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आदिल रशीद का परिचय
मूल नाम : सय्यद मंजूरुल हक़
जन्म : 20 Nov 1920 | इलाहाबाद, उत्तर प्रदेश
निधन : 03 Jan 1972 | मुंबई, महाराष्ट्र
पहचान: लोकप्रिय साहित्य (मक़बूल-ए-आम अदब) के प्रसिद्ध उपन्यासकार, बहुप्रज लेखक, अफ़सानानिगार और संपादक।
उर्दू साहित्य के इतिहास में लोकप्रिय साहित्य हमेशा पाठकों की पसंद रहा है, लेकिन आलोचकों ने हमेशा इसे नज़रअंदाज़ किया। इसी श्रेणी के एक महान लेखक आदिल रशीद थे, जिनके उपन्यास एक दौर में हाथों-हाथ लिए जाते थे, लेकिन वक़्त की गर्द ने उनके फन (कला) को वह मक़ाम नहीं दिया जिसके वे हक़दार थे।
आदिल रशीद का असली नाम सैयद मंज़ूर-उल-हक़ था। उनका जन्म 20 नवंबर 1920 को अपने ननिहाल नारा (ज़िला इलाहाबाद) में हुआ था। वह एक ज़मींदार और शिक्षित परिवार से ताल्लुक रखते थे। उनके पिता सैयद मोहम्मद फ़ज़्ल-उल-हक़ इलाके के रईस ज़मींदार थे, जबकि उनके दादा और परदादा माहिर हकीम थे। उनकी माँ अमतुल-फ़ातिमा उन्हें अदीब (लेखक) या बैरिस्टर बनाना चाहती थीं, लेकिन जब आदिल सिर्फ 8 साल के थे, उनका इंतक़ाल हो गया। कुदरत ने माँ की यह तमन्ना पूरी की और आदिल रशीद उर्दू साहित्य के एक बड़े स्तंभ बनकर उभरे।
सिर्फ 15 साल की उम्र में उन्होंने अपनी पहली कहानी 'क़र्ज़' लिखी, जो कानपुर के रिसाले (पत्रिका) 'मस्तूरात' में छपी। शुरुआत में वह 'सैयद मोहम्मद मंज़ूर-उल-हक़ मईवी' के नाम से लिखते थे, बाद में शायरी में 'आदिल' तखल्लुस अपनाया और फिर 'आदिल रशीद' के नाम से शोहरत पाई। उनकी ज़िंदगी कड़े संघर्षों से भरी रही; बचपन में माता-पिता का साया उठना और रोज़गार की तलाश उन्हें दिल्ली और फिर मुंबई ले गई।
मुंबई में उन्होंने फ़िल्मी कहानीकार के रूप में कड़ी मेहनत की। हालाँकि उन्हें ए.आर. कारदार जैसे फ़िल्मकारों के झूठे वादों की वजह से फाकाकशी (भुखमरी) भी झेलनी पड़ी, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। वह 'शाहिद' और 'हिजाब' जैसी मशहूर पत्रिकाओं के संपादक भी रहे। उनके व्यक्तित्व का एक उज्ज्वल पहलू दूसरों की मदद करना था। उन्होंने हाजरा मसरूर जैसे लेखकों को अदबी दुनिया से रूबरू कराया और कृष्ण चंदर जैसे दोस्तों की आर्थिक मदद के लिए अपने काम तक की कुर्बानी दी।
आदिल रशीद एक बहुत तेज़ लिखने वाले लेखक थे। उन्होंने लगभग 150 उपन्यास, कई कहानियाँ और तज़किरे (जीवनी) लिखे। उनका पहला उपन्यास 'मीर साहब' (1944) बेहद मशहूर हुआ। उनके अन्य प्रसिद्ध उपन्यासों में 'लरज़ते आँसू', 'दुल्हन', 'सुषमा' और 'चौदहवीं का चाँद' शामिल हैं। उपन्यासों के अलावा उनकी अहम सेवाओं में रिपोर्ताज 'खिज़ाँ के फूल' (1949), 'फ़िल्मी मोहरे' (जिसमें दिलीप कुमार और नरगिस जैसी 44 हस्तियों के खाके हैं) और बच्चों के लिए 'चूहों की हुकूमत' जैसी कहानियाँ शामिल हैं। उनका अंदाज़-ए-बयां सादा लेकिन दिलकश था।
निधन: 3 जनवरी 1972 को मुंबई के नानावती अस्पताल में उनका इंतक़ाल हुआ।
सहायक लिंक : | http://www.bio-bibliography.com/authors/view/11414
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