।संबंधित टैग
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