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बशीरुद्दीन अहमद देहलवी

1861 - 1927

प्रतिष्ठित साहित्यिकार, शायर, दकन और दिल्ली के इतिहास पर अपनी यादगार किताबों के लिए प्रसिद्ध

प्रतिष्ठित साहित्यिकार, शायर, दकन और दिल्ली के इतिहास पर अपनी यादगार किताबों के लिए प्रसिद्ध

बशीरुद्दीन अहमद देहलवी के शेर

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चराग़ उस ने बुझा भी दिया जला भी दिया

ये मेरी क़ब्र पे मंज़र नया दिखा भी दिया

बंधन सा इक बँधा था रग-ओ-पय से जिस्म में

मरने के ब'अद हाथ से मोती बिखर गए

कभी दर पर कभी है रस्ते में

नहीं थकती है इंतिज़ार से आँख

अहद के साथ ये भी हो इरशाद

किस तरह और कब मिलेंगे आप

वो अपने मतलब की कह रहे हैं ज़बान पर गो है बात मेरी

है चित भी उन की है पट भी उन की है जीत उन की है मात मेरी

ज़ोर से साँस जो लेता हूँ तो अक्सर शब-ए-ग़म

दिल की आवाज़ अजब दर्द भरी आती है

ये उन का खेल तो देखो कि एक काग़ज़ पर

लिखा भी नाम मिरा और फिर मिटा भी दिया

ये छेड़ क्या है ये क्या मुझ से दिल-लगी है कोई

जगाया नींद से जागा तो फिर सुला भी दिया

रिहाई जीते जी मुमकिन नहीं है

क़फ़स है आहनी दर-बंद पर बंद

कहते हैं अर्ज़-ए-वस्ल पर वो कहो

दूसरी बात दूसरा मतलब

मिरा दिल भी तिलिस्मी है ख़ज़ाना

कि इस में ख़ैर भी है और शर बंद

शाम भी है सुब्ह भी है और दिन भी रात भी

माह-ए-ताबाँ अब भी है महर-ए-दरख़्शाँ अब भी है

Recitation

aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI